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Full text of "bhagwat-geeta"

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परिशिष्टसहित ) 


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॥ ३» श्रीपरमात्मने नमः ॥ 6 


श्रीमद्‌ 
भगत्रद्गीता 


सचित्र साधक - संजीवनी 
( परिशिष्टसहित ) हिन्दी-टीका 





















॥ 


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सं० २०७५ पंचानबेवाँ पुनर्मुद्रण १०,००० 
कुल मुद्रण ९,२०,५०० 


% मूल्य--₹ २७० 
(दो सौ सत्तर रुपये ) 


प्रकाशक एवं मुद्रक 

गीताप्रेस, गोरखपुर २७३००५ 

( गोबिन्दभवन-कार्यालय, कोलकाता का संस्थान ) 

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॥ श्रीहरि: ॥ 
नग्न निवेदन 


विश्व-साहित्यमें श्रीमद्धगवद्गीताका अद्वितीय स्थान है। यह साक्षात्‌ भगवानूके श्रीमुखसे निःसृत परम 
रहस्यमयी दिव्य वाणी है। इसमें स्वयं भगवानूने अर्जुनको निमित्त बनाकर मनुष्यमात्रके कल्याणके लिये उपदेश दिया 
है। इस छोटे-से ग्रन्थमें भगवानूने अपने हृदयके बहुत ही विलक्षण भाव भर दिये हैं, जिनका आजतक कोई पार नहीं 
पा सका और न पा ही सकता है। 
हमारे परमश्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराजने इस अगाध गीतार्णवमें गहरे उतरकर अनेक गुह्वातम 
अमूल्य रत्न ढूँढ़ निकाले हैं, जिन्हें उन्होंने इस 'साधक-संजीवनी' हिन्दी-टीकाके माध्यमसे साधकोंके कल्याणार्थ 
उदारहदयसे वितरित किया है। गीताकी यह टीका हमें अपनी धारणासे दूसरी टीकाओंकी अपेक्षा बहुत विलक्षण 
प्रतीत होती है। हमारा गीताकी दूसरी सब टीकाओंका इतना अध्ययन नहीं है, फिर भी इस टीकामें हमें अनेक 
श्लोकोंके भाव नये और विलक्षण लगे; जैसे-- पहले अध्यायका दसवाँ, उन्नीसवाँ-बीसवाँ और पचीसवाँ श्लोक; 
दूसरे अध्यायका उनतालीसवाँ-चालीसवाँ श्लोक; तीसरे अध्यायका तीसरा, दसवाँ, बारहवाँ-तेरहवाँ और तैंतालीसवाँ 
श्लोक; चौथे अध्यायका अठारहवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; गाँचवें अध्यायका तेरहवाँ-चौदहवाँ श्लोक; छठे 
अध्यायका बीसवाँ और अड़तीसवाँ श्लोक; सातवें अध्यायका पाँचवाँ और उन्नीसवाँ श्लोक; आठवें अध्यायका छठा 
श्लोक; नवें अध्यायका तीसरा और इकतीसवाँ श्लोक; दसवें अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक; ग्यारहवें अध्यायका 
छब्बीसवाँ-सत्ताईसवाँ और पैंतालीसवाँ-छियालीसवाँ श्लोक; बारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक; तेरहवें अध्यायका 
पहला और उन्नीसवाँ-बीसवाँ-इक्कीसवाँ श्लोक; चौदहर्वे अध्यायका तीसरा, बारहवाँ, सत्रहवाँ और बाईसवाँ 
श्लोक; पन्रहवें अध्यायका सातवाँ और ग्यारहवाँ श्लोक; सोलहवें अध्यायका पाँचवाँ और बीसवाँ श्लोक; सत्रहवे 
अध्यायका सातवाँ, आठवाँ, नवाँ, दसवाँ श्लोक; अठारहवें अध्यायका सैंतीसवा और तिहत्तरवाँ श्लोक आदि- 
आदि। अगर पाठक गम्भीर अध्ययन करें तो उसे और भी कई श्लोकोंमें आंशिक नये-नये भाव मिल सकते हैं। 
वर्तमान समयमें साधनका तत्त्व सरलतापूर्वक बतानेवाले ग्रन्थोंका प्रायः अभाव-सा दीखता है, जिससे 
साधकोंको सही मार्ग-दर्शनके बिना बहुत कठिनाई होती है। ऐसी स्थितिमें परमात्मप्राप्तिके अनेक सरल उपायोंसे युक्त, 
साधकोपयोगी अनेक विशेष और मार्मिक बातोंसे अलंकृत तथा बहुत ही सरल एवं सुबोध भाषा-शैलीमें लिखित 
प्रस्तुत ग्रन्थका प्रकाशन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। 
परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी दिद्वत्ताका प्रदर्शन 
करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो--इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले 
प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी 
बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोके 
अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायँगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी 
सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी। 
परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्तको अवश्य ही 
मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें। 
-- प्रकाशक 
तेंतीसवें संस्करणका नम्र निवेदन 
श्रीमद्भगवद्गीताकी 'साधक-संजीवनी' टीका लिखनेके बाद गीताके जो नये भाव उत्पन्न हुए, उन्हें 
परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजने परिशिष्टके रूपमें लिख दिया। पहले यह परिशिष्ट अलग-अलग तीन भागोंमें 
प्रकाशित किया गया। अब उसे साधक-संजीवनी टीकामें सम्मिलित करके प्रकाशित किया जा रहा है। परिशिष्टके 
साथ-साथ साधक-संजीवनी टीकामें भी कहीं-कहीं आवश्यक संशोधन किया गया है। परिशिष्टमें गीताके अत्यन्त 
गुह्य एवं उत्तमोत्तम भावोंका प्राकट्य हुआ है। अतः आशा है कि पाठकगण साधक-संजीवनीके इस संशोधित तथा 
संवर्धित संस्करणसे अधिकाधिक लाभ उठानेकी चेष्टा करेंगे। 
—प्रकाशक 


3» श्रीपरमात्मने नमः 


साधक-संजीवनी परिशिष्टका 





भगवान्‌ अनन्त हैं, उनका सब कुछ अनन्त है, फिर उनके मुखारविन्दसे निकली हुई गीताके भावोंका अन्त आ ही 
कैसे सकता है? अलग-अलग आचार्योने गीताको अलग-अलग टीका लिखी है। उनकी टीकाके अनुसार चलनेसे 
मनुष्यका कल्याण तो हो सकता है, पर वह गीताके अर्थको पूरा नहीं जान सकता। आजतक गीताकी जितनी टीकाएँ 
लिखी गयी हैं, वे सब-की-सब इकट्टी कर दें तो भी गीताका अर्थ पूरा नहीं होता! जैसे किसी कुएँसे सैकड़ों वर्षोतक 
असंख्य आदमी जल पीते रहें तो भी उसका जल वैसा-का-वैसा ही रहता है, ऐसे ही असंख्य टीकाएँ लिखनेपर भी 
गीता वैसी-की-वैसी ही रहती है, उसके भावोंका अन्त नहीं आता। कुएँके जलकी तो सीमा है, पर गीताके भावोंकी 
सीमा नहीं है। अतः गीताके विषयमें कोई कुछ भी कहता है तो वह वास्तवमें अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है- 'सब 
जानत प्रभु प्रभुता सो्ई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥ ' (मानस, बाल० १३। १)। 

भगवान्‌की वाणी बड़े-बड़े ऋषि-मुनियोंकी वाणीसे भी ठोस और श्रेष्ठ है; क्योंकि भगवान्‌ ऋषि-मुनियोंके भी आदि 
हैं--' अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ' (गीता १०। २) । अतः कितने ही बड़े ऋषि-मुनि, सन्त-महात्मा क्यों न हों 
और उनकी वाणी कितनी ही श्रेष्ठ क्यों न हो, पर वह भगवान्‌की दिव्यातिदिव्य वाणी *गीता' की बराबरी नहीं कर सकती। 

पगडण्डीको 'पद्धति' कहते हैं और राजमार्ग, घण्टापथ अथवा चौड़ी सड़कको “प्रस्थान' कहते हैं। गीता, 
उपनिषद्‌ और ब्रह्मसूत्र-ये तीन प्रस्थान हैं, शेष सब पद्धतियाँ हैं। प्रस्थानत्रयमें गीता बहुत विलक्षण है; क्योंकि इसमें 
उपनिषद्‌ और ब्रह्मसूत्र दोनोंका ही तात्पर्य आ जाता है। 

गीता उपनिषदोंका सार है, पर वास्तवमें गीताकी बात उपनिषदोंसे भी विशेष है । कारणकी अपेक्षा कार्यमें विशेष 
गुण होता है; जैसे-आकाशमें केवल एक गुण 'शब्द' है, पर उसके कार्य वायुमें दो गुण “शब्द और स्पर्श” हैं। 

वेद भगवान्‌के निःश्वास हैं और गीता भगवानको वाणी है । निःश्वास तो स्वाभाविक होते हैं, पर गीता भगवानूने 
योगमें स्थित होकर कही है*। अतः वेदोंकी अपेक्षा भी गीता विशेष है। 

सभी दर्शन गीताके अन्तर्गत हैं, पर गीता किसी दर्शनके अन्तर्गत नहीं है । दर्शनशास्त्रमें जगत्‌ क्या है, जीव क्या है 
और ब्रह्म क्या है--यह पढ़ाई होती है । परन्तु गीता पढ़ाई नहीं कराती, प्रत्युत अनुभव कराती है। 

गीतामें किसी मतका आग्रह नहीं है, प्रत्युत केवल जीवके कल्याणका ही आग्रह है। मतभेद गीतामें नहीं है, प्रत्युत 
टीकाकारोंमें है । गीताके अनुसार चलनेसे सगुण और निर्गुणके उपासकोंमें परस्पर खटपट नहीं हो सकती । गीतामें भगवान्‌ 
साधकको समग्रकी तरफ ले जाते हैं। सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार, द्विभुज, चतुर्भुज, सहस्रभुज आदि सब रूप समग्र 
परमात्माके ही अन्तर्गत हैं। समग्ररूपमें कोई भी रूप बाकी नहीं रहता। किसीकी भी उपासना करें, सम्पूर्ण उपासनाएँ 
समग्ररूपके अन्तर्गत आ जाती हैं। सम्पूर्ण दर्शन समग्ररूपके अन्तर्गत आ जाते हैं। अत: सब कुछ परमात्माके ही अन्तर्गत 
है, परमात्माके सिवाय किंचिन्मात्र भी कुछ नहीं है-इसी भावमें सम्पूर्ण गीता है। 

गीताका तात्पर्य ' वासुदेवः सर्वम्‌ में है। एक परमात्मतत्त्वके सिवाय दूसरी सत्ताको मान्यता रहनेसे प्रवृत्तिका उदय 


*न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः॥ 
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया। (महाभारत, आश्व० १६। १२-१३) 
भगवान्‌ बोले-- वह सब-का-सब उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात नहीं है। उस समय मैंने योगयुक्त 
होकर परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था।' 
योगयुक्त अर्थात्‌ योगमें स्थित होकर गीता कहनेका तात्पर्य है कि सुननेवालेका हित किसमें है? उसके हितके लिये 
क्या कहना चाहिये ? भविष्यमें भी जो सुनेगा अथवा पढ़ेगा, उसका हित किसमें होगा ?--इस प्रकार सभी साधकोंके हितमें 
स्थित होकर गीता कही है। 


[ ङ] 


होता है और दूसरी सत्ताकी मान्यता मिटनेसे निवृत्तिकी दूढ़ता होती है । प्रवृत्तिका उदय होना ' भोग' है और निवृत्तिकी दूढ़ता 
होना “योग' है। गीता “सब कुछ परमात्मा है '--ऐसा मानती है और इसीको महत्त्व देती है । संसारमें कार्यरूपसे, कारणरूपसे, 
प्रभावरूपसे, सब रूपोंसे मैं-ही-मैं हूँ-यह बतानेके लिये ही भगवानूने गीतामें चार जगह (सातवें, नवें, दसवें और पन्द्रहवें 
अध्यायमें) अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। ब्रह्म (निर्गुण-निराकार), कृत्स्न अध्यात्म (अनन्त योनियोंके अनन्त 
जीव), अखिल कर्म (उत्पत्ति-स्थिति-प्रलय आदिकी सम्पूर्ण क्रियाएँ), अधिभूत (अपने शरीरसहित सम्पूर्ण पांच- 
भौतिक जगत्‌), अधिदैव (मन-इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवतासहित ब्रह्माजी आदि सभी देवता) तथा अधियज्ञ (अन्तर्यामी 
विष्णु और उनके सभी रूप)-ये सब-के-सब “वासुदेवः सर्वम्‌? के अन्तर्गत आ जाते हैं (सातवें अध्यायका 
उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक) । तात्पर्य है कि सत्‌, असत्‌ और उससे परे जो कुछ भी है, वह सब परमात्मा ही हैं- 
' त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌' (गीता ११। ३७) । संसार अपने रागके कारण ही दीखता है। रागके कारण ही दूसरी सत्ता 
दीखती है। राग न हो तो एक परमात्माके सिवाय कुछ नहीं है। जैसे, भगवान्ने कहा है--' सर्वस्य चाहं हदि सन्निविष्टः ' 
(गीता १५। १५) “मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ'। जिस हदयमें भगवान्‌ रहते हैं, उसी हृदयमें राग-द्वेष, 
हलचल, अशान्ति होते हैं। हृदयमें ही सुख होता है और हृदयमें ही दु:ख आता है । समुद्र-मन्थनमें वहींसे विष निकला, 
वहींसे अमृत निकला। भगवान्‌ शंकरने विष पी लिया तो अमृत निकल आया। इसी तरह राग-द्वेषको मिटा दें तो परमात्मा 
निकल आयेंगे । सन्त-महात्माओंके हदयमें राग-द्वेष नहीं रहते; अतः वहाँ परमात्मा रहते हैं। 

सब कुछ परमात्मा ही हैं-यह खुले नेत्रोंका ध्यान है। इसमें न आँख बन्द करने (ध्यान)-की जरूरत है, न कान 
बन्द करने (नादानुसन्धान)-की जरूरत है, न नाक बन्द करने (प्राणायाम)-की जरूरत है! इसमें न संयोगका असर 
पड़ता है, न वियोगका; न किसीके आनेका असर पड़ता है, न किसीके जानेका। जब सब कुछ परमात्मा ही है तो फिर 
दूसरा कहाँसे आये ? कैसे आये ? 

गीता समग्रको मानती है, इसीलिये गीताका आरम्भ और अन्त शरणागतिमें हुआ है। शरणागतिसे ही समग्रकी प्राप्ति 
होती है। परमात्माके समग्र-रूपमें सब रूप होते हुए भी सगुणकी मुख्यता है । कारण कि सगुणके अन्तर्गत तो निर्गुण भी 
आ जाता है, पर निर्गुणमें (गुणोंका निषेध होनेसे) सगुण नहीं आता। अतः सगुण ही समग्र हो सकता है। 

भगवान्‌ श्रीकृष्ण समग्र हैं-' असंशयं समग्रं माम्‌’ (गीता ७। १) । गीता समग्रकी वाणी है, इसलिये गीतामें सब 
कुछ है। जो जिस दृष्टिसे गीताको देखता है, गीता उसको वैसी ही दीखने लगती है-- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव 
भजाम्यहम्‌’ (गीता ४। ११) । 

कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-ये तीन ही योग हैं। शरीर (अपरा)-को लेकर कर्मयोग है, शरीरी (परा)-को 
लेकर ज्ञानयोग है और शरीर-शरीरी दोनोंके मालिक (भगवान्‌)-को लेकर भक्तियोग है। भगवानूने गीताके आरम्भमें पहले 
शरीरीको लेकर और फिर शरीरको लेकर क्रमशः ज्ञानयोग और कर्मयोगका वर्णन किया। फिर ध्यानयोगका वर्णन किया; 
क्योंकि वह भी कल्याण करनेका एक साधन है। फिर सातवें अध्यायसे भक्तिका विशेषतासे वर्णन किया, जो भगवानका खास 
ध्येय है। मनुष्य कर्मयोगसे जगत्‌के लिये, ज्ञानयोगसे अपने लिये और भक्तियोगसे भगवान्‌के लिये उपयोगी हो जाता है। 

गीतामें समताको 'योग' कहा गया है--'समत्वं योग उच्यते' (गीता २। ४८) । वास्तवमें 'योग' की आवश्यकता 
कर्ममें ही है, ज्ञानमें भी योगको आवश्यकता नहीं है और भक्तिमें तो योगको बिलकुल आवश्यकता नहीं है । ज्ञान और 
भक्ति वास्तवमें “योग' ही हैं। कर्म जड़ हैं, बाँधनेवाले हैं और विषय हैं, इसलिये उनमें योगकी आवश्यकता है-- 
“योगस्थः कुरु कर्माणि’ (गीता २। ४८)। कर्मोमें योग ही मुख्य है-'*योगः कर्मसु कौशलम्‌’ (गीता २।५०)। 
योगके सिवाय कर्म कुछ नहीं है--'दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय' (गीता २। ४९) । कर्तृत्व भी कर्म करनेसे ही 
आता है । इसलिये गीतामें “योग' शब्द विशेषकर 'कर्मयोग' का ही वाचक आता है। गीताकी पुष्पिकामें भी “योगशास्त्रे ' 
पदका अर्थ कर्मयोगकी शिक्षा है। 

कर्मयोगमें दो विभाग हैं-कर्मविभाग और योगविभाग । कर्मविभाग पूर्वार्ध है और योगविभाग उत्तरार्ध है। कर्म 
करणसापेक्ष है और योग करणनिरपेक्ष है । कर्मविभागमें कर्तव्यपरायणता है और योगविभागमें स्वाधीनता, निर्विकारता, 
असंगता, समता है । संसारमें हमारा जो कर्तव्य होता है, वह दूसरेका अधिकार होता है। इसलिये व्यक्तिका जो कर्तव्य है, 
वह परिवारका, समाजका और संसारका अधिकार है। जैसे, वक्ताका जो कर्तव्य है, वह श्रोताका अधिकार है और 
श्रोताका जो कर्तव्य है, वह वक्ताका अधिकार है । वक्ता बोलकर श्रोताके अधिकारकी रक्षा करता है और श्रोता सुनकर 
वक्ताके अधिकारको रक्षा करता है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेसे मनुष्य ऋणमुक्त हो जाता है और उसको 


[च] 


“योग' की प्राप्ति हो जाती है। दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनेका तात्पर्य है-शरीर, वस्तु, योग्यता और सामर्थ्यको 
अपनी न समझकर, प्रत्युत दूसरोंको ही समझकर दूसरोंको सेवामें अर्पित कर देना। 

संसारमें वस्तु और व्यक्तिके साथ हमारा संयोग होता है। जहाँ संयोग होता है, वहीं कर्तव्यका पालन करनेकी 
आवश्यकता होती है । वस्तुका संयोग होनेपर उस वस्तुमें ममता न करके उसका सदुपयोग करना, उसको दूसरोंकी सेवामें 
लगाना हमारा कर्तव्य है। व्यक्तिका संयोग होनेपर उस व्यक्तिमें ममता न करके उसकी सेवा करना, उसको सुख पहुँचाना 
हमारा कर्तव्य है । कामना और ममतासे रहित होकर कर्तव्यका पालन करनेसे शरीर-संसारके संयोगका वियोग हो जाता 
है और योगकोी प्राप्ति हो जाती है-- तं विद्याददु:खसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्‌’ (गीता ६। २३) । संयोगका तो वियोग 
होता है, पर योगका कभी वियोग नहीं होता। योगको प्राप्ति होनेपर मनुष्य राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारोंसे सर्वथा 
मुक्त हो जाता है और उसको स्वाधीनता, निर्विकारता, असंगता, समताकी प्राप्ति हो जाती है। 

प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि मैं सदा जीता रहूँ, कभी मरूँ नहीं; मैं सब कुछ जान जाउँ, कभी अज्ञानी न रहूँ, मैं सदा 
सुखी रहूँ, कभी दुःखी न रहूँ। परन्तु मनुष्यकी यह चाहना अपने बलसे अथवा संसारसे कभी पूरी नहीं हो सकती, क्योंकि 
मनुष्य जो चाहता है, वह संसारके पास है ही नहीं। वास्तवमें मनुष्यको जो चाहिये, वह उसको पहलेसे ही प्राप्त है । उससे 
गलती यह होती है कि वह उन वस्तुओंको चाहने लगता है, जिनका संयोग और वियोग होता है, जो मिलने और 
बिछुड्नेवाली हैं । यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु कभी भी हमारेसे अलग होती है, वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी 
(वर्तमानमें) भी हमारेसे अलग है । जैसे, शरीर कभी भी हमारेसे अलग होगा तो वह सदा ही हमारेसे अलग है और अभी 
भी हमारेसे अलग है। इसी तरह जो वस्तु (परमात्मा) कभी भी हमारेसे अलग नहीं होती, वह सदा ही मिली हुई है और अभी 
भी हमारेको मिली हुई है । तात्पर्य यह निकला कि वास्तवमें संसारका सदा ही वियोग है और परमात्माका सदा ही योग है। 

कोई आचार्य पहले कर्मयोग, फिर ज्ञानयोग, फिर भक्तियोग-यह क्रम मानते हैं और कोई आचार्य पहले कर्मयोग, 
फिर भक्तियोग, फिर ज्ञानयोग-यह क्रम मानते हैं। परन्तु गीता पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग-यह क्रम 
मानती है। गीता कर्मयोगको ज्ञानयोगकी अपेक्षा विशेष मानती है-*तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते' (५। २) । 
कारण कि ज्ञानयोगके बिना तो कर्मयोग हो सकता है-'कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः' (३। २०), 
“यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते’ (४। २३), पर कर्मयोगके बिना ज्ञानयोग होना कठिन है-'सन्न्यासस्तु महाबाहो 
दुःखमाप्तुमयोगतः ' (५। ६) । श्रीमद्भागवतमें भी पहले ज्ञानयोग, फिर कर्मयोग, फिर भक्तियोग-यह क्रम कहा गया 
है*। एक विलक्षण बात और है कि गीता कर्मयोग और ज्ञानयोग-दोनोंको समकक्ष और लौकिक बताती है-- 
“लोकेऽस्मिन्द्रिविधा निष्ठा०' (३। ३) । क्षर (जगत्‌) और अक्षर (जीव)-दोनों लौकिक हैं-'द्वाविमौ पुरुषौ लोके 
क्षरश्चाक्षर एव च' (गीता १५। १६), पर भगवान्‌ अलौकिक हैं-'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' (१५। १७) । क्षरको लेकर 
कर्मयोग और अक्षरको लेकर ज्ञानयोग चलता है; अतः कर्मयोग और ज्ञानयोग-दोनों लौकिक हैं। परन्तु भक्तियोग 
भगवानूको लेकर चलता है; अतः भक्तियोग अलौकिक है । 

गीताने भक्तिको सर्वश्रेष्ठ बताया है (छठे अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) । गीताकी भक्ति भेदवाली नहीं है, प्रत्युत 
अद्वैत भक्ति है। वास्तवमें देखा जाय तो ज्ञानमें द्वैत है और भक्तिमें अद्वैत है। कारण कि ज्ञानमें तो जड़-चेतन, जगत्‌-जीव, 
शरीर-शरीरी, असत्‌-सत्‌, प्रकृति-पुरुष आदि दो-दो हैं, पर भक्तिमें केवल भगवान्‌ ही हैं-'बासुदेवः सर्वम्‌' (गीता 
७। १९), 'सदसच्चाहम्‌’ (गीता ९। १९) । भगवानूने ज्ञानके साधनोंमें भी भक्ति बतायी है-*मयि चानन्ययोगेन० ' 
(१३। १०) और गुणातीत होनेका उपाय भी भक्ति बताया है--'मां च योऽव्यभिचारेण०' (१४। २६) । ज्ञानकी 
परानिष्ठासे भी पराभक्तिकी प्राप्ति होती है--'मद्भक्ति लभते पराम्‌' (१८ । ५५) । इस पराभक्तिसे जानना, देखना और 
प्रवेश करना-तीनोंकी प्राप्ति हो जाती है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक) । भगवान्‌ अपने भक्तको कर्मयोग और 
ज्ञानयोग-दोनोंकी प्राप्ति करा देते हैं (दसवें अध्यायका दसवाँ-ग्यारहवाँ श्लोक) । भगवानूने अपने भक्तको सबसे उत्तम 
योगी बताया है--'स मे युक्ततमो मतः' (६ । ४७), “ते मे युक्ततमा मताः' (१२। २), “स योगी परमो मतः' (६। ३२) । 
ध्यानयोगमें भी भक्ति आयी है--' युक्त आसीत मत्परः' (६। १४) । कर्मयोगमें भी भगवानूने भक्ति बतायी है-'युक्त 
आसीत मत्परः' (२। ६१) । भगवान्‌ने सभी योगोंमें अपनी भक्ति (परायणता) बतायी है, यह भक्तिकी विशेषता है। 


* योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया। 
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्‌॥ ( श्रीमद्भा० ११। २०। ६) 


[छ] 


अर्जुनका प्रश्न भक्तिविषयक नहीं था, फिर भी भगवानूने अपनी तरफसे भक्तिका वर्णन किया (अठारहवें अध्यायके 
छप्पनवेंसे छाछठवें श्लोकतक) । भक्तिसे समग्र परमात्माकी प्राप्ति होती है (सातवें अध्यायका उनतीसवाँ-तीसवाँ श्लोक) । 

गीताका सातवाँ, नवाँ और पन्द्रहवाँ अध्याय, दसवें अध्यायका आरम्भ तथा अठारहवें अध्यायके छप्पनवेंसे 
छाछठवेंतकके श्लोक हमें बहुत विलक्षण दीखते हैं। इनमें ' अर्जुन उवाच' नहीं है अर्थात्‌ ये भगवानूने अपनी तरफसे 
अत्यन्त कृपा करके कहे हैं। 

गीतामें कर्मयोगके वर्णनमें ज्ञानयोग-भक्तियोगकी, ज्ञानयोगके वर्णनमें कर्मयोग-भक्तियोगकी और भक्तियोगके 
वर्णनमें कर्मयोग-ज्ञानयोगकी बात भी आ जाती है। इसका तात्पर्य है कि साधक कोई भी योग करे तो उसको तीनों 
योगोंकी प्राप्ति हो जाती है अर्थात्‌ उसको मुक्ति और भक्ति-दोनों प्राप्त हो जाते हैं। कारण कि परा और अपरा-दोनों 
प्रकृतियाँ भगवानूकी ही हैं। ज्ञानयोग पराको लेकर और कर्मयोग अपराको लेकर चलता है। इसलिये किसी एक योगकी 
पूर्णता होनेपर तीनों योगोंकी पूर्णता हो जाती है। परन्तु इसमें एक शर्त यह है कि साधक अपने मतका आग्रह न रखे और 
दूसरेके मतका खण्डन या निन्दा न करे, दूसरेके मतको छोटा न माने। अपने मतका आग्रह रहनेसे और दूसरेके मतको 
छोटा मानकर उसका खण्डन या निन्दा करनेसे साधकको मुक्ति (तत्त्वज्ञान)-की प्राप्ति तो हो सकती है, पर भक्ति 
(परमप्रेम )-की अर्थात्‌ समग्रताकी प्राप्ति नहीं हो सकती। 


परिशिष्टके सम्बन्धमें 


श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रन्थ है, जिसका आजतक न तो कोई पार पा सका, न पार पाता है, न पार 
पा सकेगा और न पार पा ही सकता है। गहरे उतरकर इसका अध्ययन-मनन करनेपर नित्य नये-नये विलक्षण भाव 
प्रकट होते रहते हैं। गीतामें जितना भाव भरा है, उतना बुद्धिमें नहीं आता। जितना बुद्धिमें आता है, उतना मनमें नहीं 
आता। जितना मनमें आता है, उतना कहनेमें नहीं आता। जितना कहनेमें आता है, उतना लिखनेमें नहीं आता। गीता 
असीम है, पर उसकी टीका सीमित ही होती है। हमारे अन्तःकरणमें गीताके जो भाव आये थे, वे पहले 'साधक- 
संजीवनी' टीकामें लिख दिये थे। परन्तु उसके बाद भी विचार करनेपर भगवत्कृपा तथा सन्तकृपासे गीताके नये-नये भाव 
प्रकट होते गये। उनको अब “परिशिष्ट भाव' के रूपमें 'साधक-संजीवनी' टीकामें जोड़ा जा रहा है। 

'साधक-संजीवनी' टीका लिखते समय हमारी समझमें निर्गुणको मुख्यता रही; क्योंकि हमारी पढ़ाईमें निर्गुणको 
मुख्यता रही और विचार भी उसीका किया। परन्तु निष्पक्ष होकर गहरा विचार करनेपर हमें भगवान्‌के सगुण (समग्र) 
स्वरूप तथा भक्तिको मुख्यता दिखायी दी। केवल निर्गुणको मुख्यता माननेसे सभी बातोंका ठीक समाधान नहीं होता। 
परन्तु केवल सगुणकी मुख्यता माननेसे कोई सन्देह बाकी नहीं रहता। समग्रता सगुणमें ही है, निर्गुणमें नहीं। भगवानूने भी 
सगुणको ही समग्र कहा है--' असंशयं समग्रं माम्‌' (गीता ७। १)। 

परिशिष्ट लिखनेपर भी अभी हमें पूरा सन्तोष नहीं है और हमने गीतापर विचार करना बन्द नहीं किया है। अतः 
आगे भगवत्कृपा तथा सन्तकृपासे क्या-क्या नये भाव प्रकट होंगे-इसका पता नहीं! परन्तु मानव-जीवनको पूर्णता भक्ति 
(प्रेम) -की प्राप्तिमें ही है-इसमें हमें किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है । 

पहले “साधक-संजीवनी' टीकामें श्लोकोंके अर्थ अन्वयपूर्वक न करनेसे उनमें कहीं-कहीं कमी रह गयी थी। 
अब श्लोकोंका अन्वयपूर्वक अर्थ देकर उस कमीको पूर्ति कर दी गयी है। अन्वयार्थमें कहीं अर्थको लेकर और कहीं 
वाक्यको सुन्दरताको लेकर विशेष विचारपूर्वक परिवर्तन किया गया है। 

पाठकोंको पहलेकी और बादकी (परिशिष्ट) व्याख्यामें कोई अन्तर दीखे तो उनको बादकी व्याख्याका भाव ही 
ग्रहण करना चाहिये । यह सिद्धान्त है कि पहलेकी अपेक्षा बादमें लिखे हुए विषयका अधिक महत्त्व होता है । इसमें इस 
बातका विशेष ध्यान रखा गया है कि साधकोंका किसी प्रकारसे अहित न हो। कारण कि यह टीका मुख्यरूपसे 
साधकोंके हितकी दृष्टिसे लिखी गयी है, विद्वत्ताकी दृष्टिसे नहीं । 

साधकोंको चाहिये कि वे अपना कोई आग्रह न रखकर इस टीकाको पढ़ें और इसपर गहरा विचार करें तो 
वास्तविक तत्त्व उनकी समझमें आ जायगा और जो बात टीकामें नहीं आयी है, वह भी समझमें आ जायगी! 

विनीत-- 


स्वामी रामसुखदास 


॥ ३% श्रीपरमात्मने नमः ॥ 


| नब्बेवाँ संस्करणका नम्र निवेदन | 


साधक महानुभावोंकी सेवामें 'साधक-संजीवनी' का संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण प्रस्तुत करते हुए 
हमें अपार हर्ष हो रहा है! इस ग्रन्थके अन्तमें एक नया विषय-*साधक-संजीवनी-कोश' को सम्मिलित 
किया गया है। इस कोशका कार्य परमश्रद्धेय श्रीस्वामीजी महाराजकी इच्छासे उनके सशरीर विद्यमान 
रहते ही आरम्भ हो चुका था। इस कोशको सम्मिलित करनेसे ग्रन्थको उपयोगितामें और अधिक वृद्धि 
हो गयी है। 
आशा है कि पाठकगण 'साधक-संजीवनी'के इस संवर्धित संस्करणसे अधिक लाभान्वित होंगे 
और इस ग्रन्थमें आये हुए विभिन्न विषयोंका और अधिक गहराईसे अध्ययन-मनन कर सकेंगे। 
—प्रकाशक 


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॥ श्रीहरिः ॥ 


विषय-सूची 


श्लोक-संख्या 
प्राक्कथन 


पृष्ठ-संख्या 


पहला अध्याय 
१--११ पाण्डव और कौरव-सेनाके मुख्य- 
मुख्य महारथियोंके नामोंका वर्णन 


(विशेष बात ३५) ->न्‍्टन--न>-न३- २५--३६ 
१२--१९ दोनों पक्षोंकी सेनाओंके शंखवादनका 

बन कप सर h SON SO ३७--४२ 
२०--२७ अर्जुनके द्वारा सेना-निरीक्षण -......---- ४३--४८ 


२८--४७ अर्जुनके द्वारा कायरता, शोक और 
पश्चात्तापयुक्त वचन कहना तथा 
संजयद्वारा शोकाविष्ट अर्जुनकी 
अवस्थाका वर्णन ...........---५५-०००००००-- ४८--६३ 
(विशेष बात ५५, ६१) 
पहले अध्यायके पद, अक्षर और 


उवाच 2२:२7:90 कक ६४ 
पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ---.-.------------ ६४ 
दूसरा अध्याय 
१--१० अर्जुनकी कायरताके विषयमें संजय- 
द्वारा भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुनके 
संवादका वर्णन ००0०७०००0 ६०५--७६ 
(विशेष बात ७०) 
११--३० सांख्ययोगका वर्णन :..........--------- ७६--१११ 


(विशेष बात ८०, ८७; मार्मिक बात 

८९; विशेष बात ९३, ९३, ९९, १०२; 

प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात १०९) 
३१--३८ क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करनेकी 


आवश्यकताका प्रतिपादन ------------ १११-११७ 
(प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात ११६) 
३९-५३ कर्मयोगका वर्णन....-.--.---.----.-' ११७-१४० 


(समता-सम्बन्धी विशेष बात १२०; 

विशेष बात १२४; मार्मिक बात १२८; 

बुद्धि और समता-सम्बन्धी विशेष 

बात १३२) 

५४-७२ स्थितप्रज्ञके लक्षणों आदिका 

बने ४७७४७) ३५४४ ३३०८ बोर न १४०--१६६ 
(मार्मिक बात १५३; अहंता-ममतासे 

रहित होनेका उपाय १६१; विशेष 

बात १६४) दूसरे अध्यायके पद, 


अक्षर और उवाच .........----------०००००----- १६६ 
दूसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ---...--.--.-------- १६६ 
तीसरा अध्याय 


१-८ सांख्ययोग और कर्मयोगकी दृष्टिसे 





विषय 


कर्तव्य-कर्म करनेकी आवश्यकता- 
का निरूपण ......------------०००००००+¬ १६८-१८२ 
(मार्मिक बात १७१, १७३; विशेष 
बात १७५; साधन-सम्बन्धी 
मार्मिक बात १८१) 
९-१९ यज्ञ और सृष्टिचक्रकी परम्परा 
सुरक्षित रखनेके लिये कर्तव्य-कर्म 
करनेकी आवश्यकताका 


श्लोक-संख्या पृष्ठ-संख्या 


(मार्मिक बात १८४; कर्तव्य और 
अधिकार-सम्बन्धी मार्मिक बात 
१८८; कर्तव्य-सम्बन्धी विशेष बात 
१९१; मार्मिक बात २०१; विशेष बात 
२०२, २०५; मार्मिक बात २०८) 
२०-२९ लोकसंग्रहके लिये कर्तव्य-कर्म 
करनेकी आवश्यकताका निरूपण ... २०८-२२८ 
(परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी मार्मिक 
बात २०९; विशेष बात २१३, २१८, 
२१९, २२२, २२३; गुण-कर्मविभागको 
तत्त्वसे जाननेका उपाय २२५; प्रकृति- 
पुरुष-सम्बन्धी मार्मिक बात २२६; 
विशेष बात २२७) 
३०-३५ राग-द्वेषरहित होकर स्वधर्मके 
अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेकी प्रेरणा. २२९-- २५१ 
(अर्पण-सम्बन्धी विशेष बात २२९; 
कामना-सम्बन्धी विशेष बात २३०; 
विशेष बात २३२; राग-द्वेषपर विजय 
पानेके उपाय २४०; सेवा-सम्बन्धी 
मार्मिक बात २४३; मार्मिक बात 
२४८; स्वधर्म और परधर्म-सम्बन्धी 
मार्मिक बात २५०) 
३६-४३ पापोंके कारणभूत 'काम'को 
मारनेको प्रेरणा -.---------------०-००--- २५१-२७१ 
(कामना-सम्बन्धी विशेष बात २५३; 
विशेष बात २५६, २५९, २६२; 
मार्मिक बात २६७, २६९) तीसरे 


अध्यायके पद, अक्षर और उवाच -....-...-. २७१ 
तीसरे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ---..--..--.------ २७१ 
चौथा अध्याय 


१-१५ कर्मयोगको परम्परा और भगवान्‌के 
जन्मों तथा कर्मोको दिव्यताका 


(ज) 


विषय 


(विशेष बात २७६; मार्मिक बात 
२८१; विशेष बात २८७; अवतार- 
सम्बन्धी विशेष बात २८९; मार्मिक 
बात २९८; विशेष बात ३०४) 
१६-३२ कर्मोके तत्त्वका और तदनुसार 
यज्ञोंका वर्णन ------------०----+* ३१०--३३६ 
(विशेष बात ३१२; मार्मिक बात 
३१२; विशेष बात ३२६; मार्मिक 
बात ३२८; विशेष बात ३३३) 
३३-४२ ज्ञानयोग और कर्मयोगकी प्रशंसा 
तथा प्रेरणा < २५७४ बनन ३३७--३५२ 
(ज्ञानप्राप्तिकी प्रचलित प्रक्रिया 
३३७; विशेष बात ३४५, ३४७, ३४९) 
चौथे अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ..... ३५२ 


श्लोक-संख्या पृष्ठ-संख्या 


चौथे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द -......--.--------- ३५२ 
पाँचवाँ अध्याय 
१--६ सांख्ययोग तथा कर्मयोगकी 
एकताका प्रतिपादन और 
कर्मयोगकी प्रशंसा .............-.:- ३५३-३६६ 
(मार्मिक बात ३५९; विशेष 
बात ३६३) 

७-१२ सांख्ययोग और कर्मयोगके साधनका 
प्रकारमा ३६६--३८० 
(विशेष बात ३६७, ३७२; मार्मिक 
बात ३७८) 


१३-२६ फलसहित सांख्ययोगका विषय .... ३८०--४०४ 
(समता-सम्बन्धी विशेष बात ३८९) 


२७--२९ ध्यान और भक्तिका वर्णन ----------- ४०५--४०९ 
पाँचवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच .... ४०९ 
पाँचवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द --.....--.--.----- ४०९ 
छठा अध्याय 
१--४ कर्मयोगका विषय और योगारूढ़ 
मनुष्यके लक्षण -..-..-.--.-.--------- ४११-४२० 
(विशेष बात ४१३) 
५-९ आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा और सिद्ध 
कर्मयोगीके लक्षण >::::३४०५४५५२४ ४२०-४३१ 


(उद्धार-सम्बन्धी विशेष बात 
४२१; विशेष बात ४२९) 

१०-१५ आसनकी विधि और फलसहित 
सगुण-साकारके ध्यानका वर्णन--..- ४३१-४३८ 
(विशेष बात ४३२) 

१६-२३ नियमोंका और फलसहित 
स्वरूपके ध्यानका वर्णन .....---.--.- ४३८४५० 
(विशेष बात ४४०, ४४२, ४४४) 





श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या 
२४-२८ फलसहित निर्गुण-निराकारके 
ध्यानका वर्णन ....-....---..---------- ४५०-४५९ 
(ध्यान-सम्बन्धी मार्मिक बात ४५२; 
परमात्मामें मन लगानेकी युक्तियाँ ४५६) 
२९-३२ सगुण और निर्गुणके ध्यान- 
योगियोंका अनुभव ...-.------------- ४५९-४६५ 
३३-३६ मनके निग्रहका विषय.........-... ४६५-४७१ 


(मार्मिक बात ४७०) 

३७-४७ योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन और 
भक्ति-योगीकी महिमा ....-...--.--. ४७१-४८८ 
(विशेष बात ४७३, ४७९, ४८१; 
मार्मिक बात ४८३, विशेष बात 
४८७) छठे अध्यायके पद, 


अक्षर और उवाति ०००,7०0 ४८८ 
छठे अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ---.-------------- ४८८ 
सातवाँ अध्याय 
१--७ भगवान्‌के द्वारा समग्ररूपके 
वर्णनकी प्रतिज्ञा करना तथा 
अपरा-परा प्रकृतियोंके संयोगसे 
प्राणियोंकी उत्पत्ति बताकर 


अपनेको सबका मूल कारण बताना ४८९-५१० 
(विशेष बात ४९१; शरणागतिके 
पर्याय ४९१; ज्ञान और विज्ञान- सम्बन्धी 
विशेष बात ४९४; विशेष बात ५०३) 
८-१२ कारणरूपसे भगवान्को विभूतियोंका 

वर्णन ६5० ३४४ ERO 4 कप ५१०--५२० 
(विशेष बात ५१३, ५१८) 

१३-१९ भगवानूके शरण होनेवालोंका 
और शरण न होनेवालोंका वर्णन ...- ५२१-५४८ 
(विशेष बात ५२६, ५३१; मार्मिक 
बात ५३२, ५४२; महात्माओंको 
महिमा ५४४) 

२०-२३ अन्य देवताओंकी उपासनाओंका 
'फलसहित वर्णन .......-..--.--..-..- ५४८--५०५४ 
(विशेष बात ५५३) 

२४--३० भगवानूके प्रभावको न जाननेवालों- 
की निन्दा और जाननेवालोंकी प्रशंसा 
तथा भगवानूके समग्ररूपका वर्णन -५५४-५७७ 
(विशेष बात ५५५, ५६४; भगवान्‌के 
समग्ररूप-सम्बन्धी विशेष बात 
५६८; अध्याय-सम्बन्धी विशेष 
बात ५७०) सातवें अध्यायके 
पद्‌, अक्षर और उवाच ....................-- ५७६ 
सातवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ---..------------ ५७६ 


(ट) 


श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या 
सातवें अध्यायका सार :.:.:-...*- ५७६-५७७ 
आठवाँ अध्याय 


१--७ अर्जुनके सात प्रश्न और भगवानूके 
द्वारा उनका उत्तर देते हुए सब 
समयमें अपना स्मरण करनेकी 
आज्ञा देना oop pepsi ५७९-५९३ 
(विशेष बात ५८३; मार्मिक बात 
५८७; विशेष बात ५८९; स्मरण- 
सम्बन्धी विशेष बात ५९२) 
८-१६ सगुण-निराकार, निर्गुण-निराकार 
और सगुण-साकारकी उपासनाका 
'फलसहित वर्णन ........-..--.---.--. ५९४-६०५ 
(विशेष बात ६०२, ६०४, ६०४) 
१७-२२ ब्रह्मलोकतककी अवधिका और 
भगवानको महत्ता तथा भक्तिका 
Fic PRIN NAP ६०५-६१३ 
(विशेष बात ६१२) 
२३-२८ शुक्ल और कृष्ण-गतिका वर्णन 
और उसको जाननेवाले योगीकी 


महिमा ००09० 020 ६१३-६२१ 

(विशेष बात ६१६) 

आठवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच -.- ६२१ 

आठवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द.-...-..--.--.-- ६२१ 
नवाँ अध्याय 


१-६ प्रभावसहित विज्ञानका वर्णन--...-.- ६२३-६३६ 
(ज्ञान और विज्ञान-सम्बन्धी विशेष 
बात ६२४; विशेष बात ६२८; मार्मिक 
बात ६३३; विशेष बात ६३५) 
७-१० महासर्ग और महाप्रलयका वर्णन ... ६३६-६४२ 
११-१५ भगवानका तिरस्कार करनेवाले एवं 
आसुरी, राक्षसी और मोहिनी 
प्रकृतिका आश्रय लेनेवालोंका कथन 
तथा दैवी प्रकृतिका आश्रय लेनेवाले 
भक्तोंके भजनका वर्णन ..............- ६४२-६४९ 
१६-१९ कार्य-कारणरूपसे भगवत्स्वरूप 
विभूतियोंका बने रह रस ००००४३ ६४९--६५४ 
२०--२५ सकाम और निष्काम उपासनाका 
'फलसहित वर्णन .......-..--.--..--- ६५४-६६३ 
(विशेष बात ६५९, ६६२) 
२६-३४ पदार्थों और क्रियाओंको भगवदर्पण 
करनेका फल बताकर भक्तिके 
अधिकारियोंका और भक्तिका 
वर्णन ७७००००८८०700 0000०००१ सक ६६३-६९० 
(विशेष बात ६६४, ६६६, ६६८; 





विषय 


मार्मिक बात ६७७; विशेष बात 
६८१; मार्मिक बात ६८२, ६८४; 
विशेष बात ६८८; सातवें और नवें 
अध्यायके विषयकी एकता ६८८) 
नवें अध्यायके पद, अक्षर और 


श्लोक-संख्या पृष्ठ-संख्या 


उवाः त nnDe nd ६९० 

नवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द --.--.------------ ६९० 

नवें अध्यायका सार ...............-. ६९१-६९२ 
दसवाँ अध्याय 


१-७ भगवान्‌की विभूति और योगका 
कथन तथा उनको जाननेकी महिमा ६९३-७०४ 
(विशेष बात ६९९, ७०२) 
८-११ फलसहित भगवद्भक्ति और 
भगवत्कुपाका प्रभाव ..-..-.----------- ७०४-७११ 
(विशेष बात ७०५, ७१०) 
१२-१८ अर्जुनके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और 
योग तथा विभूतियोंको कहनेके 


लिये प्रार्थना PoP PYRO ७१ २--७१८ 
१९--४२ भगवान्‌के द्वारा अपनी विभूतियोंका 
और योगका वर्णन ...................- ७१८--७४२ 


(विशेष बात ७३५, ७३९) 
दसवें अध्यायके पद, अक्षर और 


दसवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ----.------------- ७४२ 
ग्यारहवाँ अध्याय 
१--८ विराट्रूप दिखानेके लिये अर्जुनकी 
प्रार्थना और भगवान्‌के द्वारा अर्जुनको 
दिव्यचक्षु प्रदान करना -::--. ७४३-७५२ 
(विशेष बात ७५०, ७५१) 
९-१४ संजयद्वारा धृतराष्ट्रके प्रति विराट्‌- 


रूपका वर्णन ..........-...--.--.-.-.-- ७५२-७५६ 
१५-३१ अर्जुनके द्वारा विराट्रूपको देखना 

और उसकी स्तुति करना .....--..--- ७५६-७७१ 

(विशेष बात ७५६; मार्मिक 

बात ७६२) 


३२-३५ भगवानूके द्वारा अपने अत्युग्र 
विराट्रूपका परिचय और युद्धकी 


ज्ञा नन ७७१-७७६ 
(विशेष बात ७७५) 

३६-४६ अर्जुनके द्वारा विराट्रूप भगवान्को 
स्तुति-प्रार्थना --------------------------- ७७६--७८८ 


(ग्यारहवें अध्यायमें ग्यारह रसोंका 
वर्णन ७८५, विशेष बात ७८६) 
४७--५० भगवान्‌के द्वारा विराट्रूपके दर्शनकी 


(ठ) 


श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या 
दुर्लभता बताना और भयभीत 
अर्जुनको आश्वासन देना ...-----.---- ७८८--७९५ 


(विशेष बात ७८९; संजय और 
अर्जुनको दिव्यदूष्टि कबतक 


रही? ७९२) 
५१-५५ भगवान्‌के द्वारा चतुर्भुजरूपको 
महत्ता और उसके दर्शनका 
उपाय बताना .......---.००-००१ ७९५-८०२ 


(विशेष बात ८००, ८०१) 
ग्यारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच ... ८०२ 


ग्यारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द -.-.-.-.-----.-- ८०२ 
बारहवाँ अध्याय 
१-१२ सगुण और निर्गुण-उपासकोंकी 
शरेष्ठताका निर्णय और भगवत्प्राप्तिके 
चार साधनोंका वर्णन ..............--- ८०३-८३६ 


(विशेष बात ८११; विशेष बात 
सगुण-उपासनाकी सुगमताएँ और 
निर्गुण-उपासनाकी कठिनताएँ 
८१६; विशेष बात ८२३; 
भगवत्प्राप्ति-सम्बन्धी विशेष बात 
८२५;  कर्मफलत्याग-सम्बन्धी 
विशेष बात ८३३; साधन-सम्बन्धी 
विशेष बात ८३५) 

१३-२० सिद्ध-भक्तोंके उनतालीस लक्षणोंका 
iE RRO मी ८३६-८५७ 
(मार्मिक बात ८५१; प्रकरण- 
सम्बन्धी विशेष बात ८५२) 
बारहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच... ८५७ 
बारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द -..-.----------- ८०५७ 

तेरहवाँ अध्याय 
१--१८ क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा), ज्ञान और 

ज्ञेय (परमात्मा)-का भक्ति-सहित 


विवेचन 5३४४४ लक दन ८५९--८९२ 
(मार्मिक बात ८६१; विशेष बात 
८६८, ८६९, ८७२, ८८०) 


१९--३४ ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका विवेचन ८९२-९१४ 
(मार्मिक बात ९०४) 
तेरहवें अध्यायके पद, अक्षर और 


rc NTRS न ९१४ 
तेरहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ----.------------ ९१४ 
चौदहवाँ अध्याय 
१-४ ज्ञानकी महिमा और प्रकृति-पुरुषसे 
जगत्को उत्पत्ति 5000000 0 ९१५-९१९ 


५-१८ सत्त्व, रज और तम--इन तीनों 





विषय 


गुणोंका विवेचन -.-.--.-.------------ ९१९-९३९ 
(विशेष बात ९२०, ९२६; मार्मिक 
बात ९३१; विशेष बात ९३६, ९३८) 

१९-२७ भगवत्प्राप्तिका उपाय एवं गुणातीत 
पुरुषके लक्षण :-..---+-..--००१५०००० ९३९-९५० 
(विशेष बात ९४३) 
चौदहवें अध्यायके पद, अक्षर और 


श्लोक-संख्या पृष्ठ-संख्या 


चौदहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द --....-.-.-..- २५० 
पंद्रहवाँ अध्याय 
१-६ संसार-वृक्षका तथा उसका छेदन 
करके भगवानूके शरण होनेका 
और भगवद्धामका वर्णन -......-.-- ९५१-९७१ 
(विशेष बात ९५९; वैराग्य- 
सम्बन्धी विशेष बात ९६०; संसारसे 
सम्बन्ध-विच्छेदके कुछ सुगम उपाय 
९६१; विशेष बात ९६७, ९६८) 
७-११ जीवात्माका स्वरूप तथा उसे जानने- 
वाले और न जाननेवालेका वर्णन ... ९७२-९९० 
(विशेष बात ९७४, ९८१, ९८२; 
मार्मिक बात ९८४, ९८७) 
१२-१५ भगवान्के प्रभावका वर्णन -.......-- ९९०-९९९ 
(परमात्मप्राप्ति-सम्बन्धी विशेष 
बात ९९५; प्रकरण-सम्बन्धी विशेष 
बात ९९७; मार्मिक बात ९९९) 
१६-२० क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तमका 
वर्णन तथा अध्यायका उपसंहार.. ९९९-१००९ 
(मार्मिक बात १००२; विशेष बात 
१००४) पंद्रहवें अध्यायके पद, 


अक्षर और उवाचः ०००/००० ७०00 १००९ 
पंद्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द --....-.---.-- १००९ 
पन्द्रहवें अध्यायका सार ........- १००९-१०१० 
सोलहवाँ अध्याय 
१-५ फलसहित दैवी और आसुरी 
सम्पत्तिका वर्णन .----------------- १०१२-१०३४ 


(मार्मिक बात १०२८, १०३०) 
६-८ सत्कर्मोसे विमुख हुए आसुरी- 
सम्पत्तिवाले मनुष्योंकी मान्यताओं- 
को कथने ०२०90००२24420 0००5५३ १०३५-१०४१ 
(विशेष बात १०३९) 
९-१६ आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके 
दुराचारों और मनोरथोंका फल- 
सहित वएति+४०००४४७०००००५०५०५०० १०४१-१०४९ 
१७-२० आसुरी-सम्पत्तिवाले मनुष्योंके 


(ड) 


विषय 


दुर्भाव और दुर्गतिका वर्णन .---- १०४९-१०५५ 
(विशेष बात १०५४) 
२१-२४ आसुरी-सम्पत्तिके मूलभूत दोष-- 
काम, क्रोध और लोभसे रहित 
होकर शास्त्रविधिके अनुसार कर्म 


श्लोक-संख्या पृष्ठ-संख्या 


करनेकी प्रेरणा ०2 :२:०००००३+० ०२०३६ १०५५-१०६० 

सोलहवें अध्यायके पद, अक्षर 

आए अबा ०० on १०६० 

सोलहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ----.------ १०६० 
सत्रहवाँ अध्याय 


१-६ तीन प्रकारकी श्रद्धाका और आसुर 
निश्चयवाले मनुष्योँका वर्णन -.- १०६१-१०६९ 
(मार्मिक बात १०६४; विशेष बात १०६९) 
७-१० सात्त्विक, राजस और तामस 

आहारीकी रुचिका वर्णन .....-- १०६९-१०७५ 
(प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात १०७३; 
भोजनके लिये आवश्यक विचार १०७४) 

११-२२ यज्ञ, तप और दानके तीन-तीन 
भेदोंका वर्णन ........+..**----+ १०७६-१०९२ 
(सात्तिविकताका तात्पर्यं १०७६; मनकी 
प्रसन्नता प्राप्त करनेके उपाय १०८३; 
दान-सम्बन्धी विशेष बात १०९१ ; कर्म- 
'फल-सम्बन्धी विशेष बात १०९१) 

२३-२८ ३% तत्सत्‌'के प्रयोगको व्याख्या 
और असत्‌-कर्मका वर्णन .----.- १०९३-१०९९ 
सत्रहवें अध्यायके पद, अक्षर और उवाच १०९९ 
सत्रहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ----.-------- १०९९ 

अठारहवाँ अध्याय 
१-१२ संन्यास और त्यागके विषयमे 

मतान्तर और कर्मयोगका वर्णन ११०२-११३२ 
(मार्मिक बात १११६; कर्म-सम्बन्धी 
विशेष बात १११९) 

१३-४० सांख्ययोगका वर्णन -.....-------- ११३२-११७१ 
(मार्मिक बात ११४३; विशेष बात 





श्लोक-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या 


११५२, ११६०, ११६७, ११६८) 

४१-४८ कर्मयोगका भक्तिसहित वर्णन. ११७१-११९३ 
(विशेष बात ११७२; गोरक्षा-सम्बन्धी 
विशेष बात ११७६; स्वाभाविक 


कमोंका तात्पर्य ११७८; जाति जन्मसे 
मानी जाय या कर्मसे ११७८; विशेष 
बात ११८४, ११८७, ११९०) 
४९-५५ सांख्ययोगका वर्णन .....-...---- ११९३-१२०२ 
(विशेष बात १२००) 
५६-६६ भगवद्भक्तिका वर्णन -.....----- १२०२-१२४३ 
(प्रेम-सम्बन्धी विशेष बात 
१२०६; विशेष बात १२१०, 
१२१३, १२१६; शरणागति- 


सम्बन्धी विशेष बात १२२८; 
शरणागतिका रहस्य १२३६) 

६७-७८ श्रीमद्धगवद्गीताकी महिमा ..--- १२४३-१२६३ 
(मार्मिक बात १२५५) 
अठारहवें अध्यायके पद, अक्षर और 


उवाचः»... 9000 00000 १२६३ 
अठारहवें अध्यायमें प्रयुक्त छन्द ........--- १२६३ 
आरती: 2:52 लाल सर १२६४ 
साधक-संजीवनी-कोश -.....-- १२६५-१२९६ 
विषयानुक्रमणिका ................ १२६५-१२७९ 
साधक-संजीवनीमें आयी 

गीता-सम्बन्धी मुख्य बातें .................. १२८० 
साधक-संजीवनीमें आयी 

व्याकरण-सम्बन्धी बातें .................... १२८१ 


“साधक-संजीवनी' में मूल गीताके पाठभेद . १२८१ 
साधक-संजीवनीमें आयी कहानियाँ ...... १२८२ 
उद्धृत श्लोकानुक्रमणिका ...... १२८३-१२८८ 


हिन्दी पद्यानुक्रमणिका ........... १२८९-१२९१ 
नामानुक्रमणिका .................... १२९२-१२९३ 
पारिभाषिक शब्दावली 


(साधक-संजीवनीके अनुसार) .. १२९३-१२९६ 





( रेखाचित्र ) 


क्रम-संख्या पृष्ठ-संख्या 
१ २७२ 
२ ४१० 
३ ५७८ 


क्रम-संख्या पृष्ठ-संख्या 
४ ६२२ 
५ ८५८ 


६ ११०० 





॥ ३% श्रीपरमात्मने नमः ॥ 
कृष्णां वन्दे जगदगुरुम्‌ 


पराकृतनमद्बन्धं परं ब्रा नराकृति। सौन्दर्यसारसर्वस्वं वन्दे नन्दात्मजं महः॥ 
प्रपन्नपारिजाताय तोत्ररवेत्रैकपाणये। ज्ञानमुद्राय कृष्णाय गीतामृतदुहे नमः॥ 
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्‌। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्‌॥ 


I नकल 


वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्‌ 
पीताम्बरादरुणविम्बफलाधरोष्ठात्‌ । 
पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्‌ 
कृष्णात्‌ परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥ 


I CR 


भीष्मद्रोणतटा जयद्रथजला गान्धारनीलोत्पला 
शल्यग्राहवती कृपेण वहनी कर्णेन वेलाकुला। 
अश्वत्थामविकर्णघोरमकरा दुर्योधनावर्तिनी 
सोत्तीर्णा खलु पाण्डवै रणनदी कैवर्तकः केशवः॥ 


COIR 


एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव। 
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा॥ 


CORI 





॥ ३% श्रीपरमात्मने नम: ॥ 


प्राक्क थन 
वंशीधरं तोत्त्रधरं नमामि मनोहरं मोहहरं च कृष्णम्‌। 
मालाधरं धर्मधुरन्धरं च पार्थस्य सारथ्यकरं च देवम्‌॥ 
कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिं च। 
ददाति गीता करुणार्द्रभूता कृष्णेन गीता जगतो हिताय॥ 
संजीवनी साधकजीवनीयं प्राप्तिं हरेवैं सरलं ब्रवीति। 
करोति दूरं पथिविघ्नबाधां ददाति शीघ्रं परमात्मसिद्धिम्‌॥* 


गीताको महिमा 


श्रीमद्धगवद्गीताकी महिमा अगाध और असीम है। यह 
भगवद्गीताग्रन्थ प्रस्थानत्रयमें माना जाता है। मनुष्यमात्रके 
उद्धारके लिये तीन राजमार्ग 'प्रस्थानत्रय' नामसे कहे जाते 
हैं-एक वैदिक प्रस्थान है, जिसको “उपनिषद्‌' कहते हैं; 
एक दार्शनिक प्रस्थान है, जिसको ' ब्रह्मसूत्र' कहते हैं और 
एक स्मार्त प्रस्थान है, जिसको 'भगवद्गीता' कहते हैं। 
उपनिषदोंमें मन्त्र हैं, ब्रह्मसूत्रमें सूत्र हैं और भगवद्गीतामें 
श्लोक हैं। भगवद्गीतामें श्लोक होते हुए भी भगवानूकी वाणी 
होनेसे ये मन्त्र ही हैं। इन श्लोकोंमें बहुत गहरा अर्थ भरा हुआ 
होनेसे इनको सूत्र भी कह सकते हैं। “उपनिषद्‌? अधिकारी 
मनुष्योंके कामकी चीज है और ' ब्रह्मसूत्र” विद्वानोंके कामकी 
चीज है; परन्तु ' भगवद्गीता' सभीके कामकी चीज है। 

भगवद्गीता एक बहुत ही अलौकिक, विचित्र ग्रन्थ 
है। इसमें साधकके लिये उपयोगी पूरी सामग्री मिलती है, 
चाहे वह किसी भी देशका, किसी भी वेशका, किसी भी 
समुदायका, किसी भी सम्प्रदायका, किसी भी वर्णका, 
किसी भी आश्रमका कोई व्यक्ति क्यों न हो। इसका कारण 
यह है कि इसमें किसी समुदाय-विशेषकी निन्दा या प्रशंसा 
नहीं है, प्रत्युत वास्तविक तत्त्वका ही वर्णन है। वास्तविक 
तत्त्व (परमात्मा) वह है, जो परिवर्तनशील प्रकृति और 
प्रकृतिजन्य पदार्थाँसे सर्वथा अतीत और सम्पूर्ण देश, काल, 
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिमे नित्य-निरन्तर एकरस- 
एकरूप रहनेवाला है। जो मनुष्य जहाँ है और जैसा है, 
वास्तविक तत्त्व वहाँ वैसा ही पूर्णरूपसे विद्यमान है। परन्तु 
परिवर्तनशील प्रकृतिजन्य वस्तु, व्यक्तियाँमें राग-द्वेषके 
कारण उसका अनुभव नहीं होता। सर्वथा राग-द्वेषरहित 





होनेपर उसका स्वतः अनुभव हो जाता है। 

भगवद्गीताका उपदेश महान्‌ अलौकिक है। इसपर कई 
टीकाएँ हो गयीं और कई टीकाएँ होती ही चली जा रही हैं, 
फिर भी सन्त-महात्माओं, विद्वानोंके मनमें गीताके नये-नये 
भाव प्रकट होते रहते हैं। इस गम्भीर ग्रन्थपर कितना ही 
विचार किया जाय, तो भी इसका कोई पार नहीं पा सकता। 
इसमें जैसे-जैसे गहरे उतरते जाते हैं, वैसे-ही-वैसे इसमेंसे 
गहरी बातें मिलती चली जाती हैं। जब एक अच्छे विद्वान्‌ 
पुरुषके भावोंका भी जल्दी अन्त नहीं आता, फिर जिनका 
नाम, रूप आदि यावन्मात्र अनन्त है, ऐसे भगवान्‌के द्वारा कहे 
हुए वचनोंमें भरे हुए भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है ? 

इस छोटे-से ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना 
वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, 
देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, 
इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर 
मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो 
उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय 
मिलते हैं। हरेक दर्शनके अलग-अलग अधिकारी होते हैं, 
पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले 
सब-के-सब इसके अधिकारी हैं। 

भगवद्‌गीतामें साधनोंका वर्णन करनेमें, विस्तारपूर्वक 
समझानेमें, एक-एक साधनको कई बार कहनेमें संकोच 
नहीं किया गया है, फिर भी ग्रन्थका कलेवर नहीं बढ़ा 
है। ऐसा संक्षेपमें विस्तारपूर्वक यथार्थ और पूरी बात 
बतानेवाला दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं दीखता। अपने कल्याणको 
उत्कट अभिलाषावाला मनुष्य हरेक परिस्थितिमें परमात्मतत्त्वको 


* “जो अपने हाथोंमें वंशी तथा चाबुक और गलेमें दिव्य माला धारण किये हुए हैं एवं जो प्राणियोंके मनका तथा 
मोहका हरण करनेवाले हैं, उन पार्थसारथि धर्मधुरन्धर दिव्यस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।' 
“भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा गायी हुई करुणार्द्रभूता गीता जगत्के हितके लिये कर्तव्यको दीक्षा, समताको शिक्षा, 


ज्ञानकी भिक्षा और शरणागतिका तत्त्व प्रदान करनेवाली है।' 


“परमात्मप्राप्तिको सरल बनानेवाली और साधकोंका जीवन यह 'साधक-संजीवनी' साधन-पथकी विघ्न-बाधाओंको 
दूर करके शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिूप परमसिद्धिको प्रदान करनेवाली है।' 


[ त ] 


प्राप्त कर सकता है; युद्ध-जैसी घोर परिस्थितिमें भी अपना 
कल्याण कर सकता है-इस प्रकार व्यवहारमात्रमें परमार्थकी 
कला गीतामें सिखायी गयी है। अतः इसके जोडेका दूसरा 
कोई ग्रन्थ देखनेमें नहीं आता। 

गीता एक प्रासादिक ग्रन्थ है। इसका आश्रय लेकर 
पाठ करनेमात्रसे बड़े विचित्र, अलौकिक और शान्तिदायक 
भाव स्फुरित होते हैं। इसका मन लगाकर पाठ करनेमात्रसे 
बड़ी शान्ति मिलती है। इसकी एक विधि यह है कि पहले 
गीताके पूरे श्लोक अर्थसहित कण्ठस्थ कर लिये जायें, 
फिर एकान्तमें बैठकर गीताके अन्तिम श्लोक “यत्र 


योगेश्वरः कृष्णः..... '—यहाँसे लेकर गीताके पहले श्लोक 
' धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे....'—यहाँतक बिना पुस्तकके उलटा 
पाठ किया जाय तो बड़ी शान्ति मिलती है। यदि 
प्रतिदिन पूरी गीताका एक या अनेक बार पाठ किया जाय 
तो इससे गीताके विशेष अर्थ स्फुरित होते हैं। मनमें 
कोई शंका होती है तो पाठ करते-करते उसका समाधान 
हो जाता है। 

वास्तवमें इस ग्रन्थकी महिमाका वर्णन करनेमें कोई भी 
समर्थ नहीं है। अनन्तमहिमाशाली ग्रन्थकी महिमाका वर्णन 
कर ही कौन सकता है ? 


गीताका खास लक्ष्य 


गीता किसी वादको लेकर नहीं चली है अर्थात्‌ द्वैत, 
अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत, विशुद्धाद्वैत, अचिन्त्यभेदाभेद 
आदि किसी भी वादको, किसी एक सम्प्रदायके किसी एक 
सिद्धान्तको लेकर नहीं चली है। गीताका मुख्य लक्ष्य यह है 
कि मनुष्य किसी भी वाद, मत, सिद्धान्तको माननेवाला क्यों 
न हो, उसका प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याण हो जाय, वह 
किसी भी परिस्थितिमें परमात्मप्राप्तिसे वंचित न रहे; क्योंकि 
जीवमात्रका मनुष्ययोनिमें जन्म केवल अपने कल्याणके लिये 
ही हुआ है। संसारमें ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें 
मनुष्यका कल्याण न हो सकता हो। कारण कि परमात्मतत्त्व 
प्रत्येक परिस्थितिमें समानरूपसे विद्यमान है। अतः साधकके 
सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका 
केवल सदुपयोग करना है। सदुपयोग करनेका अर्थ है-- 
दुःखदायी परिस्थिति आनेपर सुखकी इच्छाका त्याग करना; 
और सुखदायी परिस्थिति आनेपर सुखभोगका तथा “वह 
बनी रहे' ऐसी इच्छाका त्याग करना और उसको दूसरोंकी 
सेवामें लगाना। इस प्रकार सदुपयोग करनेसे मनुष्य दुःखदायी 
और सुखदायी-दोनों परिस्थितियाँसे ऊँचा उठ जाता है 
अर्थात्‌ उसका कल्याण हो जाता है। 

सृष्टिसे पूर्व परमात्मामें ' मैं एक ही अनेक रूपोंमें हो 
जाऊँ' ऐसा संकल्प हुआ। इस संकल्पसे एक ही परमात्मा 
प्रेमवृद्धिको लीलाके लिये, प्रेमका आदान-प्रदान करनेके 
लिये स्वयं ही श्रीकृष्ण और श्रीजी (श्रीराधा)-इन दो 


रूपाँमें प्रकट हो गये। उन दोनोंने परस्पर लीला करनेके 
लिये एक खेल रचा। उस खेलके लिये प्रभुके संकल्पसे 
अनन्त जीवोंकी (जो कि अनादिकालसे थे) और खेलके 
पदार्थो-(शरीरादि-) की सृष्टि हुई। खेल तभी होता है, 
जब दोनों तरफके खिलाड़ी स्वतन्त्र हों। इसलिये भगवानूने 
जीवोंको स्वतन्त्रता प्रदान को। उस खेलमें श्रीजीका तो 
केवल भगवानूको तरफ ही आकर्षण रहा, खेलमें उनसे 
भूल नहीं हुई। अतः श्रीजी और भगवान्में प्रेमवृद्धिकी 
लीला हुई । परन्तु दूसरे जितने जीव थे, उन सबने भूलसे 
संयोगजन्य सुखके लिये खेलके पदार्थो-(उत्पत्ति-विनाशशील 
प्रकृतिजन्य पदार्थो-)के साथ अपना सम्बन्ध मान लिया, 
जिससे वे जन्म-मरणके चक्करमें पड़ गये। 

खेलके पदार्थ केवल खेलके लिये ही होते हैं, किसीके 
व्यक्तिगत नहीं होते। परन्तु वे जीव खेल खेलना तो भूल गये 
और मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके खेलके पदार्थोंको 
अर्थात्‌ शरीरादिको व्यक्तिगत मानने लग गये। इसलिये वे उन 
पदार्थोमें फँस गये और भगवानूसे सर्वथा विमुख हो गये। 
अब अगर वे जीव शरीरादि उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थोंसे 
विमुख होकर भगवान्‌के सम्मुख हो जाये, तो वे जन्म- 
मरणरूप महान्‌ दुःखसे सदाके लिये छूट जायँ। अतः जीव 
संसारसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जायँ और 
भगवानूके साथ अपने नित्ययोग-(नित्य सम्बन्ध-)को 
पहचान लें-इसीके लिये भगवद्गीताका अवतार हुआ है। 


गीताका योग 


गीतामें “योग' शब्दके बड़े विचित्र-विचित्र अर्थ 
हैं। उनके हम तीन विभाग कर सकते हैं 

(१) 'युजिर्‌ योगे' धातुसे बना 'योग' शब्द, 

जिसका अर्थ है-समरूप परमात्माके साथ 





नित्यसम्बन्ध; जैसे-' समत्वं योग उच्यते' ( २। ४८ ) 
आदि। यही अर्थ गीतामें मुख्यतासे आया है। 

(२) 'युज्‌ समाधौ' धातुसे बना 'योग' शब्द, 
जिसका अर्थ है--चित्तकी स्थिरता अर्थात्‌ समाधिमें 


[ थ ] 


स्थिति; जैसे यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ' 
(६। २०) आदि। 

(३) 'युज्‌ संयमने’ धातुसे बना 'योग' शब्द, 
जिसका अर्थ है-संयमन, सामर्थ्य, प्रभाव; जैसे 
“पश्य मे योगमैश्वरम्‌’ ( ९। ५) आदि। 

गीतामें जहाँ कहीं 'योग' शब्द आया है, उसमें 
उपर्युक्त तीनोंमेंसे एक अर्थको मुख्यता और शेष दो 
अर्थोकी गौणता है; जैसे-'युजिर्‌ योगे' वाले “योग' 
शब्दमें समता-( सम्बन्ध- ) की मुख्यता है, पर समता 
आनेपर स्थिरता और सामर्थ्य: भी स्वतः आ जाती है। 
“युज्‌ समाधौ' वाले 'योग' शब्दमें स्थिरताको मुख्यता 
है, पर स्थिरता आनेपर समता और सामर्थ्य भी स्वतः 
आ जाती है। 'युज्‌ संयमने' वाले 'योग' शब्दमें 
सामर्थ्यकी मुख्यता है, पर सामर्थ्य आनेपर समता और 
स्थिरता भी स्वतः आ जाती है। अतः गीताका 'योग' 
शब्द बड़ा व्यापक और गम्भीरार्थक है। 

पातंजलयोगदर्शनमें चित्तवृत्तियोंके निरोधको 'योग' 
नामसे कहा गया है— 'योगश्‍्चित्तवृत्तिनिरोधः  १।२) 
और उस योगका परिणाम बताया है--द्रष्टाकी 
स्वरूपमें स्थिति हो जाना-- 'तदा द्रष्ट्र: स्वरूपेऽवस्थानम्‌ ' 
( १। ३ )। इस प्रकार पातंजलयोगदर्शनमें योगका जो 
परिणाम बताया गया है, उसीको गीतामें “योग' नामसे 
कहा गया है ( दूसरे अध्यायका अड़तालीसवाँ और 
छठे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक )। तात्पर्य है कि गीता 
चित्तवृत्तियाँसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक स्वत:सिद्ध 
सम-स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिको योग कहती है। 
उस समतामें स्थिति ( नित्ययोग ) होनेपर फिर कभी 
उससे वियोग नहीं होता, कभी वृत्तिरूपता नहीं होती, 
कभी व्युत्थान नहीं होता। वृत्तियोंका निरोध होनेपर तो 
“निर्विकल्प अवस्था' होती है, पर समतामें स्थिति 
होनेपर ' निर्विकल्प बोध' होता है। ' निर्विकल्प बोध' 





अवस्थातीत और सम्पूर्ण अवस्थाओंका प्रकाशक है। 

समता अर्थात्‌ नित्ययोगका अनुभव करानेके लिये 
गीतामें तीन योग-मार्गोका वर्णन किया गया है-- 
कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। स्थूल, सूक्ष्म और 
कारण--इन तीनों शरीरोंका संसारके साथ अभिन्न 
सम्बन्ध है। अतः इन तीनोंको दूसरोंकी सेवामें लगा 
दे-यह कर्मयोग हुआ; स्वयं इनसे असंग होकर अपने 
स्वरूपमें स्थित हो जाय--यह ज्ञानयोग हुआ; और 
स्वयं भगवान्‌के समर्पित हो जाय--यह भक्तियोग 
हुआ। इन तीनों योगोंको सिद्ध करनेके लिये अर्थात्‌ 
अपना उद्धार करनेके लिये मनुष्यको तीन शक्तियाँ 
प्राप्त हैं-( १) करनेकी शक्ति ( बल ), ( २ ) जाननेकी 
शक्ति (ज्ञान) और ( ३ ) माननेकी शक्ति ( विश्वास )। 
करनेकी शक्ति निःस्वार्थभावसे संसारकी सेवा करनेके 
लिये है, जो कर्मयोग है; जाननेकी शक्ति अपने 
स्वरूपको जाननेके लिये है, जो ज्ञानयोग है और 
माननेकी शक्ति भगवानूको अपना तथा अपनेको 
भगवानका मानकर सर्वथा भगवानूके समर्पित होनेके 
लिये है, जो भक्तियोग है। जिसमें करनेकी रुचि अधिक 
है, वह कर्मयोगका अधिकारी है। जिसमें अपने-आपको 
जाननेकी जिज्ञासा अधिक है, वह ज्ञानयोगका अधिकारी 
है। जिसका भगवानपर श्रद्धा-विशवास अधिक है, वह 
भक्तियोगका अधिकारी है। ये तीनों ही योग-मार्ग 
परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं। अन्य सभी साधन 
इन तीनोंके ही अन्तर्गत आ जाते हैं । 

सभी साधनोंका खास काम है-जडतासे सम्बन्ध- 
विच्छेद करना । अतः जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेकी 
प्रणालियाँ-( साधनों- ) में तो फरक रहता है, पर जडतासे 
सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर सभी साधन एक हो जाते हैं 
अर्थात्‌ अन्तमें सभी साधनोंसे एक ही समरूप 
परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है । इस समरूप परमात्मतत्त्वकी 


९-भगवानूमें संसारमात्रकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदिकी जो सामर्थ्य है, वह सामर्थ्य योगीमें नहीं आती 
“ जगद्व्यापारवर्जम्‌' ( ब्रह्मसूत्र ४। ४। १७ )। योगीमें जो सामर्थ्यं आती है, उससे वह संसारमात्रपर विजय प्राप्त कर लेता है 
(गीता ५। १९ ) अर्थात्‌ कैसी ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। 


२-श्रीमद्भागवतमें भगवानूने कहा है-- 


योगास्त्रयो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया। ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्‌॥ ( ११। २०। ६ ) 
“अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्यांके लिये मैंने तीन योग-मार्ग बताये हैं-ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग। इन 


तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है।' 


यही बात अध्यात्मरामायण और देवीभागवतमें भी आयी है-- 
(क) मार्गास्त्रयो मया प्रोक्ताः पुरा मोक्षाप्तिसाधकाः । कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च शाश्वतः॥ ( अध्यात्म० ७।७।५९ ) 


(ख ) मार्गास्त्रयो मे विख्याता मोक्षप्राप्तौ नगाधिप। कर्मयोगो ज्ञानयोगो भक्तियोगश्च सत्तम॥ 


(देवी० ७। ३७। ३ ) 


[ द ] 


प्राप्तिको ही गीताने 'योग' नामसे कहा है, और इसीको 
'नित्ययोग' कहते हैं। 

गीतामें केवल कर्मयोगका, केवल ज्ञानयोगका 
अथवा केवल भक्तियोगका ही वर्णन हुआ हो--ऐसी 
बात भी नहीं है। इसमें उपर्युक्त तीनों योगोंक अलावा 
यज्ञ, दान, तप, ध्यानयोग, प्राणायाम, हठयोग, लययोग 
आदि साधनाँका भी वर्णन किया गया है। इसका 
खास कारण यही है कि गीतामें अर्जुनके प्रश्‍न युद्धके 
विषयमें नहीं हैं, प्रत्युत कल्याणके विषयमें हैं और 
भगवान्‌के द्वारा गीता कहनेका उद्देश्य भी युद्ध 





करानेका बिलकुल नहीं है। अर्जुन अपना निश्चित 
कल्याण चाहते थे ( दूसरे अध्यायका सातवाँ, तीसरे 
अध्यायका दूसरा और पाँचवें अध्यायका पहला 
श्लोक )। इसलिये शास्त्रोंमें जितने कल्याणकारक 
साधन कहे गये हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंका गीतामें 
संक्षेपसे विशद वर्णन मिलता है। उन साधनोंको लेकर 
ही साधक-जगत्में गीताका विशेष आदर है। कारण 
कि साधक चाहे किसी मतका हो, किसी सम्प्रदायका 
हो, किसी सिद्धान्तको माननेवाला हो, पर अपना 
कल्याण तो सबको अभीष्ट है। 


साधनकी दो शेलियाँ 


जीवमें एक तो चेतन परमात्माका अंश है और एक जड 
प्रकृतिका अंश है। चेतन-अंशकी मुख्यतासे वह परमात्माकी 
इच्छा करता है और जड-अंशकी मुख्यतासे वह संसारकी 
इच्छा करता है। इन दोनों इच्छाओंमें परमात्माकी इच्छा तो 
पूरी होनेवाली है, पर संसारकी इच्छा कभी पूरी होनेवाली 
है ही नहीं। कुछ सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति होती हुई 
दीखनेपर भी वास्तवमें उनकी निवृत्ति नहीं होती, प्रत्युत 
संसारकी आसक्तिके कारण नयी-नयी कामनाएँ पैदा होती 
रहती हैं। वास्तवमें सांसारिक इच्छाओंकी पूर्ति अर्थात्‌ 
सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति इच्छाके अधीन नहीं है, प्रत्युत 
कर्मके अधीन है। परन्तु परमात्माकी प्राप्ति कर्मके अधीन 
नहीं है। स्वयंकी उत्कट अभिलाषामात्रसे परमात्माकी प्राप्ति 
हो जाती है। इसका कारण यह है कि प्रत्येक कर्मका आदि 
और अन्त होता है; इसलिये उसका फल भी आदि-अन्तवाला 
ही होता है। अतः आदि-अन्तवाले कर्मोसे अनादि-अनन्त 
परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो सकती है ? परन्तु साधकोंने प्रायः 
ऐसा समझ रखा है कि जैसे क्रियाकी प्रधानतासे सांसारिक 
वस्तुको प्राप्ति होती है, ऐसे ही परमात्माको प्राप्ति भी उसी 
प्रकार क्रियाकी प्रधानतासे ही होगी और जैसे सांसारिक 
वस्तुकी प्राप्तिके लिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता 
लेनी पड़ती है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये भी उसी 
प्रकार शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिकी सहायता लेनी पड़ेगी। 
इसलिये ऐसे साधक जडता-(शरीरादि-)को सहायतासे 
अभ्यास करते हुए परमात्माकी तरफ चलते हैं। 

जैसे ध्यानयोगमें दीर्घकालतक अभ्यास करते-करते 
अर्थात्‌ परमात्मामें चित्तको लगाते-लगाते जब चित्त निरुद्ध 
हो जाता है, तब उसमें संसारकी कोई इच्छा न रहनेसे और 
स्वयं जड होनेके कारण परमात्माको ग्रहण न कर सकनेसे 
वह (चित्त) संसारसे उपराम हो जाता है। चित्तके उपराम 





होनेसे साधकका चित्तसे अर्थात्‌ जडतासे सर्वथा सम्बन्ध- 
विच्छेद हो जाता है और वह स्वयंसे परमात्मतत््तका अनुभव 
कर लेता है (गीता-छठे अध्यायका बीसवाँ श्लोक) । परन्तु 
जो साधक आरम्भसे ही परमात्माके साथ अपना स्वत:सिद्ध 
नित्य-सम्बन्ध मानकर और जडतासे अपना किंचिन्मात्र भी 
सम्बन्ध न मानकर साधन करता है, उसको बहुत जल्दी 
और सुगमतापूर्वक परमात्मतत््तका अनुभव हो जाता है। 
इस प्रकार परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहनेवाले साधकोंके 
लिये साधनको दो शैलियाँ हैं। जिस शैलीमें अन्त:करणकी 
प्रधानता रहती है अर्थात्‌ जिसमें साधक जडताकी सहायता 
लेकर साधन करता है, उसको “करण-सापेक्ष-शैली' नामसे 
और जिस शैलीमें स्वयंकी प्रधानता रहती है अर्थात्‌ जिसमें 
साधक आरम्भसे ही जडताकी सहायता न लेकर स्वयंसे 
साधन करता है, उसको *करण-निरपेक्ष-शैली' नामसे कह 
सकते हैं। यद्यपि इन दोनों ही साधन-शैलियाँसे परमात्म- 
तत्त्वको प्राप्ति करण-निरपेक्षतासे अर्थात्‌ स्वयंसे (जडतासे 
सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर) ही होती है, तथापि 'करण- 
सापेक्ष-शैली 'से चलनेपर उसकी प्राप्ति देरीसे होती है और 
“करण-निरपेक्ष-शैली से चलनेपर उसकी प्राप्ति शीघ्रतासे 
होती है। साधनकी इन दोनों शैलियोंमें चार मुख्य भेद हैं- 
(१) करण-सापेक्ष-शैलीमें जडता-(शरीर-इन्द्रियाँ- 
मन-बुद्धि-)का आश्रय लेना पड़ता है, पर करण- 
निरपेक्ष-शैलीमें जडताका आश्रय नहीं लेना पड़ता, प्रत्युत 
जड़तासे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करना पड़ता है। 
(२) करण-सापेक्ष-शैलीमें एक नयी अवस्थाका निर्माण 
होता है पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें अवस्थाओंसे सम्बन्धविच्छेद 
होकर अवस्थातीत तत्वका अनुभव होता है। 
(३) करण-सापेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियों-(सिद्धियों-) 
की प्राप्ति होती है पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें प्राकृत शक्तियोंसे 


[ ध ] 


*सम्बन्ध-विच्छेद होकर सीधे परमात्मतत्त्वका अनुभव होता है।' 

(४) करण-सापेक्ष-शैलीमें कभी तत्काल सिद्धि नहीं 
मिलती, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जडतासे सर्वथा सम्बन्ध- 
विच्छेद होनेपर, अपने स्वरूपमें स्थित होनेपर अथवा 
भगवान्‌के शरण होनेपर तत्काल सिद्धि मिलती है। 

पातंजलयोगदर्शनमें तो योगकी सिद्धिके लिये करण- 
सापेक्ष-शैलीको महत्त्व दिया गया है, पर गीतामें योगकी 
सिद्धिके लिये करण-निरपेक्ष-शैलीको ही महत्त्व दिया गया 
है। परमात्मामें मन लग गया, तब तो ठीक है, पर मन नहीं 
लगा तो कुछ नहीं हुआ-यह करण-सापेक्ष-शैली है। 
परमात्मामें मन लगे या न लगे, कोई बात नहीं, पर स्वयं 
परमात्मामें लग जाय-यह करण-निरपेक्ष-शैली है। तात्पर्य 
यह है कि करण-सापेक्ष-शैलीमें परमात्माके साथ मन- 
बुद्धिका सम्बन्ध है और करण-निरपेक्ष-शैलीमें मन- 
बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक परमात्माके साथ स्वयंका 
सम्बन्ध है। इसलिये करण-सापेक्ष-शैलीमें अभ्यासके द्वारा 
क्रमसे सिद्धि होती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें अभ्यासकी 
आवश्यकता नहीं है। कारण कि स्वयंका परमात्माके साथ 
स्वत:सिद्ध नित्य-सम्बन्ध (नित्ययोग) है। अतः भगवानूसे 
सम्बन्ध मानने अथवा जाननेमें अभ्यासको आवश्यकता नहीं 
है; जैसे-विवाह होनेपर स्त्री पुरुषको अपना पति मान लेती 
है, तो ऐसा माननेके लिये उसको कोई अभ्यास नहीं करना 
पड्ता। इसी तरह किसीके बतानेपर “यह गंगाजी हैं '--ऐसा 
जाननेके लिये भी कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता । करण- 
सापेक्ष-शैलीमें तो अपने लिये साधन करने-(क्रिया-) की 
मुख्यता रहती है, पर करण-निरपेक्ष-शैलीमें जानने (विवेक) 
और मानने-(भाव-) की मुख्यता रहती है। 

“मेरा जडता-(शरीरादि-)से सम्बन्ध है ही नहीं'- 
ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक इसको आरम्भसे 





ही टूढ़तापूर्वक मान लेता है, तब उसे ऐसा ही स्पष्ट अनुभव 
हो जाता है। जैसे वह 'मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है '-- 
इस प्रकार गलत मान्यता करके बँधा था, ऐसे ही “मैं शरीर 
नहीं हूँ और शरीर मेरा नहीं है'--इस प्रकार सही मान्यता 
करके मुक्त हो जाता है; क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे 
मिट जाती है-यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवानूने 
गीतामें कहा है कि अज्ञानी मनुष्य शरीरसे सम्बन्ध जोड़कर 
उससे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है- 
' अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (३। २७)। 
परन्तु ज्ञानी मनुष्य उन क्रियाओंका कर्ता अपनेको नहीं 
मानता-- नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्‌ ' 
(५। ८) । तात्पर्यं यह हुआ कि अवास्तविक मान्यताको 
मिटानेके लिये वास्तविक मान्यता करनी जरूरी है। 

“मैं हिन्दू हूँ “मैं ब्राह्मण हूँ, “मैं साधु हूँ” आदि मान्यताएँ 
इतनी दृढ़ होती हैं कि जबतक इन मान्यताओंको स्वयं नहीं 
छोड्ता, तबतक इनको कोई दूसरा नहीं छुड़ा सकता। ऐसे ही 
“मैं शरीर हूँ, “मैं कर्ता हूँ” आदि मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो 
जाती हैं कि उनको छोड़ना साधकको कठिन मालूम देता है। 
परन्तु ये लौकिक मान्यताएँ अवास्तविक, असत्य होनेके 
कारण सदा रहनेवाली नहीं हैं, प्रत्युत मिटनेवाली हैं। इसके 
विपरीत “मैं शरीर नहीं हूँ, “मैं भगवानका हूँ” आदि मान्यताएँ 
वास्तविक, सत्य होनेके कारण कभी मिटती ही नहीं, प्रत्युत 
उनकी विस्मृति होती है, उनसे विमुखता होती है। इसलिये 
वास्तविक मान्यता दृढ़ होनेपर मान्यतारूपसे नहीं रहती, 
प्रत्युत बोध-(अनुभव-)में परिणत हो जाती है। 

यद्यपि गीतामें करण-सापेक्ष-शैलीका भी वर्णन किया 
गया है (जैसे चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवेंतक तथा 
चौंतीसवाँ श्लोक, छठे अध्यायके दसवेंसे अट्टाईसवेंतक, 
आठवें अध्यायके आठवेंसे सोलहवेंतक और पन्द्रहवं 


१-अगर करण-सापेक्ष-शैली-( चित्तवृत्तिनिरोध- )से सीधे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती, तो पातंजलयोगदर्शनका 


“विभूतिपाद' ( जिसमें सिद्धियोंका वर्णन है) व्यर्थ हो जाता। करण-सापेक्ष-शैलीसे जिन सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है, वे तो 
परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विघ्न हैं। पातंजलयोगदर्शनमें भी उन सिद्धियांको विघ्नरूपसे माना गया है-- ते समाधावुपसर्गा 
व्युत्थाने सिद्धयः' ( ३। ३७) अर्थात्‌ वे ( सिद्धियाँ) समाधिकी सिद्धिमें विघ्न हैं और व्युत्थान-( व्यवहार- ) में सिद्द्ियाँ हैं; 
' स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्‌' ( ३।५९ ) अर्थात्‌ लोकपाल देवताओंके द्वारा ( अपने लोकोंके भोगोंका 
लालच देकर ) बुलानेपर न तो उन भोगोंमें राग करना चाहिये और न अभिमान करना चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे पुनः 
अनिष्ट ( पतन ) होनेकी सम्भावना है। 

२-वास्तवमें परमात्माको मानने अथवा जाननेके विषयमें संसारका कोई भी दृष्टान्त पूरा नहीं घटता। कारण कि 
संसारको मानने अथवा जाननेमें तो मन-बुद्द्धि साथमें रहते हैं, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेमें मन-बुद्द्रि साथमें नहीं 
रहते अर्थात्‌ परमात्माका अनुभव स्वयंसे होता है, मन-बुद्धिसे नहीं। दूसरी बात, संसारको मानने अथवा जाननेका तो आरम्भ 
और अन्त होता है, पर परमात्माको मानने अथवा जाननेका आरम्भ और अन्त नहीं होता। कारण कि वास्तवमें संसारके साथ 
हमारा ( स्वयंका ) सम्बन्ध है ही नहीं, जबकि परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध सदासे ही है और सदा ही रहेगा। 


[ न] 


अध्यायका ग्यारहवाँ श्लोक आदि) तथापि मुख्यरूपसे 
करण-निरपेक्ष-शैलीका ही वर्णन हुआ है। (जैसे दूसरे अध्यायका 
अड़तालीसवाँ तथा पचपनवाँ, तीसरे अध्यायका सत्रहवाँ, चौथे 
अध्यायका अड्तीसवाँ, पाँचवें अध्यायके बारहवेंका पूर्वार्ध, 
छठे अध्यायका पाँचवाँ, नवें अध्यायका तीसवाँ-इकतीसवाँ, 
बारहवें अध्यायका बारहवाँ, अठारहवें अध्यायका बासठवाँ, 
छाछठवाँ तथा तिहत्तरवाँ श्लोक आदि-आदि) । इसका कारण 
यह है कि भगवान्‌ साधकोंको शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक 
अपनी प्राप्ति कराना चाहते हैं। दूसरी बात, अर्जुनने युद्धकी 
परिस्थिति प्राप्त होनेके समय अपने कल्याणका उपाय पूछा है। 
अतः उनके कल्याणके लिये करण-निरपेक्ष-शैली ही काममें 
आ सकती है; क्योंकि करण-निरपेक्ष-शैलीमें मनुष्य प्रत्येक 
परिस्थितिमें और सम्पूर्ण शास्त्रविहित कर्म करते हुए भी 
अपना कल्याण कर सकता है। इसी शैलीके अनुसार 
(अभ्यास किये बिना) अर्जुनका मोह नाश हुआ और उनको 
स्मृतिकी प्राप्ति हुई (अठारहवें अध्यायका तिहत्तरवाँ श्लोक) । 

साधनकी करण-निरपेक्ष-शैली सबके लिये समानरूपसे 
उपयोगी है; क्योंकि इसमें किसी विशेष योग्यता, परिस्थिति 
आदिकी आवश्यकता नहीं है। इस शैलीमें केवल परमात्म- 
प्राप्तकी उत्कट अभिलाषा होनेसे ही तत्काल जडतासे 
सम्बन्ध-विच्छेद होकर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव 
हो जाता है। जैसे कितने ही वर्षोका अँधेरा हो, एक 
दियासलाई जलाते ही वह नष्ट हो जाता है, ऐसे ही जडताके 
साथ कितना ही पुराना (अनन्त जन्मोंका) सम्बन्ध हो, 
परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा होते ही वह मिट जाता है। 
इसलिये उत्कट अभिलाषा करण-सापेक्षतासे होनेवाली समाधिसे 
भी ऊँची चीज है। ऊँची-से-ऊँची निर्विकल्प समाधि हो, 
उससे भी व्युत्थान होता है और फिर व्यवहार होता है अर्थात्‌ 
समाधिका भी आरम्भ और अन्त होता है। जबतक आरम्भ 
और अन्त होता है, तबतक जडताके साथ सम्बन्ध है। जडतासे 
सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर साधनका आरम्भ और अन्त नहीं 
होता, प्रत्युत परमात्मासे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है*। 

वास्तवमें देखा जाय तो परमात्मासे वियोग कभी हुआ ही 
नहीं, होना सम्भव ही नहीं । केवल संसारसे माने हुए संयोगके 
कारण परमात्मासे वियोग प्रतीत हो रहा है। संसारसे माने हुए 
संयोगका त्याग करते ही परमात्मतत्त्वके अभिलाषी मनुष्यको 
तत्काल नित्ययोगका अनुभव हो जाता है और उसमें स्थायी 





स्थिति हो जाती है। 

अन्तःकरणको शुद्ध करनेको आवश्यकता भी करण- 
सापेक्ष-शैलीमें ही है, करण-निरपेक्ष-शैलीमें नहीं। जैसे 
कलम बढ़िया होनेसे लिखाई तो बढ़िया हो सकती है, पर 
लेखक बढ़िया नहीं हो जाता, ऐसे ही करण (अन्तःकरण) 
शुद्ध होनेसे क्रियाएँ तो शुद्ध हो सकती हैं, पर कर्ता शुद्ध नहीं 
हो जाता। कर्ता शुद्ध होता है-अन्तःकरणसे सम्बन्ध- 
विच्छेद होनेसे; क्योंकि अन्तःकरणसे अपना सम्बन्ध मानना 
ही मूल अशुद्धि है। 

नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वके साथ जीवका नित्ययोग स्वत:सिद्ध 
है; अतः उसकी प्राप्तिमें करणकी अपेक्षा नहीं है। केबल 
उधर दृष्टि डालनी है, जैसा कि श्रीरामचरितमानसमें आया 
है—'संकर सहज सरूपु सम्हारा' (१। ५८। ४) अर्थात्‌ 
भगवान्‌ शंकरने अपने सहज स्वरूपको सँभाला, उसकी तरफ 
दृष्टि डाली । सँभाली चीज वह होती है, जो पहलेसे ही हमारे 
पास हो और केवल दृष्टि डालनेसे पता लग जाय कि यह है। 
ऐसे ही दृष्टि डालनेमात्रसे नित्ययोगका अनुभव हो जाता है। 
परन्तु सांसारिक सुखकी कामना, आशा और भोगके कारण 
उधर दृष्टि डालनेमें, उसका अनुभव करनेमें कठिनता मालूम 
देती है। जबतक सांसारिक भोग और संग्रहकी तरफ दृष्टि है, 
तबतक मनुष्यमें यह ताकत नहीं है कि वह अपने स्वरूपकी 
तरफ दृष्टि डाल सके। अगर किसी कारणसे, किसी खास 
विवेचनसे उधर दृष्टि चली भी जाय, तो उसका स्थायी रहना 
बड़ा कठिन है। कारण कि नाशवान्‌ पदार्थोंकी जो प्रियता 
भीतरमें बैठी हुई है, वह प्रियता भगवान्‌के स्वत:सिद्ध 
सम्बन्धको समझने नहीं देती; और समझमें आ जाय तो स्थिर 
नहीं रहने देती। हाँ, अगर उत्कट अभिलाषा जाग्रत्‌ हो जाय कि 
उस तत्त्वका अनुभव कैसे हो? तो इस अभिलाषामे यह 
ताकत है कि यह संसारकी आसक्तिका नाश कर देगी। 

गीतोक्त कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-तीनों ही 
साधन करण-निरपेक्ष अर्थात्‌ स्वयंसे होनेवाले हैं। कारण कि 
क्रिया और पदार्थ अपने और अपने लिये नहीं हैं, प्रत्युत 
दूसरोंके और दूसरोंकी सेवाके लिये हैं; मैं शरीर नहीं हूँ और 
शरीर मेरा नहीं है, मैं भगवानूका हूँ और भगवान्‌ मेरे हैं- 
इस प्रकार विवेकपूर्वक किया गया विचार अथवा मान्यता 
करण-सापेक्ष (अभ्यास) नहीं है; क्योंकि इसमें जडतासे 
सम्बन्ध-विच्छेद है। अतः कर्मयोगमें स्वयं ही जड़ताका 


* जबतक जडताका सम्बन्ध रहता है, तबतक दो अवस्थाएँ रहती हैं; क्योंकि परिवर्तनशील होनेसे जड प्रकृति कभी 
एकरूप नहीं रहती। अतः समाधि और व्युत्थान-ये दोनों अवस्थाएँ जडताके सम्बन्धसे ही होती हैं। जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद 
होनेपर ' सहजावस्था” होती है, जिसे सन्ताने 'सहज समाधि' कहा है। इससे फिर कभी व्युत्थान नहीं होता। 


[ प ] 


त्याग करता है, ज्ञानयोगमें स्वयं ही स्वयंको जानता है और 
भक्तियोगमें स्वयं ही भगवान्‌के शरण होता है। 
गीताकी इस 'साधक-संजीवनी' टीकामें भी साधनको 


करण-निरपेक्ष-शैलीको ही मुख्यता दी गयी है; क्योंकि 
साधकोंका शीघ्रतासे और सुगमतापूर्वक कल्याण कैसे हो-- 
इस बातको सामने रखते हुए ही यह टीका लिखी गयी है। 


'टीकाके सम्बन्धर्मे 


छोटी अवस्थासे ही मेरी गीतामें विशेष रुचि रही है। 
गीताका गम्भीरतापूर्वक मनन-विचार करनेसे तथा अनेक 
सन्त-महापुरुषोंके संग और वचनाँसे मुझे गीताके विषयको 
समझनेमें बड़ी सहायता मिली । गीतामें महान्‌ संतोष देनेवाले 
अनन्त विचित्र-विचित्र भाव भरे पड़े हैं। उन भावोंको पूरी 
तरह समझनेकी और उनको व्यक्त करनेकी मेरेमें सामर्थ्य 
नहीं है। परन्तु जब कुछ गीताप्रेमी सज्जनोंने विशेष आग्रह 
किया, हठ किया, तब गीताके मार्मिक भावोंका अपनेको 
बोध हो जाय तथा और कोई मनन करे तो उसको भी इनका 
बोध हो जाय-इस दृष्टिसे गीताको व्याख्या लिखवानेमें 
प्रवृत्ति हुई । 

सबसे पहले एक बारहवें अध्यायको व्याख्या लिखवायी। 
इसको संवत्‌ २०३०में 'गीताका भक्तियोग' नामसे प्रकाशित 
किया गया। इसके कुछ वर्षोके बाद तेरहवें और चौदहवें 
अध्यायको व्याख्या लिखवायी, जिसको संवत्‌ २०३५ में 
'गीताका ज्ञानयोग' नामसे प्रकाशित किया गया। इसको 
लिखवानेके बाद ऐसा विचार हुआ कि कर्मयोग, ज्ञानयोग 
और भक्तियोग-ये तीन योग हैं, अतः इन तीनों ही योगोंपर 
तीन पुस्तकें तैयार हो जायँ तो ठीक रहेगा। इस दृष्टिसे पहले 
बारहवें अध्यायको व्याख्याका संशोधन-परिवर्धन किया 
गया और उसके साथ पंद्रहवें अध्यायको व्याख्याको भी 
सम्मिलित करके संवत्‌ २०३९ में 'गीताका भक्तियोग' 
(द्वितीय संस्करण) नामसे प्रकाशित किया गया। फिर 
तीसरे, चौथे और पाँचवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी। 
इसको 'गीताका कर्मयोग' नामसे दो खण्डोंमें प्रकाशित 
किया गया। इसका प्रकाशन विलम्बसे संवत्‌ २०४० में हुआ। 

उपर्युक्त 'गीताका भक्तियोग', 'गीताका ज्ञानयोग' 
और 'गीताका कर्मयोग'-इन तीनों पुस्तकोंमें लिखनेकी 
शैली कुछ और रही अर्थात्‌ पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक, 
फिर भावार्थ, फिर अन्वय और फिर पद-व्याख्या-इस 
शैलीसे लिखा गया। परन्तु इन तीनों पुस्तकोंके बाद लिखनेकी 
शैली बदल दी गयी अर्थात्‌ पहले सम्बन्ध, फिर श्लोक और 
फिर व्याख्या-इस शैलीसे लिखा गया। इसमें दूसरोंकी 
प्रेरणा भी रही। शैली बदलनेमें भाव यह रहा कि पाठ कुछ 
कम हो जाय और जल्दी लिखा जाय, जिससे पाठकोंको 





पढ्नेमें अधिक समय न लगे और पुस्तक भी जल्दी तैयार 
होकर साधकोंके हाथ पहुँच जाय। इसी शैलीसे पहले 
सोलहवें और सत्रहवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी । इसको 
संवत्‌ २०३९ में ‘गीताको सम्पत्ति और श्रद्धा' नामसे 
प्रकाशित किया गया। इसके बाद अठारहवें अध्यायकी 
व्याख्या लिखवायी । इसको संवत्‌ २०३९ में 'गीताका सार' 
नामसे प्रकाशित किया गया। 

जब सोलहवें, सत्रहवें और अठारहवें अध्यायकी व्याख्या 
छप गयी, तब किसीने कहा कि अगर शलोकोंके अर्थ भी 
दे दिये जायँ तो ठीक रहेगा; क्योंकि पहले पाठक श्लोकका 
अर्थ समझ लेगा, तो फिर व्याख्या समझनेमें सुविधा रहेगी। 
अतः 'गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा' के दूसरे संस्करण 
(संवत्‌ २०४०)-में श्लोकोंके अर्थ भी दे दिये गये। 
श्लोकोंके अर्थ देनेके साथ-साथ पदोंकी व्याख्या करनेका 
क्रम भी कुछ बदल गया। 

इसके बाद दसवें और ग्यारहवें अध्यायकी व्याख्या 
लिखवायी। इसको 'गीताकी विभूति और विश्वरूप- 
दर्शन' नामसे प्रकाशित किया गया। फिर सातवें, आठवें और 
नवें अध्यायकी व्याख्या लिखवायी,जिसको ' गीताकी राजविद्या ' 
नामसे प्रकाशित किया गया। इसके बाद छठे अध्यायकी 
व्याख्या लिखवायी, जो 'गीताका ध्यानयोग' नामसे प्रकाशित 
को गयी। अन्तमें पहले और दूसरे अध्यायकी व्याख्या 
लिखवायी। इसको 'गीताका आरम्भ' नामसे प्रकाशित 
किया गया। ये चारों पुस्तकें संवत्‌ २०४१ में प्रकाशित हुई। 

इस प्रकार भगवत्कृपासे पूरी गीताकी टीका अलग- 
अलग कुल दस खण्डोंमें गीताप्रेससे प्रकाशित हुई । इनको 
प्रकाशित करनेके कार्यमें कागज आदिकी कई कठिनाइयाँ 
आती रहीं, फिर भी सत्संगी भाइयोंके उद्योगसे इनको 
प्रकाशित करनेका कार्य चलता रहा। लोगोंने भी इन 
पुस्तकोंको उत्साह एवं प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया, जिससे 
कई पुस्तकोंके दो-दो, तीन-तीन संस्करण भी निकल गये। 

इस टीकाको एक जगह बैठकर नहीं लिखवाया गया है 
और इसको पहले अध्यायसे लेकर अठारहवें अध्यायतक 
क्रमसे भी नहीं लिखवाया गया है। इसलिये इसमें पूर्वापरकी 
दृष्टिसे कई विरोध आ सकते हैं। परन्तु इससे साधकोंको कहीं 


[ फ ] 


भी बाधा नहीं लगेगी। कहीं-कहीं सिद्धान्तोंके विवेचनमें 
भी फरक पड़ा है; परन्तु कर्मयोग, ज्ञानयोग और 
भक्तियोग-ये तीनों स्वतन्त्रतापूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति 
करानेवाले हैं-इसमें कोई फरक नहीं पड़ा है। टीका 
लिखवाते समय 'साधकोंको शीघ्र लाभ कैसे हो '--ऐसा 
भाव रहा है। इस कारण टीकाकी भाषा, शैली आदिमें 
परिवर्तन होता रहा है। 

इस टीकामें बहुत-से श्लोकोंका विवेचन दूसरी 
टीकाओंके विपरीत पड़ता है। परन्तु इसका तात्पर्य दूसरी 
टीकाओंको गलत बतानेमें किंचिन्मात्र भी नहीं है, प्रत्युत 
मेरेको जैसा निर्विवादरूपसे उचित, प्रकरण-संगत, युक्ति- 
युक्त, संतोषजनक और प्रिय मालूम दिया, वैसा ही विवेचन 
मैंने किया है। मेरा किसीके खण्डनका और किसीके 
मण्डनका भाव बिलकुल नहीं रहा है। 

श्रीमद्भगवद्गीताका अर्थ बहुत ही गम्भीर है। इसका 
पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और विचार करनेसे बड़े ही 
विचित्र और नये-नये भाव स्फुरित होते रहते हैं, जिससे 
मन-बुद्धि चकित होकर तृप्त हो जाते हैं। टीका लिखवाते 
समय जब इन भावाँको लिखवानेका विचार होता, तब एक 
ऐसी विचित्र बाढ़ आ जाती कि कौन-कौन-से भाव 
लिखवाऊँ और कैसे लिखवाऊँ-इस विषयमें अपनेको 
बिलकुल ही अयोग्य पाता। फिर भी मेरे जो साथी हैं, 
आदरणीय मित्र हैं, उनके आग्रहसे कुछ लिखवा देता। वे 
उन भावोंको लिख लेते और संशोधित करके उनको 
पुस्तकरूपसे प्रकाशित करवा देते। फिर कभी उन 
पुस्तकांको देखनेका काम पड़ता तो उनमें कई जगह 
कमियाँ मालूम देतीं और ऐसा मालूम देता कि पूरी बातें 
नहीं आयीं हैं, बहुत-सी बातें छूट गयी हैं! इसलिये उनमें 
बार-बार संशोधन-परिवर्धन किया जाता रहा। अतः 
पाठकांसे प्रार्थना है कि वे पहले लिखे गये विषयकी 
अपेक्षा बादमें लिखे गये विषयको ही महत्त्व दें और 
उसीको स्वीकार करें। 

पूरी गीताको टीकाके अलग-अलग कई खण्ड रहनेसे 





उनके पुनर्मुद्रणमें और उन सबके एक साथ प्राप्त होनेमें 
कठिनाई रहती है-एऐसा सोचकर अब पूरी गीताको 
टीकाको एक जिल्दमें प्रस्तुत ग्रन्थके रूपमें प्रकाशित किया 
गया है। ऐसा करनेसे पहले पूर्व-प्रकाशित सम्पूर्ण टीकाको 
एक बार पुन: देखा है और उसमें आवश्यक संशोधन, 
परिवर्तन और परिवर्धन भी किया है। तेरहवें और चौदहवें 
अध्यायकी व्याख्या भी दुबारा लिखवायी गयी है। भाषा 
और शैलीको भी लगभग एक समान बनानेकी चेष्टा की 
गयी है। कई बातोंको अनावश्यक समझकर हटा दिया है, 
कई नयी बातें जोड़ दी हैं और कई बातोंको एक स्थानसे 
हटाकर दूसरे यथोचित स्थानपर दे दिया है। जिन बातोंकी 
ज्यादा पुनरुक्तियाँ हुई हैं, उनको यथासम्भव हटा दिया है, 
पर सर्वथा नहीँ। विशेष ध्यान देनेयोग्य बातोंकी पुनरुक्तियोंको 
साधकोंके लिये उपयोगी समझकर नहीं हटाया है। इस 
कार्यमें बहुत-सी भूलें भी हो सकती हैं, जिसके लिये मेरी 
पाठकोंसे करबद्ध क्षमा-याचना है। साथ ही पाठकोंसे यह 
प्रार्थना है कि उनको जो भूलें दिखायी दें, उनको वे सूचित 
करनेको कृपा करें। इससे आगेके संस्करणमें उनका सुधार 
करनेमें सुविधा रहेगी। 
गीतासे सम्बन्धित कई नये-नये विषयोंका, खोजपूर्ण 
निबन्धोंका एक संग्रह अलगसे तैयार किया गया है, 
जिसको 'गीता-दर्षण' नामसे प्रकाशित किया गया है। 
गीताका मनन-विचार करनेसे और गीताको टीका 
लिखवानेसे मुझे बहुत आध्यात्मिक लाभ हुआ है और 
गीताके विषयका बहुत स्पष्ट बोध भी हुआ है। दूसरे भाई- 
बहन भी यदि इसका मनन करेंगे, तो उनको भी 
आध्यात्मिक लाभ अवश्य होगा-एऐसी मेरी व्यक्तिगत 
धारणा है। गीताका मनन-विचार करनेसे लाभ होता है-- 
इसमें मुझे कभी किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं है। 
कृष्णानुग्रहदायिका सकरुणा गीता समाराधिता 
कर्मज्ञानविरागभक्तिरसिका मर्मार्थसंदर्शिका। 
सोत्कण्ठं किल साधकैरनुदिनं पेपीयमाना सदा 
कल्याणं परदेवतेव दिशती संजीवनी वर्धताम्‌॥* 
विनीत 
स्वामी रामसुखदास 


* कर्म, ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे परिपूर्ण इस करुणामयी गीताकी भलीभाँति उपासना की जाय ( मनन किया 
जाय, अर्थको गहराईसे समझा जाय ) तो यह भगवान्‌ श्रीकृष्णकी कृपा प्रदान करनेवाली है। साधकोंके द्वारा उत्कण्ठापूर्वक 
सदा बार-बार पान की जानेवाली, गीताके पदोंका मार्मिक अर्थ दिखानेवाली और इष्टदेवके समान कल्याण प्रदान 


करनेवाली यह 'साधक-संजीवनी' निरन्तर वृद्धिको प्राप्त हो। 


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॥ ३% श्रीपरमात्मने नमः ॥ 
३% पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। 
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ 


श्रीमद्भगवद्गीता 
( साधक-संजीवनी हिन्दी -टीकासहित ) 


गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्‌। 
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विध्नेशवरपादपङ्कजम्‌॥ ' 
ध्यानाभ्यासवशीकृतेन मनसा तन्निर्गुणं निष्क्रियं 
ज्योतिः किंचन योगिनो यदि परं पश्यन्ति पश्यन्तु ते। 
अस्माकं तु तदेव लोचनचमत्काराय भूयाच्चिरं 
कालिन्दीपुलिनोदरे किमपि यन्नीलं महो धावति॥ 
यावन्निरञ्जनमजं पुरुषं जरन्तं 

संचिन्तयामि निखिले जगति स्फुरन्तम्‌। 
तावद्‌ बलात्‌ स्फुरति हन्त हुदन्तरे मे 

गोपस्य कोऽपि शिशुरञ्जनपुञ्जमञ्जुः ॥ २ 


१-जो गजके मुखवाले हैं, भूतगण आदिके द्वारा सेवित हैं, कैथ और जामुनके फलोंका बड़े सुन्दर ढंगसे भक्षण करने- 
बाले हैं, शोकका विनाश करनेवाले हैं और भगवती उमाके पुत्र हैं, उन विघ्नेश्वर गणेशजीके चरणकमलोंमें मैं प्रणाम करता हूँ। 

२-योगीलोग ध्यानद्वारा वशीभूत मनसे किसी निर्गुण और निष्क्रिय परम ज्योतिको देखते हैं तो देखते रहेँ, पर हमारे लिये 
तो यमुनाके तटपर जो कोई नील तेज दौड़ रहा है, वही नेत्रॉंमें चिरकालतक चकाचौंध पैदा करता रहे। 

३-अहो! जब मैं सम्पूर्ण जगत्में स्फुरित होनेवाले निरंजन, अजन्मा और पुरातन पुरुषका चिन्तन करता हूँ, तब मेरे हृदयमें 
अंजनसमूहके समान काले वर्णवाला कोई गोपशिशु बलात्‌ स्फुरित होने लगता है। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


न विद्या येषां श्रीर्न शरणमपीषन्न च गुणाः 
परित्यक्ता लोकैरपि वृजिनयुक्ताः श्रुतिजडाः। 
शरण्यं यं तेऽपि प्रसृतगुणमाश्रित्य सुजना 
विमुक्तास्तं वन्दे यदुपतिमहं कृष्णममलम्‌॥ ¦ 
यस्य श्रीकरुणार्णवस्य करुणालेशेन बालो धवः 
स्वेष्टं प्राप्य समार्यधाम समगाद्रङ्कोऽप्यविन्दच्छ्यम्‌। 
याता मुक्तिमजामिलादिपतिताः शैलोऽपि पूज्योऽभवत्‌ 
तं श्रीमाधवमाश्रितेष्टदमहं नित्यं शरण्यं भजे॥' 
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्‌। 
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्‌ ॥? 
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌। 
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ * 


१-जिनके पास न विद्या है, न धन है, न कोई सहारा है; जिनमें न कोई गुण है, न वेद-शास्त्रोंका ज्ञान है; जिनको संसारके 
लोगांने पापी समझकर त्याग दिया है, ऐसे मनुष्य भी जिन शरणागतपालक प्रभुकी शरण लेकर सन्त बन जाते और मुक्त 
हो जाते हैं, उन विश्वविख्यात गुणोंवाले अमलात्मा यदुनाथ भगवान्‌ श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ। 

२-जिन करूणासिन्धु भगवानूकी करुणाके लेशमात्रसे बालक श्रुवने अपनी इष्ट वस्तुको प्राप्त करके श्रेष्ठ पुरुषोंके 
लोकको प्राप्त किया, दरिद्र सुदामाने लक्ष्मीको प्राप्त किया, अजामिल आदि पापियोंने मुक्तिको प्राप्त किया और गोवर्धन 
पर्वत भी पूज्य बन गया, उन शरणागत भक्तोंको अभीष्ट वस्तु देनेवाले शरण्य भगवान्‌ माधवका मैं नित्य भजन करता हूँ। 

३-जो वसुदेवजीके पुत्र, दिव्यरूपधारी, कंस एवं चाणूरका नाश करनेवाले और देवकीजीके लिये परम आनन्दस्वरूप 


हैं, उन जगदगुरु भगवान्‌ श्रीकृष्णकी मैं वन्दना करता हूँ। 


४-भगवान्‌ श्रीकृष्ण और मनुष्यांमें श्रेष्ठ अर्जुनको तथा सरस्वती और वेदव्यासजीको नमस्कार करके फिर महाभारतका 
कथन करना चाहिये। 


CE I I 


॥ ३% श्रीपरमात्मने नम: ॥ 


अशथ प्रथमो ऽध्यायः 


अजवतरण्णिका -- 


पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास समाप्त होनेपर जब प्रतिज्ञाके अनुसार अपना 
आधा राज्य माँग; तब दुर्योधनने आधा राज्य तो क्या, तीखी सुईकी नोक-जितनी जमीन भी बिना युद्धके देनी 
स्वीकार नहीं की। अतः पाण्डवॉने माता कुन्तीकी आज्ञके अनुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया। इस प्रकार पाण्डवों 
और कौरवोंका युद्ध होना निश्चित हो गया और तदनुसार दोनों ओरसे युद्धकी तैयारी होने लगी। 

महर्षि वेदव्यासजीका धृतराष्ट्रपर बहुत स्नेह था। उस स्नेहके कारण उन्होंने धतराष्ट्रके पास आकर कहा 
कि युद्ध होना और उसमें क्षत्रियोंका महान्‌ संहार होना अवश्यम्भावी है; इसे कोई टाल नहीं सकता। यदि तुम 
युद्ध देखना चाहते हो तो में तुम्हें दिव्य दृष्टि दे सकता हूँ जिससे तुम यहीं बैठे-बैठे युद्धको अच्छी तरहसे 
देख सकते हो।' इसपर धृतराष्ट्रगे कहा कि “में जन्मभर अन्धा रहा, अब अपने कृलके संहारको मैं देखना नहीं 
चाहता; परन्तु युद्ध कैसे हो रहा है-यह समाचार जरूर सुनना चाहता हूँ।' तन व्यासजीने कहा कि “मैं संजयको 
दिव्य दृष्टि देता हूँ, जिससे यह सम्पूर्ण युद्धको, सम्पूर्ण घटनाओको, सैनिकोंके मनमें आयी हुई बातोंको भी जान 
लेग, सुन लेगा, देख लेगा और सब बातें तुम्हें सुना भी देगा।' ऐसा कहकर व्यासजीने संजयको दिव्य दृष्टि 
प्रदान की। 

निश्चित समयके अनुसार कुरुक्षेत्रमें युद्ध आरम्भ हुआ। दस दिनतक संजय युद्ध-स्थलमें ही रहे। जब पितामह 
भीष्म बाणोंके द्वारा रथसे गिरा दिये गये तब संजयने हस्तिनापुरमें (जहाँ धृतराष्ट्र विराजमान थे) आकर धृतराष्ट्रको 
यह समाचार सुनाया। इस समाचारको सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ा दु:ख हुआ और वे विलाप करने लगे। फिर उन्होंने 
संजयसे युद्धका सारा वृत्तान्त सुनानेके लिये कहा। भीष्पपर्वके चौबीसवें अध्यायतक संजयने युद्ध-सम्बन्धी बातें 
धृतराष्ट्रको सुनायी! । पचीसवें अध्यायके आरम्भमें धृतराष्ट्र संजयसे पूछते हैं-- 





धतराष्ट्र उवाच 
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। 
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥ १॥ 


धृतराष्ट्र बोले-' 
सञ्जय = हे संजय! | युयुत्सवः = युद्धको पाण्डवाः = पाण्डुके पुत्राने 
धर्मक्षेत्रे = धर्मभूमि इच्छावाले | एव = भी 
कुरुक्षेत्रे = कुरुक्षेत्रमें मामकाः = मेरे किम्‌ = क्या 
समवेताः = इकद्रे हुए |च = और अकुर्वत = किया ? 


९-महाभारतमें कुल अठारह पर्व हैं। उन पर्वोके अन्तर्गत कई अवान्तर पर्व भी हैं। उनमेंसे ( भीष्मपर्वके अन्तर्गत ) यह 
' श्रीमद्भगवद्गीतापर्व' है, जो भीष्मपर्वके तेरहवें अध्यायसे आरम्भ होकर बयालीसवें अध्यायमें समाप्त होता है। 

२-वैशम्पायन और जनमेजयके संवादके अन्तर्गत ' धृतराष्ट्-संजय-संवाद' है और धृतराष्ट्र तथा संजयके संवादके 
अन्तर्गत ' श्रीकृष्णार्जुन-संवाद' है। 

३-संजयका जन्म गवल्गण नामक सूतसे हुआ था। ये मुनियोंके समान ज्ञानी और धर्मात्मा थे-' सञ्जयो मुनिकल्पस्तु 
जज्ञे सूतो गवल्गणात्‌’ ( महाभारत, आदि० ६३। ९७ )। ये धृतराष्ट्रके मन्त्री थे। 


२६ 


व्याख्या-- धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे '— कुरुक्षेत्रमं देवताओंने 
यज्ञ किया था। राजा कुरुने भी यहाँ तपस्या की थी। यज्ञादि 
धर्ममय कार्य होनेसे तथा राजा कुरुकी तपस्याभूमि होनेसे 
इसको धर्मभूमि कुरुक्षेत्र कहा गया है। 

यहाँ ' धर्मक्षेत्रे और ' कुरुक्षेत्रे? पदोंमें ' क्षेत्र' शब्द 
देनेमें धृतराष्ट्रका अभिप्राय है कि यह अपनी कुरुवंशियोंकी 
भूमि है। यह केवल लड़ाईकी भूमि ही नहीं है, प्रत्युत 
तीर्थभूमि भी है, जिसमें प्राणी जीते-जी पवित्र कर्म करके 
अपना कल्याण कर सकते हैं। इस तरह लौकिक और 
पारलौकिक सब तरहका लाभ हो जाय--ऐसा विचार 
करके एवं श्रेष्ठ पुरुषांकी सम्मति लेकर ही युद्धके लिये 
यह भूमि चुनी गयी है। 

संसारमें प्राय: तीन बातोंको लेकर लडाई होती है- 
भूमि, धन और स्त्री । इन तीनोंमें भी राजाओंका आपसमें 
लड़ना मुख्यतः जमीनको लेकर होता है। यहाँ ' कुरुक्षेत्रे ' 
पद देनेका तात्पर्यं भी जमीनको लेकर लड़नेमें है। 
कुरुवंशमें धृतराष्ट्र और पाण्डुके पुत्र सब एक हो जाते हैं। 
कुरुवंशी होनेसे दोनोंका कुरुक्षेत्रमें अर्थात्‌ राजा कुरुकी 
जमीनपर समान हक लगता है। इसलिये (कौरवाँद्वारा 
पाण्डवोंको उनकी जमीन न देनेके कारण) दोनों जमीनके 
लिये लड़ाई करने आये हुए हैं। 

यद्यपि अपनी भूमि होनेके कारण दोनोंके लिये 
'कुरुक्षेत्रे' पद देना युक्तिसंगत, न्यायसंगत है, तथापि 
हमारी सनातन वैदिक संस्कृति ऐसी विलक्षण है कि कोई 
भी कार्य करना होता है तो वह धर्मको सामने रखकर ही 
होता है। युद्ध-जैसा कार्य भी धर्मभूमि-तीर्थभूमिमें ही 
करते हैं, जिससे युद्धमें मरनेवालोंका उद्धार हो जाय, 
कल्याण हो जाय। अतः यहाँ कुरुक्षेत्रके साथ ' धर्मक्षेत्रे ' 
पद आया है। 

यहाँ आरम्भमें 'धर्म' पदसे एक और बात भी 

मालूम होती है। अगर आरम्भके 'धर्म' पदमेंसे ' धर्‌' 
लिया जाय और अठारहवें अध्यायके अन्तिम श्लोकके 
“मम' पदमेंसे 'म' लिया जाय, तो ' धर्म ' शब्द बन जाता 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


है। अतः सम्पूर्ण गीता धर्मके अन्तर्गत है, अर्थात्‌ धर्मका 
पालन करनेसे गीताके सिद्धान्तोंका पालन हो जाता है और 
गीताके सिद्धान्तोंके अनुसार कर्तव्य-कर्म करनेसे धर्मका 
अनुष्ठान हो जाता है। 

इन (धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे' पदोंसे सभी मनुष्योंको यह 
शिक्षा लेनी चाहिये कि कोई भी काम करना हो तो वह 
धर्मको सामने रखकर ही करना चाहिये। प्रत्येक कार्य 
सबके हितकी दृष्टिसे ही करना चाहिये, केवल अपने 
सुख-आरामकी दृष्टिसे नहीं; और कर्तव्य-अकर्तव्यके 
विषयमें शास्त्रको सामने रखना चाहिये (गीता-सोलहवें 
अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) । 

“समवेता युयुत्सवः '--राजाओँंके द्वारा बार-बार 
सन्धिका प्रस्ताव रखनेपर भी दुर्योधनने सन्धि करना 
स्वीकार नहीं किया । इतना ही नहीं, भगवान्‌ श्रीकृष्णके 
कहनेपर भी मेरे पुत्र दुर्योधनने स्पष्ट कह दिया कि बिना 
युद्धके मैं तीखी सूईकी नोक-जितनी जमीन भी पाण्डवोंको 
नहीं दूँगा।' तब मजबूर होकर पाण्डवोंने भी युद्ध करना 
स्वीकार किया है। इस प्रकार मेरे पुत्र और पाण्डुपुत्र 
दोनों ही सेनाओंके सहित युद्धकी इच्छासे इकट्ठे हुए हैं। 

दोनों सेनाओंमें युद्धकी इच्छा रहनेपर भी दुर्योधनमें 
युद्धकी इच्छा विशेषरूपसे थी। उसका मुख्य उद्देश्य 
राज्य-प्राप्तिका ही था। वह राज्य-प्राप्ति धर्मसे हो चाहे 
अधर्मसे, न्यायसे हो चाहे अन्यायसे, विहित रीतिसे हो चाहे 
निषिद्ध रीतिसे, किसी भी तरहसे हमें राज्य मिलना 
चाहिये--ऐसा उसका भाव था। इसलिये विशेषरूपसे 
दुर्योधनका पक्ष ही युयुत्सु अर्थात्‌ युद्धकी इच्छावाला था। 

पाण्डवोंमें धर्मकी मुख्यता थी। उनका ऐसा भाव था 
कि हम चाहे जैसा जीवन-निर्वाह कर लेंगे, पर अपने धर्ममें 
बाधा नहीं आने देंगे, धर्मके विरुद्ध नहीं चलेंगे। इस बातको 
लेकर महाराज युधिष्ठिर युद्ध नहीं करना चाहते थे। परन्तु 
जिस माँकी आज्ञासे युधिष्टिरने चारों भाइयोंसहित द्रौपदीसे 
विवाह किया था, उस माँकी आज्ञा होनेके कारण ही महाराज 
युधिष्ठिरकी युद्धमें प्रवृत्ति हुई थी? अर्थात्‌ केवल माँके 


९-यावद्धि तीक्ष्णया सूच्या विध्येदग्रेण केशव। तावदप्यपरित्याज्यं भूमेर्नः पाण्डवान्‌ प्रति॥ ( महाभारत, उद्योग० १२७। २५ ) 
२-माता कुन्ती बड़ी सहिष्णु थी। कष्टसे बचकर सुख, आराम, राज्य आदि चाहना--यह बात उसमें नहीं थी। वही 
एक ऐसी विलक्षण माता थी, जिसने भगवानूसे विपत्तिका ही वरदान माँगा था। उसमें सुख-लोलुपता नहीं थी। परन्तु उसके 
मनमें दो बातोंको लेकर बड़ा दुःख था। पहली बात, राज्यके लिये कौरव-पाण्डव आपसमें लड़ते, चाहे जो करते, पर मेरी 
प्यारी पुत्रवधू द्रौपदीको इन दुर्योधनादि दुष्टोंने सभामें नग्न करना चाहा, अपमानित करना चाहा-एऐसी घृणित चेष्टा करना 


मनुष्यता नहीं है। यह बात माता कुन्तीको बहुत बुरी लगी। 


श्लोक १] 


आज्ञा-पालनरूप धर्मसे ही युधिष्ठिर युद्धकी इच्छावाले हुए 
हैं। तात्पर्य है कि दुर्योधन आदि तो राज्यको लेकर ही 
युयुत्सु थे, पर पाण्डव धर्मको लेकर ही युयुत्सु बने थे। 

“मामकाः पाण्डवाएचैव '--पाण्डव धृतराष्ट्रको (अपने 
पिताके बड़े भाई होनेसे) पिताके समान समझते थे और 
उनकी आज्ञाका पालन करते थे। धृतराष्ट्रके द्वारा अनुचित 
आज्ञा देनेपर भी पाण्डव उचित-अनुचितका विचार न 
करके उनकी आज्ञाका पालन करते थे। अतः यहाँ 
“मामकाः ' पदके अन्तर्गत कौरव' और पाण्डव दोनों आ 
जाते हैं। फिर भी “पाण्डवाः' पद अलग देनेका तात्पर्य 
है कि धृतराष्ट्रका अपने पुत्रोंमें तथा पाण्डुपुत्रोंमे समान भाव 
नहीं था। उनमें पक्षपात था, अपने पुत्रोंके प्रति मोह था। 
वे दुर्योधन आदिको तो अपना मानते थे, पर पाण्डवोंको 
अपना नहीं मानते थे। इस कारण उन्हाने अपने पुत्रोंके 
लिये 'मामकाः' और पाण्डुपुत्रांके लिये “पाण्डवाः ' 
पदका प्रयोग किया है; क्योंकि जो भाव भीतर होते हैं, 
वे ही प्रायः वाणीसे बाहर निकलते हैं। इस द्वैधीभावके 
कारण ही धृतराष्ट्रको अपने कुलके संहारका दुःख भोगना 
पड़ा। इससे मनुष्यमात्रको यह शिक्षा लेनी चाहिये कि वह 
अपने घरोंमें, मुहल्लोंमें, गाँवोंमें, प्रान्तोंमें, देशोंमें, सम्प्रदायोंमें 
द्वैधीभाव अर्थात्‌ ये अपने हैं, ये दूसरे हैं-एऐसा भाव न 
रखे। कारण कि द्वैधीभावसे आपसमें प्रेम, स्नेह नहीं होता, 
प्रत्युत कलह होती है। 

यहाँ “पाण्डवाः ' पदके साथ 'एब' पद देनेका तात्पर्य 
है कि पाण्डव तो बड़े धर्मात्मा हैं; अतः उन्हें युद्ध नहीं 
करना चाहिये था। परन्तु वे भी युद्धके लिये रणभूमिमें आ 
गये तो वहाँ आकर उन्होंने क्या किया? 


* साधक-संजीवनी * 


२७ 


['मामकाः' और 'पाण्डवाः' ` -इनमेंसे पहले 
'मामकाः' पदका उत्तर संजय आगेके (दूसरे) श्लोकसे 
तेरहवें श्लोकतक देंगे कि आपके पुत्र दुर्योधने पाण्डवोँको 
सेनाको देखकर द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा 
करनेके लिये उनके पास जाकर पाण्डवोंके मुख्य-मुख्य 
सेनापतियोंके नाम लिये। उसके बाद दुर्योधनने अपनी 
सेनाके मुख्य-मुख्य योद्धाओंके नाम लेकर उनके रण- 
कौशल आदिको प्रशंसा की। दुर्योधनको प्रसन्न करनेके 
लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया। उसको सुनकर 
कौरव-सेनामें शंख आदि बाजे बज उठे। फिर चौदहवें 
श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक ' पाण्डवाः ' पदका उत्तर देंगे 
कि रथमें बैठे हुए पाण्डवपक्षीय भगवान्‌ श्रीकृष्णने शंख 
बजाया। उसके बाद अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, 
सहदेव आदिने अपने-अपने शंख बजाये, जिससे दुर्योधनकी 
सेनाका हृदय दहल गया। उसके बाद भी संजय पाण्डवोंको 
बात कहते-कहते बीसवें श्लोकसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके 
संवादका प्रसंग आरम्भ कर देंगे।] 

“किमकुर्वत'-'किम्‌' शब्दके तीन अर्थ होते हैं- 
विकल्प, निन्दा (आक्षेप) और प्रश्‍न। 

युद्ध हुआ कि नहीं ? इस तरहका विकल्प तो यहाँ 
लिया नहीं जा सकता; क्योंकि दस दिनतक युद्ध 
हो चुका है, और भीष्मजीको रथसे गिरा देनेके बाद 
संजय हस्तिनापुर आकर धृतराष्ट्रको वहाँकी घटना सुना 
रहे हैं। 

“मेरे और पाण्डुके पुत्राने यह क्या किया, जो कि युद्ध 
कर बैठे! उनको युद्ध नहीं करना चाहिये था'-एऐसी निन्दा 
या आक्षेप भी यहाँ नहीं लिया जा सकता; क्योंकि युद्ध तो 


दूसरी बात, भगवान्‌ श्रीकृष्ण पाण्डवांकी ओरसे सन्धिका प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर आये तो दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण, 
शकुनि आदिने भगवानको पकड़कर कैद करना चाहा। इस बातको सुनकर कुन्तीके मनमें यह विचार हुआ कि अब इन 
दुष्टोंको जल्दी ही खत्म करना चाहिये। कारण कि इनके जीते रहनेसे इनके पाप बढ़ते ही चले जायँगे, जिससे इनका बहुत 
नुकसान होगा। इन्हीं दो कारणोंसे माता कुन्तीने पाण्डवोंको युद्धके लिये आज्ञा दी थी। 

१-यद्यपि 'कौरव' शब्दके अन्तर्गत धृतराष्ट्रे पुत्र दुर्योधन आदि और पाण्डुके पुत्र युधिष्ठिर आदि सभी आ जाते हैं, 
तथापि इस श्लोकमें धृतराष्ट्ने युधिष्ठिर आदिके लिये 'पाण्डव' शब्दका प्रयोग किया है। अतः व्याख्यामें 'कौरव' शब्द 


दुर्योधन आदिके लिये ही दिया गया है। 


२-धृतराष्ट्रके मनमें द्वैधीभाव था कि दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि मेरे पुत्र नहीं हैं, प्रत्युत पाण्डुके 


पुत्र हैं। इस भावके कारण दुर्योधनका भीमको विष खिलाकर जलमें फेंक देना, लाक्षागृहमें पाण्डवोंको जलानेका प्रयत्न 
करना, युधिष्ठिरके साथ छलपूर्वक जुआ खेलना, पाण्डवाँका नाश करनेके लिये सेना लेकर वनमें जाना आदि कार्योके करनेमें 
दुर्योधनको धृतराष्ट्ने कभी मना नहीँ किया। कारण कि उनके भीतर यही भाव था कि अगर किसी तरह पाण्डवांका नाश हो 
जाय, तो मेरे बेटोंका राज्य सुरक्षित रहेगा। 

३-यहाँ आये “मामकाः ' और ' पाण्डवाः 'का अलग-अलग वर्णन करनेकी दृष्टिसे ही आगे संजयके वचनोंमें ' दुर्योधनः ' 
(१। २) और 'पाण्डवः' ( १। १४ ) शब्द प्रयुक्त हुए हैं। 


२८ * श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


चल ही रहा था और धृतराष्ट्रके भीतर भी आक्षेपपूर्वक | है। धृतराष्ट्र संजयसे भिन्न-भिन्न प्रकारकी छोटी-बड़ी 


पूछनेका भाव नहीं था। 


सब घटनाओंको अनुक्रमसे विस्तारपूर्वक ठीक-ठीक जाननेके 


यहाँ “किम्‌' शब्दका अर्थ प्रश्न लेना ही ठीक बैठता | लिये ही प्रश्‍न कर रहे हैं। 
परिशिष्ट भाव-- मेरे पुत्र (मामकाः ) और 'पाण्डुके पुत्र' ( पाण्डवाः )--इस मतभेदसे ही राग-द्वेष पैदा हुए, 
जिससे लड़ाई हुई, हलचल हुई। धृतराष्ट्रके भीतर पैदा हुए राग-द्वेषका फल यह हुआ कि सौ-के-सौ कौरव मारे 


गये, पर पाण्डव एक भी नहीं मारा गया! 


जैसे दही बिलोते हैं तो उसमें हलचल पैदा होती है, जिससे मक्खन निकलता है, ऐसे ही “मामकाः ' और “पाण्डवाः ' 
के भेदसे पैदा हुई हलचलसे अर्जुनके मनमें कल्याणकी अभिलाषा जाग्रत्‌ हुई, जिससे भगवद्गीतारूपी मक्खन निकला! 
तात्पर्यं यह हुआ कि धृतराष्ट्रके मनमें होनेवाली हलचलसे लड़ाई पैदा हुई और अर्जुनके मनमें होनेवाली हलचलसे 


गीता प्रकट हुई! 





सम्बन्ध धृतराष्ट्रके प्रश्नका उत्तर संजय आगेके श्लोकसे देना आरम्भ करते हैं। 
सञ्जय उवाच 


दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। 


आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥ २॥ 
संजय बोले 
तदा = उस समय दृष्ट्वा = देखकर राजा = राजा 
व्यूढम्‌ = वञ्रव्यूहसे तु = और दुर्योधनः = दुर्योधन (यह) 
खड़ी हुई आचार्यम्‌ = द्रोणाचार्यके वचनम्‌ = वचन 
पाण्डवानीकम्‌ = पाण्डव-सेनाको | उपसङ्गम्य = पास जाकर अब्रवीत्‌ = बोला। 


व्याख्या-~ तदा '--जिस समय दोनों सेनाएँ युद्धके 
लिये खड़ी हुई थीं, उस समयकी बात संजय यहाँ “तदा' 
पदसे कहते हैं। कारण कि धृतराष्ट्रका प्रश्‍न 'युद्धकी 
इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया'-इस 
विषयको सुननेके लिये ही है। 

'दृष्ट्वा' पाण्डवानीकं व्यूढम्‌'--पाण्डवोंकी 
वज्रव्यूह-से खड़ी सेनाको देखनेका तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी 
सेना बड़ी ही सुचारुरूपसे और एक ही भावसे खड़ी थी 
अर्थात्‌ उनके सैनिकोंमें दो भाव नहीं थे, मतभेद नहीं था'। 
उनके पक्षमें धर्म और भगवान्‌ श्रीकृष्ण थे। जिसके पक्षमें 
धर्म और भगवान्‌ होते हैं, उसका दूसरोंपर बड़ा असर 


पड़ता है। इसलिये संख्यामें कम होनेपर भी पाण्डवोंकी 
सेनाका तेज (प्रभाव) था और उसका दूसरोंपर बड़ा असर 
पड़ता था। अत: पाण्डव-सेनाका दुर्योधनपर भी बड़ा असर 
पड़ा, जिससे वह द्रोणाचार्यके पास जाकर नीतियुक्त गंभीर 
वचन बोलता है। 

“राजा दुर्योधनः '--दुर्योधनको राजा कहनेका तात्पर्य 
है कि धृतराष्ट्रका सबसे अधिक अपनापन (मोह) दुर्योधनमें 
ही था। परम्पराकी दृष्टिसे भी युवराज दुर्योधन ही था। 
राज्यके सब कार्योंकी देखभाल दुर्योधन ही करता था। 
धृतराष्ट्र तो नाममात्रके राजा थे। युद्ध होनेमें भी मुख्य हेतु 
दुर्योधन ही था। इन सभी कारणोंसे संजयने दुर्योधनके लिये 


१-इस अध्यायमें तीन बार 'दूष्ट्वा' (देखकर) पदका प्रयोग हुआ है--पाण्डब-सेनाको देखकर दुर्योधनका 
द्रोणाचार्यके पास जाना (१। २); कौरव-सेनाको देखकर अर्जुनका धनुषको उठाना ( १। २०); और अपने स्वजनों- 
( कुटुम्बियों- ) को देखकर अर्जुनका मोहाविष्ट होना ( १। २८ )। इन तीनोंमेंसे दो 'दृष्ट्वा' तो आपसमें सेना देखनेके लिये 
आये हैं और एक 'दृष्ट्वा' स्वजनोंको देखनेके लिये आया है, जिससे अर्जुनका भाव बदल जाता है। 

२-कौरव-सेनामें मतभेद था; क्योंकि दुर्योधन, दुःशासन आदि तो युद्ध करना चाहते थे, पर भीष्म, द्रोण, विकर्ण आदि 
युद्ध नहीं करना चाहते थे। यह नियम है कि जहाँ आपसमें मतभेद होता है, वहाँ तेज ( प्रभाव) नहीं रहता 

काँच कटोरो कुम्भ पय मोती मिनत अवास। ताल घाव तिरिया कटक फाटा करे बिनास॥ 


श्लोक ३] 


“राजा' शब्दका प्रयोग किया है। 

“आचार्यमुपसङ्गम्य '--द्रोणाचार्यके पास जानेमें मुख्यतः 
तीन कारण मालूम देते हैं- 

(१) अपना स्वार्थं सिद्ध करनेके लिये अर्थात्‌ 
द्रोणाचार्यके भीतर पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करके उनको 
अपने पक्षमें विशेषतासे करनेके लिये दुर्योधन द्रोणाचार्यके 
पास गया। 

(२) व्यवहारमें गुरुके नाते आदर देनेके लिये भी 
द्रोणाचार्यके पास जाना उचित था। 

(३) मुख्य व्यक्तिका सेनामें यथास्थान खड़े रहना 
बहुत आवश्यक होता है, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जाती है। 
इसलिये दुर्योधनका द्रोणाचार्ये पास खुद जाना उचित 
ही था। 

यहाँ शंका हो सकती है कि दुर्योधनको तो पितामह 
भीष्मके पास जाना चाहिये था, जो कि सेनापति थे। पर 
दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्ये पास ही क्‍यों गया? इसका 
समाधान यह है कि द्रोण और भीष्म-दोनों उभय- 
पक्षपाती थे अर्थात्‌ वे कौरव और पाण्डव-दोनोंका ही 
पक्ष रखते थे। उन दोनोंमें भी द्रोणाचार्यको ज्यादा राजी 
करना था; क्योंकि द्रोणाचार्यके साथ दुर्योधनका गुरुके नाते 
तो स्नेह था, पर कुटुम्बके नाते स्नेह नहीं था; और 
अर्जुनपर द्रोणाचार्यको विशेष कृपा थी। अतः उनको राजी 


* साधक-संजीवनी * 


२९ 


करनेके लिये दुर्योधनका उनके पास जाना ही उचित था। 
व्यवहारमें भी यह देखा जाता है कि जिसके साथ स्नेह 
नहीं है, उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये मनुष्य 
उसको ज्यादा आदर देकर राजी करता है। 

दुर्योधनके मनमें यह विश्वास था कि भीष्मजी तो 
हमारे दादाजी ही हैं; अतः उनके पास न जाऊँ तो भी कोई 
बात नहीं है। न जानेसे अगर वे नाराज भी हो जायेगे तो 
मैं किसी तरहसे उनको राजी कर लूँगा। कारण कि 
पितामह भीष्मके साथ दुर्योधनका कौटुम्बिक सम्बन्ध और 
स्नेह था ही, भीष्मका भी उसके साथ कौटुम्बिक सम्बन्ध 
और स्नेह था। इसलिये भीष्मजीने दुर्योधनको राजी करनेके 
लिये जोरसे शंख बजाया है (पहले अध्यायका बारहवाँ 
श्लोक) । 

“ बचनमब्रवीत्‌'-यहाँ ' अब्रवीत्‌? कहना ही पर्याप्त 
था; क्योंकि 'अब्रवीत्‌' क्रियाके अन्तर्गत ही 'वचनम्‌' आ 
जाता है अर्थात्‌ दुर्योधन बोलेगा, तो वचन ही बोलेगा। 
इसलिये यहाँ “वचनम्‌' शब्दकी आवश्यकता नहीं थी। 
फिर भी “वचनम्‌' शब्द देनेका तात्पर्य है कि दुर्योधन 
नीतियुक्त गम्भीर वचन बोलता है, जिससे द्रोणाचार्यके 
मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा हो जाय और वे हमारे ही 
पक्षमें रहते हुए ठीक तरहसे युद्ध करें। जिससे हमारी 
विजय हो जाय, हमारा स्वार्थ सिद्ध हो जाय। 





सम्बन्ध-द्रोणाचार्यके पास जाकर दुर्योधन क्या वचन बोला-इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं। 
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतां चमूम्‌ । 


व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव 


आचार्य = हे आचार्य! 

तव = आपके 

धीमता = बुद्धिमान्‌ व्यूढाम्‌ 
शिष्येण = शिष्य 

द्रुपदपुत्रेण =द्रुपदपुत्र 


व्याख्या- आचार्य'-_द्रोणके लिये ' आचार्य' सम्बोधन 
देनेमें दुर्योधनका यह भाव मालूम देता है कि आप हम 
सबके-कौरवों और पाण्डवोंके आचार्य हैं। शस्त्रविद्या 
सिखानेवाले होनेसे आप सबके गुरु हैं। इसलिये आपके 
मनमें किसीका पक्ष या आग्रह नहीं होना चाहिये। 

“तव शिष्येण धीमता '--इन पदाँका प्रयोग करनेमें 


शिष्येण धीमता॥ ३॥ 


धृष्टद्युम्नके पाण्डुपुत्राणाम्‌ = पाण्डवोंकी 
द्वारा एताम्‌ =इस 

= व्यूहरचनासे महतीम्‌ =बड़ी भारी 
खड़ी चमूम्‌ = सेनाको 
की हुई पश्य = देखिये ! 


दुर्योधनका भाव यह है कि आप इतने सरल हैं कि अपने 
मारनेके लिये पैदा होनेवाले धृष्टझुम्नको भी आपने अस्त्र- 
शस्त्रकी विद्या सिखायी है; और वह आपका शिष्य धृष्टयुम्न 
इतना बुद्धिमान्‌ है कि उसने आपको मारनेके लिये आपसे 
ही अस्त्र-शस्त्रकी विद्या सीखी है। 

"द्रुपदपुत्रेण '-यह पद कहनेका आशय है कि आपको 


३० 


मारनेके उद्देश्यको लेकर ही द्रुपदने याज और उपयाज 
नामक ब्राह्मणाँसे यज्ञ कराया, जिससे धृष्टयुम्न पैदा हुआ। 
वही यह द्रुपदपुत्र धृष्ट्ययुम्म आपके सामने (प्रतिपक्षमें) 
सेनापतिके रूपमें खड़ा है। 

यद्यपि दुर्योधन यहाँ 'द्रुपदपुत्र ' के स्थानपर ' धृष्टयुम्न ' 
भी कह सकता था, तथापि द्रोणाचार्यके साथ द्रुपद जो वैर 
रखता था, उस वैरभावको याद दिलानेके लिये दुर्योधन यहाँ 
'द्रुपदपुत्रेण' शब्दका प्रयोग करता है कि अब वैर 
निकालनेका अच्छा मौका है। 

“पाण्डुपुत्राणाम्‌ एतां व्यूढां महतीं चमूं पश्य'-- 
द्रुपदपुत्रके द्वारा पाण्डवोंकी इस व्यूहाकार खड़ी हुई बड़ी 
भारी सेनाको देखिये। तात्पर्य है कि जिन पाण्डवोंपर आप 
स्नेह रखते हैं, उन्हीं पाण्डवोंने आपके प्रतिपक्षमें खास 
आपको मारनेवाले द्रुपदपुत्रको सेनापति बनाकर व्यूह- 
रचना करनेका अधिकार दिया है। अगर पाण्डव आपसे 
स्नेह रखते तो कम-से-कम आपको मारनेवालेको तो 
अपनी सेनाका मुख्य सेनापति नहीं बनाते, इतना अधिकार 
तो नहीं देते। परन्तु सब कुछ जानते हुए भी उन्होंने उसीको 
सेनापति बनाया है। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


यद्यपि कौरवाँकी अपेक्षा पाण्डवोंकी सेना संख्यामें 
कम थी अर्थात्‌ कौरवोंकी सेना ग्यारह अक्षौहिणी* और 
पाण्डवोंकी सेना सात अक्षौहिणी थी, तथापि दुर्योधन 
पाण्डवोंकी सेनाको बड़ी भारी बता रहा है। पाण्डवोंकी 
सेनाको बड़ी भारी कहनेमें दो भाव मालूम देते हैं- 
(१) पाण्डवोंको सेना ऐसे ढंगसे व्यूहाकार खड़ी हुई 
थी, जिससे दुर्योधनको थोड़ी सेना भी बहुत बड़ी दीख 
रही थी और (२) पाण्डव-सेनामें सब-के-सब योद्धा एक 
मतके थे। इस एकताके कारण पाण्डवोंको थोड़ी सेना भी 
बलमें, उत्साहमें बड़ी मालूम दे रही थी। ऐसी सेनाको 
दिखाकर दुर्योधन द्रोणाचार्यसे यह कहना चाहता है कि युद्ध 
करते समय आप इस सेनाको सामान्य और छोटी न समझें। 
आप विशेष बल लगाकर सावधानीसे युद्ध करें। पाण्डवोंका 
सेनापति है तो आपका शिष्य द्रुपदपुत्र ही; अतः उसपर 
विजय करना आपके लिये कौन-सी बड़ी बात है! 
“एतां पश्य’ कहनेका तात्पर्य है कि यह पाण्डव- 
सेना युद्धके लिये तैयार होकर सामने खड़ी है। अतः 
हमलोग इस सेनापर किस तरहसे विजय कर सकते हैं- 
इस विषयमे आपको जल्दी-से-जल्दी निर्णय लेना चाहिये। 





सम्बन्ध-द्रोणाचार्यये पाण्डवोंकी सेना देखनेके लिये प्रार्था करके अब दुर्योधन उन्हें पाण्डव-सेनाके मह्मराथियोंको दिखाता है। 
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। 
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥ ४॥ 
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌। 
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ५॥ 
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌। 


सौभद्रो द्रौपदेयाश्च 


अत्र = यहाँ (पाण्डवों- 

को सेनामें) च =तथा 
शूराः = बड़े-बड़े युधि = 

शूरवीर हैं, भीमार्जुनसमाः 
महेष्वासाः = (जिनके) बहुत 

बड़े-बड़े युयुधानः 


सर्व एव महारथाः॥ ६॥ 


धनुष हैं (सात्यकि), 
तथा (जो) विराटः =राजा विराट 
युद्धमें च = और 
= भीम और अर्जुनके | महारथः = महारथी 
समान हैं। (उनमें) | द्रुपदः = द्रुपद (भी हैं।) 
= युयुधान धृष्टकेतुः = धृष्टकेतु 


* एक अक्षौहिणी सेनामें २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, ६५,६१० घोड़े और १,०९,३५० पैदल सैनिक होते हैं। 


(महाभारत, आदि० २। २३-२६ ) 


श्लोक ४--६ ] 


च = और 

चेकितानः = चेकितान चच 

च = तथा नरपुङ्गवः 
वीर्यवान्‌ =पराक्रमी शैब्यः 
काशिराजः = काशिराज (भी हैं।) | विक्रान्तः 
पुरुजित्‌ =पुरुजित्‌ युधामन्युः 
च = और च 
कुन्तिभोजः =कुन्तिभोज (-ये | वीर्यवान्‌ 


व्याख्या अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि '-- 
जिनसे बाण चलाये जाते हैं, फेंके जाते हैं, उनका नाम 
'इष्वास' अर्थात्‌ धनुष है। ऐसे बड़े-बड़े इष्वास (धनुष) 
जिनके पास हैं, वे सभी 'महेष्वास' हैं। तात्पर्य है कि बड़े 
धनुषोंपर बाण चढ़ाने एवं प्रत्यंचा खींचनेमें बहुत बल 
लगता है। जोरसे खींचकर छोड़ा गया बाण विशेष मार 
करता है। ऐसे बड़े-बड़े धनुष पासमें होनेके कारण ये सभी 
बहुत बलवान्‌ और शूरवीर हैं। ये मामूली योद्धा नहीं हैं। 
युद्धमें ये भीम और अर्जुनके समान हैं अर्थात्‌ बलमें ये 
भीमके समान और अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये अर्जुनके 
समान हैं। 

' युयुधानः '—युयुधान-(सात्यकि- ) ने अर्जुनसे अस्त्र- 
शस्त्रकौ विद्या सीखी थी। इसलिये भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा 
दुर्योधनको नारायणी सेना देनेपर भी वह कृतज्ञ होकर 
अर्जुनके पक्षमें ही रहा, दुर्योधनके पक्षमें नहीं गया। 
द्रोणाचार्यके मनमें अर्जुनके प्रति द्वेषभाव पैदा करनेके लिये 
दुर्योधन महारथियोंमें सबसे पहले अर्जुनके शिष्य युयुधानका 
नाम लेता है। तात्पर्य है कि इस अर्जुनको तो देखिये! इसने 
आपसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखा है और आपने 
अर्जुनको यह वरदान भी दिया है कि संसारमें तुम्हारे समान 
और कोई धनुर्धर न हो, ऐसा प्रयत्न करूँगा*। इस तरह 
आपने तो अपने शिष्य अर्जुनपर इतना स्नेह रखा है, पर 
वह कृतघ्न होकर आपके विपक्षमें लड्नेके लिये खड़ा है, 
जबकि अर्जुनका शिष्य युयुधान उसीके पक्षमें खड़ा है। 

[युयुधान महाभारतके युद्धमें न मरकर यादवोंके 
आपसी युद्धमें मारे गये।] 

“विराटश्च'--जिसके कारण हमारे पक्षका वीर सुशर्मा 
अपमानित किया गया, आपको सम्मोहन-अस्त्रसे मोहित 


* साधक-संजीवनी * 


३१ 
दोनों भाई) उत्तमौजाः =उत्तमौजा 

=तथा (भी हैं।) 
= मनुष्योंमें श्रेष्ठ सौभद्रः = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु 
=शैब्य (भी हैं।) |च = और 
= पराक्रमी द्रौपदेयाः =द्रौपदीके पाँचौं पुत्र 
= युधामन्यु (भी हैं।) 
= और सर्वे, एव = (ये) सब-के-सब 
= पराक्रमी महारथाः =महारथी हैं। 


होना पड़ा और हमलोगोंको भी जिसकी गाये छोड़कर 
युद्धसे भागना पड़ा, वह राजा विराट आपके प्रतिपक्षमें 
खड़ा है। 

राजा विराटके साथ द्रोणाचार्यका ऐसा कोई वैरभाव या 
द्वेषभाव नहीं था; परन्तु दुर्योधन यह समझता है कि अगर 
युयुधानके बाद मैं द्रुपदका नाम लूँ तो द्रोणाचार्यके मनमें 
यह भाव आ सकता है कि दुर्योधन पाण्डवोंके विरोधमें 
मेरेको उकसाकर युद्धके लिये विशेषतासे प्रेरणा कर रहा 
है तथा मेरे मनमें पाण्डवोंके प्रति वैरभाव पैदा कर रहा 
है। इसलिये दुर्योधन द्रुपदके नामसे पहले विराटका नाम 
लेता है, जिससे द्रोणाचार्य मेरी चालाकी न समझ सकें और 
विशेषतासे युद्ध करें । 

[राजा विराट उत्तर, श्वेत और शंख नामक तीनों 
पुत्रोंसहित महाभारत-युद्धमें मारे गये।] 

'द्रुपदश्च महारथः ' आपने तो द्रुपदको पहलेकी 
मित्रता याद दिलायी, पर उसने सभामें यह कहकर आपका 
अपमान किया कि मैं राजा हूँ और तुम भिक्षुक हो; अतः 
मेरी-तुम्हारी मित्रता कैसी तथा वैरभावके कारण आपको 
मारनेके लिये पुत्र भी पैदा किया, वही महारथी द्रुपद 
आपसे लड़नेके लिये विपक्षमें खड़ा है। 

[राजा द्रुपद युद्धमें द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।] 

' धृष्टकेतुः '-यह धृष्टकेतु कितना मूर्ख है कि 
जिसके पिता शिशुपालको कृष्णने भरी सभामें चक्रसे मार 
डाला था, उसी कृष्णके पक्षमें यह लड्नेके लिये खडा है! 

[ धृष्टकेतु द्रोणाचार्यके हाथसे मारे गये।] 

“चेकितानः '--सब यादवसेना तो हमारी ओरसे 
लड्नेके लिये तैयार है और यह यादव चेकितान पाण्डवोंकी 
सेनामें खड़ा है! 


* प्रयतिष्ये तथा कर्तु यथा नान्यो धनुर्धरः। त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते॥ 


(महाभारत, आदि० १३१। २७) 


३२ 


[चेकितान दुर्योधनके हाथसे मारे गये।] 

“काशिराजश्च वीर्यवान्‌'--यह काशिराज बड़ा ही 
शूरवीर और महारथी है। यह भी पाण्डवोंकी सेनामें खड़ा 
है। इसलिये आप सावधानीसे युद्ध करना; क्योंकि यह बड़ा 
पराक्रमी है। 

[काशिराज महाभारत-युद्धमें मारे गये।] 

“पुरुजित्कुन्तिभोजश्च'--यद्यपि पुरुजित्‌ और 
कुन्तिभोज-ये दोनों कुन्तीके भाई होनेसे हमारे और 
पाण्डवोंके मामा हैं, तथापि इनके मनमें पक्षपात होनेके 
कारण ये हमारे विपक्षमें युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। 

[पुरुजित्‌ और कुन्तिभोज-दोनों ही युद्धमे द्रोणाचार्यके 
हाथसे मारे गये।] 

शैब्यश्च नरपुङ्गवः “यह शैब्य युधिष्ठिरका श्वशुर 
है। यह मनुष्योंमें श्रेष्ठ और बहुत बलवान्‌ है। परिवारके 
नाते यह भी हमारा सम्बन्धी है। परन्तु यह पाण्डवोंके ही 
पक्षमें खड़ा है। 

“युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌ 
पांचालदेशके बड़े बलवान्‌ और वीर योद्धा युधामन्यु तथा 
उत्तमौजा मेरे वैरी अर्जुनके रथके पहियोंकी रक्षामें नियुक्त 
किये गये हैं। आप इनकी ओर भी नजर रखना। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


[रातमें सोते हुए इन दोनोंको अश्वत्थामाने मार डाला।] 

'सौभद्र: यह कृष्णकी बहन सुभद्राका पुत्र अभिमन्यु 
है। यह बहुत शूरवीर है। इसने गर्भमें ही चक्रव्यूह-भेदनकी 
विद्या सीखी है। अत: चक्रव्यूह-रचनाके समय आप इसका 
खयाल रखें। 

[युद्धमें दुःशासनपुत्रके द्वारा अन्यायपूर्वक सिरपर गदाका 
प्रहार करनेसे अभिमन्यु मारे गये।] 

“द्रौपदेयाश्च'--युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और 
सहदेव--इन पाँचोंके द्वारा द्रौपदीके गर्भसे क्रमशः 
प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन पैदा 
हुए हैं। इन पाँचोंको आप देख लीजिये। द्रौपदीने 
भरी सभामें मेरी हँसी उड़ाकर मेरे हृदयको जलाया है, 
उसीके इन पाँचों पुत्रोंको युद्धमें मारकर आप उसका 
बदला चुकायें। 

[रातमें सोते हुए इन पाँचोंको अश्वत्थामाने मार डाला।] 

“सर्व एव महारथा: '--ये सब-के-सब महारथी हैं। 
जो शास्त्र और शस्त्रविद्या-दोनोंमें प्रवीण हैं और युद्धमें 
अकेले ही एक साथ दस हजार धनुर्धारी योद्धाओंका 
संचालन कर सकता है, उस वीर पुरुषको ' महारथी ' कहते 
हैं*। ऐसे बहुत-से महारथी पाण्डव-सेनामें खड़े हैं। 





सम्बन्ध-द्रोणाचार्यके मनमें पाण्डवोंके प्रति द्वेष पैदा करने और युद्धके लिये जोश दिलानेके लिये दुर्योधनने 


पाण्डव-सेनाकी विशेषता बतायी। दुर्योधनके मनमें विचार आया कि द्रोणाचार्य पाण्डवोंके पक्षपाती हैं ही; अतः वे 
पाण्डव-सेनाकी महत्ता सुनकर मेरेको यह कह सकते हैं कि जब पाण्डवोंकी सेनामें इतनी विशेषता है; तो उनके साथ 
तू सन्धि क्‍यों नहीं कर लेता? ऐसा विचार आते ही दुर्योधन आगेके तीन श्लोकोंगें आपनी सेनाकी विशेषता बताता है। 


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम। 
नायका मम सैन्यस्य सञज्ज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते॥ ७॥ 


द्विजोत्तम =हे द्विजोत्तम! तान्‌ =उनपर (भी आप) | मम =मेरी 
अस्माकम्‌ = हमारे पक्षमें निबोध = ध्यान दीजिये। | सैन्यस्य = सेनाके (जो) 
तु नभी ते = आपको नायकाः =नायक हैं, 

ये =जो सञज्ज्ञार्थम्‌ =याद दिलानेके तान्‌ =उनको (मैं) 
विशिष्टाः =मुख्य (हैं), लिये ब्रवीमि = कहता हूँ। 


व्याख्या- अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध 
द्विजोत्तम'- दुर्योधन द्रोणाचार्यसे कहता है कि हे द्विजश्रेष्ठ ! 
जैसे पाण्डवोंकी सेनाम श्रेष्ठ महारथी हैं, ऐसे ही हमारी 
सेनामें भी उनसे कम विशेषतावाले महारथी नहीं हैं, प्रत्युत 
उनकी सेनाके महारथियोंकी अपेक्षा ज्यादा ही विशेषता 


रखनेवाले हैं। उनको भी आप समझ लीजिये। 

तीसरे श्लोकमें 'पश्य' और यहाँ 'निबोध' क्रिया देनेका 
तात्पर्य है कि पाण्डवोंकी सेना तो सामने खड़ी है, इसलिये 
उसको देखनेके लिये दुर्योधन “पश्य' (देखिये) क्रियाका 
प्रयोग करता है। परन्तु अपनी सेना सामने नहीं है अर्थात्‌ 


* एको दशसहस्राणि योधयेद्‌ यस्तु धन्विनाम्‌। शस्त्रशास्त्रप्रवीणश्च महारथ इति स्मृतः॥ 


श्लोक ८] 


अपनी सेनाकी तरफ द्रोणाचार्यकी पीठ है, इसलिये उसको 
देखनेकी बात न कहकर उसपर ध्यान देनेके लिये दुर्योधन 
“निबोध' (ध्यान दीजिये) क्रियाका प्रयोग करता है। 

“नायका मम सैन्यस्य सज्ज्ञार्थ तान्ब्रवीमि ते मेरी 
सेनामें भी जो विशिष्ट-विशिष्ट सेनापति हैं, सेनानायक हैं, 
महारथी हैं, मैं उनके नाम केवल आपको याद दिलानेके लिये, 
आपकी दृष्टि उधर खींचनेके लिये ही कह रहा हूँ। 

“सञ्ज्ञार्थम्‌' पदका तात्पर्यं है कि हमारे बहुत-से 
सेनानायक हैं, उनके नाम मैं कहाँतक कहूँ; इसलिये मैं 
उनका केवल संकेतमात्र करता हूँ; क्योंकि आप तो सबको 
जानते ही हैं। 

इस श्लोकमें दुर्योधनका ऐसा भाव प्रतीत होता है कि 
हमारा पक्ष किसी भी तरह कमजोर नहीं है। परन्तु 
राजनीतिके अनुसार शत्रुपक्ष चाहे कितना ही कमजोर हो 
और अपना पक्ष चाहे कितना ही सबल हो, ऐसी अवस्थामें 
भी शत्रुपक्षको कमजोर नहीं समझना चाहिये और अपनेमें 
उपेक्षा, उदासीनता आदिको भावना किंचिन्मात्र भी नहीं 


* साधक-संजीवनी * 


३३ 


आने देनी चाहिये। इसलिये सावधानीके लिये मैंने उनकी 
सेनाकी बात कही और अब अपनी सेनाकी बात कहता हूँ। 

दूसरा भाव यह है कि पाण्डवोंकी सेनाको देखकर 
दुर्योधनपर बड़ा प्रभाव पड़ा और उसके मनमें कुछ भय 
भी हुआ। कारण कि संख्यामें कम होते हुए भी पाण्डव- 
सेनाके पक्षमें बहुत-से धर्मात्मा पुरुष थे और स्वयं भगवान्‌ 
थे। जिस पक्षमें धर्म और भगवान्‌ रहते हैं, उसका सबपर 
बड़ा प्रभाव पड़ता है। पापी-से-पापी, दुष्ट-से-दुष्ट 
व्यक्तिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। इतना ही नहीं, पशु- 
पक्षी, वृक्ष-लता आदिपर भी उसका प्रभाव पड़ता है। 
कारण कि धर्म और भगवान्‌ नित्य हैं। कितनी ही ऊँची- 
से-ऊँची भौतिक शक्तियाँ क्यों न हों, हैं वे सभी अनित्य 
ही। इसलिये दुर्योधनपर पाण्डव-सेनाका बड़ा असर पड़ा। 
परन्तु उसके भीतर भौतिक बलका विश्वास मुख्य होनेसे 
वह द्रोणाचार्यको विश्वास दिलानेके लिये कहता है कि 
हमारे पक्षमें जितनी विशेषता है, उतनी पाण्डवाँकी सेनामें 
नहीं है। अत: हम उनपर सहज ही विजय कर सकते हैं। 





भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । 
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथेव च॥ ८ ॥ 


भवान्‌ = आप कर्णः = कर्ण एव नही 
(द्रोणाचार्य) च = और अश्वत्थामा = अश्वत्थामा, 
च = और समितिञ्जयः = संग्रामविजयी विकर्णः = विकर्ण 
भीष्मः = पितामह कृपः = कृपाचार्य च = और 
भीष्म च =तथा सौमदत्तिः = सोमदत्तका पुत्र 
च =तथा तथा = वैसे भूरिश्रवा। 


व्याख्या- भवान्‌ भीष्मश्च'-आप और पितामह 
भीष्म-दोनों ही बहुत विशेष पुरुष हैं। आप दोनोंके 
समकक्ष संसारमें तीसरा कोई भी नहीं है। अगर आप 
दोनॉमेंसे कोई एक भी अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध 
करे, तो देवता, यक्ष, राक्षस, मनुष्य आदिमें ऐसा कोई भी 
नहीं है, जो कि आपके सामने टिक सके। आप दोनोंके 
पराक्रमको बात जगत्में प्रसिद्ध ही है। पितामह भीष्म तो 
आबाल ब्रह्मचारी हैं, और इच्छामृत्यु हैं अर्थात्‌ उनकी 
इच्छाके बिना उन्हें कोई मार ही नहीं सकता। 

[महाभारत-युद्धमें द्रोणाचार्य धृष्टय्युम्नके द्वारा मारे गये 


और पितामह भीष्मने अपनी इच्छासे ही सूर्यके उत्तरायण 
होनेपर अपने प्राणोंका त्याग कर दिया।] 
'कर्णश्च'-कर्ण तो बहुत ही शूरवीर है। मुझे तो 
ऐसा विश्वास है कि वह अकेला ही पाण्डव-सेनापर 
विजय प्राप्त कर सकता है। उसके सामने अर्जुन भी कुछ 
नहीं कर सकता। ऐसा वह कर्ण भी हमारे पक्षमें है। 
[कर्ण महाभारत-युद्धमे अर्जुनके द्वारा मारे गये।] 
“कृपश्च समितिञ्जयः '--कृपाचार्यकी तो बात ही 
क्या है! वे तो चिरंजीवी हैं,* हमारे परम हितैषी हैं और 
सम्पूर्ण पाण्डव-सेनापर विजय प्राप्त कर सकते हैं। 


* अश्वत्थामा, बलि, वेदव्यास, हनुमान्‌, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और मार्कण्डेय-ये आठ चिरंजीवी हैं। शास्त्रम 


लिखा है-- 


अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥ ( पद्मपुराण ४९। ७ ) 


३४ 


यद्यपि यहाँ द्रोणाचार्य और भीष्मके बाद ही दुर्योधनको 
कृपाचार्यका नाम लेना चाहिये था; परन्तु दुर्योधनको 
कर्णपर जितना विश्वास था, उतना कृपाचार्यपर नहीं था। 
इसलिये कर्णका नाम तो भीतरसे बीचमें ही निकल पड़ा। 
द्रोणाचार्य और भीष्म कहीं कृपाचार्यका अपमान न समझ 
लें, इसलिये दुर्योधन कृपाचार्यको ' संग्रामविजयी' विशेषण 
देकर उनको प्रसन्न करना चाहता है। 

' अश्वत्थामा'-ये भी चिरंजीवी हैं और आपके ही 
पुत्र हैं। ये बड़े ही शूरवीर हैं। इन्होंने आपसे ही अस्त्र- 
शस्त्रकी विद्या सीखी है। अस्त्र-शस्त्रकी कलामें ये बड़े 
चतुर हैं। 

“विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च'-आप यह न 
समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं, हमारे पक्षमें भी 
मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। ऐसे ही 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


हमारे प्रपितामह शान्तनुके भाई बाह्लीकके पौत्र तथा 
सोमदत्तके पुत्र भूरिश्रवा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होंने बड़ी- 
बड़ी दक्षिणावाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और 
महारथी हैं। 

[युद्धमें विकर्ण भीमके द्वारा और भूरिश्रवा सात्यकिके 
द्वारा मारे गये।] 

यहाँ इन शूरवीरोंके नाम लेनेमें दुर्योधनका यह भाव 
मालूम देता है कि हे आचार्य! हमारी सेनामें आप, भीष्म, 
कर्ण, कृपाचार्य आदि जैसे महान्‌ पराक्रमी शूरवीर हैं, ऐसे 
पाण्डवोंकी सेनामें देखनेमें नहीं आते। हमारी सेनामें 
कृपाचार्य और अश्वत्थामा-ये दो चिरंजीवी हैं, जबकि 
पाण्डवोंकी सेनामें ऐसा एक भी नहीं है। हमारी सेनामें 
धर्मात्माओंकी भी कमी नहीं है। इसलिये हमारे लिये 
डरनेकी कोई बात नहीं है। 





अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। 


नानारशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९॥ 
अन्ये =इनके अतिरिक्त इच्छाका भी त्याग वाले हैं 
बहवः = बहुत-से कर दिया है, (तथा जो) 
शूराः =शूरवीर हैं, च = और सर्वे =सब-के-सब 
(जिन्होंने) नानाशस्त्रप्रहरणाः = जो अनेक युद्धविशारदाः = युद्धकलामें 
मदर्थे =मेरे लिये प्रकारके अस्त्र- अत्यन्त चतुर 
त्यक्तजीविताः = अपने जीनेकी शस्त्रोंको चलाने- हैं। 


व्याख्या- अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्त- 
जीविताः '--मैंने अभीतक अपनी सेनाके जितने शूरवीरोंके 
नाम लिये हैं, उनके अतिरिक्त भी हमारी सेनामें बाह्लीक, 
शल्य, भगदत्त, जयद्रथ आदि बहुत-से शूरवीर महारथी हैं, 
जो मेरी भलाईके लिये, मेरी ओरसे लड्नेके लिये अपने 
जीनेकी इच्छाका त्याग करके यहाँ आये हैं। वे मेरी 
विजयके लिये मर भले ही जाये, पर युद्धसे हटेंगे नहीं । 
उनकी मैं आपके सामने क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ ? 


'नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः '--ये सभी 
लोग हाथमें रखकर प्रहार करनेवाले तलवार, गदा, त्रिशूल 
आदि नाना प्रकारके शस्त्रोंकी कलामें निपुण हैं; और 
हाथसे फेंककर प्रहार करनेवाले बाण, तोमर, शक्ति आदि 
अस्त्रोंकी कलामें भी निपुण हैं। युद्ध कैसे करना चाहिये; 
किस तरहसे, किस पैंतरेसे और किस युक्तिसे युद्ध करना 
चाहिये; सेनाको किस तरह खड़ी करनी चाहिये आदि 
युद्धकी कलाओंमें भी ये बड़े निपुण हैं, कुशल हैं। 





सम्बन्ध-दुर्योधनकी बातें सुनकर जब द्रोणाचार्य कुछ भी नहीं बोले तब आपनी चालाकी न चल सकनेसे 
दुर्योधनके मनमें क्या विचार आता है-इसको संजय आगेके श्लोकर्मे कहते हैं*। 


सप्तैतान्‌ संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्‌। जीवेद्वर्षशतं सोऽपि सर्वव्याधिविवर्जितः॥ 
* संजय व्यासप्रदत्त दिव्य दूष्टिसे सैनिकोंके मनमें आयी बातको भी जान लेनेमें समर्थ थे 
प्रकाशं वाप्रकाशं वा दिवा वा यदि वा निशि। मनसा चिन्तितमपि सर्व वेत्स्यति सञ्जयः॥ 


( महाभारत, भीष्म० २। ११) 


श्लोक १०] * साधक-संजीवनी * ३५ 
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌। 
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ १०॥ 
द्रोणाचार्यको चुप देखकर दुर्योधनके मनमें विचार हुआ कि वास्तवमें- 
अस्माकम्‌ = हमारी भीष्माभिरक्षितम्‌= उसके संरक्षक विजय करनेमें) 
तत्‌ = वह (उभयपक्षपाती) | पर्याप्तम्‌ =पर्याप्त है, 
बलम्‌ = सेना (पाण्डवोंपर भीष्म हैं। समर्थ है; 
विजय करनेमें) तु = परन्तु (क्योंकि) 
अपर्याप्तम्‌ = अपर्याप्त है, एतेषाम्‌ =इन पाण्डवोंको | भीमाभिरक्षितम्‌ = इसके संरक्षक 
असमर्थ है; इदम्‌ =यह (निजसेनापक्षपाती) 
(क्योंकि) बलम्‌ = सेना (हमपर भीमसेन हैं। 


व्याख्या--' अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभि- 
रक्षितम्‌ अधर्म अन्यायके कारण दुर्योधनके मनमें भय 
होनेसे वह अपनी सेनाके विषयमें सोचता है कि हमारी सेना 
बड़ी होनेपर भी अर्थात्‌ पाण्डवांकी अपेक्षा चार अक्षौहिणी 
अधिक होनेपर भी पाण्डवोंपर विजय प्राप्त करनेमें है तो 
असमर्थ ही! कारण कि हमारी सेनामें मतभेद है। उसमें 
इतनी एकता (संगठन), निर्भयता, निःसंकोचता नहीं है, 
जितनी कि पाण्डवोंकी सेनामें है। हमारी सेनाके मुख्य 
संरक्षक पितामह भीष्म उभयपक्षपाती हैं अर्थात्‌ उनके भीतर 
कौरव और पाण्डव-दोनों सेनाओंका पक्ष है। वे कृष्णके 
बड़े भक्त हैं। उनके हृदयमें युधिष्ठिरका बड़ा आदर है। 
अर्जुनपर भी उनका बड़ा स्नेह है। इसलिये वे हमारे पक्षमें 
रहते हुए भी भीतरसे पाण्डवोंका भला चाहते हैं। वे ही 
भीष्म हमारी सेनाके मुख्य सेनापति हैं। ऐसी दशामें हमारी 
सेना पाण्डवोंके मुकाबलेमें कैसे समर्थ हो सकती है? नहीं 
हो सकती। 

“पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌'- परन्तु 
यह जो पाण्डवोंकी सेना है, यह हमारेपर विजय करनेमें 
समर्थ है। कारण कि इनकी सेनामें मतभेद नहीं है, प्रत्युत 
सभी एकमत होकर संगठित हैं। इनकी सेनाका संरक्षक 
बलवान्‌ भीमसेन है, जो कि बचपनसे ही मेरेको हराता 
आया है। यह अकेला ही मेरेसहित सौ भाइयोंको मारनेकी 
प्रतिज्ञा कर चुका है अर्थात्‌ यह हमारा नाश करनेपर तुला 
हुआ है! इसका शरीर वज्रके समान मजबूत है। इसको मैंने 


जहर पिलाया था, तो भी यह मरा नहीं। ऐसा यह भीमसेन 
पाण्डवोंकी सेनाका संरक्षक है, इसलिये यह सेना वास्तवमें 
समर्थ है, पूर्ण है। 
यहाँ एक शंका हो सकती है कि दुर्योधनने अपनी 
सेनाके संरक्षकके लिये भीष्मजीका नाम लिया, जो कि 
सेनापतिके पदपर नियुक्त हैं। परन्तु पाण्डव-सेनाके संरक्षकके 
लिये भीमसेनका नाम लिया, जो कि सेनापति नहीं हैं। 
इसका समाधान यह है कि दुर्योधन इस समय सेनापतियोंकी 
बात नहीं सोच रहा है; किन्तु दोनों सेनाओंकी शक्तिके 
विषयमें सोच रहा है कि किस सेनाकी शक्ति अधिक है? 
दुर्योधनपर आरम्भसे ही भीमसेनको शक्तिका, बलवत्ताका 
अधिक प्रभाव पड़ा हुआ है। अतः वह पाण्डव-सेनाके 
संरक्षकके लिये भीमसेनका ही नाम लेता है। 
विशेष बात 
अर्जुन कौरव-सेनाको देखकर किसीके पास न 
जाकर हाथमें धनुष उठाते हैं (गीता-पहले अध्यायका 
बीसवाँ श्लोक), पर दुर्योधन पाण्डवसेनाको देखकर द्रोणाचार्यके 
पास जाता है और उनसे पाण्डवाँकी व्यूहरचनायुक्त सेनाको 
देखनेके लिये कहता है। इससे सिद्ध होता है कि दुर्योधनके 
हृदयमें भय बैठा हुआ है*। भीतरमें भय होनेपर भी वह 
चालाकीसे द्रोणाचार्यको प्रसन्न करना चाहता है, उनको 
पाण्डवाँके विरुद्ध उकसाना चाहता है। कारण कि दुर्योधनके 
हदयमें अधर्म है, अन्याय है, पाप है। अन्यायी, पापी व्यक्ति 
कभी निर्भय और सुख-शान्तिसे नहीं रह सकता 


* जब कौरवाँकी सेनाके शंख आदि बाजे बजे, तब उनके शब्दका पाण्डव-सेनापर कुछ भी असर नहीं पड़ा। परन्तु जब 
पाण्डवाँकी सेनाके शंख बजे, तब उनके शब्दसे दुर्योधन आदिके हृदय विदीर्ण हो गये ( १। १३,१९ )। इससे सिद्ध होता 
है कि अधर्म-अन्यायका पक्ष लेनेके कारण दुर्योधन आदिके हृदय कमजोर हो गये थे और उनमें भय बैठा हुआ था। 


३६ 


यह नियम है। परन्तु अर्जुनके भीतर धर्म है, न्याय है। 
इसलिये अर्जुनके भीतर अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये 
चालाकी नहीं है, भय नहीं है; किन्तु उत्साह है, वीरता है। 
तभी तो वे वीरतामें आकर सेना-निरीक्षण करनेके लिये 
भगवानूको आज्ञा देते हैं कि “हे अच्युत! दोनों सेनाओंके 
मध्यमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये' (पहले अध्यायका 
इक्कीसवाँ श्लोक) । इसका तात्पर्य है कि जिसके भीतर 
नाशवान्‌ धन-सम्पत्ति आदिका आश्रय है, आदर है और 
जिसके भीतर अधर्म है, अन्याय है, दुर्भाव है, उसके भीतर 
वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतरसे खोखला होता है 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


और वह कभी निर्भय नहीं होता। परन्तु जिसके भीतर 
अपने धर्मका पालन है और भगवान्‌का आश्रय है, वह 
कभी भयभीत नहीं होता। उसका बल सच्चा होता है। वह 
सदा निश्चिन्त और निर्भय रहता है। अतः अपना कल्याण 
चाहनेवाले साधकोंको अधर्म, अन्याय आदिका सर्वथा त्याग 
करके और एकमात्र भगवानूका आश्रय लेकर भगवत्रीत्यर्थ 
अपने धर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। भौतिक सम्पत्तिको 
महत्त्व देकर और संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें फँसकर 
कभी अधर्मका आश्रय नहीं लेना चाहिये; क्योंकि इन दोनोंसे 
मनुष्यका कभी हित नहीं होता, प्रत्युत अहित ही होता है। 


परिशिष्ट भाव--अर्जुनने अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्‌ श्रीकृष्णको स्वीकार 


किया था* और दुर्योधनने भगवानूको छोड़कर उनकी नारायणी सेनाको स्वीकार किया था। तात्पर्य है कि अर्जुनकी 
दृष्टि भगवानूपर थी और दुर्योधनकी दृष्टि वैभवपर थी। जिसकी दृष्टि भगवान्‌पर होती है, उसका हृदय बलवान्‌ होता 
है; क्योंकि भगवानूका बल सच्चा है। परन्तु जिसकी दृष्टि सांसारिक वैभवपर होती है, उसका हृदय कमजोर होता 
है; क्योंकि संसारका बल कच्चा है। 





सम्बन्ध--अब दुर्योधन पितामह भीष्मको प्रसन्न करनेके लिये अपनी सेनाके सभी महाराथियोंसे कहता है-- 
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । 
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥११॥ 


च = दुर्योधन बाह्यदृष्टिसे लोग रहते हुए 
अपनी सेनाके सर्वेषु =सभी हि = निश्‍्चितरूपसे 
महारथियोंसे अयनेषु = मोर्चोपर भीष्मम्‌ = पितामह भीष्मको 
बोला यथाभागम्‌ = अपनी-अपनी एव च्ही 

भवन्तः = आप जगह अभिरक्षन्तु =चारों ओरसे रक्षा 

सर्वे, एव =सब-के-सब अवस्थिताः = दूढ़तासे स्थित करें । 


व्याख्या- अयनेषु च सर्वेषु.....भवन्तः सर्व एव 
हि'~जिन-जिन मोर्चोपर आपकी नियुक्ति कर दी गयी 
है, आप सभी योद्धालोग उन्हीं मोर्चोपर दूढ़तासे स्थित रहते 
हुए सब तरफसे, सब प्रकारसे भीष्मजीको रक्षा करें। 
भीष्मजीको सब ओरसे रक्षा करें-यह कहकर 
दुर्योधन भीष्मजीको भीतरसे अपने पक्षमें लाना चाहता है। 
ऐसा कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब भीष्मजी युद्ध 
करें, तब किसी भी व्यूहद्वारसे शिखण्डी उनके सामने न 
आ जाय-इसका आपलोग खयाल रखें। अगर शिखण्डी 
उनके सामने आ जायगा, तो भीष्मजी उसपर शस्त्रास्त्र नहीं 


चलायेंगे। कारण कि शिखण्डी पहले जन्ममें भी स्त्री था 
और इस जन्ममें भी पहले स्त्री था, पीछे पुरुष बना है। 
इसलिये भीष्मजी इसको स्त्री ही समझते हैं और उन्होंने 
शिखण्डीसे युद्ध न करनेकी प्रतिज्ञा कर रखी है। यह 
शिखण्डी शंकरके वरदानसे भीष्मजीको मारनेके लिये 
ही पैदा हुआ है। अतः जब शिखण्डीसे भीष्मजीकी 
रक्षा हो जायगी, तो फिर वे सबको मार देंगे, जिससे 
निश्चित ही हमारी विजय होगी। इस बातको लेकर 
दुर्योधन सभी महारथियाँसे भीष्मजीको रक्षा करनेके लिये 
कह रहा है। 





* एवमुक्तस्तु कृष्णेन कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः। अयुध्यमानं संग्रामे वरयामास केशवम्‌॥ ( महा, उद्योग० ७। २१) 
' श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र धनंजयने संग्रामभूमिमें ( अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित एक अक्षौहिणी नारायणी 
सेनाको छोड़कर ) युद्ध न करनेवाले निःशस्त्र उन भगवान्‌ श्रीकृष्णको ही ( अपना सहायक ) चुना।' 


श्लोक १२] 


* साधक-संजीवनी * 


३७ 


सम्बन्ध--ब्रोणाचार्यके द्वारा कुछ भी न बोलनेके कारण दुर्योधनका मानसिक उत्साह भंग हुआ देखकर उसके प्रति 
भीष्यजीके किये हुए स्नेह-सौहार्दकी बात संजय आगेके श्लोकं प्रकट करते हैं। 


तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। 
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्‌॥ १२॥ 


तस्य =उस (दुर्योधन)-के | कुरुवृद्धः 

हर्षम्‌ = (हदयमें) हर्ष प्रतापवान्‌ 

सञ्जनयन्‌ =उत्पन्न करते पितामहः 
हुए सिंहनादम्‌ 


व्याख्या- तस्य सञ्जनयन्‌ हर्षम्‌ यद्यपि दुर्योधनके 
हृदयमें हर्ष होना शंखध्वनिका कार्य है और शंखध्वनि कारण 
है, इसलिये यहाँ शंखध्वनिका वर्णन पहले और हर्ष होनेका 
वर्णन पीछे होना चाहिये अर्थात्‌ यहाँ “शंख बजाते हुए 
दुर्योधनको हर्षित किया '--ऐसा कहा जाना चाहिये । परन्तु 
यहाँ ऐसा न कहकर यही कहा है कि 'दुर्योधनको हर्षित 
करते हुए भीष्मजीने शंख बजाया'। कारण कि ऐसा कहकर 
संजय यह भाव प्रकट कर रहे हैं कि पितामह भीष्मकी 
शंखवादन क्रियामात्रसे दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न हो ही 
जायगा। भीष्मजीके इस प्रभावको द्योतन करनेके लिये ही 
संजय आगे ' प्रतापवान्‌” विशेषण देते हैं। 

“कुरुवृद्धः यद्यपि कुरुवंशियोंमे आयुको दृष्टिसे 
भीष्मजीसे भी अधिक वृद्ध बाहीक थे (जो कि 
भीष्मजीके पिता शान्तनुके छोटे भाई थे), तथापि कुरुवंशियोंमें 
जितने बड़े-बूढ़े थे, उन सबमें भीष्मजी धर्म और ईश्वरको 
विशेषतासे जाननेवाले थे। अतः ज्ञानवृद्ध होनेके कारण 
संजय भीष्मजीके लिये ' कुरुवृद्धः ' विशेषण देते हैं। 

' प्रतापवान्‌ भीष्मजीके त्यागका बड़ा प्रभाव था। वे 
कनक-कामिनीके त्यागी थे अर्थात्‌ उन्होंने राज्य भी स्वीकार 
नहीं किया और विवाह भी नहीं किया। भीष्मजी अस्त्र- 
शस्त्रको चलानेमें बड़े निपुण थे और शस्त्रके भी बड़े 
जानकार थे। उनके इन दोनों गुणोंका भी लोगोंपर बड़ा 
प्रभाव था। 

जब अकेले भीष्म अपने भाई विचित्रवीर्यके लिये 


= कौरवोंमें वृद्ध विनद्य = गरजकर 
= प्रभावशाली उच्चैः = जोरसे 
=पितामह भीष्मने |शङ्खम्‌ "शंख 

= सिंहके समान दध्मौ = बजाया। 


काशिराजकी कन्याओंको स्वयंवरसे हरकर ला रहे थे, तब 
वहाँ स्वयंवरके लिये इकट्ठे हुए सब क्षत्रिय उनपर टूट पड़े। 
परन्तु अकेले भीष्मजीने उन सबको हरा दिया। जिनसे भीष्म 
अस्त्र-शस्त्रकी विद्या पढ़े थे, उन गुरु परशुरामजीके सामने 
भी उन्होंने अपनी हार स्वीकार नहीं की । इस प्रकार शस्त्रके 
विषयमें उनका क्षत्रियांपर बड़ा प्रभाव था। 

जब भीष्म शर-शय्यापर सोये थे, तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने 
धर्मराजसे कहा कि ' आपको धर्मके विषयमें कोई शंका हो 
तो भीष्मजीसे पूछ लें; क्योंकि शास्त्रज्ञानका सूर्य अस्ताचलको 
जा रहा है अर्थात्‌ भीष्मजी इस लोकसे जा रहे हैं।*' इस 
प्रकार शास्त्रके विषयमे उनका दूसरोंपर बड़ा प्रभाव था। 

“पितामहः '--इस पदका आशय यह मालूम देता है कि 
दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कही गयी बातोंका द्रोणाचार्ये 
कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने यही समझा कि दुर्योधन 
चालाकीसे मेरेको ठगना चाहता है, इसलिये वे चुप ही रहे। 
परन्तु पितामह (दादा) होनेके नाते भीष्मजीको दुर्योधनकी 
चालाकोमें उसका बचपना दीखता है। अतः पितामह भीष्म 
द्रोणाचार्यके समान चुप न रहकर वात्सल्यभावके कारण 
दुर्योधनको हर्षित करते हुए शंख बजाते हैं। 

“सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्कं दध्मौ'-जैसे सिंहके 
गर्जना करनेपर हाथी आदि बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो 
जाते हैं, ऐसे ही गर्जना करनेमात्रसे सभी भयभीत हो जायँ 
और दुर्योधन प्रसन्न हो जाय-इसी भावसे भीष्मजीने सिंहके 
समान गरजकर जोरसे शंख बजाया। 


परिशिष्ट भाव-दुर्योधनके साथ द्रोणाचार्यका विद्याका सम्बन्ध था और भीष्मजीका जन्मका अर्थात्‌ कौटुम्बिक 
सम्बन्ध था। जहाँ विद्याका सम्बन्ध होता है, वहाँ पक्षपात नहीं होता, पर जहाँ कौटुम्बिक सम्बन्ध होता है, वहाँ स्नेहवश 
पक्षपात हो जाता है। अतः दुर्योधनके द्वारा चालाकीसे कहे गये वचन सुनकर द्रोणाचार्य चुप रहे, जिससे दुर्योधनका मानसिक 
उत्साह भंग हो गया। परन्तु दुर्योधनको उदास देखकर कौटुम्बिक स्नेहके कारण भीष्मजी शंख बजाते हैं। 





* तस्मिन्नस्तमिते भीष्मे कौरवाणां धुरंधरे । ज्ञानान्यस्तं गमिष्यन्ति तस्मात्‌ त्वां चोदयाम्यहम्‌॥ ( महाभारत, शान्ति० ४६। २३ ) 


३८ 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


सम्बन्ध--पितामह भीष्पके द्वारा शंख बजानेका परिणाम क्या हुआ, इसको संजय आगेके श्लोकर्मे कहते हैं। 
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः । 
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌ ॥ १३॥। 


ततः =उसके बाद पणवानकगोमुखाः =ढोल, अभ्यहन्यन्त =बज उठे। (उनका) 
शङ्काः = शंख मृदंग और सः = वह 

च = और नरसिंघे बाजे | शब्दः = शब्द 

भेर्यः = भेरी (नगाड़े) सहसा =एक साथ तुमुलः =बड़ा भयंकर 

च =तथा एव नही अभवत्‌ =हुआ। 


व्याख्या- ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानक- 
गोमुखाः ' यद्यपि भीष्मजीने युद्धारम्भको घोषणा करनेके 
लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत दुर्योधनको प्रसन्न 
करनेके लिये ही शंख बजाया था, तथापि कौरव-सेनाने 
भीष्मजीके शंखवादनको युद्धको घोषणा ही समझा। अतः 
भीष्मजीके शंख बजानेपर कौरव-सेनाके शंख आदि सब 
बाजे एक साथ बज उठे। 

'शंख' समुद्रसे उत्पन्न होते हैं। ये ठाकुरजीकी 
सेवा-पूजामें रखे जाते हैं और आरती उतारने आदिके 
काममें आते हैं। मांगलिक कार्योमें तथा युद्धके आरम्भमें 
ये मुखसे फूँक देकर बजाये जाते हैं। ' भेरी' नाम नगाड़ोंका 
है (जो बड़े नगाड़े होते हैं, उनको नौबत कहते हैं) । ये 
नगाड़े लोहेके बने हुए और भैंसेके चमड़ेसे मढ़े हुए होते 
हैं, तथा लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। ये मन्दिरोंमें एवं 
राजाओंके किलोंमें रखे जाते हैं। उत्सव और मांगलिक 
कार्योमें ये विशेषतासे बजाये जाते हैं। राजाओंके यहाँ ये 
रोज बजाये जाते हैं। 'पणव' नाम ढोलका है। ये लोहेके 
अथवा लकड़ीके बने हुए और बकरेके चमड़ेसे मढे हुए 


होते हैं तथा हाथसे या लकड़ीके डंडेसे बजाये जाते हैं। 
ये आकारमें ढोलकोको तरह होनेपर भी ढोलकोसे बड़े 
होते हैं। कार्यके आरम्भमें पणवोंको बजाना गणेशजीके 
पूजनके समान मांगलिक माना जाता है। 'आनक' नाम 
मृदंगका है। इनको पखावज भी कहते हैं। आकारमें ये 
लकड़ीकी बनायी हुई ढोलकीके समान होते हैं। ये मिट्टीके 
बने हुए और चमड़ेसे मढे हुए होते हैं तथा हाथसे बजाये 
जाते हैं। 'गोमुख' नाम नरसिंघेका है। ये आकारमें साँपकी 
तरह टेढ़े होते हैं और इनका मुख गायकी तरह होता है। 
ये मुखकी फूँकसे बजाये जाते हैं। 

' सहसैवाभ्यहन्यन्त ' *--कौरव-सेनामें उत्साह बहुत 
था। इसलिये पितामह भीष्मका शंख बजते ही कौरव-सेनाके 
सब बाजे अनायास ही एक साथ बज उठे। उनके बजनेमें 
देरी नहीं हुई तथा उनको बजानेमें परिश्रम भी नहीं हुआ। 

“स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌'- अलग-अलग विभागों- 
में, टुकड़ियोंमें खड़ी हुई कौरव-सेनाके शंख आदि 
बाजोंका शब्द बड़ा भयंकर हुआ अर्थात्‌ उनकी आवाज 
बड़ी जोरसे गूँजती रही। 





सम्बन्ध-इस अध्यायके आरम्भमें ही धृतराष्ट्रने संजयसे पूछा था कि युद्धक्षत्रमें मेरे और पाण्डुके पुत्रोने क्या किया 2 
अतः संजयने दूसरे श्लोकसे तेरहवें शलोकतक 'धृतराष्ट्रके पुत्रोने क्या किया” इसका उत्तर दिया। अब आगेके श्लोकसे 


संजय “पाण्डुके पुत्राने क्या कियाइसका उत्तर देते हैं। 


ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। 


माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥ १४॥ 


* कर्मको अत्यन्त सुगमतापूर्वक द्योतन करनेके लिये जहाँ कर्म आदिको ही कर्ता बना दिया जाता है, उसको ' कर्मकर्तृ ' 
प्रयोग कहते हैं। जैसे कोई लकड़ीको चीर रहा है, तो इस कर्मको सुगम बतानेके लिये 'लकड़ी चीरी जा रही है' ऐसा प्रयोग 
किया जाता है। ऐसे ही यहाँ ' बाजे बजाये गये' ऐसा प्रयोग होना चाहिये; परन्तु बाजे बजानेमें सुगमता बतानेके लिये, सेनाका 
उत्साह दिखानेके लिये 'बाजे बज उठे' ऐसा प्रयोग किया गया है। 


श्लोक १४] 


ततः =उसके बाद स्यन्दने 
श्वेतैः = सफेद स्थितौ 
हयैः = घोड़ोंसे माधवः 
युक्ते =युक्त 

महति = महान्‌ चच 


व्याख्या-'ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते चित्ररथ गन्धर्वने 
अर्जुनको सौ दिव्य घोड़े दिये थे। इन घोड़ोंमें यह विशेषता 
थी कि इनमेंसे युद्धमें कितने ही घोड़े क्यों न मारे जाये, पर 
ये संख्यामें सौ-के-सौ ही बने रहते थे, कम नहीं होते थे। 
ये पृथ्वी, स्वर्ग आदि सभी स्थानोंमें जा सकते थे। इन्हीं सौ 
घोड़ोंमेंसे सुन्दर और सुशिक्षित चार सफेद घोड़े अर्जुनके 
रथमें जुते हुए थे। 

“महति स्यन्दने स्थितौ '—यज्ञांमें आहुतिरूपसे दिये 
गये घीको खाते-खाते अग्निको अजीर्ण हो गया था। 
इसीलिये अग्निदेव खाण्डववनकी विलक्षण-विलक्षण जड़ी- 
बूटियाँ खाकर (जलाकर) अपना अजीर्ण दूर करना चाहते 
थे। परन्तु देवताओंके द्वारा खाण्डववनकी रक्षा की जानेके 
कारण अग्निदेव अपने कार्यमें सफल नहीं हो पाते थे। वे 
जब-जब खाण्डववनको जलाते, तब-तब इन्द्र वर्षा करके 
उसको (अग्निको) बुझा देते। अन्तमें अर्जुनकी सहायतासे 
अग्निने उस पूरे वनको जलाकर अपना अजीर्ण दूर किया 
और प्रसन्न होकर अर्जुनको यह बहुत बड़ा रथ दिया। नौ 
बैलगाड़ियोंमें जितने अस्त्र-शस्त्र आ सकते हैं, उतने अस्त्र- 
शस्त्र इस रथमें पड़े रहते थे। यह सोनेसे मढा हुआ और 
तेजोमय था। इसके पहिये बड़े ही दूढ़ एवं विशाल थे। 
इसकी ध्वजा बिजलीके समान चमकती थी। यह ध्वजा एक 
योजन (चार कोस) तक फहराया करती थी। इतनी लम्बी 
होनेपर भी इसमें न तो बोझ था, न यह कहीं रुकती थी और 
न कहीं वृक्ष आदिमें अटकती ही थी। इस ध्वजापर 
हनुमानजी विराजमान थे। 

“स्थितौ' कहनेका तात्पर्यं है कि उस सुन्दर और 
तेजोमय रथपर साक्षात्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण और उनके प्यारे 
भक्त अर्जुनके विराजमान होनेसे उस रथकी शोभा और तेज 
बहुत ज्यादा बढ़ गया था। 

“माधवः पाण्डवश्चैव’ मा' नाम लक्ष्मीका है 
और धव' नाम पतिका है। अतः “माधव' नाम लक्ष्मीपतिका 
है। यहाँ “पाण्डव' नाम अर्जुनका है; क्योंकि अर्जुन 
सभी पाण्डवोंमें मुख्य हैं-*पाण्डवानां धनञ्जयः ' 


* साधक-संजीवनी * 


३९ 
= रथपर पाण्डवः =पाण्डुपुत्र अर्जुनने 
=बैठे हुए एव नभी 
= लक्ष्मीपति भगवान्‌ | दिव्यौ =दिव्य 

श्रीकृष्ण शङ्खौ =शंखोंको 
= और प्रदध्मतुः =बड़े जोरसे बजाया। 
(गीता १०। ३७) । 


अर्जुन 'नर'के और श्रीकृष्ण “नारायण'के अवतार थे। 
महाभारतके प्रत्येक पर्वके आरम्भमें नर (अर्जुन) और 
नारायण (भगवान्‌ श्रीकृष्ण) -को नमस्कार किया गया है-- 
“नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌।' इस दृष्टिसे 
पाण्डव-सेनामें भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुन-ये दोनों 
मुख्य थे। संजयने भी गीताके अन्तमें कहा है कि “जहाँ 
योगेश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण और गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन 
रहेंगे, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेगी ' 
(१८।७८)। 

'दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः '-भगवान्‌ श्रीकृष्ण और 
अर्जुनके हाथोंमें जो शंख थे, वे तेजोमय और अलौकिक थे। 
उन शंखोंको उन्होंने बड़े जोरसे बजाया। 

यहाँ शंका हो सकती है कि कौरवपक्षमें मुख्य सेनापति 
पितामह भीष्म हैं, इसलिये उनका सबसे पहले शंख बजाना 
ठीक ही है; परन्तु पाण्डव-सेनामें मुख्य सेनापति ध्वृष्टद्युम्नके 
रहते हुए ही सारथि बने हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णने सबसे पहले 
शंख क्यों बजाया? इसका समाधान है कि भगवान्‌ सारथि 
बनें चाहे महारथी बनें, उनकी मुख्यता कभी मिट ही नहीं 
सकती। वे जिस किसी भी पदपर रहें, सदा सबसे बड़े ही 
बने रहते हैं। कारण कि वे अच्युत हैं, कभी च्युत होते ही 
नहीं । पाण्डव-सेनामें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही मुख्य थे और वे ही 
सबका संचालन करते थे। जब वे बाल्यावस्थामें थे, उस 
समय भी नन्द, उपनन्द आदि उनकी बात मानते थे। तभी तो 
उन्होंने बालक श्रीकृष्णके कहनेसे परम्परासे चली आयी 
इन्द्र-पूजाको छोड़कर गोवर्धनको पूजा करनी शुरू कर दी। 
तात्पर्य है कि भगवान्‌ जिस किसी अवस्थामें, जिस किसी 
स्थानपर और जहाँ कहीं भी रहते हैं, वहाँ वे मुख्य ही 
रहते हैं। इसीलिये भगवानूने पाण्डव-सेनामें सबसे पहले 
शंख बजाया। 

जो स्वयं छोटा होता है, वही ऊँचे स्थानपर नियुक्त होनेसे 
बड़ा माना जाता है। अतः जो ऊँचे स्थानके कारण अपनेको 
बड़ा मानता है, वह स्वयं वास्तवमें छोटा ही होता है। परंतु 


४० 


जो स्वयं बडा होता है, वह जहाँ भी रहता है, उसके कारण 
वह स्थान भी बडा माना जाता है। जैसे भगवान्‌ यहाँ सारथि 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय ९ 


बने हैं, तो उनके कारण वह सारथिका स्थान (पद) भी 
ऊँचा हो गया। 





सम्बन्ध--अब संजय आगेके चार श्लोकोंमें पर्वश्लोकका खुलासा करते हुए दूसरोंके शंखवादनका वर्णन करते हैं। 
पाञ्चजन्यं हषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। 
पौणडं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १५ ॥ 


हृषीकेशः =अन्तर्यामी भगवान्‌ | देवदत्तम्‌ 
श्रीकृष्णने 
पाञ्चजन्यम्‌ = पांचजन्य नामक 
(तथा) भीमकर्मा 
धनञ्जयः = धनंजय अर्जुने 


व्याख्या-' पाञ्चजन्यं हृषीकेशः सबके अन्तर्यामी 
अर्थात्‌ सबके भीतरको बात जाननेवाले साक्षात्‌ भगवान्‌ 
श्रीकृष्णने पाण्डवोंके पक्षमें खड़े होकर 'पांचजन्य' नामक 
शंख बजाया। भगवानूने पंचजन नामक शंखरूपधारी 
दैत्यको मारकर उसको शंखरूपसे ग्रहण किया था, 
इसलिये इस शंखका नाम “पांचजन्य' हो गया। 

' देवदत्तं धनञ्जयः ' राजसूय यज्ञके समय आर्जुनने 
बहुत-से राजाआंको जीतकर बहुत धन इकट्ठा किया था। 
इस कारण अर्जुनका नाम ' धनंजय' पड़ गया*। निवातकवचादि 
दैत्यांके साथ युद्ध करते समय इन्द्रने अर्जुनको 'देवदत्त' 
नामक शंख दिया था। इस शंखको ध्वनि बड़े जोरसे होती 


= देवदत्त नामक वृकोदरः = वृकोदर 
(शंख बजाया भीमने 
और) पौण्ड्म्‌ =पौण्डू नामक 
= भयानक कर्म महाशङ्खम्‌ = महाशंख 
करनेवाले दध्मौ = बजाया। 


थी, जिससे शत्रुओंको सेना घबरा जाती थी। इस शंखको 
अर्जुनने बजाया। 

“पौण्डुँ दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः '- 
हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर आदि असुरं तथा 
कोचक, जरासन्ध आदि बलवान्‌ वीरोंको मारनेके 
कारण भीमसेनका नाम 'भीमकर्मा' पड़ गया। उनके 
पेटमें जठराग्निके सिवाय 'वृक' नामको एक विशेष 
अग्नि थी, जिससे बहुत अधिक भोजन पचता था। इस 
कारण उनका नाम 'वृकोदर' पड़ गया। ऐसे भीमकर्मा 
वृकोदर भीमसेनने बहुत बड़े आकारवाला 'पौण्डू' नामक 
शंख बजाया। 





अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । 
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पको॥ १६॥ 


कुन्तीपुत्रः = कुन्तीपुत्र 
राजा =राजा 
युधिष्ठिरः = युधिष्ठिरने नकुलः 
अनन्तविजयम्‌ = अनन्तविजय च 
व्याख्या अनन्तविजयं राजा” “सुघोषमणि- 


पुष्पकौ '- अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर_ये तीनों कुन्तीके पुत्र 
हैं तथा नकुल और सहदेव-ये दोनों माद्रीके पुत्र हैं, यह 
विभाग दिखानेके लिये ही यहाँ युधिष्ठिरके लिये 'कुन्तीपुत्र' 
विशेषण दिया गया है। 

युधिष्ठिरको 'राजा' कहनेका तात्पर्य है कि युधिष्ठिरजी 


नामक (शंख सहदेवः =सहदेवने 

बजाया तथा) सुघोषमणिपुष्पकौ =सुघोष और 
= नकुल मणिपुष्पक नामक 
= और (शंख बजाये) । 


वनवासके पहले अपने आधे राज्य-(इन्द्रप्रस्थ-)के राजा 
थे, और नियमके अनुसार बारह वर्ष वनवास और एक 
वर्ष अज्ञातवासके बाद वे राजा होने चाहिये थे। 'राजा' 
विशेषण देकर संजय यह भी संकेत करना चाहते हैं कि 
आगे चलकर धर्मराज युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलके 
राजा होंगे। 





* सर्वाञ्जनपदाञ्जित्वा वित्तमादाय केवलम्‌। मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहुर्मां धनञ्जयम्‌॥ ( महाभारत, विराट० ४४। १३ ) 


श्लोक १७--१९] 


* साधक-संजीवनी * 


काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । 
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥ १७॥ 
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। 
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्‌ पृथक्‌॥ १८ ॥ 


पृथिवीपते =हे राजन्‌! विराटः 
परमेष्वासः = श्रेष्ठ धनुषवाले च = 
काश्यः = काशिराज अपराजितः = 
चच = और सात्यकिः 
महारथः = महारथी द्रुपदः 
शिखण्डी =शिखण्डी च = 
च =तथा द्रौपदेयाः = 
धृष्टद्युम्नः = धृष्ट्युम्न च 

च =एवं महाबाहुः 


व्याख्या- काश्यश्च परमेष्वासः....शङ्कान्‌ दध्मुः पृथक्‌ 
पृथक्‌ 'महारथी शिखण्डी बहुत शूरवीर था। यह पहले 
जन्ममें स्त्री (काशिराजकी कन्या अम्बा) था और इस 
जन्ममें भी राजा द्रुपदको पुत्रीरूपसे प्राप्त हुआ था। आगे 
चलकर यही शिखण्डी स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे पुरुषत्व प्राप्त 
करके पुरुष बना। भीष्मजी इन सब बातोंको जानते थे और 
शिखण्डीको स्त्री ही समझते थे। इस कारण वे इसपर बाण 
नहीं चलाते थे। अर्जुनने युद्धके समय इसीको आगे करके 
भीष्मजीपर बाण चलाये और उनको रथसे नीचे गिरा दिया। 
अर्जुनका पुत्र अभिमन्यु बहुत शूरवीर था। युद्धके 
समय इसने द्रोणनिर्मित चक्रव्यूहमें घुसकर अपने पराक्रमसे 
बहुत-से वीरोंका संहार किया। अन्तमें कौरव-सेनाके छः 


४१ 
=राजा विराट भुजाओंवाले 
और सौभद्रः = सुभद्रापुत्र 
अजेय अभिमन्यु 
= सात्यकि, (-इन सभीने) 
=राजा द्रुपद सर्वशः =सब ओरसे 
और पृथक्‌, पृथक्‌ = अलग-अलग 
द्रौपदीके पाँचों पुत्र (अपने-अपने) 
= तथा शङ्खान्‌ = शंख 
= लम्बी-लम्बी दध्मुः = बजाये। 


अस्त्र चलाये। दुःशासनपुत्रके द्वारा सिरपर गदाका प्रहार 
होनेसे इसकी मृत्यु हो गयी। 

संजयने शंखवादनके वर्णनमें कौरव-सेनाके शूरवीरोंमेंसे 
केवल भीष्मजीका ही नाम लिया और पाण्डव-सेनाके 
शूरवीरोंमेसे भगवान्‌ श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम आदि अठारह 
वीरोंके नाम लिये। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संजयके 
मनमें अधर्मके पक्ष-(कौरवसेना-) का आदर नहीं है। 
इसलिये वे अधर्मके पक्षका अधिक वर्णन करना उचित 
नहीँ समझते। परन्तु उनके मनमें धर्मके पक्ष-(पाण्डवसेना-) 
का आदर होनेसे और भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंके 
प्रति आदरभाव होनेसे वे उनके पक्षका ही अधिक वर्णन 
करना उचित समझते हैं और उनके पक्षका वर्णन करनेमें 


महारथियोंने इसको अन्यायपूर्वक घेरकर इसपर शस्त्र- | ही उनको आनन्द आ रहा है। 





सम्बन्ध-पाण्डव-सेनाके शंखवादनका कौरवसेनापर क्या असर हुआ-इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं। 
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌। 
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌ ॥ १९॥ 


च = और नभः = आकाश धार्तराष्ट्राणाम्‌ = अन्यायपूर्वक 

स = (पाण्डव-सेनाके |च = और राज्य हड्पनेवाले 
शंखोंके) उस पृथिवीम्‌ =पृथ्वीको दुर्योधन आदिके 

तुमुलः = भयंकर एव = हृदयानि = हृदय 

घोषः = शब्दने व्यनुनादयन्‌ = गुँजाते हुए व्यदारयत्‌ =विदीर्ण कर दिये। 


व्याख्या- 'स घोषो धार्तराष्ट्राणाँ ”””तुमुलो | गहरी, ऊँची और भयंकर हुई कि उस (ध्वनि- 
व्यनुनादयन्‌'-पाण्डव-सेनाकी वह शंखध्वनि इतनी विशाल, | प्रतिध्वनि-) से पृथ्वी और आकाशके बीचका भाग गूँज 


४२ 


उठा। उस शब्दसे अन्यायपूर्वक राज्यको हड़पनेवालोंके 
और उनकी सहायताके लिये (उनके पक्षमें) खड़े हुए 
राजाओंके हृदय विदीर्ण हो गये। तात्पर्य है कि हृदयको 
किसी अस्त्र-शस्त्रसे विदीर्ण करनेसे जैसी पीड़ा होती है, 
वैसी ही पीड़ा उनके हृदयमें शंखध्वनिसे हो गयी। उस 
शंखध्वनिने कौरव-सेनाके हृदयमें युद्धका जो उत्साह था, 
बल था, उसको कमजोर बना दिया, जिससे उनके हृदयमें 
पाण्डव-सेनाका भय उत्पन्न हो गया। 

संजय ये बातें धृतराष्ट्रको सुना रहे हैं। धृतराष्ट्रके 
सामने ही संजयका ' धृतराष्ट्रके पुत्रों अथवा सम्बन्धियोंके 
हृदय विदीर्ण कर दिये' ऐसा कहना सभ्यतापूर्ण और 
युक्तिसंगत नहीं मालूम देता। इसलिये संजयको ' धार्तराष्ट्राणाम्‌' 
न कहकर "तावकीनानाम्‌' (आपके पुत्रों अथवा 
सम्बन्धियोंके- ऐसा) कहना चाहिये था; क्‍योंकि ऐसा 
कहना ही सभ्यता है। इस दृष्टिसे यहाँ ' धार्तराष्ट्राणाम्‌' 
पदका अर्थ जिन्होंने अन्यायपूर्वक राज्यको धारण किया" 
ऐसा लेना ही युक्तिसंगत तथा सभ्यतापूर्ण मालूम देता है। 
अन्यायका पक्ष लेनेसे ही उनके हृदय विदीर्ण हो गये-- 
इस दृष्टिसे भी यह अर्थ लेना ही युक्तिसंगत मालूम देता है। 

यहाँ शंका होती है कि कौरवोंकी ग्यारह अक्षौहिणी? 
सेनाके शंख आदि बाजे बजे तो उनके शब्दका पाण्डवसेना- 
पर कुछ भी असर नहीं हुआ, पर पाण्डवोंकी सात 
अक्षौहिणी सेनाके शंख बजे तो उनके शब्दसे कौरव- 
सेनाके हृदय विदीर्ण क्यों हो गये इसका समाधान यह है 
कि जिनके हृदयमें अधर्म, पाप, अन्याय नहीं है अर्थात्‌ जो 
धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करते हैं, उनका हृदय 
मजबूत होता है, उनके हृदयमें भय नहीं होता। न्यायका पक्ष 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


होनेसे उनमें उत्साह होता है, शूरवीरता होती है। पाण्डवोंने 
वनवासके पहले भी न्याय और धर्मपूर्वक राज्य किया था 
और वनवासके बाद भी नियमके अनुसार कौरवोंसे 
न्यायपूर्वक राज्य माँगा था। अतः उनके हृदयमें भय नहीं 
था, प्रत्युत उत्साह था, शूरवीरता थी। तात्पर्य है कि 
पाण्डवोंका पक्ष धर्मका था। इस कारण कौरवोंकी ग्यारह 
अक्षौहिणी सेनाके बाजोंके शब्दका पाण्डव-सेनापर कोई 
असर नहीं हुआ। परन्तु जो अधर्म, पाप, अन्याय आदि करते 
हैं, उनके हृदय स्वाभाविक ही कमजोर होते हैं। उनके हृदयमें 
निर्भयता, निःशंकता नहीं रहती। उनका खुदका किया पाप, 
अन्याय ही उनके हृदयको निर्बल बना देता है। अधर्म 
अधर्मीको खा जाता है। दुर्योधन आदिने पाण्डवोंको 
अन्यायपूर्वक मारनेका बहुत प्रयास किया था। उन्होंने छल- 
कपटसे अन्यायपूर्वक पाण्डबोंका राज्य छीना था और उनको 
बहुत कष्ट दिये थे। इस कारण उनके हृदय कमजोर, निर्बल 
हो चुके थे। तात्पर्य है कि कौरवोंका पक्ष अधर्मका था। 
इसलिये पाण्डवोंकी सात अक्षौहिणी सेनाकी शंख-ध्वनिसे 
उनके हृदय विदीर्ण हो गये, उनमें बड़े जोरकी पीड़ा हो गयी। 
इस प्रसंगसे साधकको सावधान हो जाना चाहिये कि 
उसके द्वारा अपने शरीर, वाणी, मनसे कभी भी कोई 
अन्याय और अधर्मका आचरण न हो। अन्याय और 
अधर्मयुक्त आचरणसे मनुष्यका हृदय कमजोर, निर्बल हो 
जाता है। उसके हृदयमें भय पैदा हो जाता है। उदाहरणार्थ, 
लंकाधिपति रावणसे त्रिलोकी डरती थी। वही रावण जब 
सीताजीका हरण करने जाता है, तब भयभीत होकर इधर- 
उधर देखता है'। इसलिये साधकको चाहिये कि वह 
अन्याय--अधर्मयुक्त आचरण कभी न करे। 





१-' अन्यायेन धृतं राष्ट्रं यैस्ते धृतराष्ट्रा:' ऐसा बहुब्रीहि समास करनेके बाद ' धृतराष्ट्रा एव' इस विग्रहमें स्वार्थमें तद्धितका 
“अण्‌' प्रत्यय किया गया, जिससे ' धार्तराष्ट्राः ' यह रूप बन गया। यहाँ षष्ठी विभक्तिके प्रयोगकी आवश्यकता होनेसे षष्ठीमें 


' धार्तराष्ट्राणाम्‌' ऐसा प्रयोग किया गया है। 


२-दुर्योधनके पक्षमें ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका होना सम्भव ही नहीं था; परन्तु जब पाण्डव वनवासमें चले गये, तब 


दुर्योधने धर्मराज युधिष्ठिरकी राज्य करनेकी नीतिको अपनाया। जैसे युधिष्ठिरजी अपना कर्तव्य समझकर प्रजाको सुख 
देनेके लिये धर्म और न्यायपूर्वक राज्य करते थे, ऐसे ही दुर्योधनने भी अपना राज्य स्थापित करनेके लिये, अपना प्रभाव 
जमानेके लिये प्रजाके साथ युधिष्ठिरके समान बर्ताव किया। तेरह वर्षतक प्रजाके साथ अच्छा बर्ताव करनेसे युद्धके समय 
बहुत सेना जुट गयी, जो कि पहले पाण्डवोंके पक्षमें थी और पाण्डवोंको चाहती थी। इस प्रकार नौ अक्षौहिणी सेना तो 
प्रजाके साथ अच्छे बर्तावके प्रभावसे दुर्योधनके पक्षमें हो गयी और भगवान्‌ श्रीकृष्णको एक अक्षौहिणी नारायणी सेनाको 
तथा मद्रराज शल्यकी एक अक्षौहिणी सेनाको दुर्योधनने चालाकीसे अपने पक्षमें कर लिया, जो कि पाण्डवोंके पक्षमें थी। 
अतः दुर्योधनके पक्षमें ग्यारह अक्षौहिणी सेना और पाण्डवोंके पक्षमें सात अक्षौहिणी सेना थी। 
३-सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा॥ 
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं॥ 


श्लोक २०-२१] * साधक-संजीवनी * ४३ 


सम्बन्ध धृतराष्ट्रने पहले श्लोकमे अपने और पाण्डुके पुत्रोंके विषयमें प्रश्‍न किया था। उसका उत्तर संजयने दूसरे 
श्लोकसे उन्नीसवें श्लोकतक दे दिया। अब संजय भगवद्गीताके प्राकट्यका प्रसंग आगेके श्लोकसे आरम्भ करते हैं। 


अथ व्यवस्थितान्दूष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः । 
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥ २०॥ 
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। 


महीपते =हे महीपते धृतराष्ट्र! करनेवाले धनुः = (अपना) गाण्डीव 
अथ = अब राजाओं और उनके धनुष 
शस्त्रसम्पाते =शस्त्र चलनेको साथियोंको उद्यम्य = उठा लिया (और) 
प्रवृत्त =तैयारी हो ही रही | व्यवस्थितान्‌ = व्यवस्थितरूपसे | हृषीकेशम्‌ =अन्तर्यामी भगवान्‌ 
थी कि सामने खड़े हुए श्रीकृष्णसे 

तदा =उस समय दृष्ट्वा = देखकर इदम्‌ = यह 
धार्तराष्ट्रान्‌ = अन्यायपूर्वक कपिध्वजः = कपिध्वज वाक्यम्‌ = वचन 

राज्यको धारण पाण्डवः = पाण्डुपुत्र अर्जुनने | आह = बोले। 


व्याख्या-' अथ'-इस पदका तात्पर्य है कि अब 
संजय भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादरूप * भगवद्गीता? 
का आरम्भ करते हैं। अठारहवें अध्यायके चौहत्तरवें 
श्लोकमें आये “इति' पदसे यह संवाद समाप्त होता है। ऐसे 
ही भगवद्गीताके उपदेशका आरम्भ उसके दूसरे अध्यायके 
ग्यारहवें श्लोकसे होता है और अठारहवें अध्यायके 
छाछठवें श्लोकमें यह उपदेश समाप्त होता है। 

“प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते यद्यपि पितामह भीष्मने युद्धारम्भकी 
घोषणाके लिये शंख नहीं बजाया था, प्रत्युत केवल 
दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये ही शंख बजाया था, 
तथापि कौरव और पाण्डव-सेनाने उसको युद्धारम्भकी 
घोषणा ही मान लिया और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र हाथमे 
उठाकर तैयार हो गये। इस तरह सेनाको शस्त्र उठाये 
देखकर वीरतामें भरकर अर्जुने भी अपना गाण्डीव धनुष 
हाथमें उठा लिया। 

“व्यवस्थितान्‌ धार्तराष्ट्रान्‌ दूष्ट्वा'-इन पदोंसे संजयका 
तात्पर्यं है कि जब आपके पुत्र दुर्योधने पाण्डवोंकी 
सेनाको देखा, तब वह भागा-भागा द्रोणाचार्यके पास गया। 
परन्तु जब अर्जुने कौरवोंकी सेनाको देखा, तब उनका 
हाथ सीधे गाण्डीव धनुषपर ही गया--' धनुरुह्यम्य।' इससे 


मालूम होता है कि दुर्योधनके भीतर भय है और अर्जुनके 
भीतर निर्भयता है, उत्साह है, वीरता है। 

“कपिध्वजः '_ अर्जुनके लिये 'कपिध्वज' विशेषण 
देकर संजय धृतराष्ट्रको अर्जुनके रथकी ध्वजापर विराजमान 
हनुमान्‌जीका स्मरण कराते हैं। जब पाण्डव वनमें रहते थे, 
तब एक दिन अकस्मात्‌ वायुने एक दिव्य सहस्रदल कमल 
लाकर द्रौपदीके सामने डाल दिया। उसे देखकर द्रौपदी 
बहुत प्रसन्न हो गयी और उसने भीमसेनसे कहा कि 
“वीरवर! आप ऐसे बहुत-से कमल ला दीजिये।' 
द्रौपदीकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये भीमसेन वहाँसे चल 
पड़े। जब वे कदलीवनमें पहुँचे, तब वहाँ उनकी 
हनुमानूजीसे भेंट हो गयी। उन दोनोंकी आपसमें कई बातें 
हुई। अन्तमें हनुमानूजीने भीमसेनसे वरदान माँगनेके लिये 
आग्रह किया तो भीमसेनने कहा कि 'मेरेपर आपको कृपा 
बनी रहे'। इसपर हनुमानूजीने कहा कि ' हे वायुपुत्र! जिस 
समय तुम बाण और शक्तिके आघातसे व्याकुल शत्रुओंकी 
सेनामें घुसकर सिंहनाद करोगे, उस समय मैं अपनी 
गर्जनासे उस सिंहनादको और बढ़ा दूँगा। इसके सिवाय 
अर्जुनके रथकी ध्वजापर बैठकर मैं ऐसी भयंकर गर्जना 
किया करूँगा, जो शत्रुओंके प्राणोंको हरनेवाली होगी, 


सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई॥ 
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा॥ 


(मानस ३। २८। ४-५ ) 


४ 


जिससे तुमलोग अपने शत्रुओंको सुगमतासे मार सकोगे।*' 
इस प्रकार जिनके रथकी ध्वजापर हनुमानजी विराजमान 
हैं, उनकी विजय निश्चित है। 

“पाण्डवः '- धृतराष्ट्रने अपने प्रश्नमें “पाण्डवाः ' पदका 
प्रयोग किया था। अतः धृतराष्ट्रको बार-बार पाण्डवोंकी 
याद दिलानेके लिये संजय (१। १४ में और यहाँ) 
“पाण्डवः' शब्दका प्रयोग करते हैं। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


“हषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते '--पाण्डव- 
सेनाको देखकर दुर्योधन तो गुरु द्रोणाचार्यके पास जाकर 
चालाकीसे भरे हुए वचन बोलता है; परन्तु अर्जुन कौरव- 
सेनाको देखकर जो जगद्गुरु हैं, अन्तर्यामी हैं, मन-बुद्धि 
आदिके प्रेरक हैं--ऐसे भगवान्‌ श्रीकृष्णसे शूरवीरता, 
उत्साह और अपने कर्तव्यसे भरे हुए (आगे कहे जानेवाले) 
वचन बोलते हैं। 





अर्जुन उवाच 
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥ २१॥ 
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्लुकामानवस्थितान्‌। 


कैर्मया सह योद्व्यमस्मिन्रणसमुद्यमे॥ २२॥ 
अर्जुन बोले-- 
अच्युत =हे अच्युत! स्थापय =खड़ा कीजिये, निरीक्षे =देख न लूँ कि 
उभयोः = दोनों यावत्‌ = जबतक अस्मिन्‌ =इस 
सेनयोः = सेनाओंके अहम्‌ मैं (युद्धक्षेत्रमे) | रणसमुद्यमे =युद्धरूप उद्योगमें 
मध्ये =मध्यमें अवस्थितान्‌ "खड़े हुए मया = मुझे 
मे = एतान्‌ =इन कैः =किन-किनके 
रथम्‌ =रथको (आप योद्धुकामान्‌ = युद्धकी सह = साथ 
तबतक) इच्छावालोंको योद्धव्यम्‌ =युद्ध करना योग्य है। 


व्याख्या- अच्युत सेनयोरु भयोर्मध्ये रथं स्थापय'- 
दोनों सेनाएँ जहाँ युद्ध करनेके लिये एक-दूसरेके सामने 
खड़ी थीं, वहाँ उन दोनों सेनाओंमें इतनी दूरी थी कि एक 
सेना दूसरी सेनापर बाण आदि मार सके। उन दोनों सेनाओं- 
का मध्यभाग दो तरफसे मध्य था-(१) सेनाएँ जितनी 
चौड़ी खड़ी थीं, उस चौड़ाईका मध्यभाग और (२) दोनों 
सेनाआंका मध्यभाग, जहाँसे कौरव-सेना जितनी दूरीपर 
खड़ी थी, उतनी ही दूरीपर पाण्डव-सेना खड़ी थी। ऐसे 
मध्यभागमें रथ खड़ा करनेके लिये अर्जुन भगवानूसे कहते 
हैं, जिससे दोनों सेनाओंको आसानीसे देखा जा सके। 

“सेनयोरुभयोर्मध्ये' पद गीतामें तीन बार आया है-- 
यहाँ (१। २१ में), इसी अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और 
दूसरे अध्यायके दसवें श्लोकमें | तीन बार आनेका तात्पर्य 
है कि पहले अर्जुन शूरवीरताके साथ अपने रथको दोनों 
सेनाओंके बीचमें खड़ा करनेकी आज्ञा देते हैं (पहले 
अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक), फिर भगवान्‌ दोनों सेनाओंके 


बीचमें रथको खड़ा करके कुरुवंशियाको देखनेके लिये कहते 
हैं (पहले अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक) और अन्तमें दोनों 
सेनाओंके बीचमें ही विषादमग्न अर्जुनको गीताका उपदेश देते 
हैं (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक) । इस प्रकार पहले 
अर्जुनमें शूरवीरता थी, बीचमें कुटुम्बियोंको देखनेसे मोहके 
कारण उनको युद्धसे उपरति हो गयी और अन्तमें उनको 
भगवान्‌से गीताका महान्‌ उपदेश प्राप्त हुआ, जिससे उनका 
मोह दूर हो गया। इससे यह भाव निकलता है कि मनुष्य 
जहाँ-कहीं और जिस-किसी परिस्थितिमें स्थित है, वहीं रहकर 
वह प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके निष्काम हो सकता 
है और वहीं उसको परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। कारण 
कि परमात्मा सम्पूर्ण परिस्थितियाँमें सदा एकरूपसे रहते हैं। 

“यावदेतानिरीक्षेऽहं”” “रणसमुद्यमे दोनों सेनाओंके 
बीचमें रथ कबतक खड़ा करें ? इसपर अर्जुन कहते हैं 
कि युद्धकी इच्छाको लेकर कौरव-सेनामें आये हुए 
सेनासहित जितने भी राजालोग खड़े हैं, उन सबको जबतक 


* तदाहं बृंहयिष्यामि स्वरवेण रवं तव। विजयस्य ध्वजस्थश्च नादान्‌ मोक्ष्यामि दारुणान्‌॥ 
शत्रूणां ये प्राणहराः सुखं येन हनिष्यथ। ( महाभारत, वन० १५९। १७-१८ ) 


श्लोक २३-२५ ] 


मैं देख न लूँ, तबतक आप रथको वहीं खड़ा रखिये। इस 
युद्धके उद्योगमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना है? 
उनमें कौन मेरे समान बलवाले हैं? कौन मेरेसे कम 
बलवाले हैं ? और कौन मेरेसे अधिक बलवाले हैं ? उन 
सबको मैं जरा देख लूँ। 


* साधक-संजीवनी * 


४५ 


यहाँ “योद्धुकामान्‌ ' पदसे अर्जुन कह रहे हैं कि हमने 
तो सन्धिकी बात ही सोची थी, पर उन्होंने सन्धिकी बात 
स्वीकार नहीं को; क्योंकि उनके मनमें युद्ध करनेको ज्यादा 
इच्छा है। अत: उनको मैं देखूँ कि कितने बलको लेकर 
वे युद्ध करनेकी इच्छा रखते हैं। 





योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। 
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥ २३॥ 


दुर्बुद्धेः = दुष्टबुद्धि ये =जो उतावले 
धार्तराष्ट्रस्य = दुर्योधनका एते =ये राजालोग हुए (इन 
युद्धे = युद्धमें अत्र = इस सेनामें सबको) 
प्रियचिकीर्षवः= प्रिय करनेकी समागताः =आये हुए हैं, अहम्‌ न्मे 
इच्छावाले योत्स्यमानान्‌ = युद्ध करनेको अवेक्षे =देख लूँ। 


व्याख्या~ धार्तराष्ट्रस्य * दुर्बुद्धेरयुद्धे प्रियचिकीर्षवः '-- 
यहाँ दुर्योधनको दुष्टबुद्धि कहकर अर्जुन यह बताना चाहते 
हैं कि इस दुर्योधने हमारा नाश करनेके लिये आजतक 
कई तरहके षड्यन्त्र रचे हैं। हमें अपमानित करनेके लिये 
कई तरहके उद्योग किये हैं। नियमके अनुसार और 
न्यायपूर्वक हम आधे राज्यके अधिकारी हैं, पर उसको भी 
यह हड्पना चाहता है, देना नहीं चाहता। ऐसी तो इसकी 
दुष्टबुद्धि है; और यहाँ आये हुए राजालोग युद्धमें इसका 
प्रिय करना चाहते हैं! वास्तवमें तो मित्रोंका यह कर्तव्य 
होता है कि वे ऐसा काम करें, ऐसी बात बतायें, जिससे 
अपने मित्रका लोक-परलोकमें हित हो। परन्तु ये 
राजालोग दुर्योधनकी दुष्टबुद्धिको शुद्ध न करके उलटे 
उसको बढ़ाना चाहते हैं और दुर्योधनसे युद्ध कराकर, युद्धमें 
उसकी सहायता करके उसका पतन ही करना चाहते हैं। 


तात्पर्य है कि दुर्योधनका हित किस बातमें है; उसको राज्य 
भी किस बातसे मिलेगा और उसका परलोक भी किस 
बातसे सुधरेगा-इन बातोंका वे विचार ही नहीं कर रहे 
हैं। अगर ये राजालोग उसको यह सलाह देते कि भाई, 
कम-से-कम आधा राज्य तुम रखो और पाण्डवोंका आधा 
राज्य पाण्डवोंको दे दो तो इससे दुर्योधनका आधा राज्य 
भी रहता और उसका परलोक भी सुधरता। 

“योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः इन 
युद्धके लिये उतावले होनेवालोंको जरा देख तो लूँ! इन्होंने 
अधर्मका, अन्यायका पक्ष लिया है, इसलिये ये हमारे सामने 
टिक नहीं सकेंगे, नष्ट हो जायेगे । 

' योत्स्यमानान्‌' कहनेका तात्पर्य है कि इनके मनमें 
युद्धकी ज्यादा आ रही है; अतः देखूँ तो सही कि ये हैं 
कौन ? 





सम्बन्ध--अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ने क्या किया-इसको संजय आगेके दो श्लोकॉमें कहते हैं। 
सञ्जय उवाच 
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। 
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥ २४॥ 
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌। 
उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति॥ २५॥ 


* ' धार्तराष्ट्र पदके दो अर्थ होते हैं--( १ ) धृतराष्ट्रके पुत्र अथवा सम्बन्धी ( २) अन्यायपूर्वक राष्ट्र-( राज्य- ) को 
धारण करनेवाले। यहाँ धृतराष्ट्रके पुत्र दुर्योधनके लिये ही ' धार्तराष्ट्रस्य' पद आया है। 


४६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १ 
संजय बोले-- 
भारत =हे भरतवंशी सेनयोः = सेनाओंके रथोत्तमम्‌ - श्रेष्ठ रथको 
राजन्‌! मध्ये = मध्यभागमें स्थापयित्वा =खड़ा करके 
गुडाकेशेन =निद्राविजयी भीष्मद्रोणप्रमुखतः =पितामह इति =इस प्रकार 
अर्जुनके द्वारा भीष्म और उवाच =कहा कि 
एवम्‌ =इस तरह आचार्य द्रोणके [| पार्थ =' हे पार्थ! 
उक्तः = कहनेपर सामने एतान्‌ =इन 
हृषीकेशः =अन्तर्यामी भगवान्‌ | च =तथा समवेतान्‌ =इकट्टे हुए 
श्रीकृष्णने सर्वेषाम्‌ =सम्पूर्ण कुरून्‌ = कुरुवंशियोंको 
उभयोः =दोनों महीक्षिताम्‌ =राजाओंके सामने | पश्य = देख'। 


व्याख्या- गुडाकेशेन '-'गुडाकेश' शब्दके दो अर्थ 
होते हैं-(१) “गुडा' नाम मुड़े हुएका है और 'केश ' नाम 
बालोंका है। जिसके सिरके बाल मुड़े हुए अर्थात्‌ घुँघराले 
हैं, उसका नाम 'गुडाकेश' है। (२) 'गुडाका' नाम 
निद्राका है और ईश नाम स्वामीका है। जो निद्राका स्वामी 
है अर्थात्‌ निद्रा ले चाहे न ले--ऐसा जिसका निद्रापर 
अधिकार है, उसका नाम 'गुडाकेश' है। अर्जुनके केश 
घुँघराले थे और उनका निद्राप आधिपत्य था; अतः उनको 
'गुडाकेश' कहा गया है। 

'एवमुक्तः'-जो निद्रा-आलस्यके सुखका गुलाम 
नहीं होता और जो विषय-भोगोंका दास नहीं होता, केवल 
भगवानका ही दास (भक्त) होता है, उस भक्तकी बात 
भगवान्‌ सुनते हैं; केवल सुनते ही नहीं, उसकी आज्ञाका 
पालन भी करते हैं। इसलिये अपने सखा भक्त अर्जुनके 
द्वारा आज्ञा देनेपर अन्तर्यामी भगवान्‌ श्रीकृष्णने दोनों 
सेनाओंके बीचमें अर्जुनका रथ खड़ा कर दिया। 

“हृषीकेशः '--इन्द्रियोंका नाम 'हषीक ' है। जो इन्द्रियोंके 
ईश अर्थात्‌ स्वामी हैं, उनको हृषीकेश कहते हैं। पहले 
इक्कीसवें श्लोकमें और यहाँ 'हषीकेश ' कहनेका तात्पर्य 
है कि जो मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि सबके प्रेरक हैं, 
सबको आज्ञा देनेवाले हैं, वे ही अन्तर्यामी भगवान्‌ यहाँ 
अर्जुनकी आज्ञाका पालन करनेवाले बन गये हैं! यह उनकी 
अर्जुनपर कितनी अधिक कृपा है! 

“सेनयोरु भयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌ दोनों 
सेनाओंके बीचमें जहाँ खाली जगह थी, वहाँ भगवानूने 
अर्जुनके श्रेष्ठ रथको खडा कर दिया। 

' भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌'उस 
रथको भी भगवानूने विलक्षण चतुराईसे ऐसी जगह खड़ा 
किया, जहाँसे अर्जुनको कौटुम्बिक सम्बन्धवाले पितामह 
भीष्म, विद्याके सम्बन्धवाले आचार्य द्रोण एवं कौरव- 


सेनाके मुख्य-मुख्य राजालोग सामने दिखायी दे सकें। 
“उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनिति'_ कुरु ' 
पदमें धृतराष्ट्रके पुत्र और पाण्डुके पुत्र-ये दोनों आ जाते 
हैं; क्योंकि ये दोनों ही कुरुवंशी हैं। युद्धके लिये एकत्र 
हुए इन कुरुवंशियोंको देख--ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि 
इन कुरुवंशियोंको देखकर अर्जुनके भीतर यह भाव पैदा 
हो जाय कि हम सब एक ही तो हैं! इस पक्षके हों, चाहे 
उस पक्षके हों; भले हों, चाहे बुरे हों; सदाचारी हों, चाहे 
दुराचारी हों; पर हैं सब अपने ही कुटुम्बी। इस कारण 
अर्जुनमें छिपा हुआ कौटुम्बिक ममतायुक्त मोह जाग्रत्‌ हो 
जाय और मोह जाग्रत्‌ होनेसे अर्जुन जिज्ञासु बन जाय, 
जिससे अर्जुनको निमित्त बनाकर भावी कलियुगी जीवोंके 
कल्याणके लिये गीताका महान्‌ उपदेश दिया जा सके 
इसी भावसे भगवानूने यहाँ “पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरून्‌' 
कहा है। नहीं तो भगवान्‌ “पश्यैतान्‌ धार्तराष्ट्रान्‌ समानिति' 
ऐसा भी कह सकते थे; परन्तु ऐसा कहनेसे अर्जुनके भीतर 
युद्ध करनेका जोश आता; जिससे गीताके प्राकट्यका अवसर 
ही नहीं आता! और अर्जुनके भीतरका प्रसुप्त कौटुम्बिक 
मोह भी दूर नहीं होता, जिसको दूर करना भगवान्‌ अपनी 
जिम्मेवारी मानते हैं। जैसे कोई फोड़ा हो जाता है तो वैद्यलोग 
पहले उसको पकानेकी चेष्टा करते हैं और जब वह पक 
जाता है, तब उसको चीरा देकर साफ कर देते हैं; ऐसे 
ही भगवान्‌ भक्तके भीतर छिपे हुए मोहको पहले जाग्रत्‌ 
करके फिर उसको मिटाते हैं। यहाँ भी भगवान्‌ अर्जुनके 
भीतर छिपे हुए मोहको ' कुरून्‌ पश्य' कहकर जाग्रत्‌ कर 
रहे हैं, जिसको आगे उपदेश देकर नष्ट कर देंगे। 
अर्जुनने कहा था कि 'इनको मैं देख लूँ'-' निरीक्षे' 
(१। २२) 'अवेक्षे' (१। २३); अतः यहाँ भगवान्को 
“पश्य' (तू देख ले)--ऐसा कहनेकी जरूरत ही नहीं थी। 
भगवानको तो केवल रथ खड़ा कर देना चाहिये था। परन्तु 


श्लोक २६--२८ ] 


* साधक-संजीवनी * 


४७ 


भगवानूने रथ खडा करके अर्जुनके मोहको जाग्रत्‌ करनेके 


लिये ही “कुरून्‌ पश्य' (इन कुरुवंशियाँको देख)--ऐसा 
कहा है। 

कौटुम्बिक स्नेह और भगवत्प्रेम--इन दोनोंमें बहुत 
अन्तर है। कुटुम्बमें ममतायुक्त स्नेह हो जाता है तो 
कुटुम्बके अवगुणोंको तरफ खयाल जाता ही नहीं; किंतु 
“ये मेरे हैँ"--ऐसा भाव रहता है। ऐसे ही भगवानका भक्तमें 
विशेष स्नेह हो जाता है तो भक्तके अवगुणोंकी तरफ 
भगवानूका खयाल जाता ही नहीं; किन्तु “यह मेरा ही है'-- 


ऐसा ही भाव रहता है। कौटुम्बिक स्नेहमें क्रिया तथा पदार्थ- 
(शरीरादि-) की और भगवत्प्रेममें भावकी मुख्यता रहती 
है। कौटुम्बिक स्नेहमें मूढ़ता-(मोह-) की और भगवत्प्रेममें 
आत्मीयताकी मुख्यता रहती है। कौटुम्बिक स्नेहमें अँधेरा 
और भगवत्प्रेममें प्रकाश रहता है। कौटुम्बिक स्नेहमें मनुष्य 
कर्तव्यच्युत हो जाता है और भगवत्प्रेममें तल्लीनताके 
कारण कर्तव्य-पालनमें विस्मृति तो हो सकती है, पर भक्त 
कभी कर्तव्यच्युत नहीं होता । कौटुम्बिक स्नेहमें कुटुम्बियाँकी 
और भगवत्प्रेममें भगवान्‌की प्रधानता होती है। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोके भगवान्‌ने अर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। उसके बाद क्या हुआ इसका वर्णन 


संजय आगेके श्लोकोंगें करते हैं। 


तत्रापश्यत्स्थितान्यार्थः पितृनथ पितामहान्‌। 
आचार्यान्मातुलान्श्रातृन्युत्रान्पौत्रान्सर्रींस्तथा॥ २६ ॥ 


श्वशुरान्सुहदश्चैव सेनयोरुभयोरपि । 

अथ =उसके बाद पितृन्‌ = पिताओंको, तथा =तथा 
पार्थः = पृथानन्दन अर्जुनने | पितामहान्‌ =पितामहोंको, सखीन्‌ = मित्रोंको 
तत्र = उन आचार्यान्‌ = आचारयोको, श्वशुरान्‌ =समसुरोंको 
उभयोः =दोनों मातुलान्‌ = मामाओंको, च = और 
एव भ्रातून्‌ = भाइयोंको, सुहृदः = सुहृदोंको 
सेनयोः = सेनाओंमें पुत्रान्‌ = पुत्रोंको, अपि नभी 
स्थितान्‌ =स्थित पौत्रान्‌ = पौत्रोंको अपश्यत्‌ =देखा। 


व्याख्या-- तत्रापश्यत्‌......सेनयोरु भयोरपि '-- जब 
भगवानूने अर्जुनसे कहा कि इस रणभूमिमें इकट्ठे हुए 
कुरुवंशियोंको देख, तब अर्जुनकी दृष्टि दोनों सेनाओंमें 
स्थित अपने कुटुम्बियाँपर गयी। उन्होंने देखा कि उन 
सेनाओंमें युद्धके लिये अपने-अपने स्थानपर भूरिश्रवा 
आदि पिताके भाई खड़े हैं, जो कि मेरे लिये पिताके समान 
हैं। भीष्म, सोमदत्त आदि पितामह खड़े हैं। द्रोण, कृप 
आदि आचार्य (विद्या पढ़ानेवाले और कुलगुरु) खड़े हैं। 


पुरुजित्‌ कुन्तिभोज, शल्य, शकुनि आदि मामा खड़े 
हैं। भीम, दुर्योधन आदि भाई खड़े हैं। अभिमन्यु, घटोत्कच, 
लक्ष्मण (दुर्योधनका पुत्र) आदि मेरे और मेरे भाइयोंके पुत्र 
खड़े हैं। लक्ष्मण आदिके पुत्र खड़े हैं, जो कि मेरे पौत्र 
हैं। दुर्योधनके अश्वत्थामा आदि मित्र खड़े हैं और ऐसे ही 
अपने पक्षके मित्र भी खड़े हैं। द्रुपद, शैब्य आदि ससुर 
खड़े हैं। बिना किसी हेतुके अपने-अपने पक्षका हित 
चाहनेवाले सात्यकि, कृतवर्मा आदि सुहृद्‌ भी खड़े हैं। 





सम्बन्ध-अपने सब कुटुम्बियोको देखनेके बाद अजुनने क्या किया-इसको आगेके श्लोकमें कहते हैं। 
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्‌॥ २७॥ 


कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत्‌। 
अवस्थितान्‌ = अपनी-अपनी समीक्ष्य = देखकर कृपया = कायरतासे 
जगहपर स्थित सः वे आविष्टः = युक्त होकर 
तान्‌ = उन कौन्तेयः = कुन्तीनन्दन विषीदन्‌ +विषाद करते हुए 
सर्वान्‌ =सम्पूर्ण अर्जुन इदम्‌ «ऐसा 
बन्धून्‌ = बान्धवोँको परया = अत्यन्त अब्रवीत्‌ =बोले। 


४८ 


व्याख्या--' तान्‌ सर्वान्बन्धूनवस्थितान्‌ समीक्ष्य'-- 
पूर्वश्लोकके अनुसार अर्जुन जिनको देख चुके हैं, उनके 
अतिरिक्त अर्जुनने बाह्णीक आदि प्रपितामह; धृष्टद्युम्न, 
शिखण्डी, सुरथ आदि साले; जयद्रथ आदि बहनोई तथा 
अन्य कई सम्बन्धियोंको दोनों सेनाओंमें स्थित देखा। 

'स कौन्तेयः कृपया परयाविष्टः '--इन पदोंमें “स 
कौन्तेयः ' कहनेका तात्पर्य है कि माता कुन्तीने जिनको 
युद्ध करनेके लिये सन्देश भेजा था और जिन्होंने शूरवीरतामें 
आकर “मेरै साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं ?'--ऐसे मुख्य- 
मुख्य योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान्‌ श्रीकृष्णको दोनों 
सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेकी आज्ञा दी थी, वे ही 
कुन्तीनन्दन आर्जुन अत्यन्त कायरतासे युक्त हो जाते हैं! 

दोनों ही सेनाओंमें जन्मके और विद्याके सम्बन्धी-ही- 
सम्बन्धी देखनेसे अर्जुनके मनमें यह विचार आया कि 
युद्धमें चाहे इस पक्षके लोग मरें, चाहे उस पक्षके लोग 
मरें, नुकसान हमारा ही होगा, कुल तो हमारा ही नष्ट होगा, 
सम्बन्धी तो हमारे ही मारे जायँगे! ऐसा विचार आनेसे 
अर्जुनकी युद्धकी इच्छा तो मिट गयी और भीतरमें कायरता 
आ गयी। इस कायरताको भगवानूने आगे (२। २-३ में) 
“कश्मलम्‌' तथा ' हृदयदौर्बल्यम्‌' कहा है, और अर्जुनने 
(२।७ में) ' कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः' कहकर इसको 
स्वीकार भी किया है। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


अर्जुन कायरतासे आविष्ट हुए हैं--'कृपयाविष्ट: '। 
इससे सिद्ध होता है कि यह कायरता पहले नहीं थी, प्रत्युत 
अभी आयी है। अतः यह आगन्तुक दोष है। आगन्तुक 
होनेसे यह ठहरेगी नहीं । परन्तु शूरवीरता आर्जुनमें स्वाभाविक 
है; अतः वह तो रहेगी ही। 

अत्यन्त कायरता क्या है? बिना किसी कारण निन्दा, 
तिरस्कार, अपमान करनेवाले, दुःख देनेवाले, वैरभाव रखने- 
वाले, नाश करनेकी चेष्टा करनेवाले दुर्योधन, दुःशासन, 
शकुनि आदिको अपने सामने युद्ध करनेके लिये खड़े 
देखकर भी उनको मारनेका विचार न होना, उनका नाश 
करनेका उद्योग न करना-यह अत्यन्त कायरतारूप दोष 
है। यहाँ अर्जुनको कायरतारूप दोषने ऐसा घेर लिया है 
कि जो अर्जुन आदिका अनिष्ट चाहनेवाले और समय- 
समयपर अनिष्ट करनेका उद्योग करनेवाले हैं, उन 
अधर्मियों- पापियोंपर भी अर्जुनको करुणा आ रही है 
(गीता-पहले अध्यायका पैंतीसवाँ और छियालीसवाँ 
श्लोक) और वे क्षत्रियके कर्तव्यरूप आपने धर्मसे च्युत 
हो रहे हैं। 

*विषीदन्निदमब्रवीत्‌'-युद्धके परिणाममें कुटुम्बको, 
कुलको, देशको क्या दशा होगी-इसको लेकर अर्जुन 
बहुत दुःखी हो रहे हैं और उस अवस्थामें वे ये वचन 
बोलते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकोंमें किया गया है। 





अर्जुन उवाच 
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥ २८ ॥ 
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। 
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥ २९॥ 
गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते। 
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥ ३०॥ 


अर्जुन बोले- 

कृष्ण =हे कृष्ण! मम = मेरे मे = मेरे 
युयुत्सुम्‌ = युद्धको इच्छावाले | गात्राणि = अंग शरीरे = शरीरमें 
इमम्‌ =इस सीदन्ति = शिथिल हो रहे हैं | वेपथुः = कंपकँपी (आ 
स्वजनम्‌ = कुटुम्ब-समुदायको | च = और रही है) 
समुपस्थितम्‌ = अपने सामने मुखम्‌ = मुख च =एवं 

उपस्थित परिशुष्यति =सूख रहा है रोमहर्षः = रोंगटे खड़े 
दृष्ट्वा = देखकर च =तथा जायते = हो रहे हैं। 


श्लोक ३१] 


हस्तात्‌ = हाथसे एव 
गाण्डीवम्‌ =गाण्डीव धनुष परिदह्यते 
स्त्रंसते =गिर रहा है मे 

च = और मनः 

त्वक्‌ =त्वचा भ्रमति, इव 


व्याख्या- दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌ 
अर्जुनको “कृष्ण' नाम बहुत प्रिय था। यह सम्बोधन गीतामें 
नौ बार आया है। भगवान्‌ श्रीकृष्णके लिये दूसरा कोई सम्बोधन 
इतनी बार नहीं आया है। ऐसे ही भगवानको अर्जुनका 'पार्थ' 
नाम बहुत प्यारा था। इसलिये भगवान्‌ और अर्जुन 
आपसकी बोलचालमें ये नाम लिया करते थे और यह बात 
लोगोंमें भी प्रसिद्ध थी। इसी दृष्टिसे संजयने गीताके अन्तमें 
“कृष्ण” और 'पार्थ' नामका उल्लेख किया है-'यत्र 
योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ' (१८। ७८)। 

धृतराष्ट्रने पहले “समवेता युयुत्सवः' कहा था और 
यहाँ अर्जुनने भी 'युयुत्सुं समुपस्थितम्‌' कहा है; परन्तु 
दोनोंकी दृष्टियाँमें बड़ा अन्तर है। धृतराष्ट्रकी दृष्टिमें तो 
दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं और युधिष्ठिर आदि पाण्डुके 
पुत्र हैं-ऐसा भेद है; अतः धृतराष्ट्रने वहाँ “मामकाः ' और 
“पाण्डवाः ' कहा है। परन्तु अर्जुनकी दृष्टिमें यह भेद नहीं 
है; अतः अर्जुने यहाँ 'स्वजनम्‌' कहा है, जिसमें दोनों 
पक्षके लोग आ जाते हैं। तात्पर्य है कि धृतराष्ट्रको तो 
युद्धमें अपने पुत्रोंके मरनेकी आशंकासे भय है, शोक है; 
परन्तु अर्जुनको दोनों ओरके कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे 
शोक हो रहा है कि किसी भी तरफका कोई भी मरे, पर 
वह है तो हमारा ही कुटुम्बी। 

अबतक 'दूष्ट्वा' पद तीन बार आया है--' दृष्ट्वा 
तु पाण्डवानीकम्‌’ (१। २), 'व्यवस्थितान्दृष्ट्वा 
धार्तराष्ट्रान्‌? (१। २०) और यहाँ ' दृष्ट्वेमं स्वजनम्‌? 


* साधक-संजीवनी * 


तभी 


४९ 
= रहा है 
=जल रही है। च = और (मैं) 
=मेरा अवस्थातुम्‌ = खड़े रहनेमें 
=मन च तभी 
= भ्रमित-सा हो न, शक्नोमि = असमर्थ हो रहा हूँ। 


(१। २८) । इन तीनोंका तात्पर्य है कि दुर्योधनका देखना 
तो एक तरहका ही रहा अर्थात्‌ दुर्योधनका तो युद्धका ही 
एक भाव रहा; परन्तु अर्जुनका देखना दो तरहका हुआ। 
पहले तो अर्जुन धृतराष्ट्रके पुत्रोंको देखकर वीरतामें आकर 
युद्धके लिये धनुष उठाकर खड़े हो जाते हैं और अब 
स्वजनोंको देखकर कायरतासे आविष्ट हो रहे हैं, युद्धसे 
उपरत हो रहे हैं और उनके हाथसे धनुष गिर रहा है। 

“सीदन्ति मम गात्राणि” भ्रमतीव च मे मनः '-- 
अर्जुनके मनमें युद्धके भावी परिणामको लेकर चिन्ता हो 
रही है, दुःख हो रहा है। उस चिन्ता, दुःखका असर 
अर्जुनके सारे शरीरपर पड़ रहा है। उसी असरको अर्जुन 
स्पष्ट शब्दोंमें कह रहे हैं कि मेरे शरीरका हाथ, पैर, मुख 
आदि एक-एक अंग (अवयव) शिथिल हो रहा है! मुख 
सूखता जा रहा है, जिससे बोलना भी कठिन हो रहा है! 
सारा शरीर थर-थर काँप रहा है! शरीरके सभी रोंगटे खड़े 
हो रहे हैं अर्थात्‌ सारा शरीर रोमांचित हो रहा है! जिस 
गाण्डीव धनुषको प्रत्यंचाकी टंकारसे शत्रु भयभीत हो जाते 
हैं, वही गाण्डीव धनुष आज मेरे हाथसे गिर रहा है! 
त्वचामें-सारे शरीरमें जलन हो रही है*। मेरा मन भ्रमित 
हो रहा है अर्थात्‌ मेरेको क्या करना चाहिये-यह भी नहीं 
सूझ रहा है! यहाँ युद्धभूमिमें रथपर खड़े रहनेमें भी मैं 
असमर्थ हो रहा हूँ! ऐसा लगता है कि मैं मूच्छित होकर 
गिर पडँगा! ऐसे अनर्थकारक युद्धमें खड़ा रहना भी एक 
पाप मालूम दे रहा है। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोके अपने शरीरके शोकजनित आठ चिहनोंका वर्णन करके अब आर्जुन भावी परिणामके सूचक 


शकुनोंकी दुष्टिसे युद्ध करनेका अनोचित्य बताते हैं। 


निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। 
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥ ३१॥ 


* चिन्ता चितासमा ह्युक्ता बिन्दुमात्रं विशेषतः । सजीवं दहते चिन्ता निर्जीवं दहते चिता॥ 
“चिन्ताको चिताके समान कहा गया है, केवल एक बिन्दुकी ही अधिकता है। चिन्ता जीवित पुरुषको जलाती है और 


चिता मरे हुए पुरुषको जलाती है।' 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


५० [ अध्याय १ 
केशव =हे केशव! विपरीतानि = विपरीत हत्वा = मारकर 

(मैं) पश्यामि =देख रहा हूँ श्रेय: = श्रेय (लाभ) 
निमित्तानि =लक्षणों (और) च =भी 

(शकुनों)-को आहवे = युद्धमें न =नहीं 
च = स्वजनम्‌ =स्वजनोंको अनुपश्यामि =देख रहा हूँ। 


व्याख्या— निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव '-- 
हे केशव! मैं शकुनोंको* भी विपरीत ही देख रहा हूँ। 
तात्पर्य है कि किसी भी कार्यके आरम्भमें मनमें जितना 
अधिक उत्साह (हर्ष) होता है, वह उत्साह उस कार्यको 
उतना ही सिद्ध करनेवाला होता है। परन्तु अगर कार्यके 
आरम्भमें ही उत्साह भंग हो जाता है, मनमें संकल्प- 
विकल्प ठीक नहीं होते, तो उस कार्यका परिणाम अच्छा 
नहीं होता। इसी भावसे अर्जुन कह रहे हैं कि अभी मेरे 
शरीरमें अवयवोंका शिथिल होना, कम्प होना, मुखका 
सूखना आदि जो लक्षण हो रहे हैं, ये व्यक्तिगत शकुन भी 
ठीक नहीं हो रहे हैं'। इसके सिवाय आकाशसे उल्कापात 
होना, असमयमें ग्रहण लगना, भूकम्प होना, पशु-पक्षियोंका 
भयंकर बोली बोलना, चन्द्रमाके काले चिहनका मिट-सा 
जाना, बादलोंसे रक्तको वर्षा होना आदि जो पहले शकुन 
हुए हैं, वे भी ठीक नहीं हुए हैं। इस तरह अभीके और 


पहलेके-इन दोनों शकुनोंकी ओर देखता हूँ, तो मेरेको 
ये दोनों ही शकुन विपरीत अर्थात्‌ भावी अनिष्टके सूचक 
दीखते हैं। 

“न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे '- युद्धमें 
अपने कुटुम्बियोंको मारनेसे हमें कोई लाभ होगा--ऐसी 
बात भी नहीं है। इस युद्धके परिणाममें हमारे लिये लोक 
और परलोक-दोनों ही हितकारक नहीं दीखते। कारण 
कि जो अपने कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी 
होता है। अतः कुलका नाश करनेसे हमें पाप ही लगेगा, 
जिससे नरकोंकी प्राप्ति होगी । 

इस श्लोकमें “निमित्तानि पश्यामि’ और ' श्रेयः 
अनुपश्यामि''-इन दोनों वाक्योंसे अर्जुन यह कहना 
चाहते हैं कि मैं शकुनोंको देखूँ अथवा स्वयं विचार करूँ, 
दोनों ही रीतिसे युद्धका आरम्भ और उसका परिणाम हमारे 
लिये और संसारमात्रके लिये हितकारक नहीं दीखता। 





सम्बन्ध--जिसमें न तो शुभ शकुन दीखते हैं और न श्रेय ही दीखता है, ऐसी अनिष्टकारक विजयको प्राप्त करनेकी 


अनिच्छा अर्जुन आगेके श्लोकमेँ प्रकट करते हैं। 


न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। 
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥ ३२॥ 


कृष्ण न्हे कृष्ण! (मैं) |च = 
न =न (तो) सुखानि = 
विजयम्‌ =विजय 

काङ्क्षे = चाहता हूँ, गोविन्द 

न चन नः 

राज्यम्‌ =राज्य (चाहता हूँ) | राज्येन 


और, किम्‌ = क्या लाभ? 
(न) सुखोंको भोगैः = भोगोंसे (क्या 
(ही चाहता हूँ) । लाभ?) 

= हे गोविन्द! वा = अथवा 

= हमलोगोंको जीवितेन =जीनेसे (भी) 

= राज्यसे किम्‌ = क्या लाभ? 


१-जितने भी शकुन होते हैं, वे किसी अच्छी या बुरी घटनाके होनेमें निमित्त नहीं होते अर्थात्‌ वे किसी घटनाके निर्माता 
नहीं होते, प्रत्युत भावी घटनाकी सूचना देनेवाले होते हैं। 

शकुन बतानेवाले प्राणी भी वास्तवमें शकुनांको बताते नहीं हैं; किन्तु उनकी स्वाभाविक चेष्टासे शकुन सूचित होते हैं। 

२-यद्यपि अर्जुन शरीरमें होनेवाले लक्षणोंको भी शकुन मान रहे हैं, तथापि वास्तवमें ये शकुन नहीं हैं। ये तो शोकके 
कारण इन्द्रियाँ, शरीर, मन, बुद्धिमें होनेवाले विकार हैं। 

३-यहाँ 'पश्यामि' क्रिया भूत और वर्तमानके शकुनोंके विषयमें और ' अनुपश्यामि' क्रिया भविष्यके परिणामके विषयमें 
आयी है। 


श्लोक ३३-३४ ] 


व्याख्या-न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं 
सुखानि च'-मान लें कि युद्धमें हमारी विजय हो जाय, 
तो विजय होनेसे पूरी पृथ्वीपर हमारा राज्य हो जायगा, 
अधिकार हो जायगा। पृथ्वीका राज्य मिलनेसे हमें अनेक 
प्रकारके सुख मिलेंगे। परन्तु इनमेंसे मैं कुछ भी नहीं चाहता 
अर्थात्‌ मेरे मनमै विजय, राज्य एवं सुखोंकी कामना नहीं है। 

'किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा'-- 
जब हमारे मनमें किसी प्रकारकी (विजय, राज्य और 
सुखको) कामना ही नहीं है, तो फिर कितना ही बड़ा राज्य 
क्यों न मिल जाय, पर उससे हमें क्या लाभ? कितने ही 
सुन्दर-सुन्दर भोग मिल जाये, पर उनसे हमें क्या लाभ? 


* साधक-संजीवनी * 


५१ 


अथवा कुटुम्बियांको मारकर हम राज्यके सुख भोगते हुए 
कितने ही वर्ष जीते रहें, पर उससे भी हमें क्या लाभ? 
तात्पर्य है कि ये विजय, राज्य और भोग तभी सुख दे सकते 
हैं, जब भीतरमें इनकी कामना हो, प्रियता हो, महत्त्व हो। 
परन्तु हमारे भीतर तो इनकी कामना ही नहीं है। अतः ये 
हमें क्या सुख दे सकते हैं ? इन कुटुम्बियांको मारकर हमारी 
जीनेकी भी इच्छा नहीं है; क्योंकि जब हमारे कुटुम्बी मर 
जायँगे, तब ये राज्य और भोग किसके काम आयेंगे? 
राज्य, भोग आदि तो कुटुम्बके लिये होते हैं, पर जब ये 
ही मर जायँगे, तब इनको कौन भोगेगा? भोगनेकी बात 
तो दूर रही, उलटे हमें और अधिक चिन्ता, शोक होंगे! 





सम्बन्ध-- अर्जुन विजय आदि क्यों नहीं चाहते, इसका हेतु आगेके श्लोकमें बताते हैं। 
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। 
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥ ३३॥ 


येषाम्‌ = जिनके सुखानि =सुखकी च = और 

अर्थे =लिये काङ्क्षितम्‌ =इच्छा है, धनानि = धनकी 

नः = हमारी ते =वे (ही) आशाका 
राज्यम्‌ = राज्य, ड्मे =ये सब त्यक्त्वा = त्याग करके 
भोगाः = भोग (अपने) युद्धे = युद्धमें 

च = और प्राणान्‌ = प्राणोंको अवस्थिताः = खड़े हैं। 


व्याख्या~ येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः 
सुखानि च'--हम राज्य, सुख, भोग आदि जो कुछ चाहते 
हैं, उनको अपने व्यक्तिगत सुखके लिये नहीं चाहते, प्रत्युत 
इन कुटुम्बियोँ, प्रेमियों, मित्रों आदिके लिये ही चाहते 
हैं। आचायाँ, पिताओं, पितामहां, पुत्रों आदिको सुख- 
आराम पहुँचे, इनकी सेवा हो जाय, ये प्रसन्न रहें-इसके 
लिये ही हम युद्ध करके राज्य लेना चाहते हैं, भोग-सामग्री 
इकट्ठी करना चाहते हैं। 

“त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च'-- 
पर वे ही ये सब-के-सब अपने प्राणोंकी और धनकी 
आशाको छोड़कर युद्ध करनेके लिये हमारे सामने इस 
रणभूमिमें खड़े हैं। इन्होंने ऐसा विचार कर लिया है कि 


हमें न प्राणोंका मोह है और न धनकी तृष्णा है; हम मर 
बेशक जायेँ, पर युद्धसे नहीं हटेंगे। अगर ये सब मर ही 
जायँगे, तो फिर हमें राज्य किसके लिये चाहिये? सुख 
किसके लिये चाहिये ? धन किसके लिये चाहिये ? अर्थात्‌ 
इन सबको इच्छा हम किसके लिये करें? 

“प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च'का तात्पर्यं है कि वे 
प्राणोंकी और धनकी आशाका त्याग करके खड़े हैं अर्थात्‌ 
हम जीवित रहेंगे और हमें धन मिलेगा-इस इच्छाको 
छोड़कर वे खड़े हैं। अगर उनमें प्राणोंकी और धनकी 
इच्छा होती, तो वे मरनेके लिये युद्धमें क्यों खड़े होते ? 
अतः यहाँ प्राण और धनका त्याग करनेका तात्पर्य उनकी 
आशाका त्याग करनेमें ही है। 





सम्बन्ध-- जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते हुँ वे लोग कौन हैं-इसका वर्णन आर्जुन आगेके दो 


श्लोकॉमें करते हैं। 


आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः । 
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा॥ ३४॥ 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। 
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥ ३५॥ 


५२ 

आचार्याःः - आचार्य, तथा 
पितरः = पिता, 

पुत्राः - पुत्र सम्बन्धिनः 
चच = और 

तथा, एव =उसी प्रकार घ्नतः 
पितामहाः = पितामह, अपि 
मातुलाः = मामा, एतान्‌ 
श्वशुराः = ससुर, हन्तुम्‌ 
पौत्राः = पौत्र, न 
श्यालाः = साले इच्छामि 


व्याख्या-[ भगवान्‌ आगे सोलहवें अध्यायके इक्कोसवें 
श्लोकमें कहेंगे कि काम, क्रोध और लोभ-ये तीनों ही 
नरकके द्वार हैं। वास्तवमें एक कामके ही ये तीन रूप हैं। 
ये तीनों सांसारिक वस्तुओं, व्यक्तियों आदिको महत्त्व देनेसे 
पैदा होते हैं। काम अर्थात्‌ कामनाकी दो तरहकी क्रियाएँ 
होती हैं-इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति। इनमेंसे 
इष्टकी प्राप्ति भी दो तरहकी होती है-संग्रह करना और 
सुख भोगना। संग्रहकी इच्छाका नाम 'लोभ' है और 
सुखभोगको इच्छाका नाम “काम' है। अनिष्टकी निवृत्तिमें 
बाधा पड्नेपर 'क्रोध' आता है अर्थात्‌ भोगोंकी, संग्रहको 
प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंपर अथवा हमारा अनिष्ट करनेवालोंपर, 
हमारे शरीरका नाश करनेवालोंपर क्रोध आता है, जिससे 
अनिष्ट करनेवालोंका नाश करनेकी क्रिया होती है। इससे 
सिद्ध हुआ कि युद्धमें मनुष्यकी दो तरहसे ही प्रवृत्ति होती 
है—अनिष्टकी निवृत्तिके लिये अर्थात्‌ अपने 'क्रोध'को 
सफल बनानेके लिये और इष्टकी प्राप्तिके लिये अर्थात्‌ 
“लोभ' की पूर्तिके लिये। परन्तु अर्जुन यहाँ इन दोनों ही 
बातोंका निषेध कर रहे हैं। ] 

“आचार्याः पितरः ...... किं नु महीकृते अगर हमारे 
ये कुटुम्बीजन अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर 
मेरेपर प्रहार करके मेरा वध भी करना चाहें, तो भी मैं 


=तथा (अन्य जितने | मधुसूदन 


= हे मधुसूदन !( मुझे) 


भी) त्रैलोक्य- 
= सम्बन्धी हैं, राज्यस्य = त्रिलोकीका राज्य 
(मुझपर) हेतोः = मिलता हो 
= प्रहार करनेपर अपि =तो भी (मैं इनको 
= भी (मैं) मारना नहीं चाहता), 
=इनको नु =फिर 
= मारना महीकृते = पुथ्वीके लिये तो 
=नहीं (मैं इनको मारूँ ही) 
= चाहता, (और) | किम्‌ = क्या? 


अपनी अनिष्ट-निवृत्तिके लिये क्रोधमें आकर इनको मारना 
नहीं चाहता। अगर ये अपनी इष्टप्राप्तिके लिये राज्यके 
लोभमें आकर मेरेको मारना चाहें, तो भी मैं अपनी इष्ट- 
प्राप्तिके लिये लोभमें आकर इनको मारना नहीं चाहता। 
तात्पर्यं यह हुआ कि क्रोध और लोभमें आकर मेरेको 
नरकोंका दरवाजा मोल नहीं लेना है। 

यहाँ दो बार 'अपि' पदका प्रयोग करनेमें अर्जुनका 
आशय यह है कि मैं इनके स्वार्थमें बाधा ही नहीं देता तो ये 
मुझे मारेंगे ही क्यों ? पर मान लो कि ' पहले इसने हमारे 
स्वार्थमें बाधा दी है' ऐसे विचारसे ये मेरे शरीरका नाश 
करनेमें प्रवृत्त हो जाये, तो भी ( घ्नतोऽपि ) मैं इनको मारना 
नहीं चाहता। दूसरी बात, इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकोका 
राज्य मिल जाय, यह तो सम्भावना ही नहीं है, पर मान लो 
कि इनको मारनेसे मुझे त्रिलोकीका राज्य मिलता हो, तो भी 
( अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः ) मैं इनको मारना नहीं चाहता। 

'मधुसूदन'? सम्बोधनका तात्पर्यं है कि आप तो 
दैत्योंको मारनेवाले हैं, पर ये द्रोण आदि आचार्य और 
भीष्म आदि पितामह दैत्य थोड़े ही हैं, जिससे मैं इनको 
मारनेकी इच्छा करूँ ? ये तो हमारे अत्यन्त नजदीकके खास 
सम्बन्धी हैं। 

' आचार्याः '--इन कुटुम्बियाँमें जिन द्रोणाचार्य आदिसे 


१-छब्बीसवें शलोकमें 'पितृनथ पितामहान्‌ .....' कहकर सबसे पहले पिताओं और पितामहोंका नाम लिया गया है, और 
यहाँ आचार्याः पितरः.....' कहकर सबसे पहले आचार्योका नाम लिया गया है। इसका तात्पर्य है कि वहाँ तो कौटुम्बिक 
स्नेहकी मुख्यता है, इसलिये वहाँ पिताका नाम सबसे पहले लिया है; और यहाँ न मारनेका विषय चल रहा है, इसलिये यहाँ 
सबसे पहले आदरणीय पूज्य आचार्यो गुरुजनांका नाम लिया है, जो कि जीवके परम हितैषी होते हैं। 

२-'मधु' नामक दैत्यको मारनेके कारण भगवानका नाम 'मधुसूदन' पड़ा था। 


श्लोक ३६] 


* साधक-संजीवनी * 


५३ 


हमारा विद्याका, हितका सम्बन्ध है, ऐसे पूज्य आचार्योंकी 


मेरेको सेवा करनी चाहिये कि उनके साथ लड़ाई करनी 
चाहिये ? आचार्यक चरणोंमें तो अपने-आपको, अपने प्राणोंको 
भी समर्पित कर देना चाहिये। यही हमारे लिये उचित है। 

“पितरः '--शरीरके सम्बन्धको लेकर जो पितालोग 
हैं, उनका ही तो रूप यह हमारा शरीर है। शरीरसे उनके 
स्वरूप होकर हम क्रोध या लोभमें आकर अपने उन 
पिताओंको कैसे मारें ? 

“पुत्राः --हमारे और हमारे भाइयोंके जो पुत्र हैं, वे तो 
सर्वथा पालन करनेयोग्य हैं। वे हमारे विपरीत कोई क्रिया भी 
कर बेठें, तो भी उनका पालन करना ही हमारा धर्म है। 

“पितामहाः '--ऐसे ही जो पितामह हैं, वे जब हमारे 
पिताजीके भी पूज्य हैं, तब हमारे लिये तो परमपूज्य हैं 
ही। वे हमारी ताडना कर सकते हैं, हमें मार भी सकते 
हैं। पर हमारी तो ऐसी ही चेष्टा होनी चाहिये, जिससे 
उनको किसी तरहका दुःख न हो, कष्ट न हो, प्रत्युत 


उनको सुख हो, आराम हो, उनको सेवा हो। 

“मातुलाः हमारे जो मामालोग हैं, वे हमारा पालन- 
पोषण करनेवाली माताओंके ही भाई हैं। अतः वे माताओंके 
समान ही पूज्य होने चाहिये। 

“श्वशुराः '-ये जो हमारे ससुर हैं, ये मेरी और मेरे 
भाइयोंकी पत्नियाँके पूज्य पिताजी हैं। अतः ये हमारे लिये 
भी पिताके ही तुल्य हैं। इनको मैं कैसे मारना चाहूँ? 

“पौत्राः हमारे पुत्रोंके जो पुत्र हैं, वे तो पुत्रोंसे भी 
अधिक पालन-पोषण करनेयोग्य हैं। 

‘शयालाः '—हमारे जो साले हैं, वे भी हमलोगोंको 
पत्नियोंके प्यारे भैया हैं। उनको भी कैसे मारा जाय! 

“सम्बन्धिनः '—ये जितने सम्बन्धी दीख रहे हैं और इनके 
अतिरिक्त जितने भी सम्बन्धी हैं, उनका पालन-पोषण, सेवा 
करनी चाहिये कि उनको मारना चाहिये ? इनको मारनेसे अगर 
हमें त्रिलोकीका राज्य भी मिल जाय, तो भी क्या इनको 
मारना उचित है ? इनको मारना तो सर्वथा अनुचित है। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोके अर्जुनने स्वजनोंको न मारनेमें दो हेतु बताये। अब परिणामकी दृष्टिसे भी स्वजनोंको न मारना सिद्ध करते हैं। 
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याञ्जनार्दन । 
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥ ३६॥ 


जनार्दन न्हे जनार्दन! (इन) | का 
धार्तराष्ट्रान्‌ = धृतराष्ट्र- प्रीतिः 
सम्बन्धियोंको स्यात्‌ 
निहत्य = मारकर एतान्‌ 
नः = हमलोगोंको आततायिनः 
व्याख्या-- निहत्य धार्तराष्ट्राः "`` हत्वैता- 


नाततायिनः '- धृतराष्ट्रके पुत्र और उनके सहयोगी दूसरे 
जितने भी सैनिक हैं, उनको मारकर विजय प्राप्त करनेसे हमें 
क्या प्रसन्नता होगी ? अगर हम क्रोध अथवा लोभके वेगमें 
आकर इनको मार भी दें, तो उनका वेग शान्त होनेपर हमें 
रोना ही पड़ेगा अर्थात्‌ क्रोध और लोभमें आकर हम क्या 
अनर्थ कर बैठे-एऐसा पश्चात्ताप ही करना पडेगा । कुटुम्बियोंकी 
याद आनेपर उनका अभाव बार-बार खटकेगा। चित्तमें 
उनको मृत्युका शोक सताता रहेगा। ऐसी स्थितिमें हमें कभी 
प्रसन्नता हो सकती है क्या ? तात्पर्य है कि इनको मारनेसे हम 


= वया हत्वा = मारनेसे तो 
= प्रसन्नता अस्मान्‌ = हमें 

= होगी ? पापम्‌ = पाप 

= इन एव = 

= आततायियोंको आश्रयेत्‌ =लगेगा। 


इस लोकमें जबतक जीते रहेंगे, तबतक हमारे चित्तमें कभी 
प्रसन्नता नहीं होगी और इनको मारनेसे हमें जो पाप लगेगा, 
वह परलोकमें हमें भयंकर दुःख देनेवाला होगा। 

आततायी छः प्रकारके होते हैं-आग लगानेवाला, 
विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको तैयार हुआ, 
धनको हरनेवाला, जमीन (राज्य) छीननेवाला और स्त्रीका 
हरण करनेवाला*। दुर्योधन आदिमें ये छहों ही लक्षण घटते 
थे। उन्होंने पाण्डवोंको लाक्षागृहमें आग लगाकर मारना 
चाहा था। भीमसेनको जहर खिलाकर जलमें फेंक दिया 
था। हाथमे शस्त्र लेकर वे पाण्डवोंको मारनेके लिये तैयार थे 


* अग्निदो गरदश्चैव शस्त्रपाणिर्धनापहः । क्षेत्रदारापहर्ता च षडेते ह्याततायिनः॥ ( वसिष्ठस्मृति ३। १९) 
आग लगानेवाला, विष देनेवाला, हाथमें शस्त्र लेकर मारनेको उद्यत हुआ, धनका हरण करनेवाला, जमीन 
छीननेवाला और स्त्रीका हरण करनेवाला--ये छहों ही आततायी हैं।' 


५४ 


ही। द्यूतक्रीड़ामें छल-कपट करके उन्होंने पाण्डवोंका धन 
और राज्य हर लिया था। द्रौपदीको भरी सभामें लाकर 
दुर्योधनने ' मैंने तेरेको जीत लिया है, तू मेरी दासी हो गयी 
है' आदि शब्दोंसे बड़ा अपमान किया था और दुर्योधनादिकी 
प्रेरणासे जयद्रथ द्रौपदीको हरकर ले गया था। 

शास्त्रॉके वचनोंके अनुसार आततायीको मारनेसे मासेवालेको 
कुछ भी दोष (पाप) नहीं लगता-' नाततायिवधे दोषो 
इन्तुर्भवति कश्चन' (मनुस्मृति ८ । ३५१) । परन्तु आततायीको 
मारना उचित होते हुए भी मारनेकी क्रिया अच्छी नहीं है। 
शास्त्र भी कहता है कि मनुष्यको कभी किसीकी हिंसा 
नहीं करनी चाहिये-'न हिंस्यात्सर्वा भूतानि'; हिंसा न 
करना परमधर्म है-' अहिंसा परमो धर्मः *।' अतः 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


क्रोध-लोभके वशीभूत होकर कुटुम्बियाँकी हिंसाका कार्य 
हम क्यों करें? 

आततायी होनेसे ये दुर्योधन आदि मारनेके लायक हैं 
ही; परन्तु अपने कुटुम्बी होनेसे इनको मारनेसे हमें पाप 
ही लगेगा; क्योंकि शास्त्रोंमें कहा गया है कि जो अपने 
कुलका नाश करता है, वह अत्यन्त पापी होता है-'स 
एव पापिष्ठतमो यः कुर्यात्कुलनाशनम्‌।' अतः जो आततायी 
अपने खास कुटुम्बी हैं, उन्हें कैसे मारा जाय ? उनसे अपना 
सम्बन्ध-विच्छेद कर लेना, उनसे अलग हो जाना तो ठीक 
है, पर उन्हें मारना ठीक नहीं है। जैसे, अपना बेटा ही 
आततायी हो जाय तो उससे अपना सम्बन्ध हटाया जा 
सकता है, पर उसे मारा थोड़े ही जा सकता है! 





सम्बन्ध पूर्वश्लोके युद्धका दुष्परिणाम बताकर अब अर्जुन युद्ध करनेका सर्वथा अनौचित्य बताते हैं। 
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌। 
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥ ३७॥ 


तस्मात्‌ = इसलिये वयम्‌ 
स्वबान्धवान्‌ = अपने बान्धव (इन) | न, अर्हाः 
धार्तराष्ट्रान्‌ = धृतराष्ट्र- हि 
सम्बन्धियोंको माधव 
हन्तुम्‌ =मारनेके लिये स्वजनम्‌ 


व्याख्या-' तस्मान्नाहं वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्‌ 
स्वबान्धवान्‌'-अभीतक (पहले अध्यायके अट्टाईसवें 
श्लोकसे लेकर यहाँतक) मैंने कुटुम्बियांको न मारनेमें 
जितनी युक्तियाँ, दलीलें दी हैं, जितने विचार प्रकट किये 
हैं, उनके रहते हुए हम ऐसे अनर्थकारी कार्यमें कैसे प्रवृत्त 
हो सकते हैं ? अपने बान्धव इन धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको 
मारनेका कार्य हमारे लिये सर्वथा ही अयोग्य है, अनुचित 
है। हम-जैसे अच्छे पुरुष ऐसा अनुचित कार्य कर ही कैसे 
सकते हैं ? 

'स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव '-- 


= हम कुटुम्बियोंको 
=योग्य नहीं हैं; | हत्वा = मारकर (हम) 
= क्योंकि कथम्‌ = कैसे 

=हे माधव! सुखिनः = सुखी 

= अपने स्याम = होंगे ? 


हे माधव! इन कुटुम्बियोंके मरनेको आशंकासे ही बड़ा 
दुःख हो रहा है, संताप हो रहा है, तो फिर क्रोध तथा 
लोभके वशीभूत होकर हम उनको मार दें तो कितना दुःख 
होगा! उनको मारकर हम कैसे सुखी होंगे? 

यहाँ “ये हमारे घनिष्ठ सम्बन्धी हैँ'--इस ममताजनित 
मोहके कारण अपने क्षत्रियोचित कर्तव्यको तरफ अर्जुनको 
दृष्टि ही नहीं जा रही है। कारण कि जहाँ मोह होता है, 
वहाँ मनुष्यका विवेक दब जाता है। विवेक दबनेसे मोहकी 
प्रबलता हो जाती है। मोहके प्रबल होनेसे अपने कर्तव्यका 
स्पष्ट भान नहीं होता। 





* आततायीको मार दे-यह अर्थशास्त्र है और किसीकी भी हिंसा न करे--यह धर्मशास्त्र है। जिसमें अपना कोई स्वार्थ 
(मतलब ) रहता है, वह ' अर्थशास्त्र' कहलाता है; और जिसमें अपना कोई स्वार्थ नहीं रहता, वह ' धर्मशास्त्र' कहलाता है। 
अर्थशास्त्रकी अपेक्षा धर्मशास्त्र बलवान्‌ होता है। अतः शास्त्रोंमें जहाँ अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र दोनोंमें विरोध आये, वहाँ 
अर्थशास्त्रका त्याग करके धर्मशास्त्रको ही ग्रहण करना चाहिये 

स्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यबहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः॥ ( याज्ञवल्क्यस्मृति २। २१) 


श्लोक ३८-३९ ] * साधक-संजीवनी * ७७ 


सम्बन्ध--अब यहाँ यह शंका होती है कि जैसे ठुम्हारे लिये दुर्योधन आदि स्वजन हैं; ऐसे ही दुर्योधन आदिके 
लिये भी तो तुम स्वजन हो। स्वजनकी दृष्टिसे ठुम तो युद्धसे निवृत्त होनेकी बात सोच रहे हो, पर दुर्योधन आदि युद्धसे 
निवृत्त होनेकी बात ही नहीं सोच रहे हैं-इसका क्या कारण है? इसका उत्तर अर्जुन आगेके दो श्लोकॉमें देते हैं। 


यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । 
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥ ३८॥ 
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌। 
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्धिर्जनार्दन॥ ३९॥ 


यद्यपि यद्यपि च = और दोषम्‌ = दोषको 
लोभोपहतचेतसः = लोभके मित्रद्रोहे = मित्रोंके साथ द्वेष | प्रपश्यद्भिः = ठीक-ठीक जाननेवाले 
कारण जिनका करनेसे होनेवाले | अस्माभिः = हम लोग 
विवेक-विचार लुप्त | पातकम्‌ =पापको अस्मात्‌ = इस 
हो गया है, ऐसे |न = नहीं पापात्‌ = पापसे 
एते =ये (दुर्योधन आदि) | पश्यन्ति =देखते, (तो भी) | निवर्तितुम्‌ =निवृत्त होनेका 
कुलक्षयकृतम्‌ = कुलका नाश जनार्दन = हे जनार्दन! ज्ञेयम्‌ = विचार 
करनेसे होनेवाले | कुलक्षयकृतम्‌ = कुलका नाश कथम्‌ = क्यों 
दोषम्‌ = दोषको करनेसे होनेवाले | न =न करें? 


व्याख्या- यद्यप्येते न पश्यन्ति “” मित्रद्रोहे च 
पातकम्‌ इतना मिल गया, इतना और मिल जाय; फिर 
ऐसा मिलता ही रहे--ऐसे धन, जमीन, मकान, आदर, 
प्रशंसा, पद, अधिकार आदिको तरफ बढ़ती हुई वृत्तिका 
नाम “लोभ' है। इस लोभ-वृत्तिके कारण इन दुर्योधनादिकी 
विवेक-शक्ति लुप्त हो गयी है, जिससे वे यह विचार नहीं 
कर पा रहे हैं कि जिस राज्यके लिये हम इतना बड़ा पाप 
करने जा रहे हैं, कुटुम्बियोंका नाश करने जा रहे हैं, वह 
राज्य हमारे साथ कितने दिन रहेगा और हम उसके साथ 
कितने दिन रहेंगे ? हमारे रहते हुए यह राज्य चला जायगा 
तो हमारी क्या दशा होगी और राज्यके रहते हुए हमारे 
शरीर चले जायँगे तो क्या दशा होगी ? क्योंकि मनुष्य 
संयोगका जितना सुख लेता है, उसके वियोगका उतना 
दुःख उसे भोगना ही पड़ता है। संयोगमें इतना सुख नहीं 
होता, जितना वियोगमें दुःख होता है। तात्पर्य है कि 
अन्तःकरणमें लोभ छा जानेके कारण इनको राज्य-ही- 
राज्य दीख रहा है। कुलका नाश करनेसे कितना भयंकर 
पाप होगा, वह इनको दीख ही नहीं रहा है। 

जहाँ लड़ाई होती है, वहाँ समय, सम्पत्ति, शक्तिका 
नाश हो जाता है। तरह-तरहकी चिन्ताएँ और आपत्तियाँ 


आ जाती हैं। दो मित्रॉमें भी आपसमें खटपट मच जाती 
है, मनोमालिन्य हो जाता है। कई तरहका मतभेद हो जाता 
है। मतभेद होनेसे वैरभाव हो जाता है। जैसे द्रुपद और 
द्रोण-दोनों बचपनके मित्र थे। परन्तु राज्य मिलनेसे 
द्रुपदने एक दिन द्रोणका अपमान करके उस मित्रताको 
ठुकरा दिया। इससे राजा द्रुपद और द्रोणाचार्ये बीच 
वैरभाव हो गया। अपने अपमानका बदला लेनेके लिये 
द्रोणाचार्यने मेरे द्वारा राजा द्रुपदको परास्त कराकर उसका 
आधा राज्य ले लिया। इसपर द्रुपदने द्रोणाचार्यका नाश 
करनेके लिये एक यज्ञ कराया, जिससे धृष्टद्युम्न और 
द्रौपदी-दोनों पैदा हुए। इस तरह मित्रोंके साथ वैरभाव 
होनेसे कितना भयंकर पाप होगा, इस तरफ ये देख ही 
नहीं रहे हैं! 
विशेष बात 

अभी हमारे पास जिन वस्तुओंका अभाव है, उन 
वस्तुओंके बिना भी हमारा काम चल रहा है, हम अच्छी 
तरहसे जी रहे हैं। परन्तु जब वे वस्तुएँ हमें मिलनेके बाद 
फिर बिछुड़ जाती हैं, तब उनके अभावका बड़ा दु:ख होता 
है। तात्पर्य है कि पहले वस्तुओंका जो निरन्तर अभाव था, 
वह इतना दुःखदायी नहीं था, जितना वस्तुओंका संयोग 


५६ 


होकर फिर उनसे वियोग होना दुःखदायी है। ऐसा होनेपर 
भी मनुष्य अपने पास जिन वस्तुओंका अभाव मानता है, 
उन वस्तुओंको वह लोभके कारण पानेकी चेष्टा करता 
रहता है। विचार किया जाय तो जिन वस्तुओंका अभी 
अभाव है, बीचमें प्रारब्धानुसार उनकी प्राप्ति होनेपर भी 
अन्तमें उनका अभाव ही रहेगा। अतः हमारी तो वही 
अवस्था रही, जो कि वस्तुओंके मिलनेसे पहले थी। 
बीचमें लोभके कारण उन वस्तुओंको पानेके लिये केवल 
परिश्रम-ही-परिश्रम पल्ले पड़ा, दुःख-ही-दुःख भोगना 
पड़ा। बीचमें वस्तुआंके संयोगसे जो थोड़ा-सा सुख 
हुआ है, वह तो केवल लोभके कारण ही हुआ है। अगर 
भीतरमें लोभ-रूपी दोष न हो, तो वस्तुओंके संयोगसे 
सुख हो ही नहीं सकता। ऐसे ही मोहरूपी दोष न हो, 
तो कुटुम्बियाँसे सुख हो ही नहीं सकता। लालचरूपी 
दोष न हो, तो संग्रहका सुख हो ही नहीं सकता। 
तात्पर्य है कि संसारका सुख किसी-न-किसी दोषसे ही 
होता है। कोई भी दोष न होनेपर संसारसे सुख हो ही नहीं 
सकता। परन्तु लोभके कारण मनुष्य ऐसा विचार कर ही 
नहीं सकता। यह लोभ उसके विवेक-विचारको लुप्त कर 
देता है। 

“कथं न ज्ञेयमस्माभिः....प्रपश्यद्भिर्जनार्दन' अब 
अर्जुन अपनी बात कहते हैं कि यद्यपि दुर्योधनादि अपने 
कुलक्षयसे होनेवाले दोषको और मित्रद्रोहसे होनेवाले 
पापको नहीं देखते, तो भी हमलोगोंको कुलक्षयसे 
होनेवाली अनर्थ-परम्पराको देखना ही चाहिये [जिसका 
वर्णन अर्जुन आगे चालीसवें श्लोकसे चौवालीसवें श्लोकतक 
करेंगे]; क्योंकि हम कुलक्षयसे होनेवाले दोषाँको भी 
अच्छी तरहसे जानते हैं और मित्रोंके साथ द्रोह- (वैर, 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


द्वेष-) से होनेवाले पापको भी अच्छी तरहसे जानते हैं। 
अगर वे मित्र हमें दुःख दें, तो वह दुःख हमारे लिये 
अनिष्टकारक नहीं है। कारण कि दुःखसे तो हमारे 
पूर्वपापोंका ही नाश होगा, हमारी शुद्धि ही होगी। परन्तु 
हमारे मनमें अगर द्रोह--वैरभाव होगा, तो वह मरनेके बाद 
भी हमारे साथ रहेगा और जन्म-जन्मान्तरतक हमें पाप 
करनेमें प्रेरित करता रहेगा, जिससे हमारा पतन-ही-पतन 
होगा। ऐसे अनर्थ करनेवाले और मित्रोंके साथ द्रोह पैदा 
करनेवाले इस युद्धरूपी पापसे बचनेका विचार क्‍यों नहीं 
करना चाहिये ? अर्थात्‌ विचार करके हमें इस पापसे जरूर 
ही बचना चाहिये। 

यहाँ अर्जुनकी दृष्टि दुर्योधन आदिके लोभकी तरफ 
तो जा रही है, पर वे खुद कौटुम्बिक स्नेह-(मोह-) में 
आबद्ध होकर बोल रहे हैं- इस तरफ उनकी दृष्टि नहीं 
जा रही है। इस कारण वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे 
हैं। यह नियम है कि मनुष्यको दृष्टि जबतक दूसरोंके 
दोषकी तरफ रहती है, तबतक उसको अपना दोष नहीं 
दीखता, उलटे एक अभिमान होता है कि इनमें तो यह दोष 
है, पर हमारेमें यह दोष नहीं है। ऐसी अवस्थामें वह यह 
सोच ही नहीं सकता कि अगर इनमें कोई दोष है तो 
हमारेमें भी कोई दूसरा दोष हो सकता है। दूसरा दोष यदि 
न भी हो, तो भी दूसरोंका दोष देखना-यह दोष तो है 
ही। दूसरोंका दोष देखना एवं अपनेमें अच्छाईका अभिमान 
करना-ये दोनों दोष साथमें ही रहते हैं। अर्जुनको भी 
दुर्योधन आदिमें दोष दीख रहे हैं और अपनेमें अच्छाईका 
अभिमान हो रहा है (अच्छाईके अभिमानकी छायामें मात्र 
दोष रहते हैं), इसलिये उनको अपनेमें मोहरूपी दोष नहीं 
दीख रहा है। 





सम्बन्ध--कुलका क्षय करनेसे होनेवाले जिन दोषॉको हम जानते है, वे दोष कौन-से हैं? उन दोषॉकी परम्परा 


आगेके पाँच श्लोकोंमें बताते हैं। 


कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः । 
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥ ४० ॥ 


कुलक्षये =कुलका क्षय होनेपर | उत = 
सनातनाः = सदासे चलते आये | धर्मे = 
कुलधर्माः =कुलधर्म नष्टे = 
प्रणश्यन्ति =नष्ट हो जाते हैं 


और कृत्स्नम्‌ =सम्पूर्ण 
धर्मका कुलम्‌ = कुलको 
नाश होनेपर (बचे | अधर्मः = अधर्म 
हुए) अभिभवति =दबा लेता है। 


श्लोक ४१] 


व्याख्या- कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः 
सनातनाः'-जब युद्ध होता है, तब उसमें कुल-(वंश-) 
का क्षय (हास) होता है। जबसे कुल आरम्भ हुआ है, 
तभीसे कुलके धर्म अर्थात्‌ कुलकी पवित्र परम्पराएँ, पवित्र 
रीतियाँ, मर्यादाएँ भी परम्परासे चलती आयी हैं। परन्तु जब 
कुलका क्षय हो जाता है, तब सदासे कुलके साथ रहनेवाले 
धर्म भी नष्ट हो जाते हैं अर्थात्‌ जन्मके समय, द्विजाति- 
संस्कारके समय, विवाहके समय, मृत्युके समय और 
मृत्युके बाद किये जानेवाले जो-जो शास्त्रीय पवित्र रीति- 
रिवाज हैं, जो कि जीवित और मृतात्मा मनुष्यांके लिये 
इस लोकमें और परलोकमें कल्याण करनेवाले हैं, वे नष्ट 
हो जाते हैं। कारण कि जब कुलका ही नाश हो जाता है, 
तब कुलके आश्रित रहनेवाले धर्म किसके आश्रित रहेंगे? 

' धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत'-जब 
कुलकी पवित्र मर्यादाएँ, पवित्र आचरण नष्ट हो जाते हैं, 
तब धर्मका पालन न करना और धर्मसे विपरीत काम 


* साधक-संजीवनी * 


५७ 


करना अर्थात्‌ करनेलायक कामको न करना और न 
करनेलायक कामको करनारूप अधर्म सम्पूर्ण कुलको दबा 
लेता है अर्थात्‌ सम्पूर्ण कुलमें अधर्म छा जाता है। 

अब यहाँ यह शंका होती है कि जब कुल नष्ट हो 
जायगा, कुल रहेगा ही नहीं, तब अधर्म किसको दबायेगा ? 
इसका उत्तर यह है कि जो लडाईके योग्य पुरुष हैं, वे 
तो युद्धमें मारे जाते हैं; किन्तु जो लड़ाईके योग्य नहीं हैं, 
ऐसे जो बालक और स्त्रियाँ पीछे बच जाती हैं, उनको 
अधर्म दबा लेता है। कारण कि जब युद्धमें शस्त्र, शास्त्र, 
व्यवहार आदिके जानकार और अनुभवी पुरुष मर जाते 
हैं, तब पीछे बचे लोगोंको अच्छी शिक्षा देनेवाले, उनपर 
शासन करनेवाले नहीं रहते। इससे मर्यादाका, व्यवहारका 
ज्ञान न होनेसे वे मनमाना आचरण करने लग जाते हैं अर्थात्‌ 
वे करनेलायक कामको तो करते नहीं और न करनेलायक 
कामको करने लग जाते हैं। इसलिये उनमें अधर्म फैल 
जाता है। 





अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः । 
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥ ४१ ॥ 


कृष्ण न्हे कृष्ण! प्रदुष्यन्ति 
अधर्माभिभवात्‌ = अधर्मके अधिक 
बढ़ जानेसे वार्ष्णेय 
कुलस्त्रियः =कुलकी स्त्रियाँ स्त्रीषु 
व्याख्या-" अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति 


कुलस्त्रियः '_ धर्मका पालन करनेसे अन्तःकरण शुद्ध हो 
जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होनेसे बुद्धि सात्त्विकी बन जाती 
है। सात्त्विकी बुद्धिमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं 
करना चाहिये-इसका विवेक जाग्रत्‌ रहता है। परन्तु जब 
कुलमें अधर्म बढ़ जाता है, तब आचरण अशुद्ध होने लगते 
हैं, जिससे अन्तःकरण अशुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण 
अशुद्ध होनेसे बुद्धि तामसी बन जाती है। बुद्धि तामसी 
होनेसे मनुष्य अकर्तव्यको कर्तव्य और कर्तव्यको अकर्तव्य 
मानने लग जाता है अर्थात्‌ उसमें शास्त्र-मर्यादासे उलटी 
बातें पैदा होने लग जाती हैं। इस विपरीत बुद्धिसे कुलकी 
स्त्रियाँ दूषित अर्थात्‌ व्यभिचारिणी हो जाती हैं। 


= दूषित हो जाती हैं | दुष्टासु = दूषित होनेपर 
(और) वर्णसङ्करः = वर्णसंकर 

= हे वार्ष्णेय ! जायते = पैदा हो 

= स्त्रियोंके जाते हैं। 


“स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः '- स्त्रियांके 
दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाता है*। पुरुष और 
स्त्री-दोनों अलग-अलग वर्णके होनेपर उनसे जो संतान 
पैदा होती है, वह 'वर्णसंकर' कहलाती है। 

अर्जुन यहाँ 'कृष्ण' सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं 
कि आप सबको खाँचनेवाले होनेसे “कृष्ण' कहलाते हैं, 
तो आप यह बताये कि हमारे कुलको आप किस तरफ 
खींचेंगे अर्थात्‌ किधर ले जायेगे ? 

“वार्ष्णेय' सम्बोधन देनेका भाव है कि आप वृष्णिवंशमें 
अवतार लेनेके कारण 'बाष्णेय' कहलाते हैं। परन्तु जब हमारे 
कुल-(वंश-) का नाश हो जायगा, तब हमारे वंशज किस 
कुलके कहलायेंगे ? अत: कुलका नाश करना उचित नहीं है। 





* परस्पर विरुद्ध धर्मोका मिश्रण होकर जो बनता है, उसको 'संकर' कहते हैं। जब कर्तव्यका पालन नहीं होता, तब 
धर्मसंकर, वर्णसंकर, जातिसंकर, कुलसंकर, वेशसंकर, भाषासंकर, आहारसंकर आदि अनेक संकरदोष आ जाते हैं। 


५८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १ 
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। 
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥ ४२॥ 
सङ्करः = वर्णसंकर जानेवाला एषाम्‌ = इन (कुलघातियाँ)-के 
कुलघ्नानाम्‌ = कुलघातियोंको एव नही (होता है)। | पितरः = पितर 
च = और लुप्तपिण्डोदकक्रियाः = श्राद्ध | हि = भी (अपने 
कुलस्य =कुलको और तर्पण न स्थानसे) 
नरकाय =नरकमें ले मिलनेसे पतन्ति = गिर जाते हैं। 


व्याख्या सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च'-- 
वर्ण-मिश्रणसे पैदा हुए वर्णसंकर-(सन्तान-) में धार्मिक 
बुद्धि नहीँ होती। वह मर्यादाओका पालन नहीं करता; क्योंकि 
वह खुद बिना मर्यादासे पैदा हुआ है। इसलिये उसके खुदके 
कुलधर्म न होनेसे बह उनका पालन नहीं करता, प्रत्युत 
कुलधर्म अर्थात्‌ कुलमर्यादासे विरुद्ध आचरण करता है। 

जिन्होंने युद्धमें अपने कुलका संहार कर दिया है, 
उनको 'कुलघाती' कहते हैं। वर्णसंकर ऐसे कुलघातियोंको 
नरकोंमें ले जाता है। केवल कुलघातियोंको ही नहीं, प्रत्युत 
कुल-परम्परा नष्ट होनेसे सम्पूर्ण कुलको भी वह नरकोंमें 
ले जाता है। 

“पतन्ति पितरो हयेषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया ': - जिन्होंने 
अपने कुलका नाश कर दिया है, ऐसे इन कुलघातियोंके 
पितरोंको वर्णसंकरके द्वारा पिण्ड और पानी (श्राद्ध और 


तर्पण) न मिलनेसे उन पितरोंका पतन हो जाता है। कारण 
कि जब पितरोंको पिण्ड-पानी मिलता रहता है, तब वे उस 
पुण्यके प्रभावसे ऊँचे लोकोंमें रहते हैं। परन्तु जब उनको 
पिण्ड-पानी मिलना बन्द हो जाता है, तब उनका वहाँसे पतन 
हो जाता है अर्थात्‌ उनकी स्थिति उन लोकोंमें नहीं रहती। 

पितरोंको पिण्ड-पानी न मिलनेमें कारण यह है कि 
वर्णसंकरकी पूर्वजोंके प्रति आदर-बुद्धि नहीं होती। इस 
कारण उनमें पितरोंके लिये श्राद्ध-तर्पण करनेकी भावना ही 
नहीं होती। अगर लोक-लिहाजमें आकर वे श्राद्ध-तर्पण 
करते भी हैं, तो भी शास्त्रविधिके अनुसार उनका श्राद्ध- 
तर्पणमें अधिकार न होनेसे वह पिण्ड-पानी पितरोंको 
मिलता ही नहीं। इस तरह जब पितरोंको आदरबुद्धिसे और 
शास्त्रविधिके अनुसार पिण्ड-जल नहीं मिलता, तब उनका 
अपने स्थानसे पतन हो जाता है। 


परिशिष्ट भाव-पितरोंमें एक 'आजान' पितर होते हैं और एक 'मर्त्य' पितर। पितरलोकमें रहनेवाले पितर 
“ आजान' हैं और मनुष्यलोकसे मरकर गये पितर 'मर्त्य' हैं। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे मर्त्य पितरोंका पतन होता है। 
पतन उन्हीं मर्त्य पितरोंका होता है, जो कुटुम्बसे, सन्तानसे सम्बन्ध रखते हैं और उनसे श्राद्ध-तर्पणकी आशा रखते हैं। 





दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः । 
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ ४३ ॥ 


एतैः =इन दोषैः = दोषोंसे कुलधर्माः =कुलधर्म 
वर्णसङ्करकारकैः =वर्णसंकर कुलघ्नानाम्‌ = कुलघातियोंके च = और 
पैदा शाश्वताः =सदासे चलते जातिधर्माः = जातिधर्म 
करनेवाले आये उत्साद्यन्ते =नष्ट हो जाते हैं। 


व्याख्या- दोषैरेतैः कुलध्नानाम्‌.....कुलधर्माश्च 
शाश्वताः “--युद्धमें कुलका क्षय होनेसे कुलके साथ चलते 
आये कुलधर्मोका भी नाश हो जाता है। कुलधर्मोके नाशसे 
कुलमें अधर्मकी वृद्धि हो जाती है। अधर्मकी वृद्धिसे स्त्रियाँ 
दूषित हो जाती हैं। स्त्रियोंके दूषित होनेसे वर्णसंकर पैदा 


हो जाते हैं। इस तरह इन वर्णसंकर पैदा करनेवाले दोषाँसे 
कुलका नाश करनेवालोंके जातिधर्म (वर्णधर्म) नष्ट हो 
जाते हैं। 

कुलधर्म और जातिधर्म क्या हैं? एक ही जातिमें एक 
कुलकी जो अपनी अलग-अलग परम्पराएँ हैं, अलग- 


श्लोक ४४-४५ ] * साधक-संजीवनी * ५९ 


अलग मर्यादाएँ हैं, अलग-अलग आचरण हैं, वे सभी उस | “जातिधर्म' अर्थात्‌ वर्णधर्म' कहलाते हैं, जो कि सामान्य धर्म 
कुलके 'कुलधर्म' कहलाते हैं। एक ही जातिके सम्पूर्ण | हैं और शास्त्रविधिसे नियत हैं। इन कुलधर्माका और 
कुलोंके समुदायको लेकर जो धर्म कहे जाते हैं, वे सभी | जातिधर्मोका आचरण न होनेसे ये धर्म नष्ट हो जाते हैं। 





उत्सन्नकुलधर्माणाँ मनुष्याणां जनार्दन। 
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ४४॥ 


जनार्दन =हे जनार्दन! मनुष्याणाम्‌ = (उन) वासः = वास 

उत्सन्नकुलधर्माणाम्‌ = जिनके मनुष्योंका भवति > होता है, 
कुलधर्म नष्ट | अनियतम्‌ =बहुत कालतक | इति =एऐसा (हम) 
हो जाते हैं, | नरके = नरकोंमें अनुशुश्रुम "सुनते आये हैं। 


व्याख्या-- उत्सन्नकुलधर्माणाम्‌....अनुशुश्रुम *' | लोकमें उनकी निन्दा, अपमान, तिरस्कार होता है और 
भगवानूने मनुष्यको विवेक दिया है, नया कर्म करनेका | परलोकमें दुर्गति, नरकोंकी प्राप्ति होती है। अपने 
अधिकार दिया है। अतः यह कर्म करनेमें अथवा न | पापोंके कारण उनको बहुत समयतक नरकोंका कष्ट 
करनेमें, अच्छा करनेमें अथवा मन्दा करनेमें स्वतन्त्र है। | भोगना पड़ता है। ऐसा हम परम्परासे बड़े-बूढ़े गुरुजनोंसे 
इसलिये इसको सदा विवेक-विचारपूर्वक कर्तव्य-कर्म | सुनते आये हैं। 
करने चाहिये। परन्तु मनुष्य सुखभोग आदिके लोभमें “मनुष्याणाम्‌'पदमें कुलघाती और उनके कुलके 
आकर अपने विवेकका निरादर कर देते हैं और राग-द्वेषके | सभी मनुष्यांका समावेश किया गया है अर्थात्‌ कुलघातियोंके 
वशीभूत हो जाते हैं, जिससे उनके आचरण शास्त्र और | पहले जो हो चुके हैं-उन (पितरों)-का, अपना और 
कुलमर्यादाके विरुद्ध होने लगते हैं। परिणामस्वरूप इस | आगे होनेवाले-(वंश-) का समावेश किया गया है। 





सम्बन्ध-युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराके वर्णका खुद अर्जुनपर क्या असर पड़ा 2 इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं। 
अहो बत महत्पापं कर्तु व्यवसिता वयम्‌। 
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ ४५ ॥ 


अहो =यह बड़े आश्चर्य | महत्पापम्‌ "बड़ा भारी पाप | राज्यसुखलोभेन = राज्य और 
(और) कर्तुम्‌ = करनेका सुखके लोभसे 

बत = खेदको बात व्यवसिताः =निश्चय कर स्वजनम्‌ =अपने स्वजनोंको 
है कि बैठे हैं, हन्तुम्‌ = मारनेके लिये 

वयम्‌ = हमलोग यत्‌ =जो कि उद्यताः =तैयार हो गये हैं। 


व्याख्या- अहो बत....स्वजनमुद्यताः '-ये दुर्योधन आदि | हमलोगोंने बड़ा भारी पाप करनेका निश्चय-विचार कर 
दुष्ट हैं। इनकी धर्मपर दृष्टि नहीं है। इनपर लोभ सवार | लिया है। इतना ही नहीं, युद्धमें अपने स्वजनोंको मारनेके 
हो गया है। इसलिये ये युद्धके लिये तैयार हो जायँ तो | लिये अस्त्र-शस्त्र लेकर तैयार हो गये हैं! यह हमलोगोंके 
कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। परन्तु हमलोग तो धर्म- | लिये बड़े भारी आश्चर्यकी और खेद-(दुःख-)की बात 
अधर्मको, कर्तव्य-अकर्तव्यको, पुण्य-पापको जाननेवाले | है अर्थात्‌ सर्वथा अनुचित बात है। 
हैं। ऐसे जानकार होते हुए भी अनजान मनुष्योंकी तरह हमारी जो जानकारी है, हमने जो शास्त्रोंसे सुना है, 


* शोकाविष्ट होनेके कारण ही अर्जुनने यहाँ ' अनुशुश्रुम' परोक्ष लिट्की क्रियाका प्रयोग किया है। 


६० 


गुरुजनोंसे शिक्षा पायी है, अपने जीवनको सुधारनेका 
विचार किया है, उन सबका अनादर करके आज हमने 
युद्धरूपी पाप करनेके लिये विचार कर लिया है--यह 
बड़ा भारी पाप है--'महत्पापम्‌ !। 

इस श्लोकमें 'अहो' और 'बत'-ये दो पद आये हैं। 
इनमेंसे 'अहो ' पद आश्चर्यका वाचक है। आश्चर्य यही है कि 
युद्धसे होनेवाली अनर्थ-परम्पराको जानते हुए भी हमलोगोंने 
युद्धरूपी बड़ा भारी पाप करनेका पक्का निश्चय कर लिया 
है! दूसरा 'बत' पद खेदका, दुःखका वाचक है। दुःख यही 
है कि थोड़े दिन रहनेवाले राज्य और सुखके लोभमें आकर 
हम अपने कुटुम्बियाँको मारनेके लिये तैयार हो गये हैं! 

पाप करनेका निश्चय करनेमें और स्वजनोंको मारनेके 
लिये तैयार होनेमें केवल राज्यका और सुखका लोभ ही कारण 
है। तात्पर्य है कि अगर युद्धमें हमारी विजय हो जायगी तो हमें 
राज्य, वैभव मिल जायगा, हमारा आदर-सत्कार होगा, हमारी 
महत्ता बढ़ जायगी, पूरे राज्यपर हमारा प्रभाव रहेगा, सब जगह 
हमारा हुक्म चलेगा, हमारे पास धन होनेसे हम मनचाही भोग- 
सामग्री जुटा लेंगे, फिर खूब आराम करेंगे, सुख भोगेंगे-- 
इस तरह हमारेपर राज्य और सुखका लोभ छा गया है, जो 
हमारे-जैसे मनुष्योंके लिये सर्वथा अनुचित है। 

इस श्लोकमें अर्जुन यह कहना चाहते हैं कि अपने 
सद्विचारोंका, अपनी जानकारीका आदर करनेसे ही शास्त्र, 
गुरुजन आदिकी आज्ञा मानी जा सकती है। परन्तु जो मनुष्य 
अपने सद्विचारोंका निरादर करता है, वह शास्त्रोंकी, 
गुरुजनोंकी और सिद्धान्तोंकी अच्छी-अच्छी बातोंको सुनकर 
भी उन्हें धारण नहीं कर सकता। अपने सद्विचारोंका बार- 
बार निरादर, तिरस्कार करनेसे सद्विचारोंको सृष्टि बंद हो 
जाती है। फिर मनुष्यको दुर्गुण-दुराचारसे रोकनेवाला है ही 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


कौन ? ऐसे ही हम भी अपनी जानकारीका आदर नहीं 
करेंगे, तो फिर हमें अनर्थ-परम्परासे कौन रोक सकता है ? 
अर्थात्‌ कोई नहीं रोक सकता। 

यहाँ अर्जुनकी दृष्टि युद्धरूपी क्रियाकी तरफ है। वे 
युद्धरूपी क्रियाको दोषी मानकर उससे हटना चाहते हैं; 
परन्तु वास्तवमें दोष क्या है--इस तरफ अर्जुनकी दृष्टि 
नहीं है। युद्धमें कौटुम्बिक मोह, स्वार्थभाव, कामना ही दोष 
है, पर इधर दृष्टि न जानेके कारण अर्जुन यहाँ आश्चर्य और 
खेद प्रकट कर रहे हैं, जो कि वास्तवमें किसी भी 
विचारशील, धर्मात्मा, शूरवीर क्षत्रियके लिये उचित नहीं है। 

[ अर्जुनने पहले अड़तीसवें श्लोकमें दुर्योधनादिके युद्धमें 
प्रवृत्त होनेमें, कुलक्षयके दोषमें और मित्रद्रोहके पापमें 
लोभको कारण बताया; और यहाँ भी अपनेको राज्य और 
सुखके लोभके कारण महान्‌ पाप करनेको उद्यत बता रहे हैं। 
इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन पापके होनेमें 'लोभ' को हेतु 
मानते हैं। फिर भी आगे तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें 
अर्जुनने “मनुष्य न चाहता हुआ भी पापका आचरण क्‍यों कर 
बैठता है '--ऐसा प्रश्‍न क्यों किया ? इसका समाधान है कि 
यहाँ तो कौटुम्बिक मोहके कारण अर्जुन युद्धसे निवृत्त 
होनेको धर्म और युद्धमें प्रवृत्त होनेको अधर्म मान रहे हैं 
अर्थात्‌ उनकी शरीर आदिको लेकर केवल लौकिक दृष्टि 
है, इसलिये वे युद्धमें स्वजनॉको मारनेमें लोभको हेतु मान रहे 
हैं। परन्तु आगे गीताका उपदेश सुनते-सुनते उनमें अपने 
श्रेय-कल्याणको इच्छा जाग्रत्‌ हो गयी (गीता-तीसरे 
अध्यायका दूसरा श्लोक) । इसलिये वे कर्तव्यको छोड़कर न 
करनेयोग्य काममें प्रवृत्त होनेमें कौन कारण है--ऐसा पूछते 
हैं अर्थात्‌ वहाँ (तीसरे अध्यायके छत्तीसवें श्लोकमें) अर्जुन 
कर्तव्यकी दृष्टिसे, साधककी दृष्टिसे पूछते हैं।] 





सम्बन्ध--आश्चर्य और खेदमें निमग्न हुए आर्जुन आगेके शलोकमें अपनी दलीलोंका अन्तिम निर्णय बताते हैं। 
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । 
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥ ४६ ॥ 


यदि = अगर (ये) रणे = युद्धभूमिमें हन्युः =मार भी दें (तो) 
शस्त्रपाणयः = हाथोंमें शस्त्र- अप्रतीकारम्‌ = सामना न तत्‌ च्वह 

अस्त्र लिये हुए करनेवाले मे मेरे लिये 
धार्तराष्ट्राः = धृतराष्ट्रके अशस्त्रम्‌ = (तथा) क्षेमतरम्‌ =बड़ा ही 

पक्षपाती शस्त्ररहित हितकारक 

लोग माम्‌ = मुझे भवेत्‌ = होगा। 


श्लोक ४६ ] 


व्याख्या- यदि माम्‌" क्षेमतरं भवेत्‌'- अर्जुन कहते 
हैं कि अगर मैं युद्धसे सर्वथा निवृत्त हो जाऊँगा, तो शायद 
ये दुर्योधन आदि भी युद्धसे निवृत्त हो जायँगे। कारण कि 
हम कुछ चाहेंगे ही नहीं, लड़ेंगे भी नहीं, तो फिर ये लोग 
युद्ध करेंगे ही क्यों ? परन्तु कदाचित्‌ जोशमें भरे हुए तथा 
हाथोंमें शस्त्र धारण किये हुए ये धृतराष्ट्रके पक्षपाती लोग 
'सदाके लिये हमारे रास्तेका काँटा निकल जाय, वैरी 
समाप्त हो जाय'--ऐसा विचार करके सामना न करनेवाले 
तथा शस्त्ररहित मेरेको मार भी दें, तो उनका वह मारना मेरे 
लिये हितकारक ही होगा। कारण कि मैंने युद्धमें गुरुजनोंको 
मारकर बड़ा भारी पाप करनेका जो निश्चय किया था, 
उस निश्चयरूप पापका प्रायश्चित्त हो जायगा, उस पापसे 
मैं शुद्ध हो जाऊँगा। तात्पर्य है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, 
तो मैं भी पापसे बचूँगा और मेरे कुलका भी नाश नहीं होगा। 
[जो मनुष्य अपने लिये जिस किसी विषयका वर्णन 
करता है, उस विषयका उसके स्वयंपर असर पड़ता है। 
अर्जुनने भी जब शोकाविष्ट होकर अट्टाईसवें श्लोकसे 
बोलना आरम्भ किया, तब वे उतने शोकाविष्ट नहीं थे, 
जितने वे अब शोकाविष्ट हैं। पहले अर्जुन युद्धसे उपरत 
नहीं हुए, पर शोकाविष्ट होकर बोलते-बोलते अन्तमें वे 
युद्धसे उपरत हो जाते हैं और बाणसहित धनुषका त्याग 
करके बैठ जाते हैं। भगवानूने यह सोचा कि अर्जुनके 
बोलनेका वेग निकल जाय तो मैं बोलूँ अर्थात्‌ बोलनेसे 
अर्जुनका शोक बाहर आ जाय, भीतरमें कोई शोक बाकी 
न रहे, तभी मेरे वचनांका उसपर असर होगा। अतः 
भगवान्‌ बीचमें कुछ नहीं बोले।] 
विशेष बात 
अबतक अर्जुनने अपनेको धर्मात्मा मानकर युद्धसे 
निवृत्त होनेमें जितनी दलीलें, युक्तियाँ दी हैं, संसारमें रचे- 
पचे लोग अर्जुनकी उन दलीलोंको ही ठीक समझेंगे और 
आगे भगवान्‌ अर्जुनको जो बातें समझायेंगे, उनको ठीक 
नहीं समझेंगे! इसका कारण यह है कि जो मनुष्य जिस 
स्थितिमें हैं, उस स्थितिकी, उस श्रेणीकी बातको ही वे 
ठीक समझते हैं; उससे ऊँची श्रेणीकी बात वे समझ ही 
नहीं सकते। अर्जुनके भीतर कौटुम्बिक मोह है और उस 
मोहसे आविष्ट होकर ही वे धर्मकी, साधुताकी बड़ी 
अच्छी-अच्छी बातें कह रहे हैं। अतः जिन लोगोंके भीतर 
कौटुम्बिक मोह है, उन लोगोंको ही अर्जुनकी बातें ठीक 
लगेंगी। परन्तु भगवान्को दृष्टि जीवके कल्याणको तरफ 


* साधक-संजीवनी * 


६१ 


है कि उसका कल्याण कैसे हो? भगवानूकी इस ऊँची 
श्रेणीकी दृष्टिको वे (लौकिक दृष्टिवाले) लोग समझ ही 
नहीं सकते। अतः वे भगवानूकी बातोंको ठीक नहीं मानेंगे, 
प्रत्युत ऐसा मानेंगे कि अर्जुनके लिये युद्धरूपी पापसे 
बचना बहुत ठीक था, पर भगवानूने उनको युद्धमें लगाकर 
ठीक नहीं किया! 

वास्तवमें भगवानूने अर्जुनसे युद्ध नहीं कराया है, प्रत्युत 
उनको अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है। युद्ध तो अर्जुनको 
कर्तव्यरूपसे स्वतः प्राप्त हुआ था। अतः युद्धका विचार 
तो अर्जुनका खुदका ही था; वे स्वयं ही युद्धमें प्रवृत्त हुए 
थे, तभी वे भगवानको निमन्त्रण देकर लाये थे। परन्तु उस 
विचारको अपनी बुद्धिसे अनिष्टकारक समझकर वे युद्धसे 
विमुख हो रहे थे अर्थात्‌ अपने कर्तव्यके पालनसे हट रहे 
थे। इसपर भगवानूने कहा कि यह जो तू युद्ध नहीं करना 
चाहता, यह तेरा मोह है। अत: समयपर जो कर्तव्य स्वतः 
प्राप्त हुआ है, उसका त्याग करना उचित नहीं है। 

कोई बद्रीनारायण जा रहा था; परन्तु रास्तेमें उसे 
दिशाश्रम हो गया अर्थात्‌ उसने दक्षिणको उत्तर और 
उत्तरको दक्षिण समझ लिया। अतः वह बद्रीनारायणकी 
तरफ न चलकर उलटा चलने लग गया। सामनेसे उसको 
एक आदमी मिल गया। उस आदमीने पूछा कि ' भाई! 
कहाँ जा रहे हो ?' वह बोला--' बद्रीनारायण'। वह आदमी 
बोला कि ' भाई! बद्रीनारायण इधर नहीं है, उधर है। आप 
तो उलटे जा रहे हैं!” अत: वह आदमी उसको बद्रीनारायण 
भेजनेवाला नहीं है; किन्तु उसको दिशाका ज्ञान कराकर 
ठीक रास्ता बतानेवाला है। ऐसे ही भगवानूने अर्जुनको 
अपने कर्तव्यका ज्ञान कराया है, युद्ध नहीं कराया है। 

स्वजनोंको देखनेसे अर्जुनके मनमें यह बात आयी थी 
कि मैं युद्ध नहीं करूँगा-*न योत्स्ये’ (२। ९), पर 
भगवान्‌का उपदेश सुननेपर अर्जुनने ऐसा नहीं कहा कि मैं 
युद्ध नहीं करूँगा; किन्तु ऐसा कहा कि मैं आपकी आज्ञाका 
पालन करूँगा;-' करिष्ये वचनं तव' (१८।७३) अर्थात्‌ 
अपने कर्तव्यका पालन करूँगा। अर्जुनके इन वचनोंसे यही 
सिद्ध होता है कि भगवानूने अर्जुनको अपने कर्तव्यका ज्ञान 
कराया है। 

वास्तवमे युद्ध होना अवश्यम्भावी था; क्योंकि सबको 
आयु समाप्त हो चुको थी। इसको कोई भी टाल नहीं सकता 
था। स्वयं भगवानूने विश्वरूपदर्शनके समय अर्जुनसे कहा है 
कि “मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये 


६२ 


यहाँ आया हूँ। अतः तेरे युद्ध किये बिना भी ये विपक्षमें 
खड़े योद्धालोग बचेंगे नहीं' (ग्यारहवें अध्यायका बत्तीसवाँ 
श्लोक) । इसलिये यह नरसंहार अवश्यम्भावी होनहार ही 
था। यह नरसंहार अर्जुन युद्ध न करते, तो भी होता। अगर 
अर्जुन युद्ध नहीं करते, तो जिन्होंने माँकी आज्ञासे द्रौपदीके 
साथ अपने सहित पाँचों भाइयोंका विवाह करना स्वीकार 
कर लिया था, वे युधिष्ठिर तो माँकी युद्ध करनेकी आज्ञासे 
युद्ध अवश्य करते ही। भीमसेन भी युद्धसे कभी पीछे नहीं 
हटते; क्योंकि उन्होंने कौरवोंको मारनेकी प्रतिज्ञा कर रखी 
थी । द्रौपदीने तो यहाँतक कह दिया था कि अगर मेरे पति 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय ९ 


भाई (धृष्टद्युम्न) और मेरे पाँचों पुत्र तथा अभिमन्यु 
कौरवोंसे युद्ध करेंगे*। इस तरह ऐसे कई कारण थे, 
जिससे युद्धको टालना सम्भव नहीं था। 

होनहारको रोकना मनुष्यके हाथकी बात नहीं है; परन्तु 
अपने कर्तव्यका पालन करके मनुष्य अपना उद्धार कर 
सकता है और कर्तव्यच्युत होकर अपना पतन कर सकता 
है। तात्पर्य है कि मनुष्य अपना इष्ट-अनिष्ट करनेमें स्वतन्त्र 
है। इसलिये भगवानूने अर्जुनको कर्तव्यका ज्ञान कराकर 
मनुष्यमात्रको उपदेश दिया है कि उसे शास्त्रकी आज्ञाके 
अनुसार अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहना चाहिये, 


(पाण्डव) कौरवोंसे युद्ध नहीं करेंगे तो, मेरे पिता (द्रुपद), | उससे कभी च्युत नहीं होना चाहिये। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोके अर्जुनने आपनी दलीलोंका निर्णय सुना दिया। उसके बाद आर्जुनने क्या किया- इसको 


संजय आगेके श्लोकमें बताते हैं। 


सञ्जय उवाच 
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌। 
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ ४७॥ 


संजय बोले 
एवम्‌ =एऐसा अर्जुनः = अर्जुन सङ्ख्ये = युद्धभूमिमें 
उक्त्वा = कहकर सशरम्‌ = बाणसहित रथोपस्थे =रथके 
शोकसंविग्नमानसः = शोकाकुल | चापम्‌ = धनुषका मध्यभागमें 
मनवाले विसृज्य = त्याग करके उपाविशत्‌ =बैठ गये। 


व्याख्या- एवमुक्त्वार्जुनः ”' शोकसंविग्नमानसः '-- 
युद्ध करना सम्पूर्ण अनर्थोंका मूल है, युद्ध करनेसे यहाँ 
कुटुम्बियांका नाश होगा, परलोकमें नरकोंकी प्राप्ति होगी 
आदि बातोंको युक्ति और प्रमाणसे कहकर शोकसे अत्यन्त 
व्याकुल मनवाले अर्जुने युद्ध न करनेका पक्का निर्णय कर 
लिया। जिस रणभूमिमें वे हाथमें धनुष लेकर उत्साहके 
साथ आये थे, उसी रणभूमिमें उन्होंने अपने बायें हाथसे 
गाण्डीव धनुषको और दायें हाथसे बाणको नीचे रख दिया 
और स्वयं रथके मध्यभागमें अर्थात्‌ दोनों सेनाओंको देखनेके 
लिये जहाँपर खड़े थे, वहींपर शोकमुद्रामें बैठ गये। 

अर्जुनकी ऐसी शोकाकुल अवस्था होनेमें मुख्य कारण 
है-- भगवानका भीष्म और द्रोणके सामने रथ खड़ा करके 


अर्जुनसे कुरुवंशियाँको देखनेके लिये कहना और उनको 
देखकर अर्जुनके भीतर छिपे हुए मोहका जाग्रत्‌ होना। 
मोहके जाग्रत्‌ होनेपर अर्जुन कहते हैं कि युद्धमें हमारे 
कुटुम्बी मारे जायेगे । कुटुम्बियोंका मरना ही बड़े नुकसानकी 
बात है। दुर्योधन आदि तो लोभके कारण इस नुकसानकी 
तरफ नहीं देख रहे हैं। परन्तु युद्धसे कितनी अनर्थ परम्परा 
चल पड़ेगी-इस तरफ ध्यान देकर हमलोगोंको ऐसे पापसे 
निवृत्त हो ही जाना चाहिये। हमलोग राज्य और सुखके 
लोभसे कुलका संहार करनेके लिये रणभूमिमें खड़े हो गये 
हैं-यह हमने बड़ी भारी गलती की! अतः युद्ध न करते 
हुए शस्त्ररहित मेरेको यदि सामने खड़े हुए योद्धालोग मार 
भी दें, तो उससे मेरा हित ही होगा। इस तरह अन्त:करणमें 


* यदि भीमार्जुनौ कृष्ण कृपणौ सन्धिकामुकौ। पिता मे योत्स्यते वृद्धः सह पुत्रैर्महारथैः ॥ 
पञ्च चैव महावीर्याः पुत्रा मे मधुसूदन। अभिमन्युं पुरस्कृत्य योत्स्यन्ते कुरुभिः सह॥ 
(महाभारत, उद्योग० ८२। ३७-३८ ) 


श्लोक ४७] 


* साधक-संजीवनी * 


६३ 


मोह छा जानेके कारण अर्जुन युद्धसे उपरत होनेमें एवं | बैठ जाते हैं। यह मोहकी ही महिमा है कि जो अर्जुन धनुष 
अपने मर जानेमें भी हित देखते हैं और अन्तमें उसी मोहके | उठाकर युद्धके लिये तैयार हो रहे थे, वही अर्जुन धनुषको 
कारण बाणसहित धनुषका त्याग करके विषादमग्न होकर | नीचे रखकर शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे हैं! 





3% तत्सदिति श्रीमद्धगवद्गीतासूपनिषत्यु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ 


इस प्रकार ३%, तत्‌, सत्‌-इन भगवन्नामोके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप 
श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ' अर्जुनविषादयोग' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ॥ १॥ 


प्रत्येक अध्यायको समाप्तिपर महर्षि वेदव्यासजीने जो 
उपर्युक्त पुष्पिका लिखी है, इसमें श्रीमद्धगवद्गीताका 
विशेष माहात्म्य और प्रभाव ही प्रकट किया गया है। 

* ॐ, तत्‌, सत्‌*'--ये तीनों सच्चिदानन्दघन परमात्माके 
पवित्र नाम हैं। ये मात्र जीवोंका कल्याण करनेवाले हैं। 
इनका उच्चारण परमात्माके सम्मुख करता है और 
शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्मोके अंग-वैगुण्यको मिटाता है। 
अतः गीताके अध्यायका पाठ करनेमें श्लोक, पद 
और अक्षरोंके उच्चारणमें जो-जो भूलें हुई हैं, उनका 
परिमार्जन करनेके लिये और संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदपूर्वक 
भगवत्‌-सम्बन्धको याद आनेके लिये प्रत्येक अध्यायके 
अन्तमें * ॐ तत्सत्‌'का उच्चारण किया गया है। 

महर्षि वेदव्यासजीके द्वारा अध्यायके अन्तमें * ३» ' के 
उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचनाका अंग-वैगुण्य मिट 
जाय, “तत्‌'के उच्चारणका तात्पर्य है कि मेरी रचना 
भगवत्प्रीत्यर्थं हो जाय और 'सत्‌ 'के उच्चारणका तात्पर्य 
है कि मेरी रचना सत्‌ अर्थात्‌ अविनाशी फल देनेवाली हो 
जाय। 'इति'--बस, मेरा यही प्रयोजन है। इसके सिवाय 
मेरा व्यक्तिगत और कोई प्रयोजन नहीं है। 

जो ' श्रीमत्‌' अर्थात्‌ सर्वशोभासम्पन्न हैं और जिनमें 
सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य--ये छः 
'भग' नित्य विद्यमान रहते हैं, उन भगवान्‌के मुखसे निकली 
हुई होनेके कारण इसको ' श्रीमत्‌ भगवत्‌' कहा गया है। 

जब मनुष्य मस्तीमें, आनन्दमें होता है, तब उसके 
मुखसे स्वतः गीत निकलता है। भगवानूने इसको मस्तीमें 
आकर गाया है, इसलिये इसका नाम 'गीता' है। यद्यपि 
संस्कृत व्याकरणके नियमानुसार इसका नाम 'गीतम्‌' होना 
चाहिये था, तथापि उपनिषद्‌-स्वरूप होनेसे स्त्रीलिंग शब्द 
'गीता'का प्रयोग किया गया है। 


इसमें सम्पूर्ण उपनिषदोंका सारतत्त्व संगृहीत है और 
यह स्वयं भी भगवद्वाणी होनेसे उपनिषद्‌-स्वरूप है, 
इसलिये इसे 'उपनिषद्‌' कहा गया है। 

वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदिका आग्रह न रखकर 
प्राणिमात्रका कल्याण करनेवाली सर्वश्रेष्ठ विद्या होनेके 
कारण इसका नाम 'ब्रह्मविद्या' है। इस ब्रह्मविद्यास्वरूप 
गीतामें कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि 
योगसाधनांकी शिक्षा दी गयी है, जिससे साधकको 
परमात्माके साथ अपने नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाय। 
इसलिये इसे 'योगशास्त्र' कहा गया है। 

यह साक्षात्‌ पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्ण और भक्तप्रवर 
अर्जुनका संवाद है। अर्जुनने निःसंकोच-भावसे बातें पूछी 
हैं और भगवानूने उदारतापूर्वक उनका उत्तर दिया है। 
इन दोनोंके ही भाव इसमें हैं। अतः इन दोनोंके नामसे 
इस गीताशास्त्रको विशेष महिमा होनेके कारण इसे 
' श्रीकृष्णार्जुनसंवाद' नामसे कहा गया है। 

इस पहले अध्यायमें अर्जुनके विषादका वर्णन है। यह 
विषाद भी भगवान्‌ अथवा सन्तोंका संग मिल जानेपर 
संसारसे वैराग्य उत्पन्न करके कल्याण करनेवाला हो जाता 
है। यद्यपि दुर्योधनादिको भी विषाद हुआ है, तथापि उनमें 
भगवान्‌से विमुखता होनेके कारण उनका विषाद “योग' 
नहीं हुआ। केवल अर्जुनका विषाद ही भगवान्‌की सम्मुखता 
होनेके कारण 'योग' अर्थात्‌ भगवान्‌के नित्य-सम्बन्धका 
अनुभव करानेवाला हो गया। इसलिये इस अध्यायका नाम 
' अर्जुनविषादयोग' रखा गया है। 

प्रत्येक अध्यायके अन्तमें पुष्पिका देनेका तात्पर्य 
है कि अगर साधक एक अध्यायका भी ठीक तरहसे मनन- 
विचार करे, तो उस एक ही अध्यायसे उसका कल्याण 
हो जायगा। 


* द्रष्टव्य गीता-सत्रहवे अध्यायके तेईसवेंसे सत्ताईसवें श्लोकतक । 


६४ » श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १ 


परिशिष्ट भाव--गीताकी पुष्पिकामें ' ब्रह्मविद्यायाम्‌', 'योगशास्त्रे' और ' श्रीकृष्णार्जुनसंवादे '--ये तीन पद 
तो एकवचनमें आये हैं, पर ' श्रीमद्भगवद्गीतासु' और ' उपनिषत्सु '--ये दो पद बहुवचनमें आये हैं। इसका तात्पर्य 
है कि भगवद्वाणी सम्पूर्ण उपनिषदोंमें श्रीमद्भगवद्गीता भी एक उपनिषद्‌ है, जिसमें “ब्रह्मविद्या' (ज्ञानयोग), 
“योगशास्त्र' (कर्मयोग) और ' श्रीकृष्णार्जुनसंवाद' (भक्तियोग)-तीनों आये हैं। 

गीतामें ' श्रीकृष्णार्जुनसंवाद ' का आरम्भ और अन्त भक्तिमें ही हुआ है। आरम्भमें अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर 
भगवानूके शरण होते हैं। 'शिष्यस्ते5हं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌' (२। ७) और अन्तमें भगवान्‌के द्वारा 'मामेक॑ शरणं 
व्रज' पदोंसे पूर्ण शरणागतिकी प्रेरणा करनेपर अर्जुन पूर्णतया शरणागत हो जाते हैं।--'करिष्ये वचनं तव' (१८। 
७३) । अर्जुनने अपने श्रेय-(कल्याण-) का उपाय पूछा था (२। ७, ३। २, ५। १), इसलिये भगवानूने गीतामें 


“ज्ञानयोग' और “कर्मयोग' का भी वर्णन किया है। 





पहले अध्यायके पद, अक्षर और उवाच 

(१) इस अध्यायमें ' अथ प्रथमोऽध्यायः 'के तीन, 
' धृतराष्ट्र उवाच' “सञ्जय उवाच' आदि पदोंके बारह, 
श्लोकोंके पाँच सौ अट्टावन और पुष्पिकाके तेरह पद हैं। 
इस प्रकार सम्पूर्ण पदोंका योग पाँच सौ छियासी है। 

(२) इस अध्यायमें 'अथ प्रथमोऽध्यायः ' के सात, 
' धृतराष्ट्र उवाच' “सञ्जय उवाच' आदि पदोंके सैंतीस, 
श्लोकोंके एक हजार पाँच सौ चार और पुष्मिकाके 
अड्तालीस अक्षर हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण अक्षरोंका योग 
एक हजार पाँच सौ छियानबे है। इस अध्यायके सभी 
श्लोक बत्तीस अक्षरोंके हैं। 


(३) इस अध्यायमें छः 'उवाच' हैं-एक 
' धृतराष्ट्र उवाच', तीन 'सञ्जय उवाच’ और दो 
' अर्जुन उवाच'। 
पहले अध्यायमें प्रयुक्त छन्द 
इस अध्यायके सैंतालीस श्लोकोंमेंसे-पाँचवें और 
तैंतीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा तैंतालीसवें श्लोकके 
तृतीय चरणमें “रगण' प्रयुक्त होनेसे 'र-विपुला'; और 
पचीसवें श्लोकके प्रथम चरणमें तथा नवें श्लोकके तृतीय 
चरणमें 'नगण' प्रयुक्त होनेसे 'न-विपुला' संज्ञावाले छन्द 
हैं। शेष बयालीस श्लोक ठीक 'पथ्यावक्त्र' अनुष्टुप्‌ 
छन्दके लक्षणाँसे युक्त हैं। 





॥ ३% श्रीपरमात्मने नमः॥ 


अशथ द्वितीयो ऽध्यायः 


अवतरणिका -- 


दुर्योधनने द्रोणाचार्यसे दोनों सेनाओंकी बात कही, पर द्रोणाचार्य कुछ भी बोले नहीं। इससे दुर्योधन दु:खी 
हो गया। तब दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये भीष्मजीने जोरसे शंख बजाया । भीष्मजीका शंख बजनेके बाद 
कौरव और पाण्डव-सेनाके बाजे बजे। इसके बाद (बीसवें श्लोकसे) श्रीकृष्णार्जुनसंवाद आरम्भ हुआ। 

अजुनने भगवान्‌से अपने रथको दोनों सेनाओके बीचमें खड़ा करनेके लिये कहा। भगवानूने दोनों सेनाओके 
बीचमें भीष्म, द्रोण आदिके सामने रथको खड़ा करके आर्जुनसे कुरुवंशियोंको देखनेके लिये कहा। दोनों सेनाओंमें 


अपने ही स्वजनो-सम्बन्धियोको देखकर आर्जुनमें कौटुम्बिक मोह जाग्रत्‌ हुआ, जिसके परिणाममें आर्जुन युद्ध 
करना छोड़कर बाणसहित धनुषका त्याग करके रथके मध्यभागमें बैठ गये। 

इसके बाद विषादमग्न अर्जुनके प्रति भगवानूने क्या कहा-यह बात धृतराष्ट्रको सुनानेके लिये संजय दूसरे 
अध्यायका विषय आरम्भ करते हैं। 





सञ्जय उवाच 
तं तथा कृपयाविष्टमभ्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌। 
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥ १॥ 


संजय बोले 
तथा = वैसी अश्रुपूर्णा- मधुसूदनः = भगवान्‌ 
कृपया = कायरतासे कुलेक्षणम्‌ = आँसुओंके कारण मधुसूदन 
आविष्टम्‌ =व्याप्त हुए जिनके नेत्रोंकी इदम्‌ =यह (आगे कहे 
तम्‌ =उन अर्जुनके प्रति, देखनेकी शक्ति जानेवाले) 
विषीदन्तम्‌ =जो कि विषाद अवरुद्ध हो रही | वाक्यम्‌ = वचन 
कर रहे हैं (और) है, उवाच = बोले । 


व्याख्या-तं तथा कृपयाविष्टम्‌’ अर्जुन रथमें 
सारथिरूपसे बैठे हुए भगवानको यह आज्ञा देते हैं कि 
हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा 
कीजिये, जिससे मैं यह देख लूँ कि इस युद्धमें मेरे साथ 
दो हाथ करनेवाले कौन हैं? अर्थात्‌ मेरे-जैसे शूरवीरके 
साथ कौन-कौन-से योद्धा साहस करके लड़ने आये हैं ? 
अपनी मौत सामने दीखते हुए भी मेरे साथ लड़नेकी उनकी 
हिम्मत कैसे हुई ? इस प्रकार जिस आर्जुनमें युद्धके लिये 
इतना उत्साह था, वीरता थी, वे ही अर्जुन दोनों सेनाओंमें 
अपने कुटुम्बियांको देखकर उनके मरनेकी आशंकासे 
मोहग्रस्त होकर इतने शोकाकुल हो गये हैं कि उनका शरीर 
शिथिल हो रहा है, मुख सूख रहा है, शरीरमें कँपकँपी 
आ रही है, रोंगटे खड़े हो रहे हैं, हाथसे धनुष गिर रहा 





है, त्वचा जल रही है, खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रही 
है और मन भी भ्रमित हो रहा है। कहाँ तो अर्जुनका यह 
स्वभाव कि “न दैन्यं न पलायनम्‌? और कहाँ अर्जुनका 
कायरताके दोषसे शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ 
जाना! बड़े आश्चर्यके साथ संजय यही भाव उपर्युक्त 
पदाँसे प्रकट कर रहे हैं। 

पहले अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें भी संजयने 
अर्जुनके लिये “कृपया परयाविष्टः' पदाँका प्रयोग 
किया है। 

' अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌'_ अर्जुन- जैसे महान्‌ शूरवीरके 
भीतर भी कौटुम्बिक मोह छा गया और नेत्रोंमें आँसू भर 
आये! आँसू भी इतने ज्यादा भर आये कि नेत्रोंसे पूरी तरह 
देख भी नहीं सकते। 


६६ 


“विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः '--इस प्रकार 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय २ 


भगवद्वाणी सीधा आघात पहुँचानेवाली है। अर्जुनका युद्धसे 


कायरताके कारण विषाद करते हुए अर्जुनसे भगवान्‌ 
मधुसूदने ये (आगे दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें कहे जाने- 
वाले) वचन कहे। 

यहाँ विषीदन्तमुवाच' कहनेसे ही काम चल सकता था, 
'इदं वाक्यम्‌' कहनेकी जरूरत ही नहीं थी; क्योंकि 'उवाच' 
क्रियाके अन्तर्गत ही “वाक्यम्‌' पद आ जाता है। फिर भी 
“वाक्यम्‌' पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवानका यह वचन, 
यह वाणी बड़ी विलक्षण है। अर्जुनमें धर्मका बाना पहनकर 
जो कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आ गयी थी, उसपर यह 





उपराम होनेका जो निर्णय था, उसमें खलबली मचा देनेवाली 
है। अर्जुनको अपने दोषका ज्ञान कराकर अपने कल्याणकी 
जिज्ञासा जाग्रत्‌ करा देनेवाली है। इस गम्भीर अर्थवाली 
वाणीके प्रभावसे ही अर्जुन भगवानका शिष्यत्व ग्रहण करके 
उनके शरण हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक) । 

संजयके द्वारा ' मधुसूदनः ' पद कहनेका तात्पर्य है कि 
भगवान्‌ श्रीकृष्ण “मधु नामक' दैत्यको मारनेवाले अर्थात्‌ 
दुष्ट स्वभाववालोंका संहार करनेवाले हैं। इसलिये वे दुष्ट 
स्वभाववाले दुर्योधनादिका नाश करवाये बिना रहेंगे नहीं । 





सम्बन्ध भगवान्‌ने आर्जुनके प्रति कौन-से वचन कहे-इसे आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं। 
श्रीभगवानुवाच 


कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌। 


अनार्यजुष्टमस्वरर्यमकोर्तिकरमर्जुन ॥२॥ 
श्रीभगवान्‌ बोले -- 
अर्जुन =हे अर्जुन! कुतः = कहाँसे अस्वर्ग्यम्‌ = (जो) स्वर्गको 
विषमे =इस विषम अवसरपर | समुपस्थितम्‌ = प्राप्त हुई, देनेवाली नहीं है 
त्वा = तुम्हें (जिसका कि) (और) 
इदम्‌ =यह अनार्यजुष्टम्‌ = श्रेष्ठ पुरुष सेवन | अकीर्तिकरम्‌ =कोर्ति करनेवाली 
कश्मलम्‌ =कायरता नहीं करते, भी नहीं है। 


व्याख्या-- अर्जुन '--यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि 
तुम स्वच्छ, निर्मल अन्तःकरणवाले हो। अतः तुम्हारे 
स्वभावमें कालुष्य-कायरताका आना बिलकुल विरुद्ध 
बात है। फिर यह तुम्हारेमें कैसे आ गयी? 

' कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌ भगवान्‌ 
आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुनसे कहते हैं कि ऐसे युद्धके 
मौकेपर तो तुम्हारेमें शूरवीरता, उत्साह आना चाहिये था, 
पर इस बेमौकेपर तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी! 

आश्चर्य दो तरहसे होता है-अपने न जाननेके कारण 
और दूसरेको चेतानेके लिये। भगवानका यहाँ जो आश्‍्चर्य- 
पूर्वक बोलना है, वह केवल अर्जुनको चेतानेके लिये ही 





है, जिससे अर्जुनका ध्यान अपने कर्तव्यपर चला जाय। 

“कुतः' कहनेका तात्पर्य यह है कि मूलमें यह 
कायरतारूपी दोष तुम्हारेमें (स्वयंमें) नहीं है। यह तो 
आगन्तुक दोष है, जो सदा रहनेवाला नहीं है। 

“समुपस्थितम्‌' कहनेका तात्पर्य है कि यह कायरता 
केवल तुम्हारे भावोंमें और वचनोंमें ही नहीं आयी है; किन्तु 
तुम्हारी क्रियाओंमें भी आ गयी है। यह तुम्हारेपर अच्छी 
तरहसे छा गयी है, जिसके कारण तुम धनुष-बाण छोड़कर 
रथके मध्यभागमें बैठ गये हो। 

' अनार्यजुष्टम्‌ समझदार श्रेष्ठ मनुष्योंमें जो भाव 
पैदा होते हैं, वे अपने कल्याणके उद्देश्यको लेकर ही होते 


९-यहाँ ' भगवान्‌' पदमें ' भग' शब्दमें जो 'मतुप्‌' प्रत्यय किया गया है, वह नित्ययोगमें किया गया है; क्योंकि समग्र 


ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-ये छहों ' भग' भगवानमें नित्य रहते हैं। 

२- अनार्यजुष्टम्‌' पदमें जो 'नञ्‌' समास है, वह ' आयेर्जुष्टमार्यजुष्टम्‌'इस तृतीया समासके बाद ही करना चाहिये; 
जैसे-- न आर्यजुष्टम्‌ अनार्यजुष्टम्‌।' अगर 'नञ्‌' समास तृतीया समासके पहले किया जाय कि “न आर्या अनार्याः 
अनारयैर्जुष्टमनार्यजुष्टम्‌' तो यहाँ यह कहना बनता ही नहीं; क्योंकि अनार्य पुरुषोंके द्वारा जिसका सेवन किया जाता है, वह 
दूसरोंके लिये आदर्श नहीं होता। 


श्लोक ३] 


हैं। इसलिये श्लोकके उत्तरार्धमें भगवान्‌ सबसे पहले 
उपर्युक्त पद देकर कहते हैं कि तुम्हारेमें जो कायरता आयी 
है, उस कायरताको श्रेष्ठ पुरुष स्वीकार नहीं करते। कारण 
कि तुम्हारी इस कायरतामें अपने कल्याणको बात बिलकुल 
नहीं है। कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य प्रवृत्ति और 
निवृत्ति दोनोंमे अपने कल्याणका ही उद्देश्य रखते हैं। 
उनमें अपने कर्तव्यके प्रति कायरता उत्पन्न नहीं होती। 
परिस्थितिके अनुसार उनको जो कर्तव्य प्राप्त हो जाता है, 
उसको वे कल्याणप्राप्तिके उद्देश्यसे उत्साह और तत्परतापूर्वक 
सांगोपांग करते हैं। वे तुम्हारे-जैसे कायर होकर युद्धसे या 
अन्य किसी कर्तव्य-कर्मसे उपरत नहीं होते। अतः युद्ध- 
रूपसे प्राप्त कर्तव्य-कर्मसे उपरत होना तुम्हारे लिये 
कल्याणकारक नहीं है। 

' अस्वर्ग्यम्‌'कल्याणकी बात सामने न रखकर 
अगर सांसारिक दृष्टिसे भी देखा जाय, तो संसारमें 
स्वर्गलोक ऊँचा है। परन्तु तुम्हारी यह कायरता स्वर्गको 
देनेबाली भी नहीं है अर्थात्‌ कायरतापूर्वक युद्धसे निवृत्त 
होनेका फल स्वर्गकी प्राप्ति भी नहीं हो सकता। 

' अकीर्तिकरम्‌'अगर स्वर्गप्राप्तिका भी लक्ष्य न 
हो, तो अच्छा माना जानेवाला पुरुष वही काम करता है, 
जिससे संसारमें कीर्ति हो। परन्तु तुम्हारी यह जो कायरता 


* साधक-संजीवनी * 





६७ 


है, यह इस लोकमें भी कीर्ति (यश) देनेवाली नहीं है, 
प्रत्युत अपकीर्ति (अपयश) देनेवाली है। अतः तुम्हारेमें 
कायरताका आना सर्वथा ही अनुचित है। 

भगवानूने यहाँ ' अनार्यजुष्टम्‌' ' अस्वर्ग्यम्‌ और 
“अकीर्तिकरम्‌'--ऐसा क्रम देकर तीन प्रकारके मनुष्य 
बताये हैं-- (१) जो विचारशील मनुष्य होते हैं, वे केवल 
अपना कल्याण ही चाहते हैं। उनका ध्येय, उद्देश्य केवल 
कल्याणका ही होता है। (२) जो पुण्यात्मा मनुष्य होते हैं, 
वे शुभ-कर्मोके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं। वे स्वर्गको 
ही श्रेष्ठ मानकर उसकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रखते हैं। 
(३) जो साधारण मनुष्य होते हैं, वे संसारको ही आदर 
देते हैं। इसलिये वे संसारमें अपनी कीर्ति चाहते हैं और 
उस कीर्तिको ही अपना ध्येय मानते हैं। 

उपर्युक्त तीनों पद देकर भगवान्‌ अर्जुनको सावधान 
करते हैं कि तुम्हारा जो यह युद्ध न करनेका निश्चय है, 
यह विचारशील और पुण्यात्मा मनुष्योंके ध्येय--कल्याण 
और स्वर्गको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है, तथा साधारण 
मनुष्योंके ध्येय-कीर्तिको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है। 
अतः मोहके कारण तुम्हारा युद्ध न करनेका निश्चय बहुत 
ही तुच्छ है, जो कि तुम्हारा पतन करनेवाला, तुम्हें नरकोंमें 
ले जानेवाला और तुम्हारी अपकीर्ति करनेवाला होगा। 





सम्बन्ध--कायरता आनेके बाद अब क्या करें? इस जिज्ञासाको दूर करनेके लिये भगवान्‌ कहते हैं-- 
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वस्युपपद्यते | 


क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥ ३ ॥ 
पार्थ =हे पृथानन्दन त्वयि = तुम्हारेमें हृदयदौर्बल्यम्‌ = हृदयकी इस 
अर्जुन! एतत्‌ = यह तुच्छ दुर्बलताका 
क्लैब्यम्‌ =इस नपुंसकताको | न, उपपद्यते =उचित नहीं है। | त्यक्त्वा =त्याग करके 
मा, स्म, =मत प्राप्त हो; परन्तप =हे परन्तप! (युद्धके लिये) 
गमः = (क्योंकि) क्षुद्रम्‌, उत्तिष्ठ =खड़े हो जाओ। 


व्याख्या~ पार्थ ' *--माता पृथा-(कुन्ती-) के सन्देशकी | याद दिलाकर 


अर्जुनके अन्तःकरणमें क्षत्रियोचित 


* पृथा-( कुन्ती- ) के पुत्र होनेसे अर्जुनका एक नाम 'पार्थ' भी है। 'पार्थ' सम्बोधन भगवानूकी अर्जुनके साथ प्रियता 


और घनिष्ठताका द्योतक है। गीतामें भगवानूने अड़तीस बार 'पार्थ' सम्बोधनका प्रयोग किया है। अर्जुनके अन्य सभी 
सम्बोधनोंकी अपेक्षा ' पार्थ' सम्बोधनका प्रयोग अधिक हुआ है। इसके बाद सबसे अधिक प्रयोग ' कौन्तेय ' सम्बोधनका हुआ 
है, जिसकी आवृत्ति कुल चौबीस बार हुई है। 

भगवानको अर्जुनसे जब कोई विशेष बात कहनी होती है या कोई आश्वासन देना होता है या उनके प्रति भगवानका 
विशेषरूपसे प्रेम उमड़ता है, तब भगवान्‌ उन्हें 'पार्थ' कहकर पुकारते हैं। इस सम्बोधनके प्रयोगसे मानो वे स्मरण कराते हैं 
कि तुम मेरी बुआ ( पृथा-कुन्ती )-के लड़के तो हो ही, साथ-ही-साथ मेरे प्यारे भक्त और सखा भी हो (गीता ४। ३ )। 
अतः मैं तुम्हें विशेष गोपनीय बातें बताता हूँ और जो कुछ भी कहता हूँ, सत्य तथा केवल तुम्हारे हितके लिये कहता हूँ। 


६८ 


वीरताका भाव जाग्रत्‌ करनेके लिये भगवान्‌ अर्जुनको “पार्थ' 
नामसे सम्बोधित करते हैं*। तात्पर्य है कि अपनेमै कायरता 
लाकर तुम्हें माताकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। 

“क्लैब्यं मा स्म गमः '--अर्जुन कायरताके कारण 
युद्ध करनेमें अधर्म और युद्ध न करनेमें धर्म मान रहे थे। 
अतः अर्जुनको चेतानेके लिये भगवान्‌ कहते हैं कि युद्ध 
न करना धर्मकी बात नहीं है, यह तो नपुंसकता 
(हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकताको छोड़ दो। 

“नैतत्त्वय्युपपद्यते '--तुम्हारेमँ यह हिजड़ापन नहीं 
आना चाहिये था; क्योंकि तुम कुन्ती-जैसी वीर क्षत्राणी 
माताके पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। तात्पर्य है कि 
जन्मसे और अपनी प्रकृतिसे भी यह नपुंसकता तुम्हारेमें 
सर्वथा अनुचित है। 

“परन्तप'--तुम स्वयं “परन्तप' हो अर्थात्‌ शत्रुओंको 
तपानेवाले, भगानेवाले हो, तो क्या तुम इस समय युद्धसे 
विमुख होकर अपने शत्रुओंको हर्षित करोगे ? 

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ'-यहाँ ' क्षुद्रम्‌' पदके 
दो अर्थ होते हैं-(१) यह हृदयको दुर्बलता तुच्छताको 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


प्राप्त करानेवाली है अर्थात्‌ मुक्ति, स्वर्ग अथवा कीर्तिको 
देनेवाली नहीं है। अगर तुम इस तुच्छताका त्याग नहीं 
करोगे तो स्वयं तुच्छ हो जाओगे; और (२) यह हृदयकी 
दुर्बलता तुच्छ चीज है। तुम्हारे-जैसे शूरवीरके लिये ऐसी 
तुच्छ चीजका त्याग करना कोई कठिन काम नहीं है। 

तुम जो ऐसा मानते हो कि मैं धर्मात्मा हूँ और 
युद्धरूपी पाप नहीं करना चाहता, तो यह तुम्हारे हृदयको 
दुर्बलता है, कमजोरी है। इसका त्याग करके तुम 
युद्धके लिये खड़े हो जाओ अर्थात्‌ अपने प्राप्त कर्तव्यका 
पालन करो। 

यहाँ अर्जुनके सामने युद्धरूप कर्तव्य-कर्म है। इसलिये 
भगवान्‌ कहते हैं कि “उठो, खड़े हो जाओ और युद्धरूप 
कर्तव्यका पालन करो '। भगवानूके मनमें अर्जुनके कर्तव्यके 
विषयमे जरा-सा भी सन्देह नहीं है। वे जानते हैं कि सभी 
दृष्टियोंसे अर्जुनके लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अतः 
अर्जुनको थोथी युक्तियोंको परवाह न करके उनको अपने 
कर्तव्यका पालन करनेके लिये चट आज्ञा देते हैं कि पूरी 
तैयारीके साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ। 


परिशिष्ट भाव--इस बातका विस्तार भगवान्‌ने आगे इकतीसवेंसे अड्तीसवें श्लोकतक किया है। 





सम्बन्ध पहले अध्याये अजुनने युद्ध न करनेके विषये बहुत-सी युक्तियाँ (दलीलें) दी थीं। उन युक्तियोंका कुछ 
भी आदर न करके भगवानूने एकाएक अर्जुनको कायरतारूप दोषके लिये जोरसे फटकारा और युद्धके लिये खड़े हो जानेकी 
आज्ञा दे दी। इस बातको लेकर आर्जुन भी अपनी युक्तियोका समाधान न पाकर एकाएक उत्तेजित होकर बोल उठे-- 


अर्जुन उवाच 
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। 
इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥ ४॥ 


अर्जुन बोले- 
मधुसूदन =हे मधुसूदन! द्रोणम्‌ = द्रोणके (क्योंकि) 
अहम्‌ र प्रति = साथ अरिसूदन हे अरिसूदन! 
सङ्ख्ये =रणभूमिमें इषुभिः = बाणोंसे (ये) 
भीष्मम्‌ = भीष्म कथम्‌ = कैसे पूजाहों =दोनों ही पूजाके 
च = और योत्स्यामि =युद्ध करूँ? योग्य हैं। 


व्याख्या मधुसूदन' और ' अरिसूदन'-ये दो सम्बोधन | मारनेवाले हैं अर्थात्‌ जो दुष्ट स्वभाववाले, अधर्ममय 
देनेका तात्पर्य है कि आप दैत्यांको और शत्रुओंको | आचरण करनेवाले और दुनियाको कष्ट देनेवाले मधु-कैटभ 


* कुन्तीका सन्देश था-- 


एतद्‌ धनञ्जयो वाच्यो नित्योद्युक्तो वृकोदरः ॥ यदर्थ क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः । ( महा०, उद्यो १३७। ९-१० ) 
“तुम अर्जुनसे तथा युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले भीमसे यह कहना कि जिस कार्यके लिये क्षत्रियमाता पुत्र उत्पन्न 


करती है, अब उसका समय आ गया है।' 


श्लोक ५] 


आदि दैत्य हैं, उनको भी आपने मारा है और जो बिना 
कारण द्वेष रखते हैं, अनिष्ट करते हैं, ऐसे शत्रुओंको भी 
आपने मारा है। परन्तु मेरे सामने तो पितामह भीष्म और 
आचार्य द्रोण खड़े हैं, जो आचरणांमें सर्वथा श्रेष्ठ हैं, मेरेपर 
अत्यधिक स्नेह रखनेवाले हैं और प्यारपूर्वक मेरेको शिक्षा 
देनेवाले हैं। ऐसे मेरे परम हितैषी दादाजी और विद्यागुरुको 
मैं कैसे मारूँ ? 

“कथं * भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च'-मैं कायरताके 
कारण युद्धसे विमुख नहीं हो रहा हूँ, प्रत्युत धर्मको देखकर 
युद्धसे विमुख हो रहा हूँ; परन्तु आप कह रहे हैं कि यह 
कायरता, यह नपुंसकता तुम्हारेमें कहाँसे आ गयी! आप 
जरा सोचें कि मैं पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके साथ 
बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ? महाराज! यह मेरी कायरता नहीं 
है। कायरता तो तब कही जाय, जब मैं मरनेसे डरूँ। मैं 
मरनेसे नहीं डर रहा हूँ, प्रत्युत मारनेसे डर रहा हूँ। 

संसारमें दो ही तरहके सम्बन्ध मुख्य हैं-जन्म- 
सम्बन्ध और विद्या-सम्बन्ध। जन्मके सम्बन्धसे तो पितामह 
भीष्म हमारे पूजनीय हैं। बचपनसे ही मैं उनकी गोदमें पला 
हुँ। बचपनमें जब मैं उनको *पिताजी-पिताजी' कहता, तब 
वे प्यारसे कहते कि “मैं तो तेरे पिताका भी पिता हूँ!' इस 


* साधक-संजीवनी * 





६९ 


तरह वे मेरेपर बड़ा ही प्यार, स्नेह रखते आये हैं। विद्याके 
सम्बन्धसे आचार्य द्रोण हमारे पूजनीय हैं। वे मेरे विद्यागुरु 
हैं। उनका मेरेपर इतना स्नेह है कि उन्होंने खास अपने 
पुत्र अश्वत्थामाको भी मेरे समान नहीं पढ़ाया। उन्होंने 
ब्रह्मास्त्रको चलाना तो दोनोंको सिखाया, पर ब्रह्मास्त्रका 
उपसंहार करना मेरेको ही सिखाया, अपने पुत्रको नहीं । 
उन्होंने मेरेको यह वरदान भी दिया है कि “मेरे शिष्यॉंमें 
अस्त्र-शस्त्र-कलामें तुम्हारेसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं 
होगा।' ऐसे पूजनीय पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके 
सामने तो वाणीसे 'रे', 'तू'--ऐसा कहना भी उनको हत्या 
करनेके समान पाप है, फिर मारनेकी इच्छासे उनके साथ 
बाणोंसे युद्ध करना कितने भारी पापकी बात है! 
“इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजाहौं'सम्बन्धमें बड़े 
होनेके नाते पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण-ये दोनों ही 
आदरणीय और पूजनीय हैं। इनका मेरेपर पूरा अधिकार 
है। अतः ये तो मेरेपर प्रहार कर सकते हैं, पर मैं उनपर 
बाणाँसे कैसे प्रहार करूँ ? उनका प्रतिद्वन्द्वी होकर युद्ध 
करना तो मेरे लिये बड़े पापकी बात है! क्योंकि ये दोनों 
ही मेरे द्वारा सेवा करनेयोग्य हैं और सेवासे भी बढ़कर पूजा 
करनेयोग्य हैं। ऐसे पूज्यजनोंको मैं बाणाँसे कैसे मारूँ ? 





सम्बन्ध पूर्वश्लोकमें अजुनने उत्तेजित होकर भगवानूसे अपना निर्णय कह दिया। अब भगवद्वाणीका असर होनेपर 
अर्जुन अपने और भगवान्‌के निर्णयका सन्तुलन करके कहते हैं-- 


गुरूनहत्वा हि महानुभावान्‌ श्रेयो भोक्तु भैक्ष्यमपीह लोके। 
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥ ५ ॥ 


महानुभावान्‌ = महानुभाव अपि =भी (तथा) 

गुरून्‌ = गुरुजनोंको श्रेयः = श्रेष्ठ (समझता हूँ); | अर्थकामान्‌ = धनकी कामनाकी 
अहत्वा =न मारकर हि = क्योंकि मुख्यतावाले 

इह =इस गुरून्‌ = गुरुजनोंको भोगान्‌ = भोगोंको 

लोके = लोकमें (मैं) हत्वा = मारकर एव नही 

भेक्ष्यम्‌ = भिक्षाका अन्न इह = यहाँ तु =तो 

भोक्तुम्‌ = खाना रुधिरप्रदिग्धान्‌ = रक्तसे सने हुए | भुञ्जीय = भोगुँगा ! 


व्याख्या-[इस श्लोकसे ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे- | है--ऐसा जानते हुए भी भगवान्‌ मुझे बिना किसी सन्देहके 
तीसरे श्लोकोंमें भगवान्‌के कहे हुए वचन अब अर्जुनके | युद्धके लिये आज्ञा दे रहे हैं, तो कहीं-न-कहीं मेरी समझमें 
भीतर असर कर रहे हैं। इससे अर्जुनके मनमें यह विचार आ | ही गलती है! इसलिये अर्जुन अब पूर्वश्लोककी तरह उत्तेजित 
रहा है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनोंको मारना धर्मयुक्त नहीं | होकर नहीं बोलते, प्रत्युत कुछ ढिलाईसे बोलते हैं ।] 


* दूसरे श्लोकमें भगवानूने ' कुतः ' पदसे कहा था कि तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी ? उस “कुतः ' पदके बदलेमें 


ही अर्जुन यहाँ 'कथम्‌' पदसे अपनी बात कहते हैं। 


90 


“गुरूनहत्वा.....भैक्ष्यमपीह लोके '--अब अर्जुन पहले 
अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म, 
द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा, तो दुर्योधन 
भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न 
होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा, जिससे मेरेको दुःख पाना 
पड़ेगा। मेरा जीवन-निर्वाह भी कठिनतासे होगा। यहाँतक 
कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है, उसको भी 
जीवन-निर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु 
गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षा- 
वृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ। 

'इह लोके' कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा 
माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमान-तिरस्कार होगा, 
लोग मेरी निन्दा करेंगे, तथापि गुरुजनांको मारनेको अपेक्षा 
भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है। 

“अपि' कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनांको 
मारना भी निषिद्ध है और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है; 
परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध 
दीखता है। 

'हत्वार्थकामांस्तु .......... रुधिरप्रदिग्धान्‌’ अब अर्जुन 
भगवान्‌के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि 
अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो युद्धमें 
गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और 
जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है, ऐसे भोगोंको ही 
तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके 
मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी! शान्ति थोड़े ही मिलेगी! 

यहाँ यह प्रश्‍न हो सकता है कि भीष्म, द्रोण आदि गुरुजन 
धनके द्वारा ही कौरवोंसे बँधे थे; अतः यहाँ ' अर्थकामान्‌' 
पदको 'गुरून्‌' पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या 
आपत्ति है ? इसका उत्तर यह है कि ' अर्थकी कामनावाले 
गुरुजन'-एऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि 
पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले 
नहीं थे। वे तो दुर्योधनके वृत्तिभोगी थे, उन्होंने दुर्योधनका 
अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्योधनका साथ छोड़ना 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे। 

दूसरी बात, अर्जुने भीष्म, द्रोण आदिके लिये 
“महानुभावान्‌' पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ 
भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है! 
तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं, वे अर्थकी कामनावाले नहीं 
हो सकते और जो अर्थकी कामनावाले हैं, वे महानुभाव 
नहीं हो सकते। अतः यहाँ ' अर्थकामान्‌' पद ' भोगान्‌' 
पदका ही विशेषण हो सकता है। 

विशेष बात 

भगवानूने दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणको 
दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा 
होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात्‌ 
वे समझे कि भगवान्‌ राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही 
युद्धकी आज्ञा देते हैं*। पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका 
एक ही पक्ष था, जिससे वे धनुष-बाण छोड़कर और 
शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (पहले 
अध्यायका सैंतालीसवाँ श्लोक) । परंतु युद्ध करनेका पक्ष 
तो भगवान्‌के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका 
भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं, पर दुर्योधन 
आदि धर्मको नहीं जानते, इसलिये वे धन, राज्य आदिके 
लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात 
अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी 
आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ, तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे 
सने हुए धन, राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा! इस तरह 
अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराई-ही-बुराई दिखायी दे रही है। 

जो बुराई बुराईके रूपमें आती है, उसको मिटाना बड़ा 
सुगम होता है। परंतु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है, 
उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है; जैसे-सीताजीके सामने 
रावण और हनुमानूजीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो 
उनको सीताजी और हनुमानूजी पहचान नहीं सके; क्योंकि 
उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप 
कर्तव्य-कर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है 
अर्थात्‌ अर्जुनके मनमें धर्म-(हिंसा-त्याग-) रूप भलाईके 


* केवल भौतिक दृष्टि रखनेवाले मनुष्य कल्याणकी बात सोच ही नहीं सकते। जबतक भौतिक पदार्थोंकी तरफ ही 
दृष्टि रहती है, तबतक आध्यात्मिक दृष्टि जाग्रत्‌ नहीं होती। यहाँ अर्जुनकी दूष्टिमें शरीर आदि भौतिक पदार्थोंकी मुख्यता 
हो रही है। वे कौटुम्बिक मोह-ममतामें फँसकर धर्मको भी भौतिक दृष्टिसे ही देख रहे हैं। भौतिक ( प्राकृत ) दूष्टिसे अत्यन्त 
विलक्षण आध्यात्मिक दूष्टिकी तरफ अभी अर्जुनका खयाल नहीं है अर्थात्‌ उनकी दृष्टि भौतिक राज्यसे ऊपर नहीं जा रही 
है और वे कौटुम्बिक मोह-ममताके प्रवाहमें बह रहे हैं। इसलिये वे ऐसा समझ रहे हैं कि युद्धमें प्रवृत्त कराकर भगवान्‌ मुझे 
राज्य दिलाना चाहते हैं, जबकि वास्तवमें भगवान्‌ उनका कल्याण करना चाहते हैं। 


श्लोक ६] 


वेशमें कर्तव्य-त्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्य- 
त्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है; क्योंकि उनके 
भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अत: इस बुराईको मिटानेमें 
भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है। 

आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्ण-आश्रमको 
मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है, तो यह बुराई 
एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख 
रही है। अतः वर्ण-आश्रमको मर्यादा मिटनेसे परिणाममें 
लोगोंका कितना पतन होगा, लोगोंमें कितना आसुरभाव 


* साधक-संजीवनी * 





७१ 


आयेगा-इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके 
बहाने लोग झूठ, कपट, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात 
आदि-आदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ 
अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म, द्रोण 
आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं ? क्योंकि हम 
धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुनने जिसको 
अच्छाई माना है, वह वास्तवमें बुराई ही है; परन्तु 
उसमें मान्यता अच्छाईको होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख 
रही है। 


परिशिष्ट भाव--' महानुभावान्‌ '- भीष्म, द्रोण आदि गुरुजनांका अनुभाव, भीतरका भाव श्रेष्ठ है, शुद्ध है; 


क्योंकि युद्ध करते हुए भी उनमें पक्षपात नहीं है। 





सम्बन्ध भगवान्‌के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे आर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हुँ जिससे अर्जुनको 
अपने युद्ध न करनेके निर्णये आधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं-- 


न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । 
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्रः ॥ ६ ॥ 


एतद्‌ = (हम) यह गरीयः = अत्यन्त श्रेष्ठ है | न, जिजीविषामः = जीना भी 
च नभी यत्‌, वा =अथवा (हम उन्हें) नहीं चाहते, 
न -नहीं जयेम = जीतेंगे ते =्वे 
विदाः = जानते (कि) यदि, वा च्या (वे) एव नही 
नः =हमलोगोंके लिये |नः = हमें धार्तराष्ट्राः = धृतराष्ट्रके 
(युद्ध करना और | जयेयुः = जीतेंगे । सम्बन्धी 
न करना-इन) |यान्‌ =जिनको प्रमुखे = (हमारे) सामने 
कतरत्‌ = दोनोंमेंसे कौन-सा | हत्वा = मारकर (हम) अवस्थिताः = खड़े हैं। 


व्याख्या- न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः मैं युद्ध करूँ 
अथवा न करूँ--इन दोनों बातोंका निर्णय मैं नहीँ कर पा 
रहा हूँ। कारण कि आपकी दृष्टिमें तो युद्ध करना ही श्रेष्ठ 
है, पर मेरी दृष्टिमें गुरुजनोंको मारना पाप होनेके कारण 
युद्ध न करना ही श्रेष्ठ है। इन दोनों पक्षोंको सामने रखनेपर 
मेरे लिये कौन-सा पक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ है--यह मैं नहीं जान 
पा रहा हूँ। इस प्रकार उपर्युक्त पदोंमें अर्जुनके भीतर 
भगवानका पक्ष और अपना पक्ष दोनों समकक्ष हो गये हैं। 
“यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः '- अगर आपको 
आज्ञाके अनुसार युद्ध भी किया जाय, तो हम उनको जीतेंगे 
अथवा वे (दुर्योधनादि) हमारेको जीतेंगे-इसका भी हमें 
पता नहीं है। 
यहाँ अर्जुनको अपने बलपर अविश्वास नहीं है, प्रत्युत 





भविष्यपर अविश्वास है; क्योंकि भविष्यमें क्या होनहार 
है-इसका किसीको क्या पता? 

“यानेव हत्वा न जिजीविषामः '--हम तो कुटुम्बियोंको 
मारकर जीनेको भी इच्छा नहीं रखते; भोग भोगनेकी, राज्य 
प्राप्त करके हुक्म चलानेकी बात तो बहुत दूर रही! कारण 
कि अगर हमारे कुटुम्बी मारे जायेगे, तो हम जीकर क्या 
करेंगे? अपने हाथाँसे कुटुम्बको नष्ट करके बैठे-बैठे 
चिन्ता-शोक ही तो करेंगे! चिन्ता-शोक करने और 
वियोगका दुःख भोगनेके लिये हम जीना नहीं चाहते। 

'तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः हम जिनको मारकर 
जीना भी नहीं चाहते, वे ही धूतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे 
सामने खड़े हैं। धृतराष्ट्रके सभी सम्बन्धी हमारे कुटुम्बी ही 
तो हैं। उन कुटुम्बियोंको मारकर हमारे जीनेको धिक्कार है! 





* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय २ 


सम्बन्ध-- अपने कर्तव्यका निर्णय करनेमें अपनेको असमर्थ पाकर अब अर्जुन व्याकुलातापूर्वक भगवानूसे प्रार्थना करते हैं। 
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पूच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। 
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥ ७॥ 


कार्पण्य- पृच्छामि =पूछता हूँ (कि) | ब्रूहि = कहिये । 
दोषोपहतस्वभावः: =कायरतारूप यत्‌ =जो अहम्‌ =्मैं 
दोषसे तिरस्कृत |निश्‍्चितम्‌ =निश्चित ते = आपका 
स्वभाववाला (और) | श्रेयः = कल्याण शिष्यः = शिष्य हूँ । 
धर्मसम्मूढचेताः =धर्मके विषयमें करनेवाली त्वाम्‌ = आपके 
मोहित अन्तः- स्यात्‌ = हो, प्रपन्नम्‌ = शरण हुए 
करणवाला (मैं) [तत्‌ =वह (बात) माम्‌ = मुझे 
त्वाम्‌ = आपसे मे =मेरे लिये शाधि = शिक्षा दीजिये। 


व्याख्या-— कार्पण्यदोघोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां 
धर्मसम्मूढचेताः "यद्यपि अर्जुन अपने मनमें युद्धसे 
सर्वथा निवृत्त होनेको सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते थे, तथापि पापसे 
बचनेके लिये उनको युद्धसे उपराम होनेके सिवाय दूसरा 
कोई उपाय भी नहीं दीखता था। इसलिये वे युद्धसे उपराम 
होना चाहते थे और उपराम होनेको गुण ही मानते थे, 
कायरतारूप दोष नहीं। परन्तु भगवानूने अर्जुनको इस 
उपरतिको कायरता और हृदयकी तुच्छ दुर्बलता कहा, तो 
भगवान्‌के उन निःसंदिग्ध वचनोंसे अर्जुनको ऐसा विचार 
हुआ कि युद्धसे निवृत्त होना मेरे लिये उचित नहीं है। यह 
तो एक तरहको कायरता ही है, जो मेरे स्वभावके 
बिलकुल विरुद्ध है; क्योंकि मेरे क्षात्र-स्वभावमें दीनता 
और पलायन (पीठ दिखाना)-ये दोनों ही नहीं हैं।' इस 
तरह भगवानके द्वारा कथित कायरतारूप दोषको अपनेमें 
स्वीकार करते हुए अर्जुन भगवानूसे कहते हैं कि एक तो 
कायरतारूप दोषके कारण मेरा क्षात्र-स्वभाव एक तरहसे 
दब गया है और दूसरी बात, मैं अपनी बुद्धिसे धर्मके 
विषयमें कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी बुद्धिमें ऐसी 
मूढ़ता छा गयी है कि धर्मके विषयमें मेरी बुद्धि कुछ भी 
काम नहीं कर रही है! 
तीसरे श्लोकमें तो भगवानूने अर्जुनको स्पष्टरूपसे 
आज्ञा दे दी थी कि हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको, कायरताको 
छोड़कर युद्धके लिये खड़े हो जाओ'। इससे अर्जुनको 
धर्म-(कर्तव्य-) के विषयमें कोई सन्देह नहीं रहना चाहिये 
था। फिर भी सन्देह रहनेका कारण यह है कि एक तरफ 


९-यहाँ “चेतस्‌' शब्द बुद्धिका वाचक है। 
२-अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे न दैन्यं न पलायनम्‌। 





तो युद्धमें कुटुम्बका नाश करना, पूज्यजनोंको मारना अधर्म 
(पाप) दीखता है और दूसरी तरफ युद्ध करना क्षत्रियका 
धर्म दीखता है। इस प्रकार कुटुम्बियोंको देखते हुए युद्ध 
नहीं करना चाहिये और क्षात्रधर्मको दृष्टिसे युद्ध करना 
चाहिये-इन दो बातोंको लेकर अर्जुन धर्म-संकटमें पड़ 
गये। उनको बुद्धि धर्मका निर्णय करनेमें कुण्ठित हो गयी। 
ऐसा होनेपर ' अभी इस समय मेरे लिये खास कर्तव्य क्या 
है? मेरा धर्म क्या है?” इसका निर्णय करानेके लिये वे 
भगवानूसे पूछते हैं। 

“यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे'--इसी अध्यायके 
दूसरे श्लोकमें भगवानूने कहा था कि तू जो कायरताके 
कारण युद्धसे निवृत्त हो रहा है, तेरा यह आचरण 
' अनार्यजुष्ट' है अर्थात्‌ श्रेष्ठ पुरुष ऐसा आचरण नहीं 
करते, वे तो जिसमें अपना कल्याण हो, वही आचरण 
करते हैं। यह बात सुनकर अर्जुनके मनमें आया कि मुझे 
भी वही करना चाहिये, जो श्रेष्ठ पुरुष किया करते हैं। 
इस प्रकार अर्जुनके मनमें कल्याणको इच्छा जाग्रत्‌ हो गयी 
और उसीको लेकर वे भगवान्‌से अपने कल्याणकी बात 
पूछते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो जाय, ऐसी 
बात मेरेसे कहिये। 

अर्जुनके हृदयम हलचल (विषाद) होनेसे और अब 
यहाँ अपने कल्याणकी बात पूछनेसे यह सिद्ध होता है कि 
मनुष्य जिस स्थितिमें स्थित है, उसी स्थितिमें वह संतोष 
करता रहता है तो उसके भीतर अपने असली उद्देश्यकी 
जागृति नहीं होती। वास्तविक उद्देश्य-कल्याणको 


श्लोक ८] 


जागृति तभी होती है, जब मनुष्य अपनी वर्तमान स्थितिसे 
असन्तुष्ट हो जाय, उस स्थितिमें रह न सके। 

'शिष्यस्तेडहम्‌'--अपने कल्याणकी बात पूछनेपर 
अर्जुनके मनमें यह भाव पैदा हुआ कि कल्याणकी बात 
तो गुरुसे पूछी जाती है, सारथिसे नहीं पूछी जाती। इस 
बातको लेकर अर्जुनके मनमें जो रथीपनका भाव था, 
जिसके कारण वे भगवानूको यह आज्ञा दे रहे थे कि 
'हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा 
कीजिये', वह भाव मिट जाता है और अपने कल्याणकी 
बात पूछनेके लिये अर्जुन भगवानके शिष्य हो जाते हैं और 
कहते हैं कि “महाराज! मैं आपका शिष्य हूँ, शिक्षा लेनेका 
पात्र हुँ, आप मेरे कल्याणकी बात कहिये'। 

“शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌'-गुरु तो उपदेश दे देंगे, 
जिस मार्गका ज्ञान नहीं है, उसका ज्ञान करा देंगे, पूरा 
प्रकाश दे देंगे, पूरी बात बता देंगे, पर मार्गपर तो स्वयं 
शिष्यको ही चलना पड़ेगा। अपना कल्याण तो शिष्यको 
ही करना पड़ेगा। मैं तो ऐसा नहीं चाहता कि भगवान्‌ 
उपदेश दें और मैं उसका अनुष्ठान करूँ; क्योंकि उससे 
मेरा काम नहीं चलेगा। अतः अपने कल्याणको जिम्मेवारी 
मैं अपनेपर क्यों रखूँ? गुरुपर ही क्यों न छोड़ दूँ! जैसे 
केवल माँके दूधपर ही निर्भर रहनेवाला बालक बीमार हो 
जाय, तो उसको बीमारी दूर करनेके लिये ओषधि स्वयं 
माँको खानी पड़ती है, बालकको नहीं। इसी तरह मैं भी 
सर्वथा गुरुके ही शरण हो जाऊँ, गुरुपर ही निर्भर हो 
जाऊँ, तो मेरे कल्याणका पूरा दायित्व गुरुपर ही आ 
जायगा, स्वयं गुरुको ही मेरा कल्याण करना पड़ेगा-इस 
भावसे अर्जुन कहते हैं कि “मैं आपके शरण हूँ, मेरेको 
शिक्षा दीजिये '। 

यहाँ अर्जुन 'त्वां प्रपन्नम्‌' पदोंसे भगवानूके शरण 
होनेकी बात तो कहते हैं, पर वास्तवमें सर्वथा शरण हुए 
नहीं हैं। अगर वे सर्वथा शरण हो जाते, तो फिर उनके 


* साधक-संजीवनी * 





७३ 


द्वारा शाधि माम्‌' ' मेरेको शिक्षा दीजिये' यह कहना नहीं 
बनता; क्योंकि सर्वथा शरण होनेपर शिष्यका अपना कोई 
कर्तव्य रहता ही नहीं। दूसरी बात, आगे नवें श्लोकमें 
अर्जुन कहेंगे कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा'-*न योत्स्ये।' 
अर्जुनकी वह बात भी शरणागतिके विरुद्ध पड़ती है। 
कारण कि शरणागत होनेके बाद 'मैं युद्ध करूँगा या नहीं 
करूँगा; क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा'-यह बात 
रहती ही नहीं। उसको यह पता ही नहीं रहता कि 
शरण्य क्या करायेंगे और क्या नहीं करायेंगे। उसका तो 
यही एक भाव रहता है कि अब शरण्य जो करायेंगे, वही 
करूँगा। अर्जुनकी इस कमीको दूर करनेके लिये ही आगे 
चलकर भगवानको 'मामेकं शरणं व्रज' (१८। ६६) 
“एक मेरी शरणमें आ जा'- ऐसा कहना पड़ा। फिर 
अर्जुनने भी “करिष्ये बचनं तव' (१८। ७३) ' आपकी 
आज्ञाका पालन करूँगा'-एऐसा कहकर पूर्ण शरणागतिको 
स्वीकार किया। 

इस श्लोकमें अर्जुनने चार बातें कहीं हैं-( १) 
' कार्पण्यदोषो धर्मसम्मूढचेताः ( २ ) ' यच्छ्रेयः 
स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ ( ३ ) ' शिष्यस्तेऽहम्‌' (४) 
“शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌।' इनमेंसे पहली बातमें अर्जुन 
धर्मके विषयमे पूछते हैं, दूसरी बातमें अपने कल्याणके 
लिये प्रार्थना करते हैं, तीसरी बातमें शिष्य बन जाते हैं और 
चौथी बातमें शरणागत हो जाते हैं। अब इन चारों बातोंपर 
विचार किया जाय, तो पहली बातमें मनुष्य जिससे पूछता 
है, बह कहनेमें अथवा न कहनेमें स्वतन्त्र होता है। दूसरीमें, 
जिससे प्रार्थना करता है, उसके लिये कहना कर्तव्य हो 
जाता है। तीसरीमें, जिनका शिष्य बन जाता है, उन गुरुपर 
शिष्यको कल्याणका मार्ग बतानेका विशेष दायित्व आ 
जाता है। चौथीमें, जिसके शरणागत हो जाता है, उस 
शरण्यको शरणागतका उद्धार करना ही पड़ता है अर्थात्‌ 
उसके उद्धारका उद्योग स्वयं शरण्यको करना पड़ता है। 


0999999. 





सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें अर्जुन भगवान्‌के शरणागत तो हो जाते हँ पर उनके मनमें आता है कि भगवानका तो युद्ध करानेका 
ही भाव है पर मैं युद्ध करना अपने लिये धर्मयुक्त नहीं मानता हूँ। उन्होंने जैसे पहले उत्तिष्ठ कहकर युद्धके लिये आज्ञा दी, ऐसे 
ही वे अब भी युद्ध करनेकी आज्ञा दे देंगे। दूसरी बात शायद मैं अपने हृदयके भावोंको भगवान्‌के सामने पूरी तरह नहीं रख पाया 
हूँ। इन बातोको लेकर अर्जुन आगेके श्लोकमें युद्ध न करनेके पक्षमें अपने हृदयकी अवस्थाका स्पष्टरूपसे वर्णन करते हैं। 


न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्‌ यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌। 
अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥ ८ ॥ 


७४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 

हि =कारण कि सुराणाम्‌ = (स्वर्गमें) मम =मेरा 

भूमौ = पृथ्वीपर देवताओंका यत्‌ =्जो 

ऋद्धम्‌ = धन-धान्य- आधिपत्यम्‌ = आधिपत्य शोकम्‌ =शोक है, (वह) 
समृद्ध (और) अवाप्य =मिल जाय अपनुद्यात्‌ =दूर हो जाय 

असपत्नम्‌ =शत्रुरहित अपि =तो भी (--ऐसा मैं) 

राज्यम्‌ = राज्य इन्द्रियाणाम्‌ =इन्द्रियोंको न =नहीं 

च =तथा उच्छोषणम्‌ = सुखानेवाला प्रपश्यामि =देखता हूँ। 


व्याख्या-[ अर्जुन सोचते हैं कि भगवान्‌ ऐसा समझते 
होंगे कि अर्जुन युद्ध करेगा तो उसकी विजय होगी और 
विजय होनेपर उसको राज्य मिल जायगा, जिससे उसके 
चिन्ता-शोक मिट जायँगे और संतोष हो जायगा। परन्तु 
शोकके कारण मेरी ऐसी दशा हो गयी है कि विजय होनेपर 
भी मेरा शोक दूर हो जाय--ऐसी बात मैं नहीं देखता।] 

' अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यम्‌’ अगर मेरेको 
धन-धान्यसे सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय 
अर्थात्‌ जिस राज्यमें प्रजा खूब सुखी हो, प्रजाके पास खूब 
धन-धान्य हो, किसी चीजकी कमी न हो और राज्यमें 
कोई बैरी भी न हो--ऐसा राज्य मिल जाय, तो भी मेरा 
शोक दूर नहीं हो सकता। 

“सुराणामपि चाधिपत्यम्‌'इस पृथ्वीके तुच्छ भोगोंवाले 
राज्यकी तो बात ही क्या, इन्द्रका दिव्य भोगोंवाला राज्य भी 
मिल जाय, तो भी मेरा शोक, जलन, चिन्ता दूर नहीं हो सकती । 

अर्जुने पहले अध्यायमें यह बात कही थी कि मैं न 
विजय चाहता हूँ, न राज्य चाहता हूँ और न सुख ही चाहता 
हूँ; क्योंकि उस राज्यसे क्या होगा ? उन भोगोंसे क्या होगा ? 
और उस जीनेसे क्या होगा ? जिनके लिये हम राज्य, भोग 
एवं सुख चाहते हैं, वे ही मरनेके लिये सामने खड़े हैं (पहले 





अध्यायका बत्तीसवाँ-तैंतीसवाँ श्लोक) । यहाँ अर्जुन कहते हैं 
कि पृथ्वीका धन-धान्य-सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल 
जाय तथा देवताआंका आधिपत्य मिल जाय, तो भी मेरा 
शोक दूर नहीं हो सकता, मैं उनसे सुखी नहीं हो सकता। वहाँ 
(पहले अध्यायके बत्तीसवें-तैतीसवें श्लोकमें) तो कौटुम्बिक 
ममताकी वृत्ति ज्यादा होनेसे अर्जुनकी युद्धसे उपरति हुई है, 
पर यहाँ उनकी जो उपरति हो रही है, वह अपने कल्याणकी 
वृत्ति पैदा होनेसे हो रही है। अतः बहाँकी उपरति और 
यहाँकी उपरतिमें बहुत अन्तर है। 

“न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषण- 
मिन्द्रियाणाम्‌'-जब कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही 
मेरेको इतना शोक हो रहा है, तब उनके मरनेपर मेरेको 
कितना शोक होगा! अगर मेरेको राज्यके लिये ही शोक 
होता तो वह राज्यके मिलनेसे मिट जाता; परन्तु कुटुम्बके 
नाशकी आशंकासे होनेवाला शोक राज्यके मिलनेसे कैसे 
मिटेगा? शोकका मिटना तो दूर रहा, प्रत्युत शोक और 
बढ़ेगा; क्योंकि युद्धमें सब मारे जायँगे तो मिले हुए 
राज्यको कौन भोगेगा? वह किसके काम आयेगा ? अतः 
पृथ्वीका राज्य और स्वर्गका आधिपत्य मिलनेपर भी 
इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। 





सम्बन्ध-प्राकृत पदाथोकि प्राप्त होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय, यह मैं नहीं देखता हूँ-एऐसा कहनेके बाद अर्जुनने 
क्या किया 2 इसका वर्णन संजय आगेके श्लोकमें करते हैं। 
सञ्जय उवाच 
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप । 
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥ ९॥ 


संजय बोले 
परन्तप =हे शत्रुतापन जीतनेवाले अर्जुन | इति =एऐसा 
धृतराष्ट्र! हृषीकेशम्‌ =अन्तर्यामी ह्‌ = साफ-साफ 
एवम्‌ =एऐसा गोविन्दम्‌ = भगवान्‌ गोविन्दसे | उक्त्वा = कहकर 
उक्त्वा = कहकर न, योत्स्ये ='मैं युद्ध नहीं तूष्णीम्‌ =चुप 
गुडाकेशः =निद्राको करूँगा? बभूव = हो गये। 


श्लोक १०] 


व्याख्या-- एवमुक्त्वा हृषीकेशम्‌””””“बभूव ह 
अर्जुनने अपना और भगवान्‌का-दोनोंका पक्ष सामने 
रखकर उनपर विचार किया, तो अन्तमें वे इसी निर्णयपर 
पहुँचे कि युद्ध करनेसे तो अधिक-से-अधिक राज्य 
प्राप्त हो जायगा, मान हो जायगा, संसारमें यश हो जायगा, 
परन्तु मेरे हृदयमें जो शोक है, चिन्ता है, दुःख है, वे 
दूर नहीं होंगे। अतः अर्जुनको युद्ध न करना ही ठीक 
मालूम दिया। 


* साधक-संजीवनी * 





७५ 


यद्यपि अर्जुन भगवानूकी बातका आदर करते हैं और 
उसको मानना भी चाहते हैं; परंतु उनके भीतर युद्ध 
करनेकी बात ठीक-ठीक जँच नहीं रही है। इसलिये अर्जुन 
अपने भीतर जँची हुई बातको ही यहाँ स्पष्टरूपसे, साफ- 
साफ कह देते हैं कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा'। इस प्रकार 
जब अपनी बात, अपना निर्णय भगवानूसे साफ-साफ कह 
दिया, तब भगवानूसे कहनेके लिये और कोई बात बाकी 
नहीं रही; अतः वे चुप हो जाते हैं। 





सम्बन्ध-जब अजुनने युद्ध करनेके लिये साफ मना कर दिया, तब उसके बाद क्या हुआ-इसको संजय आगेके 


श्लोकमें बताते हैं। 
तमुवाच हृषीकेशः 


प्रहसन्निव भारत। 


सेनयोरु भयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥ १०॥ 


भारत =हे भरतवंशोद्धव | विषीदन्तम्‌ =विषाद करते हुए हृषीकेश 
धृतराष्ट्र! तम्‌ = उस अर्जुनके इदम्‌ =यह (आगे कहे 
उभयोः = दोनों प्रति जानेवाले) 
सेनयोः = सेनाओंके प्रहसन्‌, इव = हँसते हुए-से वचः = वचन 
मध्ये = मध्यभागमें हृषीकेशः = भगवान्‌ उवाच = बोले। 
व्याख्या- तमुवाच हषीकेशः.......विषीदन्तमिदं | करूँ’ आदि कुछ भी सोचनेका अधिकार नहीं रहता। 


वचः'--अर्जुनने बड़ी शूरवीरता और उत्साहपूर्वक 
योद्धाओंको देखनेके लिये भगवानूसे दोनों सेनाओंके बीचमें 
रथ खड़ा करनेके लिये कहा था। अब वहींपर अर्थात्‌ दोनों 
सेनाओंके बीचमें अर्जुन विषादमग्न हो गये ! वास्तवमें होना 
यह चाहिये था कि वे जिस उद्देश्यसे आये थे, उस 
उद्देश्यके अनुसार युद्धके लिये खड़े हो जाते। परन्तु उस 
उद्देश्यको छोड़कर अर्जुन चिन्ता-शोकमें फँस गये। अतः 
अब दोनों सेनाओंके बीचमें ही भगवान्‌ शोकमग्न अर्जुनको 
उपदेश देना आरम्भ करते हैं। 

“प्रहसन्निव (विशेषतासे हँसते हुएकी तरह-) का 
तात्पर्य है कि अर्जुनके भाव बदलनेको देखकर अर्थात्‌ 
पहले जो युद्ध करनेका भाव था, वह अब विषादमें बदल 
गया-इसको देखकर भगवान्को हँसी आ गयी। दूसरी 
बात, अर्जुनने पहले (दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें) 
कहा था कि मैं आपके शरण हूँ, मेरेको शिक्षा दीजिये 
अर्थात्‌ मैं युद्ध करूँ या न करूँ, मेरेको क्या करना 
चाहिये-इसकी शिक्षा दीजिये; परन्तु यहाँ मेरे कुछ बोले 
बिना अपनी तरफसे ही निश्चय कर लिया कि “मैं युद्ध 
नहीं करूँगा'-यह देखकर भगवानको हँसी आ गयी। 
कारण कि शरणागत होनेपर “मैं क्या करूँ और क्या नहीं 





उसको तो इतना ही अधिकार रहता है कि शरण्य जो काम 
कहता है, वही काम करे। अर्जुन भगवान्‌के शरण होनेके 
बाद “मैं युद्ध नहीं करूँगा' ऐसा कहकर एक तरहसे 
शरणागत होनेसे हट गये। इस बातको लेकर भगवानको 
हँसी आ गयी। “इब ' का तात्पर्य है कि जोरसे हँसी आनेपर 
भी भगवान्‌ मुसकराते हुए ही बोले। 

जब अर्जुनने यह कह दिया कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा' 
तब भगवानको यहीँ कह देना चाहिये था कि जैसी तेरी मर्जी 
आये, वैसा कर यथेच्छसि तथा कुरु' (१८। ६३) । 
परन्तु भगवानूने यही समझा कि मनुष्य जब चिन्ता-शोकसे 
विकल हो जाता है, तब वह अपने कर्तव्यका निर्णय न कर 
सकनेके कारण कभी कुछ, तो कभी कुछ बोल उठता है। 
यही दशा अर्जुनको हो रही है। अतः भगवान्‌के हृदयमें 
अर्जुनके प्रति अत्यधिक स्नेह होनेके कारण कृपालुता उमड़ 
पड़ी। कारण कि भगवान्‌ साधकके वचनाँको तरफ ध्यान न 
देकर उसके भावको तरफ ही देखते हैं। इसलिये भगवान्‌ 
अर्जुनके 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' इस वचनकी तरफ ध्यान न 
देकर (आगेके श्लोकसे) उपदेश आरम्भ कर देते हैं। 

जो वचनमात्रसे भी भगवानूके शरण हो जाता है, 
भगवान्‌ उसको स्वीकार कर लेते हैं। भगवानूके हृदयमें 


७६ 


प्राणियोंके प्रति कितनी दयालुता है! 

“हृषीकेश' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्‌ अन्तर्यामी 
हैं अर्थात्‌ प्राणियोंके भीतरी भावोंको जाननेवाले हैं। भगवान्‌ 
अर्जुनके भीतरी भावोंको जानते हैं कि अभी तो कौटुम्बिक 
मोहके वेगके कारण और राज्य मिलनेसे अपना शोक 
मिटता न दीखनेके कारण यह कह रहा है कि “मैं युद्ध 
नहीं करूँगा'; परन्तु जब इसको स्वयं चेत होगा, तब यह 
बात ठहरेगी नहीं और मैं जैसा कहूँगा, वैसा ही यह करेगा। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


“इद बचः उवाच' पदोंमें केवल 'उवाच' कहनेसे 
ही काम चल सकता था; क्योंकि “उवाच' के अन्तर्गत ही 
“वचः ' पदका अर्थ आ जाता है। अतः “बचः ' पद देना 
पुनरुक्तिदोष दीखता है। परन्तु वास्तवमें यह पुनरुक्तिदोष नहीं 
है, प्रत्युत इसमें एक विशेष भाव भरा हुआ है। अभी आगेके 
श्लोकसे भगवान्‌ जिस रहस्यमय ज्ञानको प्रकट करके उसे 
सरलतासे, सुबोध भाषामें समझाते हुए बोलेंगे, उसकी 
तरफ लक्ष्य करनेके लिये यहाँ 'बचः' पद दिया गया है। 


परिशिष्ट भाव--धर्म भूमि कुरुक्षेत्रके एक भागमें कौरव-सेना खड़ी है और दूसरे भागमें पाण्डव-सेना। दोनों 
सेनाओंके मध्यभागमें श्वेत घोडाँसे युक्त एक महान्‌ रथ खड़ा है। उस रथके एक भागमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण बैठे हैं और 
एक भागमें अर्जुन! अर्जुनके निमित्त मनुष्यमात्रका कल्याण करनेके लिये भगवान्‌ अपना अलौकिक उपदेश आरम्भ 
करते हैं और सर्वप्रथम शरीर तथा शरीरीके विभागका वर्णन करते हैं। 





सम्बन्ध-शोकाविष्ट अर्जुनको शोक-निवृत्तिका उपदेश देनेके लिये भगवान्‌ आगेका प्रकरण कहते हैं। 
श्रीभगवानुवाच 


अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। 
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥ ११॥ 


श्रीभगवान्‌ बोले 
त्वम्‌ = तुमने की बातें च = और 
अशोच्यान्‌ =शोक न भाषसे =कह रहे हो; अगतासून्‌ =जिनके प्राण नहीं 
करनेयोग्यका (परन्तु) गये हैं, उनके लिये 
अन्वशोचः "शोक किया है | गतासून्‌ = जिनके प्राण चले | पण्डिताः = पण्डितलोग 
च = और गये हैं, उनके न, अनुशोचन्ति = शोक नहीं 
प्रज्ञावादान्‌ =विद्रत्ता (पण्डिताई) लिये करते। 


व्याख्या-[मनुष्यको शोक तब होता है, जब वह 
संसारके प्राणी-पदार्थोमें दो विभाग कर लेता है कि ये मेरे 
हैं और ये मेरे नहीं हैं; ये मेरे निजी कुटुम्बी हैं और ये 
मेरे निजी कुटुम्बी नहीं हैं; ये हमारे वर्णके हैं और ये हमारे 
वर्णके नहीं हैं; ये हमारे आश्रमके हैं और ये हमारे आश्रमके 
नहीं हैं; ये हमारे पक्षके हैं और ये हमारे पक्षके नहीं हैं। 
जो हमारे होते हैं, उनमें ममता, कामना, प्रियता, आसक्ति 
हो जाती है। इन ममता, कामना आदिसे ही शोक, चिन्ता, 
भय, उद्वेग, हलचल, संताप आदि दोष पैदा होते हैं। ऐसा 
कोई भी दोष, अनर्थ नहीं है, जो ममता, कामना आदिसे 
पैदा न होता हो-यह सिद्धान्त है। 
गीतामें सबसे पहले धृतराष्ट्रने कहा कि मेरे और 
पाण्डुके पुत्रोंने युद्धभूमिमें क्या किया? यद्यपि पाण्डव 
धृतराष्ट्रको अपने पितासे भी अधिक आदर-दूष्टिसे देखते 





थे, तथापि धृतराष्ट्रके मनमें अपने पुत्रोंके प्रति ममता थी। 
अतः उनका अपने पुत्रोंमें और पाण्डवोंमें भेदभावपूर्वक 
पक्षपात था कि ये मेरे हैं और ये मेरे नहीं हैं। 

जो ममता धृतराष्ट्रमें थी, वही ममता अर्जुनमें भी पैदा 
हुई । परन्तु अर्जुनको वह ममता धृतराष्ट्रको ममताके समान 
नहीं थी। अर्जुनमें धृतराष्ट्रकी तरह पक्षपात नहीं था; अतः वे 
सभीको स्वजन कहते हैं दृष्ट्वेमं स्वजनम्‌' (१ । २८), 
और दुर्योधन आदिको भी स्वजन कहते हैं-'स्वजनं हि 
कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव’ (१। ३७) । तात्पर्य है 
कि अर्जुनको सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें ममता थी और उस 
ममताके कारण ही उनके मरनेकी आशंकासे अर्जुनको शोक 
हो रहा था। इस शोकको मिटानेके लिये भगवानूने अर्जुनको 
गीताका उपदेश दिया है, जो इस ग्यारहवें शलोकसे आरम्भ 
होता है। इसके अन्तमें भगवान्‌ इसी शोकको अनुचित बताते 


श्लोक ११] 


हुए कहेंगे कि तू केवल मेरा ही आश्रय ले और शोक 
मत कर--'मा शुचः' (१८। ६६) । कारण कि संसारका 
आश्रय लेनेसे ही शोक होता है और अनन्यभावसे मेरा 
आश्रय लेनेसे तेरे शोक, चिन्ता आदि सब मिट जायेगे ।] 
' अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्‌'—संसारमात्रमें दो चीजें हैं- 
सत्‌ और असत्‌, शरीरी और शरीर । इन दोनोंमें शरीरी 
तो अविनाशी है और शरीर विनाशी है। ये दोनों ही 
अशोच्य हैं। अविनाशीका कभी विनाश नहीं होता, इसलिये 
उसके लिये शोक करना बनता ही नहीं और विनाशीका 
विनाश होता ही है, वह एक क्षण भी स्थायीरूपसे नहीं 
रहता, इसलिये उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता। 
तात्पर्य हुआ कि शोक करना न तो शरीरीको लेकर बन 
सकता है और न शरीरोंको लेकर ही बन सकता है। 
शोकके होनेमें तो केवल अविवेक (मूर्खता) ही कारण है। 
मनुष्यके सामने जन्मना-मरना, लाभ-हानि आदिके 
रूपमें जो कुछ परिस्थिति आती है, वह प्रारब्धका अर्थात्‌ 
अपने किये हुए कर्मोका ही फल है। उस अनुकूल-प्रतिकूल 
परिस्थितिको लेकर शोक करना, सुखी-दुःखी होना केवल 
मूर्खता ही है। कारण कि परिस्थिति चाहे अनुकूल आये, 
चाहे प्रतिकूल आये, उसका आरम्भ और अन्त होता है 
अर्थात्‌ वह परिस्थिति पहले भी नहीं थी और अन्तमं भी नहीं 
रहेगी । जो परिस्थिति आदिमे और अन्तमें नहीं होती, वह 
बीचमें एक क्षण भी स्थायी नहीं होती। अगर स्थायी होती 
तो मिटती कैसे ? और मिटती है तो स्थायी कैसे ? ऐसी 
प्रतिक्षण मिटनेवाली अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर 
हर्ष-शोक करना, सुखी-दु:खी होना केवल मूर्खता है। 
“प्रज्ञावादांश्च भाषसे'-एक तरफ तो तू पण्डिताईको 
बातें बघार रहा है और दूसरी तरफ शोक भी कर रहा 
है। अतः तू केवल बातें ही बनाता है। वास्तवमें तू पण्डित 
नहीं है; क्योंकि जो पण्डित होते हैं, वे किसीके लिये भी 
कभी शोक नहीं करते। 
कुलका नाश होनेसे कुल-धर्म नष्ट हो जायगा। धर्मके 
नष्ट होनेसे स्त्रियाँ दूषित हो जायँगी, जिससे वर्णसंकर पैदा 


* ( १) श्लेष्माश्रु बान्धवैर्मुक्तं प्रेतो भुङ्क्ते यतोऽवशः। 


* साधक-संजीवनी * 





७७ 


होगा। वह वर्णसंकर कुलघातियोंको और उनके कुलको 
नरकोंमें ले जानेवाला होगा। पिण्ड और पानी न मिलनेसे 
उनके पितराँका भी पतन हो जायगा--ऐसी तेरी पण्डिताईकी 
बातोंसे भी यही सिद्ध होता है कि शरीर नाशवान्‌ है और 
शरीरी अविनाशी है। अगर शरीरी स्वयं अविनाशी न होता, 
तो कुलघाती और कुलके नरकोंमें जानेका भय नहीं होता, 
पितरोंका पतन होनेकी चिन्ता नहीं होती। अगर तुझे 
कुलकी और पितरोंकी चिन्ता होती है, उनका पतन होनेका 
भय होता है, तो इससे सिद्ध होता है कि शरीर नाशवान्‌ 
है और उसमें रहनेवाला शरीरी नित्य है। अतः शरीरोंके 
नाशको लेकर तेरा शोक करना अनुचित है। 

'गतासूनगतासूंश्च'-सबके पिण्ड-प्राणका वियोग 
अवश्यम्भावी है। उनमेंसे किसीके पिण्ड-प्राणका वियोग 
हो गया है और किसीका होनेवाला है। अतः उनके लिये 
शोक नहीं करना चाहिये। तुमने जो शोक किया है, यह 
तुम्हारी गलती है। 

जो मर गये हैं, उनके लिये शोक करना तो महान्‌ गलती 
है। कारण कि मरे हुए प्राणियोंके लिये शोक करनेसे उन 
प्राणियोंको दुःख भोगना पड़ता है। जैसे मृतात्माके लिये जो 
पिण्ड और जल दिया जाता है, वह उसको परलोकमें मिल 
जाता है, ऐसे ही मृतात्माके लिये जो कफ और आँसू बहाते 
हैं, वे मृतात्माको परवश होकर खाने-पीने पड़ते हैं*। जो अभी 
जी रहे हैं, उनके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये। उनका 
तो पालन-पोषण करना चाहिये, प्रबन्ध करना चाहिये। 
उनकी क्या दशा होगी! उनका भरण-पोषण कैसे होगा! 
उनकी सहायता कौन करेगा! आदि चिन्ता-शोक कभी नहीं 
करने चाहिये; क्योंकि चिन्ता-शोक करनेसे कोई लाभ नहीं है। 

मेरे शरीरके अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है 
आदि विकारोंके पैदा होनेमें मूल कारण है-शरीरके साथ 
एकता मानना। कारण कि शरीरके साथ एकता माननेसे ही 
शरीरका पालन-पोषण करनेवालॉंके साथ अपनापन हो 
जाता है, और उस अपनेपनके कारण ही कुटुम्बियोंके 
मरनेको आशंकासे अर्जुनके मनमें चिन्ता-शोक हो रहे हैं, 


तस्मान्न रोदितव्यं हि क्रियाः कार्याश्च शक्तितः॥ ( पंचतन्त्र, मित्रभेद ३६५ ) 
'मृतात्माको अपने बन्धु-बान्धवोंके द्वारा त्यक्त कफयुक्त आँसुओंको विवश होकर खाना-पीना पड़ता है। इसलिये रोना 
नहीं चाहिये, प्रत्युत अपनी शक्तिके अनुसार मृतात्माकी ऑर्ध्वदैहिक क्रिया करनी चाहिये।' 


(२) मृतानां बान्धवा ये तु मुञ्चन्त्यश्रूणि भूतले। 
पिबन्त्यश्रूणि तान्यद्धा मृताः प्रेताः परत्र वै॥ 


(स्कन्दपुराण, ब्राह्म० सेतु० ४८। ४२ ) 


'मृतात्माके बन्धु-बान्धव भूतलपर जिन आँसुओंका त्याग करते हैं, उन आँसुओंको मृतात्मा परलोकमें पीते हैं।' 


9८ 


तथा चिन्ता-शोकसे ही अर्जुनके शरीरमें उपर्युक्त विकार 
प्रकट हो रहे हैं। इसमें भगवानूने 'गतासून्‌' और 
“अगतासून्‌' के शोकको ही हेतु बताया है। जिनके प्राण 
चले गये हैं, वे 'गतासून्‌' हैं और जिनके प्राण नहीं चले 
गये हैं, वे 'अगतासून्‌' हैं। “पिण्ड और जल न मिलनेसे 
पितरोंका पतन हो जाता है' (पहले अध्यायका बयालीसवाँ 
श्लोक)--यह अर्जुनकी “गतासून्‌' की चिन्ता है और 
“जिनके लिये हम राज्य, भोग और सुख चाहते हैं, वे ही 
प्राणांकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं? (पहले 
अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक )--यह अर्जुनकी ' अगतासून्‌” 
की चिन्ता है। ये दोनों चिन्ताएँ शरीरको लेकर ही हो रही 
हैं; अतः ये दोनों चिन्ताएँ धातुरूपसे एक ही हैं। कारण 
कि 'गतासून्‌' और 'अगतासून्‌' दोनों ही नाशवान्‌ हैं। 

“गतासून्‌' और अगतासून्‌'--इन दोनोंके लिये कर्तव्य- 
कर्म करना चिन्ताकी बात नहीं है। “गतासून्‌' के लिये 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


पिण्ड-पानी देना, श्राद्ध-तर्पण करना-यह कर्तव्य है और 
' अगतासून्‌' के लिये व्यवस्था कर देना, निर्वाहका प्रबन्ध 
कर देना-यह कर्तव्य है। कर्तव्य चिन्ताका विषय नहीं 
होता, प्रत्युत विचारका विषय होता है। विचारसे कर्तव्यका 
बोध होता है और चिन्तासे विचार नष्ट होता है। 
नानुशोचन्ति पण्डिताः ' सत्‌-असत्‌-विवेकवती 
बुद्धिका नाम “पण्डा' है। वह “पण्डा' जिनको विकसित हो 
गयी है अर्थात्‌ जिनको सत्‌-असत्का स्पष्टतया विवेक हो 
गया है, वे पण्डित हैं। ऐसे पण्डितोंमें सत्‌-असत्को लेकर 
शोक नहीं होता; क्योंकि सत्को सत्‌ माननेसे भी शोक नहीं 
होता और असतूको असत्‌ माननेसे भी शोक नहीं होता। स्वयं 
सत्‌-स्वरूप है और बदलनेवाला शरीर असत्‌-स्वरूप है। 
असतूको सत्‌ मान लेनेसे ही शोक होता है अर्थात्‌ ये शरीर 
आदि ऐसे ही बने रहें, मरें नहीं-इस बातको लेकर ही शोक 
होता है। सत्‌को लेकर कभी चिन्ता-शोक होते ही नहीं। 


परिशिष्ट भाव--एक विभाग शरीरका है और एक विभाग शरीरी (शरीरवाले)-का है। दोनों एक-दूसरेसे 
सर्वथा सम्बन्धरहित हैं। दोनांका स्वभाव ही अलग-अलग है। एक जड़ है, एक चेतन। एक नाशवान्‌ है, एक अविनाशी, 
एक विकारी है, एक निर्विकार। एकमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता है और एक अनन्तकालतक ज्यों-का-त्यों ही रहता है 
' भूतग्रामः स एवायम्‌’ (गीता ८। १९), 'सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च' (गीता १४। २)। 

शरीर और शरीरी-दोनों ही अशोच्य हैं। शरीरका निरन्तर विनाश होता है; अत: उसके लिये शोक करना नहीं 
बनता और शरीरीका विनाश कभी होता ही नहीं; अत: उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता। शोक केवल मूर्खतासे 
होता है। शरीरकी निरन्तर सहजनिवृत्ति है और शरीरी निरन्तर सबको प्राप्त है। शरीर और शरीरीके इस विभागको 
जाननेवाले विवेकी मनुष्य मृत अथवा जीवित, किसी भी प्राणीके लिये कभी शोक नहीं करते। उनको दृष्टिमें बदलनेवाले 
शरीरका विभाग ही अलग है और न बदलनेवाले शरीरी अर्थात्‌ स्वरूपकी सत्ताका विभाग ही अलग है। 

गीताका उपदेश शरीर और शरीरीके भेदसे आरम्भ होता है। दूसरे दार्शनिक ग्रन्थ तो आत्मा और अनात्माका 
इदंतासे वर्णन करते हैं, पर गीता इदंतासे आत्मा-अनात्माका वर्णन न करके सबके अनुभवके अनुसार देह-देही, शरीर- 
शरीरीका वर्णन करती है। यह गीताकी विलक्षणता है! साधक अपना कल्याण चाहता है तो उसके लिये सबसे पहले 
यह जानना आवश्यक है कि “मैं कौन हूँ'। अर्जुनने भी अपने कल्याणका उपाय पूछा है--“यच्छेय: स्यान्निश्चितं 
ब्रूहि तन्मे’ (२। ७)। देह और देहीका भेद स्वीकार करनेसे ही कल्याण हो सकता है। जबतक “मैं देह हूँ'-यह 
भाव रहेगा, तबतक कितना ही उपदेश सुनते रहेँ, सुनाते रहें और साधन भी करते रहें, कल्याण नहीं होगा। 

जो वस्तु अपनी न हो, उसको अपना मान लेना और जो वस्तु वास्तवमै अपनी हो, उसको अपना न मानना 
बहुत बड़ी भूल है। अपनी वस्तु वही हो सकती है, जो सदा हमारे साथ रहे और हम सदा उसके साथ रहें। शरीर 
एक क्षण भी हमारे साथ नहीं रहता और परमात्मा निरन्तर हमारे साथ रहते हैं। कारण कि शरीरको सजातीयता संसारके 
साथ है और हमारी अर्थात्‌ शरीरीकी सजातीयता परमात्माके साथ है। इसलिये शरीरको अपना मानना और परमात्माको 
अपना न मानना सबसे बड़ी भूल है। इस भूलको मिटानेके लिये भगवान्‌ गीतामें सबसे पहले शरीर-शरीरीके भेदका 
वर्णन करते हैं और साधकको उद्बोधन करते हैं कि जिसकी मृत्यु होती है, वह तुम नहीं हो अर्थात्‌ तुम शरीर नहीं 
हो। तुम ज्ञाता (जाननेवाले) हो, शरीर ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) है। (गीता-तेरहवें अध्यायका पहला श्लोक) तुम 
सर्वदेशीय हो--' नित्यः सर्वगतः ' (गीता २। २४), “येन सर्वमिदं ततम्‌’ (गीता २। १७), शरीर एकदेशीय है। तुम चिन्मय 
लोकके निवासी हो, शरीर जड़ संसारका निवासी है। तुम मुझ परमात्माके अंश हो-'ममैवांशो जीवलोके' (गीता 
१५। ७), शरीर प्रकृतिका अंश है-'मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि’ (गीता १५। ७) । तुम निरन्तर अमरतामें 


श्लोक १२] * साधक-संजीवनी * ७९ 
रहते हो, शरीर निरन्तर मृत्युमें रहता है। शरीरकी क्षतिसे तुम्हारी किंचिन्मात्र भी क्षति नहीं होती। अतः शरीरको लेकर 
तुम्हें शोक, चिन्ता, भय आदि नहीं होने चाहिये। 

शरीरी किसी शरीरसे लिप्त नहीं है, इसलिये उसको सर्वव्यापी कहा गया है- सर्वगतः ' (गीता २। २४), 
“येन सर्वमिदं ततम्‌’ (२। १७)। तात्पर्यं हुआ कि साधकका स्वरूप सत्तामात्र है; अतः वास्तवमें वह शरीरी 
(शरीरवाला) नहीं है, प्रत्युत शरीरी है। इसलिये भगवानूने उसको अव्यक्त भी कहा है--' अव्यक्तः' (२। २५), 
' अव्यक्तादीनि भूतानि’ (२। २८) । शरीर प्रतिक्षण नष्ट होनेवाला और असत्‌ है। असत्की सत्ता विद्यमान नहीं है- 
“नासतो विद्यते भावः' (२। १६)। जिसकी सत्ता विद्यमान नहीं है, ऐसे असत्‌ शरीरको लेकर साधक शरीरी 
(शरीरवाला) कैसे हो सकता है? इसलिये साधक शरीर भी नहीं है और शरीरी भी नहीं है। परन्तु इस प्रकरणें 
भगवानूने साधकोंको समझानेकी दृष्टिसे उस सत्तामात्र स्वरूपको 'शरीरी' (देही) नामसे कहा है। “शरीरी' कहनेका 
तात्पर्य यही बताना है कि तुम शरीर नहीं हो। 

जिस समय हम शरीर और शरीरीका विचार करते हैं, उस समय भी शरीर और शरीरी वैसे ही हैं और जिस 
समय विचार नहीं करते, उस समय भी वे वैसे ही हैं। विचार करनेसे वस्तुस्थितिमें तो कोई फर्क नहीं पड़ता, पर 
साधकका मोह मिट जाता है, उसका मनुष्यजन्म सफल हो जाता है। 

मनुष्यशरीर विवेकप्रधान है। अतः “मैं शरीर नहीं हुँ'-यह विवेक मनुष्यशरीरमें ही हो सकता है। शरीरको मैं- 
मेरा मानना मनुष्यबुद्धि नहीं है, प्रत्युत पशुबुद्धि है। इसलिये श्रीशुकदेवजी महाराज राजा परीक्षित्‌्से कहते हैं- 

त्वं तु राजन्‌ मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि। न जातः प्रागभूतोऽद्य देहवत्त्वं न नङ्क्ष्यसि॥ 
( श्रीमद्धा० १२। ५। २) 

“हे राजन्‌! अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा। जैसे शरीर पहले नहीं था, पीछे पैदा हुआ 

और फिर मर जायगा, ऐसे तुम पहले नहीं थे, पीछे पैदा हुए और फिर मर जाओगे-यह बात नहीं है।' 





सम्बन्ध सत्‌-तत््तको लेकर शोक करना अनुचित क्यों है-इस शंकाके समाधानके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं। 
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः । 
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥ १२॥ 


जातु =किसी कालमें जनाधिपाः = राजालोग वयम्‌ = (मैं, तू और 
अहम्‌ =मैं न =नहीं (थे), राजालोग-) हम 
न =नहीं न, तु, एव "यह बात भी सर्वे =सभी 

आसम्‌ =था (और) नहीं है; न =नहीं 

त्वम्‌ =्तू च = और भविष्यामः =रहेंगे, 

न =नहीं (था) अतः = इसके एव = (यह बात) भी 
इमे = (तथा) ये परम्‌ =बाद (भविष्यमें) |न =नहीं है। 


व्याख्या-[मात्र संसारमें दो ही वस्तुएँ हैं-शरीरी 
(सत्‌) और शरीर (असत्‌)। ये दोनों ही अशोच्य हैं 
अर्थात्‌ शोक न शरीरी-(शरीरमें रहनेवाले-) को लेकर 
हो सकता है और न शरीरको लेकर ही हो सकता है। 
कारण कि शरीरीका कभी अभाव होता ही नहीं और शरीर 
कभी रह सकता ही नहीं। इन दोनोंके लिये पूर्वश्लोकमें जो 
' अशोच्यान्‌’ पद आया है, उसकी व्याख्या अब शरीरीकी 
नित्यता और शरीरकी अनित्यताके रूपमें करते हैं।] 





“न त्वेवाहं जातु ........ जनाधिपाः '--लोगोंकी दृष्टिसे 
मैंने जबतक अवतार नहीं लिया था, तबतक मैं इस रूपसे 
(कृष्णरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था और तेरा 
जबतक जन्म नहीं हुआ था, तबतक तू भी इस रूपसे 
(अर्जुनरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था तथा इन 
राजाओंका भी जबतक जन्म नहीं हुआ था, तबतक ये भी 
इस रूपसे (राजारूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं थे। परन्तु 
मैं, तू और ये राजालोग इस रूपसे प्रकट न होनेपर भी पहले 


८० 


नहीं थे--ऐसी बात नहीं है। 

यहाँ “मैं, तू और ये राजालोग पहले थे--ऐसा कहनेसे 
ही काम चल सकता था, पर ऐसा न कहकर “मैं, तू और 
ये राजालोग पहले नहीं थे, ऐसी बात नहीं '--ऐसा कहा 
गया है। इसका कारण यह है कि 'पहले नहीं थे, ऐसी 
बात नहीं' ऐसा कहनेसे “पहले हम सब जरूर थे'-यह 
बात दृढ़ हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि नित्य-तत्त्व 
सदा ही नित्य है। इसका कभी अभाव था ही नहीं। 'जातु' 
कहनेका तात्पर्य है कि भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें 
तथा किसी भी देश, परिस्थिति, अवस्था, घटना, वस्तु 
आदिमें नित्यतत्त्वका किंचिन्मात्र भी अभाव नहीं हो सकता। 

यहाँ ' अहम्‌' पद देकर भगवान्‌ने एक विलक्षण बात 
कही है। आगे चौथे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवानूने 
अर्जुनसे कहा है कि 'मेरे और तेरे बहुत-से जन्म हुए हैं, 
पर उनको मैं जानता हूँ, तू नहीं जानता'। इस प्रकार 
भगवानूने अपना ईश्वरपना प्रकट करके जीवोंसे अपनेको 
अलग बताया है। परन्तु यहाँ भगवान्‌ जीवोंके साथ अपनी 
एकता बता रहे हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ (चौथे 
अध्यायके पाँचवें श्लोकमें) भगवानका आशय अपनी 
महत्ता, विशेषता प्रकट करनेमें है और यहाँ भगवानका 
आशय तात्त्विक दृष्टिसे नित्य-तत्त्वको जनानेमें है। 

“न चैव ..... वयमतः परम्‌'- भविष्यमें शरीरोंकी ये 
अवस्थाएँ नहीं रहेंगी और एक दिन ये शरीर भी नहीं रहेंगे; 
परन्तु ऐसी अवस्थामें भी हम सब नहीं रहेंगे--यह बात 
नहीं है अर्थात्‌ हम सब जरूर रहेंगे। कारण कि नित्य- 
तत्वका कभी अभाव था नहीं और होगा भी नहीं। 

मैं, तू और राजालोग-हम सभी पहले नहीं थे, यह 
बात भी नहीं है और आगे नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं 
है--इस प्रकार भूत और भविष्यको बात तो भगवानूने कह 
दी, पर वर्तमानकी बात भगवानूने नहीं कही । इसका कारण 
यह है कि शरीरोंकी दृष्टिसे तो हम सब वर्तमानमें प्रत्यक्ष 
ही हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये “हम सब अभी 
नहीं हैं, यह बात नहीं है '--ऐसा कहनेकी जरूरत नहीं है। 
अगर तात्त्विक दृष्टिसे देखा जाय, तो हम सभी वर्तमानमें 
हैं और ये शरीर प्रतिक्षण बदल रहे हैं-इस तरह शरीरोंसे 
अलगावका अनुभव हमें वर्तमानमें ही कर लेना चाहिये। 
तात्पर्यं है कि जैसे भूत और भविष्यमै अपनी सत्ताका 
अभाव नहीं है, ऐसे ही वर्तमानमें भी अपनी सत्ताका अभाव 
नहीं है-इसका अनुभव करना चाहिये। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


जैसे प्रत्येक प्राणीको नींद आनेसे पहले भी यह 
अनुभव रहता है कि 'अभी हम हैं' और नींद खुलनेपर 
भी यह अनुभव रहता है कि “अभी हम हैं' तो नींदकी 
अवस्थामें भी हम वैसे-के-वैसे ही थे। केवल बाह्य 
जाननेको सामग्रीका अभाव था, हमारा अभाव नहीं था। 
ऐसे ही मैं, तू और राजालोग-हम सबके शरीर पहले भी 
नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे तथा अभी भी शरीर 
प्रतिक्षण नाशको ओर जा रहे हैं; परन्तु हमारी सत्ता पहले भी 
थी, पीछे भी रहेगी और अभी भी वैसी-की-वैसी ही है। 

हमारी सत्ता कालातीत तत्त्व है; क्योंकि हम उस 
कालके भी ज्ञाता हैं अर्थात्‌ भूत, भविष्य और वर्तमान 
ये तीनों काल हमारे जाननेमें आते हैं। उस कालातीत 
तत्त्वको समझानेके लिये ही भगवानूने यह श्लोक कहा है। 

विशेष बात 

मैं, तू और राजालोग पहले नहीं थे-यह बात नहीं 
और आगे नहीं रहेंगे-यह बात भी नहीं, ऐसा कहनेका 
तात्पर्य है कि जब ये शरीर नहीं थे, तब भी हम सब थे 
और जब ये शरीर नहीं रहेंगे, तब भी हम रहेंगे अर्थात्‌ 
ये सब शरीर तो हैं नाशवान्‌ और हम सब हैं अविनाशी । 
ये शरीर पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे-इससे 
शरीरोंकी अनित्यता सिद्ध हुई और हम सब पहले थे और 
आगे रहेंगे-इससे सबके स्वरूपकी नित्यता सिद्ध हुई। इन 
दो बातोंसे यह एक सिद्धान्त सिद्ध होता है कि जो आदि 
और अन्तमें रहता है, वह मध्यमें भी रहता है तथा जो 
आदि और अन्तमें नहीं रहता, वह मध्यमें भी नहीं रहता। 

जो आदि और अन्तमें नहीं रहता, वह मध्यमें कैसे 
नहीं रहता; क्योंकि वह तो हमें दीखता है? इसका उत्तर 
यह है कि जिस दृष्टिसे अर्थात्‌ जिन मन, बुद्धि और 
इन्द्रियाँसे दृश्यका अनुभव हो रहा है, उन मन-बुद्धि- 
इन्द्रियांसहित वह दृश्य प्रतिक्षण बदल रहा है। वे एक क्षण 
भी स्थायी नहीं हैं। ऐसा होनेपर भी जब स्वयं दृश्यके 
साथ तादात्म्य कर लेता है, तब वह द्रष्टा अर्थात्‌ देखनेवाला 
बन जाता है। जब देखनेके साधन (मन-बुद्धि- इन्द्रियाँ) 
और दृश्य (मन-बुद्धि-इन्द्रियांके विषय) ये सभी एक 
क्षण भी स्थायी नहीं हैं, तो देखनेवाला स्थायी कैसे सिद्ध 
होगा? तात्पर्य है कि देखनेवालेकी संज्ञा तो दृश्य और 
दर्शनके सम्बन्धसे ही है। दृश्य और दर्शनसे सम्बन्ध न हो 
तो देखनेवालेको कोई संज्ञा नहीं होती, प्रत्युत उसका 
आधाररूप जो नित्य-तत्त्व है, वही रह जाता है। 


श्लोक १३] * साधक-संजीवनी * ८९ 
उस नित्य-तत्त्वको हम सबकी उत्पत्ति, स्थिति और | न रहनेपर भी उसकी सत्ता ज्यों-की-त्यों ही है। उस 
प्रलयका आधार और सम्पूर्ण प्रतीतियोंका प्रकाशक कह | सत्य-तत्त्वकी तरफ जिसकी दृष्टि है, उसको शोक कैसे 
सकते हैं। परन्तु ये आधार और प्रकाशक नाम भी आधेय | हो सकता है? अर्थात्‌ नहीं हो सकता। इसी दृष्टिसे मैं, 
और प्रकाश्यके सम्बन्धसे ही हैं। आधेय और प्रकाश्यके | तू और राजालोग स्वरूपसे अशोच्य हैं। 

परिशिष्ट भाव--इस श्लोकमें परमात्मा और जीवात्माके साधर्म्यका वर्णन है। भगवान्‌ कहते हैं कि मैं 
कृष्णरूपसे, तू अर्जुनरूपसे तथा सब लोग राजारूपसे पहले भी नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे, पर सत्तारूपसे 
हम सब पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। तात्पर्य है कि मैं, तू तथा राजालोग--ये तीनों शरीरको लेकर तो अलग- 
अलग हैं, पर सत्ताको लेकर एक ही हैं। शरीर तो पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे, पर स्वरूप (स्वयं) 
की सत्ता पहले भी थी, बादमें भी रहेगी और वर्तमानमें है ही। जब ये शरीर नहीं थे, तब भी सत्ता थी और जब 
ये शरीर नहीं रहेंगे, तब भी सत्ता रहेगी। एक सत्ताके सिवाय कुछ नहीं है। 

मैं, तू तथा ये राजालोग--ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि परमात्माकी सत्ता और जीवको सत्ता एक ही है अर्थात्‌ 
“है' और 'हूँ'--दोनोंमें एक ही चिन्मय सत्ता है। 'मैं' (अहम्‌) के सम्बन्धसे ही 'हूँ” है। अगर “मैं' (अहम्‌) का 
सम्बन्ध न रहे तो 'हूँ' नहीं रहेगा, प्रत्युत 'है' ही रहेगा। वह ' है' अर्थात्‌ चिन्मय सत्तामात्र ही हमारा स्वरूप है, शरीर 
हमारा स्वरूप नहीं है। इसलिये शरीरको लेकर शोक नहीं करना चाहिये। 

भूतकाल और भविष्यकालको घटना जितनी दूर दीखती है, उतनी ही दूर वर्तमान भी है। जैसे भूत और भविष्यसे 
हमारा सम्बन्ध नहीं है, ऐसे ही वर्तमानसे भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। जब सम्बन्ध ही नहीं है, तो फिर भूत, भविष्य 
और वर्तमानमें क्या फर्क हुआ? ये तीनों कालके अन्तर्गत हैं, जबकि हमारा स्वरूप कालसे अतीत है। कालका तो 
खण्ड होता है, पर स्वरूप (सत्ता) अखण्ड है। शरीरको अपना स्वरूप माननेसे ही भूत, भविष्य और वर्तमानमें फर्क 
दीखता है। वास्तवमें भूत, भविष्य और वर्तमान विद्यमान है ही नहीं! 

अनेक युग बदल जायँ तो भी शरीरी बदलता नहीं, वह-का-वह ही रहता है; क्योंकि वह परमात्माका अंश 
है। परन्तु शरीर बदलता ही रहता है, क्षणमात्र भी वह नहीं रहता। 


देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। 
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥ १३ ॥ 





देहिनः = देहधारीके यौवनम्‌ = जवानी (और) प्राप्ति होती है। 
अस्मिन्‌ "इस जरा = वृद्धावस्था तत्र = उस विषयमें 
देहे = मनुष्यशरीरमें (होती है), धीरः = धीर मनुष्य 
यथा = जैसे तथा =ऐसे ही न, मुह्यति =मोहित नहीं 
कौमारम्‌ = बालकपन, देहान्तरप्राप्तिः = दूसरे शरीरको होता। 


व्याख्या— देहिनोऽस्मिन्यथा देहे* कौमारं यौवनं 
जरा'-शरीरधारीके शरीरमें पहले बाल्यावस्था आती है, 
फिर युवावस्था आती है और फिर वृद्धावस्था आती है। 
तात्पर्य है कि शरीरमें कभी एक अवस्था नहीं रहती, उसमें 
निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। 

यहाँ “शरीरधारीके इस शरीरमें'-एऐसा कहनेसे सिद्ध 
होता है कि शरीरी अलग है और शरीर अलग है। शरीरी 





द्रष्टा है और शरीर दृश्य है। अतः शरीरमें बालकपन आदि 
अवस्थाओंका जो परिवर्तन है, वह परिवर्तन शरीरीमें नहीं है। 

“तथा देहान्तरप्राप्तिः जैसे शरीरकी कुमार, युवा 
आदि अवस्थाएँ होती हैं, ऐसे ही देहान्तरकी अर्थात्‌ दूसरे 
शरीरकी प्राप्ति होती है। जैसे स्थूलशरीर बालकसे जवान 
एवं जवानसे बूढ़ा हो जाता है, तो इन अवस्थाओंके 
परिवर्तनको लेकर कोई शोक नहीं होता, ऐसे ही शरीरी एक 


* कुमार, युवा और वृद्धावस्था तो मात्र शरीरधारियोंके शरीरोंकी होती है; परन्तु यहाँ ' अस्मिन्‌ देहे' पदोंमें 'देह' शब्द 


मनुष्य-शरीरका वाचक मानना चाहिये। 


८२ 


शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है, तो इस विषयमें भी शोक 
नहीं होना चाहिये। जैसे स्थूलशरीरके रहते-रहते कुमार, 
युवा आदि अवस्थाएँ होती हैं, ऐसे ही सूक्ष्म और कारण- 
शरीरके रहते-रहते देहान्तरकी प्राप्ति होती है अर्थात्‌ जैसे 
बालकपन, जवानी आदि स्थूल-शरीरकी अवस्थाएँ हैं, ऐसे 
देहान्तरकी प्राप्ति (मृत्युके बाद दूसरा शरीर धारण करना) 
सूक्ष्म और कारण-शरीरकी अवस्था है। 

स्थूलशरीरके रहते-रहते कुमार आदि अवस्थाओंका 
परिवर्तन होता है--यह तो स्थूल दृष्टि है। सूक्ष्म दृष्टिसे 
देखा जाय तो अवस्थाओंकी तरह स्थूलशरीरमें भी 
परिवर्तन होता रहता है। बाल्यावस्थामै जो शरीर था, वह 
युवावस्थामें नहीं है। वास्तवमें ऐसा कोई भी क्षण नहीं है, 
जिस क्षणमें स्थूलशरीरका परिवर्तन न होता हो। ऐसे ही 
सूक्ष्म और कारण-शरीरमें भी प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता 
है, जो देहान्तररूपसे स्पष्ट देखनेमें आता है'। 

अब विचार यह करना है कि स्थूलशरीरका तो हमें 
ज्ञान होता है, पर सूक्ष्म और कारण-शरीरका हमें ज्ञान नहीं 
होता। अतः जब सूक्ष्म और कारण-शरीरका ज्ञान भी नहीं 
होता, तो उनके परिवर्तनका ज्ञान हमें कैसे हो सकता है? 
इसका उत्तर है कि जैसे स्थूलशरीरका ज्ञान उसकी 
अवस्थाओंको लेकर होता है, ऐसे ही सूक्ष्म और कारण- 
शरीरका ज्ञान भी उसकी अवस्थाओंको लेकर होता है। 
स्थूलशरीरकी “जाग्रत्‌', सूक्ष्म-शरीरकी 'स्वन” और 
कारण-शरीरकी ' सुषुप्ति' अवस्था मानी जाती है। मनुष्य 
अपनी बाल्यावस्थामें अपनेको स्वप्ममें बालक देखता है, 
युवावस्थामें स्वप्नमें युवा देखता है और वृद्धावस्थामें स्वप्नमें 
वृद्ध देखता है। इससे सिद्ध हो गया कि स्थूलशरीरके 
साथ-साथ सूक्ष्मशरीरका भी परिवर्तन होता है। ऐसे ही 
सुषुप्ति-अवस्था बाल्यावस्थामें ज्यादा होती है, युवावस्थामें 
कम होती है और वृद्धावस्थामें वह बहुत कम हो जाती 
है; अतः इससे कारणशरीरका परिवर्तन भी सिद्ध हो गया। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


दूसरी बात, बाल्यावस्था और युवावस्थामें नींद लेनेपर 
शरीर और इन्द्रियाँमै जैसी ताजगी आती है, वैसी ताजगी 
वृद्धावस्थामें नींद लेनेपर नहीं आती अर्थात्‌ वृद्धावस्थामें 
बाल्य और युवा-अवस्था-जैसा विश्राम नहीं मिलता। इस 
रीतिसे भी कारणशरीरका परिवर्तन सिद्ध होता है। 

जिसको दूसरा-देवता, पशु, पक्षी आदिका शरीर 
मिलता है, उसको उस शरीरमें (देहाध्यासके कारण) “मैं 
यही हूँ'-एऐसा अनुभव होता है, तो यह सूक्ष्मशरीरका 
परिवर्तन हो गया। ऐसे ही कारणशरीरमें स्वभाव (प्रकृति) 
रहता है, जिसको स्थूल दृष्टिसे आदत कहते हैं। बह आदत 
देवताकी और होती है तथा पशु-पक्षी आदिकी और होती 
है, तो यह कारणशरीरका परिवर्तन हो गया। 

अगर शरीरी-(देही-) का परिवर्तन होता, तो अवस्थाओंके 
बदलनेपर भी “मैं बही हूँ'-एऐसा ज्ञान नहीं होता। परन्तु 
अवस्थाओंके बदलनेपर भी “जो पहले बालक था, जवान 
था, वही मैं अब हूँ'-ऐसा ज्ञान होता है। इससे सिद्ध होता 
है कि शरीरीमें अर्थात्‌ स्वयंमें परिवर्तन नहीं हुआ है। 

यहाँ एक शंका हो सकती है कि स्थूलशरीरकी 
अवस्थाओंके बदलनेपर तो उनका ज्ञान होता है, पर 
शरीरान्तरकी प्राप्ति होनेपर पहलेके शरीरका ज्ञान क्यों 
नहीं होता? पूर्वशरीरका ज्ञान न होनेमें कारण यह है कि 
मृत्यु और जन्मके समय बहुत ज्यादा कष्ट होता है। उस 
कष्टके कारण बुद्धिमें पूर्वजन्मको स्मृति नहीं रहती। 
जैसे लकवा मार जानेपर, अधिक वृद्धावस्था होनेपर बुद्धिमें 
पहले जैसा ज्ञान नहीं रहता, ऐसे ही मृत्युकालमें तथा 
जन्मकालमें बहुत बड़ा धक्का लगनेपर पूर्वजन्मका ज्ञान नहीं 
रहता। परन्तु जिसकी मृत्युमें ऐसा कष्ट नहीं होता अर्थात्‌ 
शरीरको अवस्थान्तरकी प्राप्तिको तरह अनायास ही देहान्तरकी 
प्राप्ति हो जाती है, उसको बुद्धिमें पूर्वजन्मको स्मृति रह 
सकती है”। 

अब विचार करें कि जैसा ज्ञान अवस्थान्तरकी प्राप्तिमें 


९-देहान्तरकी प्राप्ति होनेपर स्थूलशरीर तो छूट जाता है, पर मुक्तिसे पहले सूक्ष्म और कारणशरीर नहीं छूटते। जबतक 
मुक्ति न हो तबतक सूक्ष्म और कारणशरीरके साथ सम्बन्ध बना रहता है। 
२-शास्त्रमे इस ज्ञानको 'प्रत्यभिज्ञा' कहा गया है-'तत्तेदन्तावगाहि ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा '। 
३-म्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधीः। ( श्रीमद्भा० ३। ३०। १८) 
“मनुष्य रोते हुए स्वजनोंके बीच अत्यन्त वेदनासे अचेत होकर मृत्युको प्राप्त होता है।' 
विनिष्क्रामति कृच्छेण निरुच्छ्वासो हतस्मृतिः॥ ( श्रीमद्भा० ३। ३१। २३) 
“जन्मके समय उसके श्वासकी गति रुक जाती है और पूर्वस्मृति नष्ट हो जाती है।' 
४-ये मृताः सहसा मर्त्या जायन्ते सहसा पुनः । तेषां पौराणिकोऽभ्यासः कञ्चित्‌ कालं हि तिष्ठति॥ 
तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः। तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत्‌ सा प्रणश्यति॥ 


( महाभारत, अनुशासन० १४५ ) 


श्लोक १३] 


होता है, वैसा ज्ञान देहान्तरकी प्राप्तिमें नहीं होता; परन्तु 'मैं 
हूँ" इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान तो सबको रहता है । जैसे, 
सुषुप्ति-(गाढ-निद्रा-) में अपना कुछ भी ज्ञान नहीं रहता, 
पर जगनेपर मनुष्य कहता है कि ऐसी गाढ़ नींद आयी कि 
मेरेको कुछ पता नहीं रहा, तो ' कुछ पता नहीं रहा'-इसका 
ज्ञान तो है ही। सोनेसे पहले मैं जो था, वही मैं जगनेके बाद 
हूँ, तो सुषुप्तिके समय भी मैं वही था--इस प्रकार अपनी 
सत्ताका ज्ञान अखण्डरूपसे निरन्तर रहता है। अपनी सत्ताके 
अभावका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता। शरीरधारीकी 
सत्ताका सद्भाव अखण्डरूपसे रहता है, तभी तो मुक्ति होती 
है और मुक्त-अवस्थामें वह रहता है। हाँ, जीवन्मुक्त 
अवस्थामें उसको शरीरान्तरोंका ज्ञान भले ही न हो, पर मैं 
तीनों शरीरोंसे अलग हूँ--ऐसा अनुभव तो होता ही है। 

' धीरस्तत्र न मुहाति '--धीर वही है, जिसको सत्‌- 


* साधक-संजीवनी * 





८३ 


असतूका बोध हो गया है। ऐसा धीर मनुष्य उस विषयमें 
कभी मोहित नहीं होता, उसको कभी सन्देह नहीं होता। 
इसका अर्थ यह नहीं है कि उस धीर मनुष्यको देहान्तरकी 
प्राप्ति होती है। ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होनेका कारण 
गुणोंका संग है और गुणोंसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर धीर 
मनुष्यको देहान्तरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती। 

यहाँ “तत्र' पदका अर्थ ' देहान्तर-प्राप्तिके विषयमें' 
नहीं है, प्रत्युत ' देह-देहीके विषयमें ' है। तात्पर्य है कि देह 
क्या है? देही क्या है? परिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील 
क्या है? अनित्य क्या है? नित्य क्या है? असत्‌ क्या है? 
सत्‌ क्या है? विकारी क्या है? अविकारी क्या है ?-इस 
विषयमे वह मोहित नहीं होता। देह और देही सर्वथा अलग 
हैं-इस विषयमें उसको कभी मोह नहीं होता। उसको 
अपनी असंगताका अखण्ड ज्ञान रहता है। 


परिशिष्ट भाव--शरीर कभी एकरूप रहता ही नहीं और सत्ता कभी अनेकरूप होती ही नहीं। शरीर जन्मसे 
पहले भी नहीं था, मरनेके बाद भी नहीं रहेगा तथा वर्तमानमें भी वह प्रतिक्षण मर रहा है। वास्तवमें गर्भमै आते ही 
शरीरके मरनेका क्रम (परिवर्तन) शुरू हो जाता है। बाल्यावस्था मर जाय तो युवावस्था आ जाती है, युवावस्था मर 
जाय तो वृद्धावस्था आ जाती है और वृद्धावस्था मर जाय तो देहान्तर-अवस्था अर्थात्‌ दूसरे शरीरकी प्राप्ति हो जाती 
है। ये सब अवस्थाएँ शरीरकी हैं। बाल, युवा और वृद्धये तीन अवस्थाएँ स्थूलशरीरकी हैं और देहान्तरकी प्राप्ति 
सूक्ष्मशरीर तथा कारणशरीरकी है। परन्तु स्वरूपकी चिन्मय सत्ता इन सभी अवस्थाओंसे अतीत है। अवस्थाएँ बदलती 
हैं, स्वरूप वही रहता है। इस प्रकार शरीर-विभाग और सत्ता-विभागको अलग-अलग जाननेवाला तत्त्वज्ञ पुरुष कभी 
किसी अवस्थामें भी मोहित नहीं होता। 
जीव अपने कर्मोका फल भोगनेके लिये अनेक योनियोंमें जाता है, नरक और स्वर्गमें जाता है--ऐसा कहनेमात्रसे सिद्ध 
होता है कि चौरासी लाख योनियाँ छूट जाती हैं, स्वर्ग और नरक छूट जाते हैं, पर स्वयं (शरीरी) वही रहता है। योनियाँ 
(शरीर) बदलती हैं, जीव (शरीरी) नहीं बदलता। जीव एक रहता है, तभी तो वह अनेक योनियाँमें, अनेक लोकोंमें जाता 
है। जो अनेक योनियोंमें जाता है, वह स्वयं किसीके साथ लिप्त नहीं होता, कहीं नहीं फँसता। अगर वह लिप्त हो जाय, 
फँस जाय तो फिर चौरासी लाख योनियोंको कौन भोगेगा ? स्वर्ग और नरकमें कौन जायगा? मुक्त कौन होगा? 
जन्मना और मरना हमारा धर्म नहीं है, प्रत्युत शरीरका धर्म है। हमारी आयु अनादि और अनन्त है, जिसके 
अन्तर्गत अनेक शरीर उत्पन्न होते और मरते रहते हैं। जैसे हम अनेक वस्त्र बदलते रहते हैं, पर वस्त्र बदलनेपर 
हम नहीं बदलते, प्रत्युत वे-के-वे ही रहते हैं (गीता-दूसरे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक) | ऐसे ही अनेक योनियोंमें 
जानेपर भी हमारी सत्ता नित्य-निरन्तर ज्याँ-की-त्यों रहती है। तात्पर्य है कि हमारी स्वतन्त्रता और असंगता स्वत:सिद्ध 
है। हमारा जीवन किसी एक शरीरके अधीन नहीं है। असंग होनेके कारण ही हम अनेक शरीरोंमें जानेपर भी वही रहते 
हैं, पर शरीरके साथ संग मान लेनेके कारण हम अनेक शरीरोंको धारण करते रहते हैं। माना हुआ संग तो टिकता नहीं, 
पर हम नया-नया संग पकडते रहते हैं। अगर नया संग न पकड़ें तो मुक्ति (असंगता), स्वाधीनता स्वत:सिद्ध है। 





सम्बन्ध-अनित्य वस्तु शरीर आदिको लेकर जो शोक होता है; उसकी निवृत्तिके लिये कहते हैं-- 


“जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक 
बना रहता है। इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर कहलाते हैं। फिर ज्यों- 
ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों-त्यों उनकी स्वप्न-जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है।' 


८४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु:खदा: । 
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥ १४॥ 

कौन्तेय = हे कुन्तीनन्दन ! और उष्ण (और) 

मात्रास्पर्शा: =इन्द्रियोंके विषय (प्रतिकूलता)-के | अनित्याः = अनित्य हैं। 

(जड़ पदार्थ) द्वारा सुख और भारत =हे भरतवंशोद्भव 

तु =तो दुःख देनेवाले हैं अर्जुन! 

शीतोष्ण- (तथा) तान्‌ =उनको (तुम) 

सुखदुःखदाः =शीत (अनुकूलता) | आगमापायिनः =आने-जानेवाले तितिक्षस्व =सहन करो। 


व्याख्या-[यहाँ एक शंका होती है कि इन चौदहवें- 
पंद्रहवें श्लोकांसे पहले (ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक) 
और आगे (सोलहवेंसे तीसवें श्लोकतक) देही और 
देह-इन दोनोंका ही प्रकरण है। फिर बीचमें ' मात्रास्पर्श' 
के ये दो श्लोक (प्रकरणसे अलग ) कैसे आये ? इसका 
समाधान यह है कि जैसे बारहवें श्लोकमें भगवानूने सम्पूर्ण 
जीवोंके नित्य-स्वरूपको बतानेके लिये “किसी कालमें मैं 
नहीं था, ऐसी बात नहीं है'-एऐसा कहकर अपनेको 
उन्हींको पंक्तिमें रख दिया, ऐसे ही शरीर आदि मात्र प्राकृत 
पदार्थोंको अनित्य, विनाशी, परिवर्तनशील बतानेके लिये 
भगवानूने यहाँ 'मात्रास्पर्श' की बात कही है।] 

'तु'-नित्य-तत्त्वसे देहादि अनित्य वस्तुओंको अलग 
बतानेके लिये यहाँ “तु' पद आया है। 

“मात्रास्पर्शा: जिनसे माप-तौल होता है अर्थात्‌ 
जिनसे ज्ञान होता है, उन (ज्ञानके साधन) इन्द्रियां और 
अन्तःकरणका नाम 'मात्रा' है। मात्रासे अर्थात्‌ इन्द्रियों और 
अन्तःकरणसे जिनका संयोग होता है, उनका नाम “स्पर्श? 
है। अतः इन्द्रियों और अन्त:करणसे जिनका ज्ञान होता है, 
ऐसे सृष्टिके मात्र पदार्थ 'मात्रास्पर्शाः ' हैं। 

यहाँ “मात्रास्पर्शा: ' पदसे केवल पदार्थ ही क्यों लिये 
जायँ, पदार्थोंका सम्बन्ध क्यों न लिया जाय ? अगर हम यहाँ 
'मात्रास्पर्शाः ' पदसे केवल पदार्थोका सम्बन्ध ही लें, तो 
उस सम्बन्धको ' आगमापायिनः ' (आने-जानेवाला) नहीं 
कह सकते; क्योंकि सम्बन्धको स्वीकृति केवल अन्तःकरणमें 
न होकर स्वयंमें (अहममें) होती है। स्वयं नित्य है, इसलिये 
उसमें जो स्वीकृति हो जाती है, वह भी नित्य-जैसी ही हो 





जाती है। स्वयं जबतक उस स्वीकृतिको नहीं छोड़ता, 
तबतक वह स्वीकृति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है अर्थात्‌ 
पदार्थोका वियोग हो जानेपर भी, पदार्थोके न रहनेपर भी, 
उन पदार्थोंका सम्बन्ध बना रहता है।* जैसे, कोई स्त्री 
विधवा हो गयी है अर्थात्‌ उसका पतिसे सदाके लिये वियोग 
हो गया है, पर पचास वर्षके बाद भी उसको कोई कहता है 
कि यह अमुककी स्त्री है, तो उसके कान खड़े हो जाते हैं! 
इससे सिद्ध हुआ कि सम्बन्धी-(पति-) के न रहनेपर भी 
उसके साथ माना हुआ सम्बन्ध सदा बना रहता है। इस 
दृष्टिसे उस सम्बन्धको आने-जानेवाला कहना बनता नहीं; 
अतः यहाँ मात्रास्पर्शा: ' पदसे पदार्थोका सम्बन्ध न लेकर 
मात्र पदार्थ लिये गये हैं। 

“शीतोष्णसुखदुःखदाः '—यहाँ शीत और उष्ण शब्द 
अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं। अगर इनका अर्थ 
सरदी और गरमी लिया जाय तो ये केवल त्वगिन्द्रिय- 
(त्वचा-)के विषय हो जायँगे, जो कि एकदेशीय हैं। अत: 
शीतका अर्थ अनुकूलता और उष्णका अर्थ प्रतिकूलता लेना 
ही ठीक मालूम देता है। 

मात्र पदार्थ अनुकूलता-प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दुःख 
देनेवाले हैं अर्थात्‌ जिसको हम चाहते हैं, ऐसी अनुकूल 
वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, देश, काल आदिके 
मिलनेसे सुख होता है और जिसको हम नहीं चाहते, ऐसी 
प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिके मिलनेसे 
दुःख होता है। यहाँ अनुकूलता-प्रतिकूलता कारण हैं और 
सुख-दुःख कार्य हैं। वास्तवमें देखा जाय तो इन पदार्थोमें 
सुख-दुःख देनेकी सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य इनके साथ 


* यह माना हुआ सम्बन्ध केवल अस्वीकृतिसे अर्थात्‌ अपनेमें न माननेसे ही मिटता है। अपने सत्स्वरूपमें सम्बन्ध है नहीं, 
हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं; परन्तु माने हुए सम्बन्धको अस्वीकृतिके बिना कितना ही त्याग किया जाय, कितना ही 
कष्ट भोगा जाय, शरीरमें कितना ही परिवर्तन हो जाय, कितनी ही तपस्या की जाय, तो भी माना हुआ सम्बन्ध मिटता नहीं, 


प्रत्युत ज्यों-का-त्यों ही बना रहता है। 


श्लोक १४] 


सम्बन्ध जोड़कर इनमें अनुकूलता-प्रतिकूलताकी भावना 
कर लेता है, जिससे ये पदार्थ सुख-दुःख देनेवाले दीखते 
हैं। अतः भगवानूने यहाँ 'सुखदुःखदाः' कहा है। 

“आगमापायिनः '--मात्र पदार्थ आदि-अन्तवाले, उत्पत्ति- 
विनाशशील और आने-जानेवाले हैं। वे ठहरनेवाले नहीं हैं; 
क्योंकि वे उत्पत्तिसे पहले नहीं थे और विनाशके बाद भी 
नहीं रहेंगे। इसलिये वे ' आगमापायी ' हैं। 

' अनित्याः '--अगर कोई कहे कि वे उत्पत्तिसे पहले 
और विनाशके बाद भले ही न हों, पर मध्यमें तो रहते 
ही होंगे? तो भगवान्‌ कहते हैं कि अनित्य होनेसे वे 
मध्यमें भी नहीं रहते। वे प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। इतनी 
तेजीसे बदलते हैं कि उनको उसी रूपमें दुबारा कोई देख 
ही नहीं सकता; क्योंकि पहले क्षण वे जैसे थे, दूसरे क्षण 
वे वैसे रहते ही नहीं। इसलिये भगवानूने उनको ' अनित्याः ' 
कहा है। 

केवल वे पदार्थ ही अनित्य, परिवर्तनशील नहीं हैं, 
प्रत्युत जिनसे उन पदार्थोंका ज्ञान होता है, वे इन्द्रियाँ और 
अन्तःकरण भी परिवर्तनशील हैं। उनके परिवर्तनको कैसे 
समझें ? जैसे दिनमें काम करते-करते शामतक इन्द्रियों 
आदिमें थकावट आ जाती है, और सबेरे तृप्तिपूर्वक नींद 
लेनेपर उनमें जो ताजगी आयी थी, वह शामतक नहीं 
रहती। इसलिये पुनः नींद लेनी पड़ती है, जिससे इन्द्रियोंकी 
थकावट मिटती है और ताजगीका अनुभव होता है। जैसे 


* साधक-संजीवनी * 





८५ 


जाग्रत्‌-अवस्थामें प्रतिक्षण थकावट आती रहती है, ऐसे ही 
नींदमें प्रतिक्षण ताजगी आती रहती है। इससे सिद्ध हुआ 
कि इन्द्रियां आदिमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। 

[यहाँ मात्र पदार्थोंको स्थूलरूपसे ' आगमापायिनः ' 
और सूक्ष्मरूपसे 'अनित्याः' कहा गया है। इनको 
अनित्यसे भी सूक्ष्म बतानेके लिये आगे सोलहवें श्लोकमें 
इनको 'असत्‌' कहेंगे और पहले जिस नित्य-तत्त्वका 
वर्णन हुआ है, उसको 'सत्‌' कहेंगे।] 

“तांस्तितिक्षस्व "--ये जितने मात्रास्पर्श अर्थात्‌ इन्द्रियोंके 
विषय हैं, उनके सामने आनेपर “यह अनुकूल है और यह 
प्रतिकूल है'— ऐसा ज्ञान होना दोषी नहीं है, प्रत्युत उनको 
लेकर अन्तःकरणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकार पैदा 
होना ही दोषी है। अतः अनुकूलता-प्रतिकूलताका ज्ञान 
होनेपर भी राग-द्वेषादि विकारोंको पैदा न होने देना अर्थात्‌ 
मात्रास्पर्शोमें निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इस 
सहनेको ही भगवानूने “तितिक्षस्व' कहा है। 

दूसरा भाव यह है कि शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण 
आदिकी क्रियाओंका, अवस्थाओंका आरम्भ और अन्त 
होता है तथा उनका भाव और अभाव होता है। वे क्रियाएँ, 
अवस्थाएँ तुम्हारेमें नहीं हैं; क्योंकि तुम उनको जाननेवाले 
हो, उनसे अलग हो। तुम स्वयं ज्यों-के-त्यों रहते हो। 
अतः उन क्रियाओंमें, अवस्थाओंमें तुम निर्विकार रहो। 
इनमें निर्विकार रहना ही तितिक्षा है। 


परिशिष्ट भाव--जैसे शरीर कभी एकरूप नहीं रहता, प्रतिक्षण बदलता रहता है, ऐसे ही इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे 


जिनका ज्ञान होता है, वे सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थ (मात्र प्रकृति और प्रकृतिका कार्य) भी कभी एकरूप नहीं रहते, 
उनका संयोग और वियोग होता रहता है। जिन पदार्थोंको हम चाहते हैं, उनके संयोगसे सुख होता है और वियोगसे 
दुःख होता है। जिन पदार्थोको हम नहीं चाहते, उनके वियोगसे सुख होता है और संयोगसे दु:ख होता है। पदार्थ 
भी आने-जानेवाले तथा अनित्य हैं। ऐसे ही जिनसे पदार्थोंका ज्ञान होता है, वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण भी आने- 
जानेवाले तथा अनित्य हैं और पदार्थोसे होनेवाला सुख-दुःख भी आने-जानेवाला तथा अनित्य है। परन्तु स्वयं सदा 
ज्याँ-का-त्यों रहनेवाला, निर्विकार तथा नित्य है। अतः उनको सह लेना चाहिये। अर्थात्‌ उनके संयोग-वियोगको लेकर 
सुखी-दुःखी नहीं होना चाहिये, प्रत्युत निर्विकार रहना चाहिये। सुख और दुःख दोनों अलग-अलग होते हैं, पर उनको 
देखनेवाला एक ही होता है और उन दोनोंसे अलग (निर्विकार) होता है। परिवर्तनशीलको देखनेसे स्वयं (स्वरूप) 
को अपरिवर्तनशीलता (निर्विकारता)-का अनुभव स्वतः होता है। 

यहाँ “शीत' शब्द अनुकूलताका और 'उष्ण' शब्द प्रतिकूलताका वाचक है। तात्पर्य है कि ज्यादा सर्दी (ठण्ड) 
पड्नेसे भी वृक्ष सूख जाता है और ज्यादा गर्मी पड्नेसे भी वृक्ष सूख जाता है; अतः परिणाममें सर्दी और गर्मी 
दोनों एक ही हैं। इसी तरह अनुकूलता और प्रतिकूलता भी एक ही हैं। इसलिये भगवान्‌ इन दोनोंको ही सहनेकी 
अर्थात्‌ इनसे ऊँचा उठनेकी आज्ञा देते हैं। 

सुख-दुःख, हर्ष-शोक, राग-द्वेष, काम-क्रोध आदि आने-जानेवाले, बदलनेवाले हैं, पर स्वयं (स्वरूप) ज्यों-का- 
त्यों रहनेवाला है। साधकसे यह बहुत बड़ी भूल होती है कि वह बदलनेवाली दशाको देखता है, पर स्वयंको नहीं देखता। 


८६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 


दशाको स्वीकार करता है, पर स्वयंको स्वीकार नहीं करता। दशा पहले भी नहीं थी और पीछे भी नहीं रहेगी; अतः बीचमें 
दीखनेपर भी वह है नहीं। परन्तु स्वयंम आदि, अन्त और मध्य है ही नहीं। दशा कभी एकरूप रहती ही नहीं और स्वयं 
कभी अनेकरूप होता ही नहीं। जो दीखता है, वह भी दशा है और जो देखनेवाली (बुद्धि) है, वह भी दशा है। जाननेमें 
आनेवाली भी दशा है, और जाननेवाली भी दशा है। स्वयंमें न दीखनेवाला है, न देखनेवाला है; न जाननेमें आनेवाला है, 
न जाननेवाला है। ये दीखनेवाला-देखनेवाला आदि सब दशाके अन्तर्गत हैं। दीखनेवाला-देखनेवाला तो नहीं रहेंगे, पर स्वयं 
रहेगा; क्योंकि दशा तो मिट जायगी, पर स्वयं रह जायगा। तात्पर्य है कि दीखनेवाले' (दृश्य) के साथ सम्बन्ध होनेसे 
ही स्वयं ' देखनेवाला' (द्रष्टा) कहलाता है। अगर ' दीखनेवाले' के साथ सम्बन्ध न रहे तो स्वयं रहेगा, पर उसका नाम 
“ देखनेवाला' नहीं रहेगा । इसी तरह ' शरीर' के साथ सम्बन्ध होनेसे ही स्वयं (चिन्मय सत्ता) 'शरीरी कहलाता है। अगर 
“शरीर' के साथ सम्बन्ध न रहे तो स्वयं रहेगा, पर उसका नाम 'शरीरी' नहीं रहेगा (गीता-तेरहवें अध्यायका पहला 
श्लोक) । अतः भगवानूने केवल मनुष्योंको समझानेके लिये ही “शरीरी ' नाम कहा है। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोकमें मात्रास्पर्शोकी तितिक्षाकी बात कही। अब ऐसी तितिक्षासे क्या होगा-इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं। 


यं हि न व्यथयन्त्येते 


पुरुषं पुरुषर्षभ। 


समदुःखसुरख्रं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १५॥ 


हि =कारण कि धीरम्‌ = बुद्धिमान्‌ नहीं करते, 
पुरुषर्षभ हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ | पुरुषम्‌ = मनुष्यको सः =वह 
अर्जुन! एते =ये मात्रास्पर्श अमृतत्वाय = अमर होनेमें 
समदुःखसुखम्‌ = सुख-दुः खमे (पदार्थ) कल्पते = समर्थ हो जाता है 
सम रहनेवाले न, व्यथयन्ति = विचलित अर्थात्‌ वह अमर 
यम्‌ =जिस (सुखी-दुःखी) हो जाता है। 


व्याख्या-- पुरुषर्षभ '-- मनुष्य प्रायः परिस्थितियोंको 
बदलनेका ही विचार करता है, जो कभी बदली नहीं जा 
सकतीं और जिनको बदलना सम्भव ही नहीं। युद्धरूपी 
परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अर्जुनने उसको बदलनेका विचार 
न करके अपने कल्याणका विचार कर लिया है। यह 
कल्याणका विचार करना ही मनुष्योंमे उनकी श्रेष्ठता है। 
'समदुःखसुखं धीरम्‌'धीर मनुष्य सुख-दुःखमें 
सम होता है। अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही सुख और दुःख-- 
ये दोनों अलग-अलग दीखते हैं। सुख-दुःखके भोगनेमें 
पुरुष (चेतन) हेतु है, और वह हेतु बनता है प्रकृतिमें 
स्थित होनेसे (गीता--तेरहवें अध्यायका बीसवाँ-इक्कीसवाँ 
श्लोक) । जब वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब 
सुख-दुःखको भोगनेवाला कोई नहीं रहता। अतः अपने- 
आपमें स्थित होनेसे वह सुख-दुःखमें स्वाभाविक ही सम 
हो जाता है। 
'यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषम्‌'-धीर मनुष्यको ये 
मात्रास्पर्श अर्थात्‌ प्रकृतिके मात्र पदार्थ व्यथा नहीं पहुँचाते । 
प्राकृत पदार्थोके संयोगसे जो सुख होता है, वह भी व्यथा 





है और उन पदार्थोके वियोगसे जो दुःख होता है, वह भी 
व्यथा है। परन्तु जिसकी दृष्टि समताकी तरफ है, उसको 
ये प्राकृत पदार्थ सुखी-दुःखी नहीं कर सकते। समताको 
तरफ दृष्टि रहनेसे अनुकूलताको लेकर उस सुखका ज्ञान 
तो होता है, पर उसका भोग न होनेसे अन्तःकरणमें उस 
सुखका स्थायी रूपसे संस्कार नहीं पड़ता। ऐसे ही 
प्रतिकूलता आनेपर उस दुःखका ज्ञान तो होता है, पर 
उसका भोग न होनेसे अन्त: करणमें उस दुःखका स्थायीरूपसे 
संस्कार नहीं पड़ता। इस प्रकार सुख-दु:खके संस्कार न 
पड्नेसे वह व्यथित नहीं होता। तात्पर्यं यह हुआ कि 
अन्तःकरणमें सुख-दुःखका ज्ञान होनेसे वह स्वयं सुखी- 
दुःखी नहीं होता। 

“सोऽमृतत्वाय कल्पते '--ऐसा धीर मनुष्य अमरताके 
योग्य हो जाता है अर्थात्‌ उसमें अमरता प्राप्त करनेकी 
सामर्थ्य आ जाती है। सामर्थ्य, योग्यता आनेपर वह अमर 
हो ही जाता है, इसमें देरीका कोई काम नहीं। कारण कि 
उसकी अमरता तो स्वत:सिद्ध है। केवल पदार्थोके संयोग- 
वियोगसे जो आपनेमें विकार मानता था, यही गलती थी। 


श्लोक १५] 


विशेष बात 
यह मनुष्य-योनि सुख-दुःख भोगनेके लिये नहीं मिली 
है, प्रत्युत सुख-दुःखसे ऊँचा उठकर महान्‌ आनन्द, परम 
शान्तिकी प्राप्तिक लिये मिली है, जिस आनन्द, सुख- 
शान्तिके प्राप्त होनेके बाद और कुछ प्राप्त करना बाकी 
नहीं रहता (गीता ६। २२) । अगर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, 
परिस्थिति आदिके होनेमें अथवा उनकी सम्भावनामें हम 
सुखी होंगे अर्थात्‌ हमारे भीतर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति 
आदिको प्राप्त करनेकी कामना, लोलुपता रहेगी तो हम 
अनुकूलताका सदुपयोग नहीं कर सकेंगे। अनुकूलताका 
सदुपयोग करनेकी सामर्थ्य, शक्ति हमें प्राप्त नहीं हो 
सकेगी। कारण कि अनुकूलताका सदुपयोग करनेकी शक्ति 
अनुकूलताके भोगमें खर्च हो जायगी, जिससे अनुकूलताका 
सदुपयोग नहीं होगा; किन्तु भोग ही होगा। इसी रीतिसे 
प्रतिकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना, क्रिया आदिके 
आनेपर अथवा उनकी आशंकासे हम दुःखी होंगे तो 
प्रतिकूलताका सदुपयोग नहीं होगा; किन्तु भोग ही होगा। 
दुःखको सहनेकी सामर्थ्य हमारेमें नहीं रहेगी। अत: हम 
प्रतिकूलताके भोगमें ही फँसे रहेंगे और दुःखी होते रहेंगे। 
अगर अनुकूल वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति, घटना 
आदिके प्राप्त होनेपर सुख-सामग्रीका अपने सुख, आराम, 
सुविधाके लिये उपयोग करेंगे और उससे राजी होंगे तो 
यह अनुकूलताका भोग हुआ। परन्तु निर्वाह-बुद्धिसे उपयोग 
करते हुए उस सुख-सामग्रीको अभावग्रस्तांको सेवामें लगा 
दें तो यह अनुकूलताका सदुपयोग हुआ। अतः सुख- 
सामग्रीको दुःखियोंकी ही समझें। उसमें दु:खियोंका ही 
हक है। मान लो कि हम लखपति हैं तो हमें लखपति 
होनेका सुख होता है, अभिमान होता है। परन्तु यह सब 
तब होता है, जब हमारे सामने कोई लखपति न हो। अगर 
हमारे सामने, हमारे देखने-सुननेमें जो आते हैं, वे सब- 
के-सब करोड़पति हों, तो क्या हमें लखपति होनेका सुख 
मिलेगा? बिलकुल नहीं मिलेगा। अतः हमें लखपति 
होनेका सुख तो अभावग्रस्तोंने, दरिद्रोने ही दिया है। अगर 
हम मिली हुई सुख-सामग्रीसे अभावग्रस्तांको सेवा न करके 
स्वयं सुख भोगते हैं, तो हम कृतध्न होते हैं। इसीसे सब 
अनर्थ पैदा होते हैं। कारण कि हमारे पास जो सुख-सामग्री 
है, वह दु:खी आदमियाँकी ही दी हुई है। अत: उस सुख- 
सामग्रीको दुःखियोंकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य 
होता है। 


* साधक-संजीवनी * 





८७9 


अब विचार यह करना है कि प्रतिकूलताका सदुपयोग 
कैसे किया जाय ? दुःखका कारण सुखकी इच्छा, आशा 
ही है। प्रतिकूल परिस्थिति दुःखदायी तभी होती है, जब 
भीतर सुखकी इच्छा रहती है। अगर हम सावधानीके साथ 
अनुकूलताकी इच्छाका, सुखकी आशाका त्याग कर दें, तो 
फिर हमें प्रतिकूल परिस्थितिमें दुःख नहीं हो सकता अर्थात्‌ 
हमें प्रतिकूल परिस्थिति दुःखी नहीं कर सकती। जैसे, 
रोगीको कड़वी-से-कड़वी दवाई लेनी पड़े, तो भी उसे 
दुःख नहीं होता, प्रत्युत इस बातको लेकर प्रसन्नता होती 
है कि इस दवाईसे मेरा रोग नष्ट हो रहा है। ऐसे ही पैरमें 
काँटा गहरा गड़ जाय और काँटा निकालनेवाला उसे 
निकालनेके लिये सुईसे गहरा घाव बनाये तो बड़ी पीड़ा 
होती है। उस पीड़ासे वह सिसकता है, घबराता है, पर 
वह काँटा निकालनेवालेको यह कभी नहीं कहता कि भाई, 
तुम छोड़ दो, काँटा मत निकालो। काँटा निकल जायगा, 
सदाके लिये पीड़ा दूर हो जायगी-इस बातको लेकर वह 
इस पीडाको प्रसन्नतापूर्वक सह लेता है। यह जो सुखको 
इच्छाका त्याग करके दुःखको, पीडाको प्रसन्नतापूर्वक 
सहना है यह प्रतिकूलताका सदुपयोग है। अगर वह कडवी 
दवाई लेनेसे, काँटा निकालनेकी पीड़ासे दुःखी हो जाता है, 
तो यह प्रतिकूलताका भोग है, जिससे उसको भयंकर दुःख 
पाना पड़ेगा। 
यदि हम सुख-दुःखका उपभोग करते रहेंगे, तो 
भविष्यमें हमें भोग-योनियोंमें अर्थात्‌ स्वर्ग, नरक आदिमें 
जाना ही पड़ेगा। कारण कि सुख-दु:ख भोगनेके स्थान ये 
स्वर्ग, नरक आदि ही हैं। यदि हम सुख-दु:खका भोग 
करते हैं, सुख-दुःखमें सम नहीं रहते, सुख-दु:खसे ऊँचे 
नहीं उठते, तो हम मुक्तिके पात्र कैसे होंगे ? नहीं हो सकते। 
चौदहवें श्लोकमें भगवानूने कहा कि ये सांसारिक पदार्थ 
आदि अनुकूलता-प्रतिकूलताके द्वारा सुख-दुःख देनेवाले 
और आने-जानेवाले हैं, सदा रहनेवाले नहीं हैं; क्योंकि ये 
अनित्य हैं, क्षणभंगुर हैं। इनके प्राप्त होनेपर उसी क्षण इनका 
नष्ट होना शुरू हो जाता है। इनका संयोग होते ही इनसे 
वियोग होना शुरू हो जाता है। ये पहले नहीं थे, पीछे नहीं 
रहेंगे और वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। इनको 
भोगकर हम केवल अपना स्वभाव बिगाड़ रहे हैं, सुख- 
दुःखके भोगी बनते जा रहे हैं। सुख-दु:खके भोगी बनकर 
हम भोगयोनिके ही पात्र बनते जा रहे हैं, फिर हमें मुक्ति कैसे 
मिलेगी ? हमें भुक्ति-(भोग-) की ही रुचि है, तो फिर 


८८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 
भगवान्‌ हमें मुक्ति कैसे देंगे ? उनका सदुपयोग करेंगे, तो हम सुख-दुःखसे ऊँचे उठ 
इस प्रकार यदि हम सुख-दुःखका उपभोग न करके | जायँगे और महान्‌ आनन्दका अनुभव कर लेंगे। 
परिशिष्ट भाव--स्वरूप सत्तारूप है। सत्तामें कोई व्यथा नहीं है। शरीरमें अपनी स्थिति माननेसे ही व्यथा 
होती है। अतः शरीरमें अपनी स्थिति मानते हुए कोई भी मनुष्य व्यथारहित नहीं हो सकता। व्यथारहित होनेका तात्पर्य 
है-- प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न होना और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न होना (गीता--पाँचवें अध्यायका बीसवाँ 
श्लोक) । व्यथारहित होनेसे मनुष्यको बुद्धि स्थिर हो जाती है-“ स्थिरबुद्धिरसम्मूढः ' (गीता ५। २०)। 
सुखदायी-दुःखदायी परिस्थितिसे सुखी-दुःखी होना ही व्यथित होना है। सुखी-दुःखी होना सुख-दुःखका भोग 
है। भोगी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। साधकको सुख-दुःखका भोग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत सुख-दुःखका 
सदुपयोग करना चाहिये । सुखदायी-दुःखदायी परिस्थितिका प्राप्त होना प्रारब्ध है और उस परिस्थितिको साधन-सामग्री 
मानकर उसका सदुपयोग करना वास्तविक पुरुषार्थ है। इस पुरुषार्थसे अमरताकी प्राप्ति हो जाती है। सुखका सदुपयोग 
है--दूसरोंको सुख पहुँचाना, उनकी सेवा करना और दुःखका सदुपयोग है-सुखकी इच्छाका त्याग करना। दुःखका 
सदुपयोग करनेपर साधक दु:खके कारणको खोज करता है। दुःखका कारण है-सुखकी इच्छा--' ये हि संस्पर्शजा 
भोगा दुःखयोनय एव ते' (गीता ५। २२) | जो सुख-दुःखका भोग करता है, उस भोगीका पतन हो जाता है और 
जो सुख-दुःखका सदुपयोग करता है, वह योगी सुख-दुःख दोनोंसे ऊँचे उठकर अमरताका अनुभव कर लेता है। 





सम्बन्ध-- अबतक देह-देहीका जो विवेचन हुआ है; उसीको भगवान्‌ दूसरे शब्दोंसे आगेके तीन श्लोकोंगें कहते हैं। 


नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। 
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥ १६ ॥ 


असतः = असत्का तो अभावः = अभाव उभयोः = दोनोंका 
भावः = भाव (सत्ता) न, विद्यते =विद्यमान अपि नही 
न, विद्यते = विद्यमान नहीं है। अन्तः = तत्त्व 

नहीं है तत्त्वदर्शिभिः = तत्त्वदर्शी दृष्टः =देखा अर्थात्‌ 
तु = और महापुरुषोंने अनुभव किया 
सतः = सत्‌का अनयोः =इन है। 


व्याख्या-[यहाँ (पूर्वार्धमें) भगवानूने ' भू सत्तायाम्‌' 
(भावः, अभावः ), ' अस्‌ भुवि’ ( असतः, सतः ) 
और “विद्‌ सत्तायाम्‌' ( विद्यते )--इन तीन सत्तावाचक 
धातुओंका प्रयोग किया है। इन तीनोंके प्रयोगका तात्पर्य 
नित्य-तत्त्वकी ओर लक्ष्य करानेमें ही है।] 

“नासतो विद्यते भावः’ शरीर उत्पत्तिके पहले भी 
नहीं था, मरनेके बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी 
इसका क्षण-प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तात्पर्य है कि यह 
शरीर भूत, भविष्य और वर्तमान-इन तीनों कालोंमें कभी 
भावरूपसे नहीं रहता। अतः यह असत्‌ है। इसी तरहसे इस 
संसारका भी भाव नहीं है, यह भी असत्‌ है। यह शरीर 
तो संसारका एक छोटा-सा नमूना है; इसलिये शरीरके 
परिवर्तनसे संसारमात्रके परिवर्तनका अनुभव होता है कि 
इस संसारका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव 
होगा तथा वर्तमानमें भी अभाव हो रहा है। 





संसारमात्र कालरूपी अग्निमें लकड़ीकी तरह निरन्तर 
जल रहा है। लकड़ीके जलनेपर तो कोयला और राख 
बची रहती है, पर संसारको कालरूपी अग्नि ऐसी 
विलक्षण रीतिसे जलाती है कि कोयला अथवा राख कुछ 
भी बाकी नहीं रहता। वह संसारका अभाव-ही-अभाव कर 
देती है। इसलिये कहा गया है कि असतूकी सत्ता नहीं है। 

“नाभावो विद्यते सतः '--जो सत्‌ वस्तु है, उसका 
अभाव नहीं होता अर्थात्‌ जब देह उत्पन्न नहीं हुआ था, 
तब भी देही था, देह नष्ट होनेपर भी देही रहेगा और 
वर्तमानमें देहके परिवर्तनशील होनेपर भी देही उसमें 
ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसी रीतिसे जब संसार उत्पन्न 
नहीं हुआ था, उस समय भी परमात्मतत्त्व था, संसारका 
अभाव होनेपर भी परमात्मततत्व रहेगा और वर्तमानमें 
संसारके परिवर्तनशील होनेपर भी परमात्मतत्त्व उसमें 
ज्यों-का-त्यों ही है। 


श्लोक १६] 


मार्मिक बात 

संसारको हम एक ही बार देख सकते हैं, दूसरी बार 
नहीं। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है; अतः 
एक क्षण पहले वस्तु जैसी थी, दूसरे क्षणमें वह वैसी नहीं 
रहती, जैसे--सिनेमा देखते समय परदेपर दृश्य स्थिर 
दीखता है; पर वास्तवमें उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता 
है। मशीनपर फिल्म तेजीसे घूमनेके कारण वह परिवर्तन 
इतनी तेजीसे होता है कि उसे हमारी आँखें नहीं पकड़ 
पातीं । इससे भी अधिक मार्मिक बात यह है कि वास्तवमें 
संसार एक बार भी नहीं दीखता। कारण कि शरीर, 
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि जिन करणाँसे हम संसारको देखते 
हैं-अनुभव करते हैं, वे करण भी संसारके ही हैं। अतः 
वास्तवमें संसारसे ही संसार दीखता है। जो शरीर-संसारसे 
सर्वथा सम्बन्धरहित है, उस स्वरूपसे संसार कभी 
दीखता ही नहीं! तात्पर्य यह है कि स्वरूपमें संसारको 
प्रतीति नहीं है। संसारके सम्बन्धसे ही संसारकी प्रतीति 
होती है। इससे सिद्ध हुआ कि स्वरूपका संसारसे कोई 
सम्बन्ध है ही नहीं । 

दूसरी बात, संसार (शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि)-की 
सहायताके बिना चेतन-स्वरूप कुछ कर ही नहीं सकता। 
इससे सिद्ध हुआ कि मात्र क्रिया संसारमें ही है, स्वरूपमें 
नहीं। स्वरूपका क्रियासे कोई सम्बन्ध है ही नहीं। 

संसारका स्वरूप है-क्रिया और पदार्थ। जब स्वरूपका 
न तो क्रियासे और न पदार्थसे ही कोई सम्बन्ध है, तब 
यह सिद्ध हो गया कि शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसहित 
सम्पूर्ण संसारका अभाव है। केवल परमात्मतत््तका ही भाव 
(सत्ता) है, जो निर्लिप्तरूपसे सबका प्रकाशक और 
आधार है। 

“उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः इन 
दोनोंके अर्थात्‌ सत्‌-असत्‌, देही-देहके तत्त्वको जाननेवाले 


* साधक-संजीवनी * 





८९ 


महापुरुषोंने इनका तत्त्व देखा है, इनका निचोड निकाला 
है कि केवल एक सत्‌-तत्त्व ही विद्यमान है। 

असत्‌ वस्तुका तत्त्व भी सत्‌ है और सत्‌ वस्तुका तत्त्व 
भी सत्‌ है अर्थात्‌ दोनोंका तत्त्व एक 'सत्‌' ही है, दोनोंका 
तत्त्व भावरूपसे एक ही है। अतः सत्‌ और असत्‌-इन 
दोनोंके तत्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा जाननेमें 
आनेवाला एक सत्‌-तत्त्व ही है। असत्‌की जो सत्ता प्रतीत 
होती है, वह सत्ता भी वास्तवमें सतूकी ही है। सत्‌की 
सत्तासे ही असत्‌ सत्तावान्‌ प्रतीत होता है। इसी सतूको “परा 
प्रकृति’ (गीता ७। ५), धक्षेत्रज्ञ' (गीता १३। १-२), 
“पुरुष' (गीता १३। १९) और 'अक्षर' (गीता १५। 
१६) कहा गया है; तथा असत्‌को 'अपरा प्रकृति ', 
“क्षेत्र, 'प्रकृति' और 'क्षर' कहा गया है। 

अर्जुन भी शरीरोंको लेकर शोक कर रहे हैं कि युद्ध 
करनेसे ये सब मर जायंगे। इसपर भगवान्‌ कहते हैं कि 
क्या युद्ध न करनेसे ये नहीं मरेंगे? असत्‌ तो मरेगा ही 
और निरन्तर मर ही रहा है। परन्तु इसमें जो सत्‌-रूपसे 
है, उसका कभी अभाव नहीं होगा। इसलिये शोक करना 
तुम्हारी बेसमझी ही है। 

ग्यारहवें श्लोकमें आया है कि जो मर गये हैं और 
जो जी रहे हैं, उन दोनोंके लिये पण्डितजन शोक नहीं 
करते। बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें देहीकी नित्यताका वर्णन 
है और उसमें ' धीर' शब्द आया है। चौदहवें-पंद्रहवें श्लोकोंमें 
संसारकी अनित्यताका वर्णन आया है, तो उसमें भी ' धीर' 
शब्द आया है। ऐसे ही यहाँ (सोलहवें श्लोकमें) सत्‌- 
असत्‌का विवेचन आया है, तो इसमें “तत्त्वदर्शी? शब्द 
आया है। इन श्लोकोंमें “पण्डित', ' धीर' और “तत्त्वदर्शी ' 
पद देनेका तात्पर्य है कि जो विवेकी होते हैं, समझदार 
होते हैं, उनको शोक नहीं होता । अगर शोक होता है, 
तो वे विवेकी नहीं हैं, समझदार नहीं हैं। 


परिशिष्ट भाव-_सत्तामात्र 'सत्‌' है और सत्ताके सिवाय जो कुछ भी प्रकृति और प्रकृतिका कार्य (क्रिया 
और पदार्थ) है, वह ' असत्‌” अर्थात्‌ परिवर्तनशील है। जिन महापुरुषोंने सत्‌ और असत्‌-दोनांका तत्त्व देखा है अर्थात्‌ 
जिनको सत्तामात्रमें अपनी स्वत:सिद्ध स्थितिका अनुभव हो गया है, उनकी दृष्टि (अनुभव) -में असत्‌की सत्ता विद्यमान 


९-नित्यदा ह्यंग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च। कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दूश्यते॥ ( श्रीमद्भा० १९। २२। ४२) 
“यद्यपि प्रतिक्षण ही शरीरोंकी उत्पत्ति और नाश होता रहता है, तथापि कालकी गति अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण उनका 


प्रतिक्षण उत्पन्न और नष्ट होना दिखायी नहीं देता।' 


२- नानुशोचन्ति पण्डिताः ' ( २। १९ ), ' धीरस्तत्र न मुह्यति’ ( २। १३ ), ' समदुःखसुखं धीरम्‌' ( २। १५ )--इन तीन 
जगह जिनको 'पण्डित' और ' धीर' कहा है, उन्हींको यहाँ 'तत्त्वदर्शी' कहा गया है। 


९० # श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 


है ही नहीं और सत्‌का अभाव विद्यमान है ही नहीं अर्थात्‌ सत्तामात्र (सत्‌-तत््व)-के सिवाय कुछ भी नहीं है। 

भगवानूने चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकाँमै शरीरकी अनित्यताका वर्णन किया था, उसको यहाँ “नासतो विद्यते भावः ' 
पदोंसे कहा है और बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें शरीरीकी नित्यताका वर्णन किया था, उसको यहाँ “नाभावो विद्यते सतः ' 
पदाँसे कहा है। 

“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः '—इन सोलह अक्षरोंमें सम्पूर्ण वेदों, पुराणों, शास्त्रोंका तात्पर्य भरा 
हुआ है! असत्‌ और सत्‌-इन दोनोंको ही प्रकृति और पुरुष, क्षर और अक्षर, शरीर और शरीरी, अनित्य और 
नित्य, नाशवान्‌ और अविनाशी आदि अनेक नामाँसे कहा गया है। देखने, सुनने, समझने, चिन्तन करने, निश्चय करने 
आदिमें जो कुछ भी आता है, वह सब 'असत्‌' है। जिसके द्वारा देखते, सुनते, चिन्तन आदि करते हैं, वह भी ' असत्‌' 
है और दीखनेवाला भी ' असत्‌' है। 

इस श्लोकार्ध (सोलह अक्षरों) -में तीन धातुओंका प्रयोग हुआ है-- 

(१) ` भू सत्तायाम्‌ -जैसे ' अभावः' और ' भावः'। 
(२) “अस्‌ भुवि'-जैसे, ' असतः' और ' सतः '। 

(३) 'विद्‌ सत्तायाम्‌'_जैसे, ` विद्यते’ और “न विद्यते'। 

यद्यपि इन तीनों धातुओंका मूल अर्थ एक 'सत्ता' ही है, तथापि सूक्ष्मरूपसे ये तीनों अपना स्वतन्त्र अर्थ भी 
रखते हैं; जैसे-' भू! धातुका अर्थ “उत्पत्ति! है, 'अस्‌' धातुका अर्थ 'सत्ता' (होनापन) है और 'विद्‌' धातुका अर्थ 
“ विद्यमानता' (वर्तमानकी सत्ता) है। 

“नासतो विद्यते भावः' पदोंका अर्थ है-' असतः भावः न विद्यते’ अर्थात्‌ असत्की सत्ता विद्यमान नहीं है, 
प्रत्युत असतूका अभाव ही विद्यमान है; क्योंकि इसका निरन्तर अभाव (परिवर्तन) होता ही रहता है। असत्‌ वर्तमान 
नहीं है। असत्‌ उपस्थित नहीं है। असत्‌ प्राप्त नहीं है। असत्‌ मिला हुआ नहीं है। असत्‌ मौजूद नहीं है। असत्‌ कायम 
नहीं है। जो वस्तु उत्पन्न होती है, उसका नाश अवश्य होता है-यह नियम है। उत्पन्न होते ही तत्काल उस वस्तुका 
नाश शुरू हो जाता है। उसका नाश इतनी तेजीसे होता है कि उसको दो बार कोई देख ही नहीं सकता अर्थात्‌ उसको 
एक बार देखनेपर फिर दुबारा उसी स्थितिमें नहीं देखा जा सकता। यह सिद्धान्त है कि जिस वस्तुका किसी भी 
क्षण अभाव है, उसका सदा अभाव ही है। अतः संसारका सदा ही अभाव है। संसारको कितनी ही सत्ता दें, कितना 
ही महत्त्व दें, पर वास्तवमें वह विद्यमान है ही नहीं। असत्‌ प्राप्त है ही नहीं, कभी प्राप्त हुआ ही नहीं, कभी प्राप्त 
होगा ही नहीं। असत्‌का प्राप्त होना सम्भव ही नहीं है। 

“नाभावो विद्यते सतः' पदोंका अर्थ है-' सतः अभावः न विद्यते’ अर्थात्‌ सतूका अभाव विद्यमान नहीं है, 
प्रत्युत सत्‌का भाव ही विद्यमान है; क्योंकि इसका कभी अभाव (परिवर्तन) होता ही नहीं। जिसका अभाव हो जाय, 
उसको सत्‌ कहते ही नहीं। सतूको सत्ता निरन्तर विद्यमान है। सत्‌ निरन्तर वर्तमान है। सत्‌ निरन्तर उपस्थित है। सत्‌ 
निरन्तर प्राप्त है। सत्‌ निरन्तर मिला हुआ है। सत्‌ निरन्तर मौजूद है। सत्‌ निरन्तर कायम है। किसी भी देश, काल, 
वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, घटना, परिस्थिति, अवस्था आदिमे सतूका अभाव नहीं होता। कारण कि देश, काल, वस्तु आदि 
तो असत्‌ (अभावरूप अर्थात्‌ निरन्तर परिवर्तनशील) है, पर सत्‌ सदा ज्याँ-का-त्यों रहता है। उसमें कभी किंचिन्मात्र 
भी कोई परिवर्तन नहीं होता, कोई कमी नहीं आती। अतः सतूका सदा ही भाव है। परमात्मतत्त्वको कितना ही अस्वीकार 
करें, उसकी कितनी ही उपेक्षा करें, उससे कितना ही विमुख हो जाय, उसका कितना ही तिरस्कार करें, उसका 
कितनी ही युक्तियोंसे खण्डन करें, पर वास्तवमें उसका अभाव विद्यमान है ही नहीं। सतूका अभाव होना सम्भव ही 
नहीं है। सतूका अभाव कभी कोई कर सकता ही नहीं (गीता-दूसरे अध्यायका सत्रहवाँ श्लोक) । 

“उभयोरपि दृष्टः '—तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने सतू-तत्त्वको उत्पन्न नहीं किया है, प्रत्युत देखा है अर्थात्‌ अनुभव 
किया है। तात्पर्य है कि असत्‌का अभाव और सतूका भाव-दोनोंके तत्त्व (निष्कर्ष)-को जाननेवाले जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ 
महापुरुष एक सत्‌-तत्त्वको ही देखते हैं अर्थात्‌ स्वतः-स्वाभाविक एक 'है' का ही अनुभव करते हैं। असत्का तत्त्व 
भी सत्‌ है और सत्‌का तत्त्व भी सत्‌ है--ऐसा जान लेनेपर उन महापुरुषाँकी दृष्टिमें एक सत्‌-तत्त्व 'है' के सिवाय 
और किसीको स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं। 


श्लोक १७] * साधक-संजीवनी + ९१ 
असत्‌की सत्ता विद्यमान न रहनेसे उसका अभाव और सतूका अभाव विद्यमान न रहनेसे उसका भाव सिद्ध हुआ। 
निष्कर्ष यह निकला कि असत्‌ है ही नहीं, प्रत्युत सत्‌-ही-सत्‌ है। उस सतू-तत्त्वमें देह और देहीका विभाग नहीं है। 
जबतक असत्की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत्‌की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता 
है। उभयोरपि दूष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः इसमें उभयोरपि' में विवेक है, 'अन्तः' में तत्त्वज्ञान है और 
'दृष्टः "में अनुभव है अर्थात्‌ विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो गया और सत्तामात्र ही शेष रह गयी। एक सत्ताके सिवाय 
कुछ नहीं है-यह ज्ञानमार्गकी सर्वोपरि बात है। 
असत्की सत्ता नहीं है-यह भी सत्य है और सत्‌का अभाव नहीं है-यह भी सत्य है। सत्यको स्वीकार करना 
साधकका काम है। साधकको अनुभव हो अथवा न हो, उसको तो सत्यको स्वीकार करना है। 'है' को स्वीकार 
करना है और 'नहीं' को अस्वीकार करना है-यही वेदान्त है, वेदोंका खास निष्कर्ष है। 
संसारमें भाव और अभाव-दोनों दीखते हुए भी ' अभाव' मुख्य रहता है। परमात्मामें भाव और अभाव-दोनों 
दीखते हुए भी ' भाव' मुख्य रहता है। संसारमें 'अभाव' के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं और परमात्मामें ' भाव' के अन्तर्गत 
भाव-अभाव हैं। दूसरे शब्दोंमें, संसारमें ' नित्यवियोग' के अन्तर्गत संयोग-वियोग हैं और परमात्मामें *नित्ययोग' के 
अन्तर्गत योग-वियोग (मिलन-विरह) हैं। अतः संसारमें अभाव ही रहा और परमात्मामें भाव ही रहा। 





सम्बन्ध-सत्‌ और असत्‌ क्या है-इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं। 
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌। 
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥ १७॥ 


अविनाशि = अविनाशी इदम्‌ =यह विनाशम्‌ = विनाश 
तु =तो सर्वम्‌ =सम्पूर्ण (संसार) | कश्चित्‌ =कोई भी 
तत्‌ =उसको ततम्‌ =व्याप्त है। न = नहीं 
विद्धि = जान, अस्य =इस कर्तुम्‌ = कर 
येन = जिससे अव्ययस्य = अविनाशीका अईति = सकता। 


व्याख्या अविनाशि तु तद्विद्द्र'- पूर्वश्लोकमें जो 
सत्‌-असत्‌को बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्‌'को 
व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है। 

“उस अविनाशी तत्त्वको तू समझ'-एऐसा कहकर 
भगवानूने उस तत्त्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें 
तात्पर्यं है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें 
वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो 
परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है, 





यह “नहीं' है। 

यहाँ 'तत्‌' पदसे सत्‌-तत्त्वको परोक्ष रीतिसे कहनेका 
तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह 
इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको 
परोक्ष रीतिसे कहा गया है। 

“येन सर्वमिदं ततम्‌'*--जिसको परोक्ष कहा है, 
उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस 
नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना, 


* “येन सर्वमिदं ततम्‌'ये पद गीतामें तीन बार आये हैं। उनमेंसे यहाँ ( २। १७ में ) ये पद शरीरीके लिये आये हैं कि 


इस शरीरीसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। यह बात सांख्ययोगकी दूष्टिसे कही गयी है। दूसरी बार ये पद आठवें अध्यायके 
बाईसवें श्लोकमें आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिस ईश्वरसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह अनन्यभक्तिसे मिलता है। 
अतः भक्तिका वर्णन होनेसे उपर्युक्त पद ईश्वरके विषयमें आये हैं। तीसरी बार ये पद अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें 
आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसका चारों वर्ण अपने-अपने कर्मोद्वारा पूजन करें। यह 
वर्णन भी भक्तिकी दूष्टिसे हुआ है। 

नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें राजविद्याका वर्णन करते हुए भगवानूने “मया ततमिदं सर्वम्‌' पदोंसे कहा है कि यह 
सम्पूर्ण संसार मेरेसे व्याप्त है। इस प्रकार तीन जगह तो 'येन' पद देकर उस तत्त्वको परोक्षरूपसे कहा है, और एक जगह 
' अस्मत्‌' शब्द-'मया' देकर स्वयं भगवानूने अपरोक्षरूपसे अपनी बात कही है। 


९२ 


लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए 
बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त 
(परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्‌-तत्त्व ही व्याप्त है। 
अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्‌-तत्त्व ही जाननेयोग्य है। 

“ विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति'--यह 
शरीरी अव्यय* अर्थात्‌ अविनाशी है। इस अविनाशीका 
कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी 
है-- क्‍योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा 
है। अत: इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं 
मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस 
अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा 
अर्थात्‌ अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही। 

यहाँ 'अस्य' पदसे सत्‌-तत्त्वको इदंतासे कहनेका 
तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता 
दीखती है, वह इसी सत्‌-तत्त्वकी ही है। “मेरा शरीर है 
और मैं शरीरधारी हूँ'--ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, 
उसीको लक्ष्य करके भगवानूने यहाँ ' अस्य' पद दिया है। 


परिशिष्ट भाव--व्यवहारमें हम कहते हैं कि “यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है' आदि, 


तो इसमें ' मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान' आदि तो पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें 
जा रहे हैं। परन्तु इनमें 'है' रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है। तात्पर्य है कि ' मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान' 
आदि तो संसार (असत्‌) है और 'है' अविनाशी आत्मतत्त्व (सत्‌) है। इसलिये ' मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान' आदि 
तो अलग-अलग हुए, पर इन सबमें 'है' एक ही रहा। इसी तरह मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं देवता हूँ आदिमें शरीर 
तो अलग-अलग हुए पर 'हूँ' अथवा “है? एक ही रहा। 

“येन सर्वमिदं ततम्‌'--ये पद यहाँ जीवात्माके लिये आये हैं और आठवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें तथा अठारहवें 
अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें यही पद परमात्माके लिये आये हैं। इसका तात्पर्य है कि जीवात्माका सर्वव्यापक 
परमात्माके साथ साधर्म्य है। अतः जैसे परमात्मा संसारसे असंग हैं, ऐसे ही जीवात्मा भी शरीर-संसारसे स्वत:- 
स्वाभाविक असंग है-' असङ्गो ह्यायं पुरुषः' (बृहदा० ४। ३। १५), ' देहेऽस्मिन्पुरुषः परः? (गीता १३। २२) । 
जीवात्माकी स्थिति किसी एक शरीरमें नहीं है। वह किसी शरीरसे चिपका हुआ नहीं है। परन्तु इस असंगताका अनुभव 
न होनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है। 


oe 


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। 
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥ १८ ॥ 


अनाशिनः = अविनाशी, शरीरिणः =इस शरीरीके उक्ताः =कहे गये हैं। 
अप्रमेयस्य = जाननेमें न ड्मे नये तस्मात्‌ = इसलिये 

आनेवाले (और) | देहाः =देह भारत =हे अर्जुन! (तुम) 
नित्यस्य = नित्य रहनेवाले अन्तवन्तः = अन्तवाले युध्यस्व =युद्ध करो। 


व्याख्या-' अनाशिनः '--किसी कालमें, किसी कारणसे 
कभी किंचिन्मात्र भी जिसमें परिवर्तन नहीं होता, जिसकी 
क्षति नहीं होती, जिसका अभाव नहीं होता, उसका नाम 
' अनाशी' अर्थात्‌ अविनाशी है। 

' अप्रमेयस्य'—जो प्रमा-(प्रमाण-)का विषय नहीं है 
अर्थात्‌ जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंका विषय नहीं है, 





उसको *अप्रमेय' कहते हैं। 

जिसमें अन्तःकरण और इ्द्रियाँ प्रमाण नहीं होतीं, उसमें 
शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण होते हैं, शास्त्र और 
सन्त-महापुरुष उन्हींके लिये प्रमाण होते हैं, जो श्रद्धालु हैं। 
जिसकी जिस शास्त्र और सन्तमें श्रद्धा होती है, वह उसी 
शास्त्र और सन्तके वचनोंको मानता है। इसलिये यह तत्त्व 


* भगवानूने गीतामें जगह-जगह शरीरीको भी अव्यय कहा है और अपनेको भी अव्यय कहा है। स्वरूपसे दोनों अव्यय 
होनेपर भी भगवान्‌ तो प्रकृतिको अपने वशमें करके ( स्वतन्त्रतापूर्वक ) प्रकट और अन्तर्धान होते हैं और यह शरीरी प्रकृतिके 
परवश होकर जन्मता और मरता रहता है; क्योंकि इसने शरीरको अपना मान रखा है। 


श्लोक १८] 


केवल श्रद्धाका विषय है, प्रमाणका विषय नहीं। 

शास्त्र और सन्त किसीको बाध्य नहीं करते कि तुम 
हमारेमें श्रद्धा करो। श्रद्धा करने अथवा न करनेमें मनुष्य 
स्वतन्त्र है। अगर वह शास्त्र और सन्तके वचनोंमें श्रद्धा करेगा, 
तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय है; और अगर वह श्रद्धा 
नहीं करेगा, तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय नहीं है। 

“नित्यस्य'--यह नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। किसी 
कालमें यह न रहता हो--ऐसी बात नहीं है अर्थात्‌ यह सब 
कालमें सदा ही रहता है। 

“अन्तवन्त इमे देहा उक्ताः शरीरिणः '--इस अविनाशी, 
अप्रमेय और नित्य शरीरीके सम्पूर्ण संसारमें जितने भी 
शरीर हैं, वे सभी अन्तवाले कहे गये हैं। अन्तवाले कहनेका 
तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण अन्त हो रहा है। इनमें अन्तके 
सिवाय और कुछ है ही नहीं, केवल अन्त-ही-अन्त है। 

उपर्युक्त पदोंमें शरीरीके लिये तो एकवचन दिया है 
और शरीरोंके लिये बहुवचन दिया है। इसका एक कारण 
तो यह है कि प्रत्येक प्राणीके स्थूल, सूक्ष्म और कारण 
ये तीन शरीर होते हैं। दूसरा कारण यह है कि संसारके 
सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही शरीरी व्याप्त है। आगे चौबीसवें 
श्लोकमें भी इसको 'सर्वगतः' पदसे सबमें व्यापक 
बतायेंगे। यह शरीरी तो अविनाशी है और इसके कहे 
जानेवाले सम्पूर्ण शरीर नाशवान्‌ हैं। जैसे अविनाशीका कोई 
विनाश नहीं कर सकता, ऐसे ही नाशवानूको कोई 
अविनाशी नहीं बना सकता। नाशवान्‌का तो विनाशीपना ही 
नित्य रहेगा अर्थात्‌ उसका तो नाश ही होगा। 

विशेष बात 

यहाँ ' अन्तवन्त इमे देहाः ' कहनेका तात्पर्य है कि ये 
जो देह देखनेमें आते हैं, ये सब-के-सब नाशवान्‌ हैं। पर 
ये देह किसके हैं? 'नित्यस्य', ' अनाशिनः ये देह 
नित्यके हैं, अविनाशीके हैं। तात्पर्य है कि नित्य-तत्त्वने, 
जिसका कभी नाश नहीं होता, इनको अपना मान रखा है। 
अपना माननेका अर्थ है कि अपनेको शरीरमें रख दिया 
और शरीरको अपनेमें रख लिया। अपनेको शरीरमें रखनेसे 


* साधक-संजीवनी * 





९३ 


' अहंता' अर्थात्‌ 'मैं'-पन पैदा हो गया और शरीरको 
अपनेमें रखनेसे “ममता' अर्थात्‌ 'मेरा'-पन पैदा हो गया। 

यह स्वयं जिन-जिन चीजोंमें अपनेको रखता चला 
जाता है, उन-उन चीजोंमें 'मैं'-पन होता ही चला जाता है; 
जैसे-अपनेको धनमें रख दिया तो “मैं धनी हूँ'; अपनेको 
राज्यमें रख दिया तो “मैं राजा हूँ"; अपनेको विद्यामें रख दिया 
तो “मैं विद्वान्‌ हूँ; अपनेको बुद्धिमें रख दिया तो “मैं बुद्धिमान्‌ 
हुँ; अपनेको सिद्धियोंमें रख दिया तो “मैं सिद्ध हूँ'; 
अपनेको शरीरमें रख दिया तो 'मैं शरीर हूँ'; आदि-आदि। 

यह स्वयं जिन-जिन चीजोंको अपनेमें रखता चला 
जाता है, उन-उन चीजोंमें ' मेरा'-पन होता ही चला जाता 
है; जैसे-कुट्म्बको अपनेमें रख लिया तो ' कुटुम्ब मेरा 
है'; धनको अपनेमें रख लिया तो “धन मेरा है'; बुद्धिको 
अपनेमें रख लिया तो “बुद्धि मेरी है'; शरीरको अपनेमें 
रख लिया तो “शरीर मेरा है'; आदि-आदि। 

जडताके साथ “मैं” और 'मेरा'-पन होनेसे ही मात्र 
विकार पैदा होते हैं। तात्पर्य है कि शरीर और मैं (स्वयं) 
दोनों अलग-अलग हैं, इस विवेकको महत्त्व न देनेसे ही 
मात्र विकार पैदा होते हैं। परन्तु जो इस विवेकको आदर देते 
हैं, महत्त्व देते हैं, वे पण्डित होते हैं। ऐसे पण्डितलोग कभी 
शोक नहीं करते; क्योंकि सत्‌ सत्‌ ही है और असत्‌ असत्‌ 
ही है-इसका उनको ठीक अनुभव हो जाता है। 

“तस्मात्‌ ' युध्यस्व'- भगवान्‌ अर्जुनके लिये आज्ञा 
देते हैं कि सत्‌-असतूको ठीक समझकर तुम युद्ध करो 
अर्थात्‌ प्राप्त कर्तव्यका पालन करो। तात्पर्य है कि शरीर 
तो अन्तवाला है और शरीरी अविनाशी है। इन दोनों 
शरीर-शरीरीको दृष्टिसे शोक बन ही नहीं सकता। अतः 
शोकका त्याग करके युद्ध करो। 

विशेष बात 

यहाँ सत्रहवें और अठारहवें -इन दोनों श्लोकोंमें विशेषतासे 
सत्‌-तत््वका ही विवेचन हुआ है। कारण कि इस पूरे 
प्रकरणमें भगवानका लक्ष्य सत्‌का बोध करानेमें ही है। 
सत्‌का बोध हो जानेसे असत्‌की निवृत्ति स्वतः हो जाती है। 


१-आरम्भमें तो यह तत्त्व श्रद्धाका विषय है, पर आगे चलकर जब इसका प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है, तब यह श्रद्धाका 


विषय नहीं रहता। 


२-यहाँ 'तस्मात्‌' पद युक्ति समझनेमें आया है अर्थात्‌ युक्ति समझमें आ गयी तो अब युद्ध करो। इसी तरह गीतामें 
' तस्मात्‌' पदका प्रयोग प्रायः प्रकरणकी समाप्तिपर अथवा युक्तिकी समाप्तिपर किया गया है; जैसे--दूसरे अध्यायके तीसवें, 
तीसरे अध्यायके उन्नीसवें, आठवें अध्यायके सातवें तथा सत्ताईसवें आदि एलोकोंमें ' तस्मात्‌ ' पद प्रकरणको समाप्तिके लिये 
आया है और दूसरे अध्यायके पचीसवें, सत्ताईसवें, सैंतीसवें, अड़सठवें तथा ग्यारहवें अध्यायके तैंतीसवें आदि एलोकोंमें 


'तस्मात्‌' पद युक्तिकी समाप्तिके लिये आया है। 


९४ 


फिर किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। इस 
प्रकार सतूका अनुभव करके निःसंदिग्ध होकर कर्तव्यका 
पालन करना चाहिये। इस विवेचनसे यह बात सिद्ध होती 
है कि सांख्ययोग एवं कर्मयोगमें किसी विशेष वर्ण और 
आश्रमकी आवश्यकता नहीं है। अपने कल्याणके लिये 
चाहे सांख्ययोगका अनुष्ठान करे, चाहे कर्मयोगका अनुष्ठान 
करे, इसमें मनुष्यकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। परन्तु व्यावहारिक 
काम करनेमें वर्ण और आश्रमके अनुसार शास्त्रीय 
विधानकी परम आवश्यकता है, तभी तो यहाँ सांख्ययोगके 
अनुसार सत्‌-असतूका विवेचन करते हुए भगवान्‌ युद्ध 
करनेकी अर्थात्‌ कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


आगे तेरहवें अध्यायमें जहाँ ज्ञानके साधनोंका वर्णन 
किया गया है, वहाँ भी 'असक्तिरनभिष्वङ्कः पुत्रदार- 
गृहादिषु’ (१३। ९) कहकर पुत्र, स्त्री, घर आदिकी 
आसक्तिका निषेध किया है। अगर संन्यासी ही सांख्य- 
योगके अधिकारी होते तो पुत्र, स्त्री, घर आदिमें आसक्ति- 
रहित होनेके लिये कहनेकी आवश्यकता ही नहीं थी; 
क्योंकि संन्यासीके पुत्र-स्त्री आदि होते ही नहीं। 

इस तरह गीतापर विचार करनेसे सांख्ययोग एवं 
कर्मयोग-दोनों परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन सिद्ध हो 
जाते हैं। ये किसी वर्ण और आश्रमपर किंचिन्मात्र भी 
अवलम्बित नहीं हैं। 


परिशिष्ट भाव-- भगवानूने अपने उपदेशके आरम्भमें 'गतासून्‌' (मृत) और 'अगतासून्‌' (जीवित) दोनों 


प्राणियांको अशोच्य बताया। फिर बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें “गतासून्‌' को अशोच्य बतानेके लिये 'सत्‌' (नित्य) का 
वर्णन किया और चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें ' अगतासून्‌' को अशोच्य बतानेके लिये ' असत्‌’ (अनित्य) का वर्णन 
किया। फिर सत्‌ और असतू-दोनोंका वर्णन सोलहवें श्लोकमें किया। इसके बाद सत्के भाव और असत्के अभावका 
विवेचन मुख्यरूपसे सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें करके एक प्रकरण पूरा करते हैं। 

यद्यपि भाव (होनापन) आत्माका ही है, शरीरका नहीं, तथापि मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह पहले शरीरको 
देखकर फिर उसमें आत्माको देखता है, पहले आकृतिको देखकर फिर भावको देखता है। ऊपर लगायी हुई पालिश 
कबतक टिकेगी ? साधकको विचार करना चाहिये कि आत्मा पहले थी या शरीर पहले था? विचार करनेपर सिद्ध 
होता है कि आत्मा पहले है, शरीर पीछे है; भाव पहले है, आकृति पीछे है। इसलिये साधककी दृष्टि पहले भावरूप 
आत्मा या स्वयंको तरफ जानी चाहिये, शरीरको तरफ नहीं। 





सम्बन्ध- पूर्वश्लोकतक शरीरीको आविनाशी जाननेवालोकी बात कही। अब उसी बातको अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे 
दृढ़ करनेके लिये, जो शरीरीको अविनाशी नहीं जानते, उनकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं। 


य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌। 
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥ १९॥ 


यः = जो मनुष्य एनम्‌ =इसको विजानीतः = जानते; 

एनम्‌ =इस (अविनाशी | हतम्‌ =मरा (क्योंकि) 
शरीरी )-को मन्यते न मानता है, अयम्‌ = यह 

हन्तारम्‌ = मारनेवाला तौ न न्न 

वेत्ति =मानता है उभौ =दोनों ही हन्ति = मारता है (और) 

च = और (इसको) न तन 

यः = जो मनुष्य न =नहीं हन्यते =मारा जाता है। 


व्याख्या-य एनं* वेत्ति हन्तारम्‌'--जो इस | कारण कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर 
शरीरीको मारनेवाला मानता है; वह ठीक नहीं जानता। | कैसा ही चतुर क्यों न हो, पर किसी औजारके बिना वह 


७ 


* यहाँ 'एनम्‌' पद अन्वादेशमें आया है। जिसका पहले वर्णन हो चुका है, उसको दुबारा कहना ' अन्वादेश' कहलाता 
है। पहले सत्रहवें शलोकमें एक विषयको लेकर जिसका “अस्य' पदसे वर्णन हुआ है, अब यहाँ दूसरे विषयको लेकर उसी 


७ 


तत्त्वको दुबारा कह रहे हैं। इसलिये यहाँ 'एनम्‌' पदका प्रयोग किया गया है। 


श्लोक २०] 


कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना 
स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें 
भगवानूने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा 
ही होती हैं--ऐसा जो अनुभव करता है, वह शरीरीके 
अकर्तापनका अनुभव करता है (तेरहवें अध्यायका उनतीसवाँ 
श्लोक) । तात्पर्य यह हुआ कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है, 
पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके, सम्बन्ध जोड़कर 
शरीरसे होनेवाली क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मान लेता है। 
अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो यह 
किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है। 

“यश्चैनं मन्यते हतम्‌'--जो इसको मरा मानता है, 
वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं 
है, ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है; क्योंकि इसमें कभी 
कोई विकृति नहीं आती । जिसमें विकृति आती है, परिवर्तन 
होता है अर्थात्‌ जो उत्पत्ति-विनाशशील होता है, वही मर 


* साधक-संजीवनी * 





९५ 


सकता है। 

'उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते'--वे 
दोनों ही नहीं जानते अर्थात्‌ जो इस शरीरीको मारनेवाला 
मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको 
मरनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता। 

यहाँ प्रश्‍न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला 
और मरनेवाला दोनों मानता है, क्या वह ठीक जानता है? 
इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि 
यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी 
नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे 
नित्य-निरन्तर ज्याँ-का-त्योँ रहनेवाला है। अतः इस 
शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये। 

अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको 
मरने-मारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह 
सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है। 


परिशिष्ट भाव--यह शरीरी न तो किसीको मारता है और न किसीसे मारा ही जाता है-इसका तात्पर्य है 


कि शरीरी किसी क्रियाका कर्ता भी नहीं है तथा कर्म भी नहीं है और इसमें कोई विकार भी नहीं आता। जो मनुष्य 
शरीरकी तरह शरीरीको भी मारनेवाला तथा मरनेवाला मानते हैं, वे वास्तवमें शरीर और शरीरीके विवेकको महत्त्व 
नहीं देते, इसमें स्थित नहीं होते, प्रत्युत अविवेकको महत्त्व देते हैं। 





सम्बन्ध-यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है? इसके उत्तरें कहते हैं-- 
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। 
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २०॥ 


अयम्‌ =यह शरीरी भूत्वा = उत्पन्न होकर शाश्वतः = शाश्वत 

न न भूयः = फिर (और) 
कदाचित्‌ =कभी भविता = होनेवाला पुराणः = अनादि है। 
जायते = जन्मता है न -नहीं है। शरीरे = शरीरके 

वा = और अयम्‌ = यह हन्यमाने = मारे जानेपर 
न न्न अजः = जन्मरहित, भी (यह) 
म्रियते =मरता है नित्यः = नित्य-निरन्तर न =नहीं 

वा =तथा (यह) रहनेवाला, हन्यते =मारा जाता। 


व्याख्या-[शरीरमें छः विकार होते हैं-उत्पन्न होना, | इस श्लोकमें बता रहे हैं! ।] 
सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना*। “न जायते प्रियते वा कदाचित्‌ '-- जैसे शरीर उत्पन्न 
यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है-यही बात भगवान्‌ | होता है, ऐसे यह शरीरी कभी भी, किसी भी समयमें उत्पन्न 


९-जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यति। ( निरुक्त १। १। २) 

२-यह शरीरी उत्पन्न नहीं होता-- न जायते', ' अजः'; उत्पन्न होकर विकारी सत्तावाला नहीं होता--' अयं भूत्वा भविता 
वा न भूयः '; यह बदलता नहीं--' शाश्वतः ', यह बढ़ता नहीं--' पुराणः ', यह क्षीण नहीं होता-- नित्यः ', और यह मरता नहीं 
“न म्रियते' “न हन्यते हन्यमाने शरीरे '। 


९६ 


नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवानूने इस शरीरीको 
अपना अंश बताते हुए इसको 'सनातन' कहा है-- 
“ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः' (१५। ७) । 

यह शरीरी कभी मरता भी नहीं। मरता वही है, जो 
पैदा होता है; और 'म्रियते'का प्रयोग भी वहीं होता है, 
जहाँ पिण्ड-प्राणका वियोग होता है । पिण्ड-प्राणका वियोग 
शरीरमें होता है। परन्तु शरीरीमें संयोग-वियोग दोनों ही 
नहीं होते। यह ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसका मरना 
होता ही नहीं। 

सभी विकारोंमें जन्मना और मरना-ये दो विकार ही 
मुख्य हैं; अतः भगवानूने इनका दो बार निषेध किया है-- 
जिसको पहले “न जायते' कहा, उसीको दुबारा ' अजः' 
कहा है; और जिसको पहले “न म्रियते' कहा, उसीको 
दुबारा 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' कहा है। 

'अयं भूत्वा भविता वा न भूयः'यह अविनाशी 
नित्य-तत्त्व पैदा होकर फिर होनेवाला नहीं है अर्थात्‌ यह 
स्वत:सिद्ध निर्विकार है। जैसे, बच्चा पैदा होता है, तो पैदा 
होनेके बाद उसकी सत्ता होती है। जबतक वह गर्भमें नहीं 
आता, तबतक “बच्चा है' ऐसे उसकी सत्ता (होनापन) 
कोई भी नहीं कहता। तात्पर्य है कि बच्चेकी सत्ता पैदा 
होनेके बाद होती है; क्योंकि उस विकारी सत्ताका आदि 
और अन्त होता है। परन्तु इस नित्य-तत्त्वकी सत्ता 
स्वतःसिद्ध और निर्विकार है; क्योंकि इस अविकारी 
सत्ताका आरम्भ और अन्त नहीं होता। 

'अजः'-इस शरीरीका कभी जन्म नहीं होता। 
इसलिये यह ' अजः ' अर्थात्‌ जन्मरहित कहा गया है। 

“नित्यः '--यह शरीरी नित्य-निरन्तर रहनेवाला है; 
अतः इसका कभी अपक्षय नहीं होता। अपक्षय तो अनित्य 
वस्तुमें होता है, जो कि निरन्तर रहनेवाली नहीं है। जैसे, 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


आधी उम्र बीतनेपर शरीर घटने लगता है, बल क्षीण होने 
लगता है, इन्द्रियोंकी शक्ति कम होने लगती है। इस प्रकार 
शरीर, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण आदिका तो अपक्षय होता है, 
पर शरीरीका अपक्षय नहीं होता। इस नित्य-तत्त्वमें कभी 
किंचिन्मात्र भी कमी नहीं आती। 

“शाश्वतः “--यह नित्य-तत्त्व निरन्तर एकरूप, एकरस 
रहनेवाला है। इसमें अवस्थाका परिवर्तन नहीं होता अर्थात्‌ 
यह कभी बदलता नहीं। इसमें बदलनेकी योग्यता है ही 
नहीं। 

“पुराणः 'यह अविनाशी तत्त्व पुराण (पुराना) 
अर्थात्‌ अनादि है। यह इतना पुराना है कि यह कभी पैदा 
हुआ ही नहीं। उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें भी देखा जाता 
है कि जो वस्तु पुरानी हो जाती है, वह फिर बढ़ती नहीं, 
प्रत्युत नष्ट हो जाती है; फिर यह तो अनुत्पन्न तत्त्व है, 
इसमें बढ्नारूप विकार कैसे हो सकता है? तात्पर्य है कि 
बढ्नारूप विकार तो उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें ही होता 
है, इस नित्य-तत्त्वमें नहीं। 

“न हन्यते हन्यमाने शरीरे'-शरीरका नाश होनेपर 
भी इस अविनाशी शरीरीका नाश नहीं होता। यहाँ “शरीरे ' 
पद देनेका तात्पर्य है कि यह शरीर नष्ट होनेवाला है। इस 
नष्ट होनेवाले शरीरमें ही छ: विकार होते हैं, शरीरीमें नहीं । 

इन पदोंमें भगवानूने शरीर और शरीरीका जैसा स्पष्ट 
वर्णन किया है, ऐसा स्पष्ट वर्णन गीतामें दूसरी जगह नहीं 
आया है। 

अर्जुन युद्धमें कुटुम्बियोंके मरनेको आशंकासे विशेष 
शोक कर रहे थे। उस शोकको दूर करनेके लिये भगवान्‌ 
कहते हैं कि शरीरके मरनेपर भी इस शरीरीका मरना नहीं 
होता अर्थात्‌ इसका अभाव नहीं होता। इसलिये शोक करना 
अनुचित है। 


परिशिष्ट भाव--हमारा (स्वयंका) और शरीरका स्वभाव बिलकुल अलग-अलग है। हम शरीरके साथ चिपके 
हुए नहीं हैं, शरीरसे मिले हुए नहीं हैं। शरीर हमारे साथ चिपका हुआ नहीं है, हमारेसे मिला हुआ नहीं है। इसलिये 
शरीरके न रहनेपर हमारा कुछ भी बिगड़ता नहीं। अबतक हम असंख्य शरीर धारण करके छोड़ चुके हैं, पर उससे 
हमारी सत्तामें क्या फर्क पड़ा? हमारा क्या नुकसान हुआ ? हम तो ज्यों-के-त्यों ही रहे-' भूतग्रामः स एवायं भूत्वा 
भूत्वा प्रलीयते' (गीता ८। १९)। ऐसे ही यह शरीर छूटनेपर भी हम स्वयं ज्यों-के-त्यों ही रहेंगे। 

जैसे हाथ, पैर, नासिका आदि शरीरके अंग हैं, ऐसे शरीर शरीरी (स्वयं)-का अंग भी नहीं है। जो बहनेवाला 
और विकारी होता है, वह 'अंग' नहीं होता”; जैसे-कफ, मूत्र आदि बहनेवाले और फोड़ा आदि विकारी होनेसे 
शरीरके अंग नहीं हैं, ऐसे ही शरीर बहनेवाला (परिवर्तनशील) और विकारी होनेसे शरीरीका अंग नहीं है। 





* अद्रवं मूत्तिमत्‌ स्वाङ्गं प्राणिस्थमविकारजम्‌। अतत्स्थं तत्र दृष्टं च तेन चेत्तत्तथायुतम्‌॥ 


श्लोक २१-२२ ] 


* साधक-संजीवनी * 


९७ 


सम्बन्ध-उन्नीसवें श्लोकमें भगवानूने बताया कि यह शरीरी न तो मारता है और न मरता ही है। इसमें मरनेका 
निषेध तो बीसवें श्लोकमें कर दिया, अब मारनेका निषेध करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं। 


वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌। 
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥ २१ ॥ 


पार्थ = हे पृथानन्दन ! नित्यम्‌ = नित्य, कथम्‌ = कैसे 

यः =जो अजम्‌ = जन्मरहित (और) | कम्‌ = किसको 

पुरुषः = मनुष्य अव्ययम्‌ =अव्यय हन्ति = मारे (और) 
एनम्‌ =इस शरीरीको वेद = जानता है, कम्‌ = (कैसे) किसको 
अविनाशिनम्‌ = अविनाशी, सः =वह घातयति = मरवाये ? 


व्याख्या- वेदाविनाशिनम्‌" घातयति हन्ति कम्‌ 
इस शरीरीका कभी नाश नहीं होता, इसमें कभी कोई 
परिवर्तन नहीं होता, इसका कभी जन्म नहीं होता और इसमें 
कभी किसी तरहको कोई कमी नहीं आती--ऐसा जो ठीक 
अनुभव कर लेता है, वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे 
किसको मरवाये ? अर्थात्‌ दूसरोंको मारने और मरवानेमें उस 
पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। वह किसी क्रियाका न तो 
कर्ता बन सकता है और न कारयिता बन सकता है। 

यहाँ भगवानूने शरीरीको अविनाशी, नित्य, अज और 
अव्यय कहकर उसमें छहों विकारोंका निषेध किया है; 
जैसे-' अविनाशी ' कहकर मृत्युरूप विकारका, ' नित्य' 
कहकर अवस्थान्तर होना और बढ़नारूप विकारका, 
'अज' कहकर जन्म होना और जन्मके बाद होनेवाली 
सत्तारूप विकारका, तथा 'अव्यय' कहकर क्षयरूप 





विकारका निषेध किया गया है। शरीरीमें किसी भी क्रियासे 
किंचिन्मात्र भी कोई विकार नहीं होता। 

अगर भगवान्को 'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' और कं 
घातयति हन्ति कम्‌' इन पदोंमें शरीरीके कर्ता और कर्म 
बननेका ही निषेध करना था, तो फिर यहाँ करने-न- 
करनेको बात न कहकर मरने-मारनेको बात क्यों कही ? 
इसका उत्तर है कि युद्धका प्रसंग होनेसे यहाँ यह कहना 
जरूरी है कि शरीरी युद्धमें मारनेवाला नहीं बनता; क्योंकि 
इसमें कर्तापन नहीं है। जब शरीरी मारनेवाला अर्थात्‌ कर्ता 
नहीं बन सकता, तब यह मरनेवाला अर्थात्‌ क्रियाका विषय 
(कर्म॑) भी कैसे बन सकता है? तात्पर्य यह है कि यह शरीरी 
किसी भी क्रियाका कर्ता और कर्म नहीं बनता। अतः मरने- 
मारनेमें शोक नहीं करना चाहिये, प्रत्युत शास्त्रको आज्ञाके 
अनुसार प्राप्त कर्तव्य-कर्मका पालन करना चाहिये। 


परिशिष्ट भाव--उत्पन्न होनेवाली वस्तु तो स्वतः मिटती है, उसको मिटाना नहीं पड्ता। पर जो वस्तु उत्पन्न 


नहीं होती, वह कभी मिटती ही नहीं। हमने चौरासी लाख शरीर धारण किये, पर कोई भी शरीर हमारे साथ नहीं रहा 
और हम किसी भी शरीरके साथ नहीं रहे; किन्तु हम ज्यों-के-त्यों अलग रहे। यह जाननेकी विवेकशक्ति उन शरीरोंमें 
नहीं थी, प्रत्युत इस मनुष्य-शरीरमें ही है। अगर हम इसको नहीं जानते तो भगवान्‌के दिये विवेकका निरादर करते हैं। 





सम्बन्ध पूर्वश्लोकांमें देहीकी निर्विकारताका जो वर्णन हुआ है आगेके श्लोकमें उसीका दृष्टन्तरूपसे वर्णन करते हैं। 
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। 
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२॥ 


नरः = मनुष्य नवानि =नये (कपड़े) शरीराणि =शरीरोंको 
यथा = जैसे गृह्णाति = धारण कर विहाय = छोड़कर 
जीर्णानि =पुराने लेता है, अन्यानि = दूसरे 
वासांसि = कपड़ोंको तथा =एऐसे ही नवानि = नये (शरीरोंमें) 
विहाय = छोड़कर देही =देही संयाति = चला जाता 
अपराणि = दूसरे जीर्णानि =पुराने है। 


९८ 


व्याख्या-- वासांसि जीर्णानि”“संयाति नवानि देही 
इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें सूत्ररूपसे कहा गया था 
कि देहान्तरकी प्राप्तिके विषयमें धीर पुरुष शोक नहीं 
करते। अब उसी बातको उदाहरण देकर स्पष्टरूपसे कह 
रहे हैं कि जैसे पुराने कपड़ोंके परिवर्तनपर मनुष्यको शोक 
नहीं होता, ऐसे ही शरीरॉंके परिवर्तनपर भी शोक नहीं 
होना चाहिये। 

कपड़े मनुष्य ही बदलते हैं, पशु-पक्षी नहीं; अतः यहाँ 
कपड़े बदलनेके उदाहरणमें 'नरः' पद दिया है। यह 
“नरः ' पद मनुष्ययोनिका वाचक है और इसमें स्त्री-पुरुष, 
बालक-बालिकाएँ, जवान-बूढ़े आदि सभी आ जते हैं। 

जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये 

कपड़ोंको धारण करता है, ऐसे ही यह देही पुराने शरीरोंको 
छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको धारण करता है। पुराना शरीर 
छोड्नेको 'मरना' कह देते हैं, और नया शरीर धारण 
करनेको “जन्मना' कह देते हैं। जबतक प्रकृतिके साथ 
सम्बन्ध रहता है, तबतक यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर 
कर्मोके अनुसार या अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार नये- 
नये शरीरोंको प्राप्त होता रहता है। 

यहाँ “शरीराणि ' पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि 
जबतक शरीरीको अपने वास्तविक स्वरूपका यथार्थ बोध 
नहीं होता, तबतक यह शरीरी अनन्तकालतक शरीर धारण 
करता ही रहता है। आजतक इसने कितने शरीर धारण 
किये हैं, इसकी गिनती भी सम्भव नहीं है। इस बातको 
लक्ष्यमें रखकर 'शरीराणि' पदमें बहुवचनका प्रयोग किया 
गया है तथा सम्पूर्ण जीवोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ 
'देही' पद आया है। 

यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें तो जीर्ण कपड़ोंकी बात कही 
है और उत्तरार्धमें जीर्ण शरीरोंकी । जीर्ण कपड़ोंका दृष्टान्त 
शरीरोंमें कैसे लागू होगा ? कारण कि शरीर तो बच्चों और 
जवानोंके भी मर जाते हैं। केवल बूढ़ोंके जीर्ण शरीर मर 
जाते हों, यह बात तो है नहीं! इसका उत्तर यह है कि 
शरीर तो आयु समाप्त होनेपर ही मरता है और आयु 
समाप्त होना ही शरीरका जीर्ण होना है*। शरीर चाहे 
बच्चाका हो, चाहे जवानोंका हो, चाहे वृद्धोंका हो, आयु 
समाप्त होनेपर वे सभी जीर्ण ही कहलायेंगे। 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


इस श्लोकमें भगवानूने “यथा' और “तथा ' पद देकर 
कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े 
धारण कर लेता है, वैसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर 
नये शरीरोंमें चला जाता है। यहाँ एक शंका होती है। जैसे 
कुमार, युवा और वृद्ध अवस्थाएँ अपने-आप होती हैं, वैसे 
ही देहान्तरकी प्राप्ति अपने-आप होती है (दूसरे अध्यायका 
तेरहवाँ श्लोक) यहाँ तो “यथा' (जैसे) और “तथा' 
(वैसे) घट जाते हैं। परन्तु (इस श्लोकमें ) पुराने कपड़ोंको 
छोड्नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो मनुष्यकी 
स्वतन्त्रता है, पर पुराने शरीरोंको छोड्नेमें और नये शरीर 
धारण करनेमें देहीकी स्वतन्त्रता नहीं है। इसलिये यहाँ 
“यथा' और तथा' कैसे घटेंगे ? इसका समाधान है कि यहाँ 
भगवानका तात्पर्य स्वतन्त्रता-परतन्त्रताकी बात कहनेमें नहीं 
है, प्रत्युत शरीरके वियोगसे होनेवाले शोकको मिटानेमें है। 
जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण करनेपर भी 
धारण करनेवाला (मनुष्य) वही रहता है, वैसे ही पुराने 
शरीरांको छोड़कर नये शरीरोंमें चले जानेपर भी देही ज्यों- 
का-त्यों निर्लिप्तरूपसे रहता है; अतः शोक करनेकी कोई 
बात है ही नहीं। इस दृष्टिसे यह दृष्टान्त ठीक ही है। 

दूसरी शंका यह होती है कि पुराने कपड़े छोड्नेमें और 
नये कपड़े धारण करनेमें तो सुख होता है, पर पुराने शरीर 
छोड्नेमें और नये शरीर धारण करनेमें दु:ख होता है। अतः 
यहाँ “यथा' और “तथा' कैसे घटेंगे ? इसका समाधान यह 
है कि शरीरोंके मरनेका जो दुःख होता है, वह मरनेसे नहीं 
होता, प्रत्युत जीनेकी इच्छासे होता है। “मैं जीता रहूँ'- 
ऐसी जीनेकी इच्छा भीतरमें रहती है और मरना पड़ता है, 
तब दुःख होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य शरीरके 
साथ एकात्मता कर लेता है, तब वह शरीरके मरनेसे अपना 
मरना मान लेता है और दुःखी होता है। परन्तु जो शरीरके 
साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता, उसको मरनेमें दुःख नहीं 
होता, प्रत्युत आनन्द होता है! जैसे, मनुष्य कपड़ोंके साथ 
अपनी एकात्मता नहीं मानता, तो कपड़ोंको बदलनेमें 
उसको दुःख नहीं होता। कारण कि वहाँ उसका यह विवेक 
स्मष्टतया जाग्रत्‌ रहता है कि कपड़े अलग हैं और मैं अलग 
हूँ। परन्तु वही कपड़ोंका बदलना अगर छोटे बच्चेका किया 
जाय, तो वह पुराने कपड़े उतारनेमें और नये कपड़े धारण 


* विवेक-विचारपूर्वक देखा जाय तो आयु प्रतिक्षण समाप्त हो रही है अर्थात्‌ शरीर प्रतिक्षण जीर्ण हो रहा है, प्रतिक्षण 
मर रहा है। यह एक क्षण भी स्थिर नहीं है। जैसे, जवान होनेसे बालकपन मर जाता है, तो वास्तवमें वह बालकपन निरन्तर 
मरता ही रहा है। परन्तु उधर दृष्टि न होनेसे प्रतिक्षण होनेवाली मौतकी तरफ खयाल नहीं जाता। यही वास्तवमें बेहोशी है। 


श्लोक २२३ 


करनेमें भी रोता है। उसका यह दुःख केवल मूर्खतासे, 
नासमझीसे होता है। इस मूर्खताको मिटानेके लिये ही 
भगवानूने यहाँ “यथा' और “तथा' पद देकर कपड़ोंका 
दृष्टान्त दिया है। 

यहाँ भगवानूने कपड़ोंके धारण करनेमें तो 'गृहृणाति' 
(धारण करता है) क्रिया दी, पर शरीरोंके धारण करनेमें 
“संयाति' (जाता है) क्रिया दी, ऐसा क्रियाभेद भगवान्‌ने 
क्यों किया? लौकिक दृष्टिसे बेसमझीके कारण ऐसा 
दीखता है कि मनुष्य अपनी जगह रहता हुआ ही कपड़ोंको 
धारण करता है और देहान्तरकी प्राप्तिमें देहीको उन-उन 
देहोंमें जाना पड़ता है। इस लौकिक दृष्टिको लेकर ही 
भगवानूने क्रियाभेद किया है। 

विशेष बात 

गीतामें “येन सर्वमिदं ततम्‌’ (२। १७), 'नित्यः 
सर्वगतः स्थाणु:' (२। २४) आदि पदोंसे देहीको सर्वत्र 
व्याप्त, नित्य, सर्वगत और स्थिर स्वभाववाला बताया तथा 
“संयाति नवानि देही' (२। २२), “शरीर यदवाप्नोति' 
(१५।८) आदि पदोंसे देहीको दूसरे शरीरोंमें जानेकी बात 
कही गयी है। अतः जो सर्वगत है, सर्वत्र व्याप्त है, उसका 
जाना-आना कैसे ? क्योंकि जो जिस देशमें न हो, उस 
देशमें चला जाय, तो इसको ' जाना' कहते हैं और जो दूसरे 
देशमें है, वह इस देशमें आ जाय, तो इसको 'आना' कहते 
हैं। परन्तु देहीके विषयमें तो ये दोनों ही बातें नहीं घटतीं ! 
इसका समाधान यह है कि जैसे किसीकी बाल्यावस्थासे 
युवावस्था हो जाती है तो वह कहता है कि “मैं जवान हो 
गया हूँ'। परन्तु वास्तवमें वह स्वयं जवान नहीं हुआ है, 


* साधक-संजीवनी * 





९९ 


प्रत्युत उसका शरीर जवान हुआ है। 
इसलिये बाल्यावस्थामें जो वह था, युवावस्थामें भी वह 
वही है। परन्तु शरीरसे तादात्म्य माननेके कारण वह 
शरीरके परिवर्तनको अपनेमें आरोपित कर लेता है। ऐसे 
ही आना-जाना वास्तवमें शरीरका धर्म है, पर शरीरके 
साथ तादात्म्य होनेसे वह अपनेमें आना-जाना मान लेता है। 
अतः वास्तवमें देहीका कहीं भी आना-जाना नहीं होता, 
केवल शरीरोंके तादात्म्यके कारण उसका आना-जाना 
प्रतीत होता है। 

अब यह प्रश्न होता है कि अनादिकालसे जो जन्म- 
मरण चला आ रहा है, उसमें कारण क्या है? कर्मोकी 
दृष्टिसे तो शुभाशुभ कर्मोका फल भोगनेके लिये जन्म- 
मरण होता है, ज्ञानकी दृष्टिसे अज्ञानके कारण जन्म-मरण 
होता है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवानूकी विमुखताके 
कारण जन्म-मरण होता है। इन तीनोंमें भी मुख्य कारण 
है कि भगवानूने जीवको जो स्वतन्त्रता दी है, उसका 
दुरुपयोग करनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है। अब वह 
जन्म-मरण मिटे कैसे ? मिली हुई स्वतन्त्रताका सदुपयोग 
करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। तात्पर्य है कि अपने 
स्वार्थके लिये कर्म करनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः अपने 
स्वार्थका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे 
जन्म-मरण मिट जायगा। अपनी जानकारीका अनादर 
करनेसे* जन्म-मरण हुआ है; अतः अपनी जानकारीका 
आदर करनेसे जन्म-मरण मिट जायगा। भगवानूसे विमुख 
होनेसे जन्म-मरण हुआ है; अतः भगवान्‌के सम्मुख होनेसे 
जन्म-मरण मिट जायगा। 


परिशिष्ट भाव--मनुष्य नयी-नयी वस्तु चाहता है तो भगवान्‌ भी उसको नयी-नयी वस्तु (शरीरादि सामग्री) 


देते रहते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है तो भगवान्‌ उसको नया शरीर दे देते हैं। अतः नयी-नयी इच्छा करना ही जन्म- 
मरणका हेतु है। नयी-नयी इच्छा करनेवालेको अनन्तकालतक नयी-नयी वस्तु मिलती ही रहेगी । मनुष्यमें एक इच्छाशक्ति 
है, एक प्राणशक्ति है। इच्छाशक्तिके रहते हुए प्राणशक्ति नष्ट हो जाती है, तब नया जन्म होता है। अगर इच्छाशक्ति 
न रहे तो प्राणशक्ति नष्ट होनेपर भी पुनः जन्म नहीं होता। 

कोई भी दृष्टान्त केवल एक अंशमें घटता है, सर्वथा नहीं घटता। यहाँ पुराने कपड़े छोड़कर नये कपड़े बदलनेका दृष्टान्त 
केवल इस अंशमें है कि जैसे आदमी अनेक कपड़े बदलनेपर भी एक ही रहता है, ऐसे ही स्वयं अनेक योनियोंमें अनेक 
शरीर धारण करनेपर भी एक (वही-का-वही) रहता है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड्नेसे हम मर नहीं जाते और नये कपड़े 
धारण करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते, ऐसे ही पुराने शरीरको छोड्नेसे हम मर नहीं जाते और नया शरीर धारण 


* अपनी जानकारीका अनादर करनेका तात्पर्य है कि हम जितना जानते हैं, उसके अनुसार कार्य न करना। जैसे, सत्य 
बोलना ठीक है, झूठ बोलना ठीक नहीं--ऐसा जानते हुए भी स्वार्थके लिये झूठ बोल देते हैं। कोई हमें सुख देता है तो अच्छा 
लगता है और दुःख देता है तो बुरा लगता है--ऐसा जानते हुए भी अपने सुखके लिये दूसरोंको दुःख देते हैं। ऐसे ही हम जानते 
हैं कि शरीर आदि सब जानेवाले हैं, रहनेवाले नहीं हैं, फिर भी इनमें मोह-ममता करते हैं। यही अपनी जानकारीका अनादर है। 


१०० 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय २ 


करनेसे हम पैदा नहीं हो जाते। तात्पर्य है कि शरीर मरता है, हम नहीं मरते। अगर हम मर जायँ तो फिर पुण्य- 
पापका फल कौन भोगेगा ? अन्य योनियोंमें कौन जायगा? बन्धन किसका होगा? मुक्त कौन होगा? 





सम्बन्ध पहले दुष्टान्तरूपसे शरीरीकी निर्विकारताका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकॉमें उसीका प्रकारान्तरसे वर्णन करते हैं। 
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। 
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ २३॥ 


शस्त्राणि =शस्त्र एनम्‌ =इसको न, क्लेदयन्ति =गीला नहीं कर 
एनम्‌ =इस (शरीरी)-को |न, दहति =जला नहीं सकता 
न, छिन्दन्ति =काट नहीं सकती, च = और 

सकते, आपः = जल मारुतः = वायु (इसको) 
पावकः = अग्नि एनम्‌ =इसको न, शोषयति =सुखा नहीं सकती। 


व्याख्या- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि'-इस शरीरीको 
शस्त्र नहीं काट सकते; क्योंकि ये प्राकृत शस्त्र वहाँतक 
पहुँच ही नहीं सकते। 

जितने भी शस्त्र हैं, वे सभी पृथ्वी-तत्त्वसे उत्पन्न होते 
हैं। यह पृथ्वी-ततत्व इस शरीरीमें किसी तरहका कोई 
विकार नहीं पैदा कर सकता। इतना ही नहीं, पृथ्वी-तत्त्व 
इस शरीरीतक पहुँच ही नहीं सकता, फिर विकृति करनेकी 
बात तो दूर ही रही! 

'नैनं दहति पावकः'अग्नि इस शरीरीको जला 
नहीँ सकती; क्योंकि अग्नि वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती। 
जब वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती, तब उसके द्वारा जलाना कैसे 
सम्भव हो सकता है? तात्पर्य है कि अग्नि-तत्त्व इस शरीरीमें 
कभी किसी तरहका विकार उत्पन्न कर ही नहीं सकता। 

“न चैनं क्लेदयन्त्यापः'-जल इसको गीला नहीं 
कर सकता; क्योंकि जल वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। 
तात्पर्य है कि जल-तत्त्व इस शरीरीमें किसी प्रकारका 
विकार पैदा नहीं कर सकता। 

“न शोषयति मारुतः'-वायु इसको सुखा नहीं 
सकती अर्थात्‌ वायुमें इस शरीरीको सुखानेको सामर्थ्य नहीं 
है; क्योंकि वायु वहाँतक पहुँचती ही नहीं। तात्पर्य है कि 
वायु-तत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहकी विकृति पैदा नहीं 
कर सकता। 

पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश--ये पाँच महाभूत 
कहलाते हैं। भगवानूने इनमेंसे चार ही महाभूतोंकी बात 
कही है कि ये पृथ्वी, जल, तेज और वायु इस शरीरीमें 
किसी तरहकी विकृति नहीं कर सकते; परन्तु पाँचवें महाभूत 
आकाशकी कोई चर्चा ही नहीं की है। इसका कारण यह 





है कि आकाशमें कोई भी क्रिया करनेकी 
शक्ति नहीं है। क्रिया (विकृति) करनेकी शक्ति तो इन 
चार महाभूतोंमें ही है। आकाश तो इन सबको अवकाशमात्र 
देता है। 
पृथ्वी, जल, तेज और वायु-ये चारों तत्त्व आकाशसे 
ही उत्पन्न होते हैं, पर वे अपने कारणभूत आकाशमें भी 
किसी तरहका विकार पैदा नहीं कर सकते अर्थात्‌ पृथ्वी 
आकाशका छेदन नहीं कर सकती, जल गीला नहीं कर 
सकता, अग्नि जला नहीं सकती और वायु सुखा नहीं सकती। 
जब ये चारों तत्त्व अपने कारणभूत आकाशको, आकाशके 
कारणभूत महत्तत््तको और महत्तत्वके कारणभूत प्रकृतिको 
भी कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते, तब प्रकृतिसे सर्वथा अतीत 
शरीरीतक ये पहुँच ही कैसे सकते हैं? इन गुणयुक्त 
पदार्थोंकी उस निर्गुण-तत्त्वमें पहुँच ही कैसे हो सकती है? 
नहीं हो सकती (गीता-तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक) । 
शरीरी नित्य-तत्त्व है। पृथ्वी आदि चारों तत्त्वोंको 
इसीसे सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः जिससे इन तत्त्वोंको 
सत्ता-स्फूर्ति मिलती है, उसको ये कैसे विकृत कर सकते 
हैं ? यह शरीरी सर्वव्यापक है और पृथ्वी आदि चारों तत्त्व 
व्याप्य हैं अर्थात्‌ शरीरीके अन्तर्गत हैं। अतः व्याप्य वस्तु 
व्यापकको कैसे नुकसान पहुँचा सकती है? उसको 
नुकसान पहुँचाना सम्भव ही नहीं है। 
यहाँ युद्धका प्रसंग है। 'ये सब सम्बन्धी मर 
जायँगे'-इस बातको लेकर अर्जुन शोक कर रहे हैं। अतः 
भगवान्‌ कहते हैं कि ये कैसे मर जायँगे ? क्योंकि वहाँतक 
अस्त्र-शस्त्रोंकी क्रिया पहुँचती ही नहीं अर्थात्‌ शस्त्रके द्वारा 
शरीर कट जानेपर भी शरीरी नहीं कटता, अग्न्यास्त्रके द्वारा 


श्लोक २४] * साधक-संजीवनी » १०१ 
शरीर जल जानेपर भी शरीरी नहीं जलता, वरुणास्त्रके द्वारा | है कि अस्त्र-शस्त्रोंके द्वारा शरीर मर जानेपर भी शरीरी 
शरीर गल जानेपर भी शरीरी नहीं गलता और वायव्यास्त्रके | नहीं मरता, प्रत्युत ज्यों-का-त्यों निर्विकार रहता है। अतः 
द्वारा शरीर सूख जानेपर भी शरीरी नहीं सूखता। तात्पर्य | इसको लेकर शोक करना तेरी बिलकुल ही बेसमझी है। 

परिशिष्ट भाव--हम कहते हैं कि “शरीर है' तो परिवर्तन शरीरमें होता है, 'है' (शरीरी) में नहीं होता। जैसे, 
“काठ है' तो विकृति काठमें आती है, 'है' में नहीं आती। काठ कटता है, 'है' नहीं कटता। काठ जलता है, 'है' 
नहीं जलता। काठ गीला होता है, 'है' गीला नहीं होता। काठ सूखता है, 'है' नहीं सूखता। काठ कभी एकरूप रहता 


ही नहीं और 'है' कभी अनेकरूप होता ही नहीं। 





अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। 
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥ २४॥ 


अयम्‌ =यह शरीरी नहीं किया जा अयम्‌ =यह 

अच्छेद्यः =काटा नहीं जा सकता नित्यः = नित्य रहनेवाला, 
सकता, च = और सर्वगतः = सबमें परिपूर्ण, 

अयम्‌ =यह अशोष्यः, एव = (यह ) सुखाया | अचलः = अचल, 

अदाह्याः =जलाया नहीं जा भी नहीं जा स्थाणुः = स्थिर स्वभाववाला 
सकता, सकता। (और) 

अक्लेद्यः = (यह) गीला (कारण कि) सनातनः = अनादि है। 


व्याख्या-[शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्‍यों नहीं 
करते-यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।] 

' अच्छेद्योऽयम्‌ शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर 
सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव 
है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है, प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया 
शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती, यह छेदन होनेके योग्य 
ही नहीं है। 

शस्त्रके सिवाय मन्त्र, शाप आदिसे भी इस शरीरीका 
छेदन नहीं हो सकता। जैसे, याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न 
दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर 
गिर गया (बृहदारण्यक०)। इस प्रकार देह तो मन्त्राँसे, 
वाणीसे कट सकता है, पर देही सर्वथा अछेद्य है। 

' अदाह्योऽयम्‌'-यह शरीरी अदाह्य है; क्योंकि इसमें 
जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र, शाप 
आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे, दमयन्तीके 
शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। 
इस प्रकार अग्नि, शाप आदिसे वही जल सकता है, जो 
जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहन-क्रियाका प्रवेश 
ही नहीं हो सकता। 

' अक्लेद्यः '--यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात्‌ 
इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र, 





शाप, ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे, 
सुननेमें आता है कि 'मालकोश' रागके गाये जानेसे पत्थर 
भी गीला हो जाता है; चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि 
गीली हो जाती है। परन्तु यह देही राग-रागिनी आदिसे 
गीली होनेवाली वस्तु नहीं है। 

' अशोष्यः'यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका 
शोषण हो जाय, यह ऐसी वस्तु नहीं है; क्योंकि इसमें 
शोषण-क्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र, 
शाप, ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे 
अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये, ऐसे इस देहीका 
कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता। 

“एव च'--अर्जुन नाशको सम्भावनाको लेकर शोक 
कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य 
और अशोष्य कहकर भगवान्‌ “एव च' पदाँसे विशेष जोर 
देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी 
भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अत: यह शरीरी शोक 
करनेयोग्य है ही नहीं। 

“नित्य: यह देही नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। यह 
किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा- 
ऐसी बात नहीं है; किन्तु यह सब कालमें नित्य-निरन्तर 
ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। 


१०२ 


“सर्वगतः '--यह देही सब कालमें ज्यों-का-त्यों ही 
रहता है, तो यह किसी देशमें रहता होगा ? इसके उत्तरमें 
कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति, वस्तु, शरीर आदिमें 
एकरूपसे विराजमान है। 

“अचलः '--यह सर्वगत है, तो यह कहीं आता-जाता 
भी होगा ? इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला 
है अर्थात्‌ इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ--इस प्रकार 
आने-जानेकी क्रिया नहीं है। 

“स्थाणुः '--यह स्थिर स्वभाववाला है, कहीं आता- 
जाता नहीं--यह बात ठीक है, पर इसमें कम्पन तो होता 
होगा? जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है, कहीं भी आता- 
जाता नहीं, पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है, 
ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी ? इसके 
उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात्‌ इसमें 
हिलनेकी क्रिया नहीं है। 

“सनातनः '--यह देही अचल है, स्थाणु है--यह बात 
तो ठीक है, पर यह कभी पैदा भी होता होगा ? इसपर 
कहते हैं कि यह सनातन है, अनादि है, सदासे है। यह 
किसी समय नहीं था, ऐसा सम्भव ही नहीं है। 

विशेष बात 

यह संसार अनित्य है, एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला 
नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है, जिसमें कभी 
किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता, उस देहीकी तरफ 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


लक्ष्य करानेमें “नित्यः ' पदका तात्पर्य है। 

देखने, सुनने, पढ़ने, समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार 
आता है, उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है, उसकी 
तरफ लक्ष्य करानेमें “सर्वगतः ' पदका तात्पर्य है। 

संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ आदि हैं, 
वे सब-के-सब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु, 
व्यक्ति, पदार्थ आदिमे जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान 
(विचलित) नहीं होता, उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें 
'अचलः' पदका तात्पर्य है। 

प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया 
होती रहती है, परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील 
संसारमें जो क्रियारहित, परिवर्तनरहित, स्थायी स्वभाववाला 
तत्त्व है, उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'स्थाणुः' पदका 
तात्पर्य है। 

मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा 
ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो 
न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी 
था और पीछे भी हरदम रहेगा- उस तत्त्व-(देही-)की 
तरफ लक्ष्य करानेमें “सनातनः ' पदका तात्पर्य है। 

उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीर- 
संसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीर-शरीरी- 
भावका अलग-अलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्य- 
निरन्तर एकरस, एकरूप रहता है। 


परिशिष्ट भाव-- सर्वगतः ' स्वयं देहगत नहीं है, प्रत्युत सर्वगत है-एऐसा अनुभव होना ही जीवन्मुक्ति है। जैसे 
शरीर संसारमें बैठा हुआ है, ऐसे हम शरीरमें बैठे हुए नहीं हैं। शरीरके साथ हमारा मिलन कभी हुआ ही नहीं, है 
ही नहीं, होगा ही नहीं, हो सकता ही नहीं। शरीर हमारेसे बहुत दूर है। परन्तु कामना-ममता-तादात्म्यके कारण हमें 


शरीरके साथ एकता प्रतीत होती है। 


वास्तवमें शरीरीको शरीरकी जरूरत ही नहीं है। शरीरके बिना भी शरीरी मौजसे रहता है। 





अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । 
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमरहसि॥ २५॥ 
अयम्‌ = यह देही अयम्‌ = (और) यह एवम्‌ = ऐसा 
अव्यक्तः - प्रत्यक्ष नहीं दीखता, | अविकार्यः =निर्विकार विदित्वा = जानकर 
अयम्‌ =यह उच्यते = कहा जाता है। अनुशोचितुम्‌ = शोक 
अचिन्त्यः =चिन्तनका विषय | तस्मात्‌ = अतः न =नहीं 
नहीं है एनम्‌ =इस देहीको अईसि = करना चाहिये। 


व्याख्या अव्यक्तोऽयम्‌ जैसे शरीर-संसार स्थूलरूपसे | आनेवाला नहीं है; क्योंकि यह स्थूल सृष्टिसे रहित है। 


देखनेमें आता है, वैसे यह शरीरी स्थूलरूपसे देखनेमें 


' अचिन्त्योऽयम्‌'मन, बुद्धि आदि देखनेमें तो नहीं 


श्लोक २६] 


आते, पर चिन्तनमें आते ही हैं अर्थात्‌ ये सभी चिन्तनके 
विषय हैं। परन्तु यह देही चिन्तनका भी विषय नहीं है; 
क्योंकि यह सूक्ष्म सृष्टिसे रहित है। 

' अविकार्योऽयमुच्यते'—यह देही विकाररहित कहा 
जाता है अर्थात्‌ इसमें कभी किंचिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं 
होता। सबका कारण प्रकृति है, उस कारणभूत प्रकृतिमें भी 
विकृति होती है। परन्तु इस देहीमें किसी प्रकारकी विकृति 
नहीं होती; क्योंकि यह कारण सृष्टिसे रहित है। 

यहाँ चौबीसवें-पचीसवें श्लोकोंमें अच्छेद्य, अदाह्य, 
अक्लेद्य, अशोष्य, अचल, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य- 
इन आठ विशेषणोंके द्वारा इस देहीका निषेधमुखसे और 


* साधक-संजीवनी * 





१०३ 


नित्य, सर्वगत, स्थाणु और सनातन इन चार विशेषणोंके 
द्वारा इस देहीका विधिमुखसे वर्णन किया गया है। परन्तु 
वास्तवमें इसका वर्णन हो नहीं सकता; क्‍योंकि यह 
वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी आदि प्रकाशित 
होते हैं, उस देहीको वे सब प्रकाशित कैसे कर सकते हैं ? 
अतः इस देहीका ऐसा अनुभव करना ही इसका वर्णन 
करना है। 

“तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि’ इसलिये 
इस देहीको अच्छेद्य, अशोष्य, नित्य, सनातन, अविकार्य 
आदि जान लें अर्थात्‌ ऐसा अनुभव कर लें तो फिर शोक 
हो ही नहीं सकता। 





सम्बन्ध-अगर शरीरीको निर्विकार न मानकर विकारी मान लिया जाय (जो कि सिद्धान्तसे विरुद्ध है), तो भी 
शोक नहीं हो सकता-यह बात आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं। 


अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌। 
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥ २६॥ 


महाबाहो न्हे महाबाहो! नित्यम्‌ = नित्य त्वम्‌ = तुम्हें 

अथ = अगर (तुम) मृतम्‌ = मरनेवाला एवम्‌ =इस प्रकार 
एनम्‌ =इस देहीको च =भी शोचितुम्‌ =शोक 
नित्यजातम्‌ =नित्य पैदा होनेवाला | मन्यसे = मानो, न नहीं 

वा = अथवा तथापि =तो भी अईसि = करना चाहिये। 


व्याख्या- अथ चैनं *“'शोचितुमहसि '-- भगवान्‌ 
यहाँ पक्षान्तरमें “अथ च' और 'मन्यसे' पद देकर कहते 
हैं कि यद्यपि सिद्धान्तकी और सच्ची बात यही है कि देही 
किसी भी कालमें जन्मने-मरनेवाला नहीं है ( गीता-- दूसरे 
अध्यायका बीसवाँ श्लोक), तथापि अगर तुम सिद्धान्तसे 
बिलकुल विरुद्ध बात भी मान लो कि देही नित्य 
जन्मनेवाला और नित्य मरनेवाला है, तो भी तुम्हें शोक 
नहीं होना चाहिये। कारण कि जो जन्मेगा, वह मरेगा ही 
और जो मरेगा, वह जन्मेगा ही-इस नियमको कोई टाल 
नहीं सकता। 

अगर बीजको पृथ्वीमें बो दिया जाय, तो वह फूलकर 
अंकुर दे देता है और वही अंकुर क्रमशः बढ़कर वृक्षरूप 
हो जाता है। इसमें सूक्ष्म दूष्टिसे देखा जाय कि क्या वह 
बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहा? प॒थ्वीमें वह पहले 
अपने कटठोररूपको छोड़कर कोमलरूपमें हो गया, फिर 
कोमलरूपको छोड़कर अंकुररूपमें हो गया, इसके बाद 





अंकुररूपको छोड़कर वृक्षरूपमें हो गया और अन्तमें आयु 
समाप्त होनेपर वह सूख गया। इस तरह बीज एक क्षण 
भी एकरूपसे नहीं रहा, प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता रहा। अगर 
बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहता, तो वृक्षके सूखनेतककी 
क्रिया कैसे होती उसने पहले रूपको छोड़ा-यह उसका 
मरना हुआ, और दूसरे रूपको धारण किया-यह उसका 
जन्मना हुआ। इस तरह वह प्रतिक्षण ही जन्मता-मरता रहा। 
बीजको ही तरह यह शरीर है। बहुत सूक्ष्मरूपसे वीर्यका 
जन्तु रजके साथ मिला। वह बढ़ते-बढ़ते बच्चेके रूपमें 
हो गया और फिर जन्म गया। जन्मके बाद वह बढ़ा, फिर 
घटा और अन्तमें मर गया। इस तरह शरीर एक क्षण भी 
एकरूपसे न रहकर बदलता रहा अर्थात्‌ प्रतिक्षण जन्मता- 
मरता रहा। 

भगवान्‌ कहते हैं कि अगर तुम शरीरकी तरह 
शरीरीको भी नित्य जन्मने-मरनेवाला मान लो, तो भी यह 
शोकका विषय नहीं हो सकता। 





१०४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च। 
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥ २७॥ 

हि >कारण कि श्रुवम्‌ = जरूर नहीं हो सकता। 

जातस्य =पैदा हुएकी जन्म = जन्म होगा। अर्थे = (अतः) इस विषयमें 

रुवः = जरूर तस्मात्‌ = अतः त्वम्‌ = तुम्हें 

मृत्युः =मृत्यु होगी अपरिहाये = (इस जन्म-मरण- | शोचितुम्‌ = शोक 

च = और रूप परिवर्तनके |न -नहीं 

मृतस्य > मरे हुएका प्रवाहका )निवारण | अईसि = करना चाहिये। 


व्याख्या- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धुव॑ जन्म मृतस्य 
च'__पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने 
और मरनेवाला भी मान लिया जाय, तो भी वह शोकका 
विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया 
है, वह जरूर मरेगा और जो मर गया है, वह जरूर जन्मेगा। 
' तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि इसलिये 
कोई भी इस जन्म-मृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) 
नहीं कर सकता; क्योंकि इसमें किसीका किंचिन्मात्र भी 
वश नहीं चलता। यह जन्म-मृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे 
चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस 
दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है। 
ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं, तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे 
पास ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे तुम उनको बचा 
सको। जो मर जायँगे, वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम 
रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका ? 
शोक उसीका कीजिये, जो अनहोनी होय। 
अनहोनी होती नहीं, होनी है सो होय॥ 
जैसे, इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ 
है, तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय 





होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोक-चिन्ता 
नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन! अगर तुम ऐसा मानते हो 
कि शरीरके साथ ये भीष्म, द्रोण आदि सभी मर जायेगे, 
तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायँगे। अतः इस दृष्टिसे 
भी शोक नहीँ हो सकता। 

भगवानूने इन दो (छब्बीसवें-सत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो 
बात कही है, वह भगवानका कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं 
है। अतः ‘अथ च' पद देकर भगवानूने दूसरे (शरीर- 
शरीरीको एक माननेवाले) पक्षको बात कही है कि ऐसा 
सिद्धान्त तो है नहीं, पर अगर तू ऐसा भी मान ले, तो 
भी शोक करना उचित नहीं है। 

इन दो श्लोकोंका तात्पर्यं यह हुआ कि संसारको मात्र 
चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर 
दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको 
छोड्ना-यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण 
करना-यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है, 
उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है, बह फिर 
जन्मता है-यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। इस 
दृष्टिसे भी क्या शोक करें? 


परिशिष्ट भाव--किसी प्रियजनकी मृत्यु हो जाय, धन नष्ट हो जाय तो मनुष्यको शोक होता है। ऐसे ही भविष्यको 


लेकर चिन्ता होती है कि आगर स्त्री मर गयी तो क्या होगा? पुत्र मर गया तो क्या होगा? आदि। ये शोक-चिन्ता अपने 
विवेकको महत्त्व न देनेके कारण ही होते हैं। संसारमै परिवर्तन होना, परिस्थिति बदलना आवश्यक है। अगर परिस्थिति 
नहीं बदलेगी तो संसार कैसे चलेगा ? मनुष्य बालकसे जवान कैसे बनेगा ? मूर्खसे विद्वान्‌ कैसे बनेगा? रोगीसे नीरोग कैसे 
बनेगा? बीजका वृक्ष कैसे बनेगा? परिवर्तनके बिना संसार स्थिर चित्रकी तरह बन जायगा! वास्तवमै मरनेवाला 
(परिवर्तनशील) ही मरता है, रहनेवाला कभी मरता ही नहीं। यह सबका प्रत्यक्ष अनुभव है कि मृत्यु होनेपर शरीर तो हमारे 
सामने पड़ा रहता है, पर शरीरका मालिक (जीवात्मा) निकल जाता है। अगर इस अनुभवको महत्त्व दें तो फिर चिन्ता- 
शोक हो ही नहीं सकते | बालिके मरनेपर भगवान्‌ राम इसी अनुभवको ओर ताराका लक्ष्य कराते हैं- 


तारा बिकल देखि रघुराया। दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया॥ 
छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम सरीरा॥ 
प्रगर सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा॥ 


श्लोक २८ ] 


उपजा 


* साधक-संजीवनी * 


१०५ 


ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर माँगी॥ 


(मानस, किष्किन्धा० ११। २-३) 


विचार करना चाहिये कि जब चौरासी लाख योनियोंमें कोई भी शरीर नहीं रहा, तो फिर यह शरीर कैसे रहेगा ? 
जब चौरासी लाख शरीर मैं-मेरे नहीं रहे, तो फिर यह शरीर मैं-मेरा कैसे रहेगा? यह विवेक मनुष्य-शरीरमें हो 


सकता है, अन्य शरीरोंमें नहीं । 





सम्बन्ध पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर अब भगवान्‌ आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं। 
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। 
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥ २८॥ 


भारत =हे भारत! अव्यक्तनिधनानि =मरनेके बाद दीखते हैं। (अतः) 

भूतानि =सभी प्राणी अप्रकट हो जायँगे, | तत्र =इसमें 

अव्यक्तादीनि = जन्मसे पहले व्यक्तमध्यानि, एव = केवल परिदेवना =शोक करनेकी 
अप्रकट थे (और) बीचमें ही प्रकट | का =बात ही क्या है? 


व्याख्या- अव्यक्तादीनि भूतानि देखने, सुनने और 
समझनेमें आनेवाले जितने भी प्राणी (शरीर आदि) हैं, वे 
सब-के-सब जन्मसे पहले अप्रकट थे अर्थात्‌ दीखते 
नहीं थे। 

' अव्यक्तनिधनान्येव'—ये सभी प्राणी मरनेके बाद 
अप्रकट हो जायेगे अर्थात्‌ इनका नाश होनेपर ये सभी 
'नहीं' में चले जायँगे, दीखेंगे नहीं। 

'व्यक्तमध्यानि'ये सभी प्राणी बीचमें अर्थात्‌ जन्मके 
बाद और मृत्युके पहले प्रकट दिखायी देते हैं। जैसे सोनेसे 
पहले भी स्वप्न नहीं था और जगनेपर भी स्वप्न नहीं रहा, 





ऐसे ही इन प्राणियोंके शरीरोंका पहले भी अभाव था और 
पीछे भी अभाव रहेगा। परन्तु बीचमें भावरूपसे दीखते हुए 
भी वास्तवमें इनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। 

“तत्र का परिदेवना '-जो आदि और अन्तमें नहीं होता, 
वह बीचमें भी नहीं होता-यह सिद्धान्त है' । सभी प्राणियोंके 
शरीर पहले नहीं थे और पीछे नहीं रहेंगे; अत: वास्तवमें वे 
बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु यह शरीरी पहले भी था और पीछे 
भी रहेगा; अतः वह बीचमें भी रहेगा ही। निष्कर्ष यह 
निकला कि शरीरोंका सदा अभाव है और शरीरीका कभी भी 
अभाव नहीं है। इसलिये इन दोनोंके लिये शोक नहीं हो सकता। 


परिशिष्ट भाव--जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका 'नहीं'-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और 
अन्तमें है, उसका 'है'-पना नित्य-निरन्तर है'। जिसका 'नहीं'-पना नित्य-निरन्तर है, वह ' असत्‌' (शरीर) है और 
जिसका 'है'-पना नित्य-निरन्तर है, वह 'सत्‌' (शरीरी) है। असत्के साथ हमारा नित्यवियोग है और सत्के साथ 


हमारा नित्ययोग है। 





सम्बन्ध--अब भगवान्‌ शरीरीकी अलौकिकताका वर्णन करते हैं। 


९-आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। ( माण्डूक्यकारिका ४। ३१) 
२-( क ) यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य सन्‌। ( श्रीमद्भा० ११। २४। १७) 
“जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है।' 
(ख ) आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च तदेव मध्ये॥ ( श्रीमद्भा० ११। २८। १८) 
“इस संसारके आदिमे जो था तथा अन्तमें जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही परमात्मा 


बीचमें भी है।' 


(ग) न यत्‌ पुरस्तादुत यन्न पश्चान्मध्ये च तन्न व्यपदेशमात्रम्‌। ( श्रीमद्भा० ११। २८। २१) 
“जो उत्पत्तिसे पहले नहीं था और प्रलयके बाद भी नहीं रहेगा, ऐसा समझना चाहिये कि बीचमें भी वह है 


नहीं, केवल कल्पनामात्र, नाममात्र ही है।' 


१०६ 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 


[ अध्याय २ 


आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्ृदति तथैव चान्यः। 
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥ २९॥ 


कश्चित्‌ =कोई आश्चर्यवत्‌ = (इसका) श्रृणोति =सुनता है 
एनम्‌ =इस शरीरीको आश्चर्यकी च = और 
आश्चर्यवत्‌ = आश्चर्यको तरह तरह एनम्‌ =इसको 
पश्यति = देखता (अनुभव | वदति =वर्णन करता है श्रुत्वा = सुनकर 
करता) है च =तथा अपि नभी 
च = और अन्यः = अन्य (कोई) कश्चित्‌, एव = कोई 
तथा = वैसे एनम्‌ =इसको न -नहीं 
एव नही आश्चर्यवत्‌ -आश्चर्यकी वेद = जानता अर्थात्‌ यह 
अन्यः =दूसरा (कोई) तरह दुर्विज्ञेय है। 


व्याख्या- आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्‌'--इस देहीको 
कोई आश्चर्यकी तरह जानता है। तात्पर्य यह है कि जैसे 
दूसरी चीजें देखने, सुनने, पढ़ने और जाननेमें आती हैं, वैसे 
इस देहीका जानना नहीं होता। कारण कि दूसरी वस्तुएँ 
इदंतासे (“यह' करके) जानते हैं अर्थात्‌ वे जाननेका विषय 
होती हैं, पर यह देही इन्द्रिय-मन-बुद्धिका विषय नहीं है। 
इसको तो स्वयंसे, अपने-आपसे ही जाना जाता है। अपने- 
आपसे जो जानना होता है, वह जानना लौकिक ज्ञानकी 
तरह नहीं होता, प्रत्युत बहुत विलक्षण होता है। 

“पश्यति' पदके दो अर्थ होते हैं--नेत्रोंस देखना और 
स्वयंके द्वारा स्वयंको जानना। यहाँ “पश्यति' पद स्वयंके 
द्वारा स्वयंको जाननेके विषयमें आया है (गीता--दूसरे 
अध्यायका पचपनवाँ, छठे अध्यायका बीसवाँ आदि) । 

जहाँ नेत्र आदि करणोंसे देखना (जानना) होता है, वहाँ 
द्रष्टा (देखनेवाला), दृश्य (दीखनेवाली वस्तु) और दर्शन 
(देखनेकी शक्ति )--यह त्रिपुटी होती है। इस त्रिपुटीसे ही 
सांसारिक देखना--जानना होता है। परन्तु स्वयंके ज्ञानमें यह 
त्रिपुटी नहीं होती अर्थात्‌ स्वयंका ज्ञान करण-सापेक्ष नहीं है। 
स्वयंका ज्ञान तो स्वयंके द्वारा ही होता है अर्थात्‌ वह ज्ञान 
करण-निरपेक्ष है। जैसे, “मैं हूँ-एऐसा जो अपने होनेपनका 
ज्ञान है, इसमें किसी प्रमाणकी या किसी करणकी आवश्यकता 
नहीं है। इस अपने होनेपनको ' इदंता' से अर्थात्‌ दृश्यरूपसे 
नहीं देख सकते। इसका ज्ञान अपने-आपको ही होता है। यह 
ज्ञान इन्द्रियजन्य या बुद्धिजन्य नहीं है। इसलिये स्वयंको 
(अपने-आपको ) जानना आश्चर्यकी तरह होता है। 

जैसे अँधेरे कमरेमें हम किसी चीजको लाने जाते हैं, 
तो हमारे साथ प्रकाश भी चाहिये और नेत्र भी चाहिये 





अर्थात्‌ उस अँधेरे कमरेमें प्रकाशकी सहायतासे हम उस 
चीजको नेत्रोंसे देखेंगे, तब उसको लायेंगे। परन्तु कहीं 
दीपक जल रहा है और हम उस दीपकको देखने जायूँगे, 
तो उस दीपकको देखनेके लिये हमें दूसरे दीपककी 
आवश्यकता नहीं पड़ेगी; क्योंकि दीपक स्वयंप्रकाश है। 
वह अपने-आपको स्वयं ही प्रकाशित करता है। ऐसे ही 
अपने स्वरूपको देखनेके लिये किसी दूसरे प्रकाशकी 
आवश्यकता नहीं है; क्योंकि यह देही (स्वरूप) स्वयंप्रकाश 
है। अतः यह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानता है। 
स्थूल, सूक्ष्म और कारण-ये तीन शरीर हैं। अन्न- 
जलसे बना हुआ 'स्थूलशरीर' है। यह स्थूलशरीर इन्द्रियोंका 
विषय है। इस स्थूलशरीरके भीतर पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच 
कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि--इन सत्रह तत्त्वोंसे 
बना हुआ ' सूक्ष्मशरीर ' है। यह सूक्ष्मशरीर इन्द्रियोंका विषय 
नहीं है, प्रत्युत बुद्धिका विषय है। जो बुद्धिका भी विषय नहीं 
है, जिसमें प्रकृति--स्वभाव रहता है, वह ' कारणशरीर ' है। 
इन तीनों शरीरोंपर विचार किया जाय तो यह स्थूलशरीर मेरा 
स्वरूप नहीं है; क्योंकि यह प्रतिक्षण बदलता है और जाननेमें 
आता है। सूक्ष्मशरीर भी बदलता है और जाननेमें आता है; 
अतः यह भी मेरा स्वरूप नहीं है। कारणशरीर प्रकृतिस्वरूप 
है, पर देही (स्वरूप) प्रकृतिसे भी अतीत है, अतः 
कारणशरीर भी मेरा स्वरूप नहीं है। यह देही जब प्रकृतिको 
छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है, तब यह अपने- 
आपसे अपने-आपको जान लेता है। यह जानना सांसारिक 
वस्तुओंको जाननेकी अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता है, 
इसलिये इसको ' आश्चर्यवत्‌ पश्यति' कहा गया है। 
यहाँ भगवानूने कहा है कि अपने-आपका अनुभव 


श्लोक २९] 


करनेवाला कोई एक ही होता है--“कश्चित्‌' और आगे 
सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भी यही बात कही है कि 
कोई एक मनुष्य ही मेरेको तत्त्वसे जानता है--“कश्चिन्मां 
वेत्ति तत्त्वतः।' इन पदाँसे ऐसा मालूम होता है कि इस 
अविनाशी तत्त्वको जानना बड़ा कठिन है, दुर्लभ है। परन्तु 
वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। इस तत्त्वको जानना कठिन 
नहीं है, दुर्लभ नहीं है, प्रत्युत इस तत्त्वको सच्चे हृदयसे 
जाननेवालेकी इस तरफ लगनेवालेकी कमी है। यह कमी 
जाननेकी जिज्ञासा कम होनेके कारण ही है। 

' आश्चर्यवद्ठदति तथैव चान्यः --ऐसे ही दूसरा 
पुरुष इस देहीका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है; क्योंकि 
यह तत्त्व वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी भी 
प्रकाशित होती है, वह वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती 
है? जो महापुरुष इस तत्त्वका वर्णन करता है, वह तो 
शाखा-चन्द्रन्यायको तरह वाणीसे इसका केवल संकेत ही 
करता है, जिससे सुननेवालेका इधर लक्ष्य हो जाय। अतः 
इसका वर्णन आश्चर्यकी तरह ही होता है। 

यहाँ जो ' अन्यः' पद आया है, उसका तात्पर्य यह नहीं 
है कि जो जाननेवाला है, उससे यह कहनेवाला अन्य है; 
क्योंकि जो स्वयं जानेगा ही नहीं, वह वर्णन क्या करेगा ? 
अतः इस पदका तात्पर्य यह है कि जितने जाननेवाले हैं, 
उनमें वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। कारण कि 
सब-के-सब अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष उस तत्त्वका 
विवेचन करके सुननेवालेको उस तत्त्वतक नहीं पहुँचा 
सकते। उसकी शंकाओंका, तर्कोका पूरी तरह समाधान 
करनेकी क्षमता नहीं रखते। अतः वर्णन करनेवालेकी 
विलक्षण क्षमताका द्योतन करनेके लिये ही यह ' अन्यः' 
पद दिया गया है। 

' आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्ृणोति'—दूसरा कोई इस 
देहीको आश्चर्यकी तरह सुनता है। तात्पर्य है कि सुननेवाला 
शास्त्रोंकी, लोक-लोकान्तरोंको जितनी बातें सुनता आया 
है, उन सब बातोंसे इस देहीकी बात विलक्षण मालूम देती 
है। कारण कि दूसरा जो कुछ सुना है, वह सब-का-सब 
इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदिका विषय है; परन्तु यह देही 
इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है, प्रत्युत यह इन्द्रियों आदिके 


* साधक-संजीवनी * 





१०७ 


विषयको प्रकाशित करता है। अतः इस देहीकी विलक्षण 
बात वह आश्चर्यकी तरह सुनता है। 

यहाँ * अन्यः' पद देनेका तात्पर्य है कि जाननेवाला 
और कहनेवाला-इन दोनाँसे सुननेवाला (तत्वका जिज्ञासु) 
अलग है। 

श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌ '--इसको सुन करके 
भी कोई नहीं जानता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसने 
सुन लिया, तो अब वह जानेगा ही नहीं। इसका तात्पर्य यह 
है कि केवल सुन करके (सुननेमात्रसे) इसको कोई भी नहीं 
जान सकता। सुननेके बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा, 
तब वह अपने-आपसे ही अपने-आपको जानेगा*। 

यहाँ कोई कहे कि शास्त्रों और गुरुजनोंसे सुनकर ज्ञान 
तो होता ही है, फिर यहाँ 'सुन करके भी कोई नहीं 
जानता '--ऐसा कैसे कहा गया है? इस विषयपर थोड़ी 
गम्भीरतासे विचार करके देखें कि शास्त्रापर श्रद्धा स्वयं 
शास्त्र नहीं कराते और गुरुजनोंपर श्रद्धा स्वयं गुरुजन नहीं 
कराते; किन्तु साधक स्वयं ही शास्त्र और गुरुपर श्रद्धा- 
विश्वास करता है, स्वयं ही उनके सम्मुख होता है। अगर 
स्वयंके सम्मुख हुए बिना ही ज्ञान हो जाता, तो आजतक 
भगवान्‌के बहुत अवतार हुए हैं, बड़े-बड़े जीवन्मुक्त महापुरुष 
हुए हैं, उनके सामने कोई अज्ञानी रहना ही नहीं चाहिये था। 
अर्थात्‌ सबको तत्त्वज्ञान हो जाना चाहिये था! पर ऐसा 
देखनेमें नहीं आता। श्रद्धा-विश्वासपूर्वक सुननेसे स्वरूपमें 
स्थित होनेमें सहायता तो जरूर मिलती है, पर स्वरूपमें 
स्थित स्वयं ही होता है। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य 
तत्त्वज्ञानको असम्भव बतानेमें नहीं, प्रत्युत उसे करण- 
निरपेक्ष बतानेमें है। मनुष्य किसी भी रीतिसे तत्त्वको 
जाननेका प्रयत्न क्यों न करे, पर अन्तमें अपने-आपसे ही 
अपने-आपको जानेगा। श्रवण, मनन आदि साधन तत्त्वके 
ज्ञानमें परम्परागत साधन माने जा सकते हैं, पर वास्तविक 
बोध करण-निरपेक्ष (अपने-आपसे) ही होता है। 

अपने-आपसे अपने-आपको जानना क्या होता है ? 
एक होता है करना, एक होता है देखना और एक होता 
है जानना। करनेमें कर्मेन्द्रियोंकी, देखनेमें ज्ञानेन्द्रियोंकी और 
जाननेमें स्वयंकी मुख्यता होती है। 


* अपने-आपसे ही अपनेको जाननेकी बात गीतामें कई जगह आयी है; जैसे 
(१) आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। ( २। ५५ ) 
(२) यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः। आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते॥ ( ३। १७) 
(३) यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ ( ६। २० ) 
(४) यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌। ( १५। ११) 


१०८ 


ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा जानना नहीं होता, प्रत्युत देखना होता 
है, जो कि व्यवहारमें उपयोगी है। स्वयंके द्वारा जो जानना 
होता है, वह दो तरहका होता है--एक तो शरीर-संसारके 
साथ मेरी सदा भिन्नता है और दूसरा, परमात्माके साथ मेरी 
सदा अभिननता है। दूसरे शब्दोंमें, परिवर्तनशील नाशवान्‌ 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


पदार्थोके साथ मेरा किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है और 
अपरिवर्तनशील अविनाशी परमात्माके साथ मेरा नित्य 
सम्बन्ध है। ऐसा जाननेके बाद फिर स्वतः अनुभव होता 
है। उस अनुभवका वाणीसे वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तो 
बुद्धि भी चुप हो जाती है। 





परिशिष्ट भाव--शरीरीको सुननेमात्रसे अर्थात्‌ अभ्यासके द्वारा नहीं जान सकते, पर जिज्ञासापूर्वक तत्त्वज्ञ, 
अनुभवी महापुरुषोंसे सुनकर जान सकते हैं यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः' (गीता ७। ३)। 
' आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ' कहनेका तात्पर्य है कि तत्वका अनुभव करनेवालोंमें भी वर्णन करनेवाला कोई एक 
ही होता है। सब-के-सब अनुभव करनेवाले उसका वर्णन नहीं कर सकते। 

जैसे संसारमें सुननेमात्रसे विवाह नहीं होता, प्रत्युत स्त्री और पुरुष एक-दूसरेको पति-पत्नीरूपसे स्वीकार करते हैं, 
तब विवाह होता है, ऐसे ही सुननेमात्रसे परमात्मतत्त्वको कोई भी नहीं जान सकता, प्रत्युत सुननेके बाद जब स्वयं उसको 
स्वीकार करेगा अथवा उसमें स्थित होगा, तब स्वयंसे उसको जानेगा। अतः सुननेमात्रसे मनुष्य ज्ञानको बातें सीख सकता 
है, दूसरोंको सुना सकता है, लिख सकता है, व्याख्यान दे सकता है, विवेचन कर सकता है, पर अनुभव नहीं कर सकता। 

परमात्मतत्त्वको केवल सुननेमात्रसे नहीं जान सकते, प्रत्युत सुनकर उपासना करनेसे जान सकते हैं- श्रुत्वान्येभ्य 
उपासते......' (गीता १३ । २५) । अगर परमात्मतत्त्वका वर्णन करनेवाला अनुभवी हो और सुननेवाला श्रद्धालु तथा जिज्ञासु 


हो तो तत्काल भी ज्ञान हो सकता है। 





सम्बन्ध-- अबतक देह और देहीका जो प्रकरण चल रहा था, उसका आगेके श्लोके उपसंहार करते हैं। 


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। 
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥ ३०॥ 


भारत =हे भरतवंशोद्भव | नित्यम्‌ =नित्य ही प्राणीके लिये 
अर्जुन! अवध्यः = अवध्य है। त्वम्‌ = तुम्हें 

सर्वस्य =सबके तस्मात्‌ = इसलिये शोचितुम्‌ "शोक 

देहे = देहमें सर्वाणि =सम्पूर्ण न =नहीं 

अयम्‌ =यह भूतानि = प्राणियोंके लिये अरहसि =करना 

देही = देही अर्थात्‌ किसी भी चाहिये । 


व्याख्या-'देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य 
भारत'मनुष्य, देवता, पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि 
स्थावर-जंगम सम्पूर्ण प्राणियाँके शरीरोंमें यह देही नित्य 
अवध्य अर्थात्‌ अविनाशी है। 

'अवध्यः' शब्दके दो अर्थ होते हैं-(१) इसका वध 
नहीं करना चाहिये और (२) इसका वध हो ही नहीं 
सकता। जैसे गाय अवध्य है अर्थात्‌ कभी किसी भी 
अवस्थामें गायको नहीं मारना चाहिये; क्योंकि गायको 
मारनेमें बड़ा भारी दोष है, पाप है। परन्तु देहीके विषयमें 
'देहीका वध नहीं करना चाहिये'-एऐसी बात नहीं है, 
प्रत्युत इस देहीका वध (नाश) कभी किसी भी तरहसे हो 





ही नहीं सकता और कोई कर भी नहीं सकता 
“विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमहति' (२। १७) । 

' तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि’ 
इसलिये तुम्हें किसी भी प्राणीके लिये शोक नहीं करना 
चाहिये; क्योंकि इस देहीका विनाश कभी हो ही नहीं 
सकता और विनाशी देह क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता। 

यहाँ “सर्वाणि भूतानि, पदोंमें बहुवचन देनेका आशय 
है कि कोई भी प्राणी बाकी न रहे अर्थात्‌ किसी भी 
प्राणीके लिये शोक नहीं करना चाहिये। 

शरीर विनाशी ही है; क्योंकि उसका स्वभाव ही नाशवान्‌ 
है। वह प्रतिक्षण ही नष्ट हो रहा है। परन्तु जो अपना 


श्लोक ३०] 


नित्य-स्वरूप है, उसका कभी नाश होता ही नहीं। अगर 
इस वास्तविकताको जान लिया जाय तो फिर शोक होना 
सम्भव ही नहीं है। 
प्रकरण-सम्बन्धी विशेष बात 

यहाँ ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतकका जो 
प्रकरण है, यह विशेषरूपसे देही-देह, नित्य-अनित्य, सतू- 
असत्‌, अविनाशी-विनाशी--इन दोनोंके विवेकके लिये 
अर्थात्‌ इन दोनोंको अलग-अलग बतानेके लिये ही है। 
कारण कि जबतक 'देही अलग है और देह अलग है'— 
यह विवेक नहीं होगा, तबतक कर्मयोग, ज्ञानयोग, 
भक्तियोग आदि कोई-सा भी योग अनुष्ठानमें नहीं आयेगा। 
इतना ही नहीं, स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिये भी देही- 
देहके भेदको समझना आवश्यक है। कारण कि देहसे 
अलग देही न हो, तो देहके मरनेपर स्वर्ग कौन जायगा ? 
अतः जितने भी आस्तिक दार्शनिक हैं, वे चाहे अद्वैतवादी 
हों, चाहे द्वैतवादी हों; किसी भी मतके क्यों न हों, सभी 
शरीरी-शरीरके भेदको मानते ही हैं। यहाँ भगवान्‌ इसी 
भेदको स्पष्ट करना चाहते हैं। 

इस प्रकरणमें भगवानूने जो बात कही है, वह प्रायः 
सम्पूर्ण मनुष्योंके अनुभवकी बात है। जैसे, देह बदलता है 
और देही नहीं बदलता। अगर यह देही बदलता तो देहके 
बदलनेको कौन जानता? पहले बाल्यावस्था थी, फिर 
जवानी आयी; कभी बीमारी आयी, कभी बीमारी चली 
गयी-इस तरह अवस्थाएँ तो बदलती रहती हैं, पर इन 
सभी अवस्थाओंको जाननेवाला देही वही रहता है। अतः 


* साधक-संजीवनी * 





१०९ 


बदलनेवाला और न बदलनेवाला-ये दोनों कभी एक नहीं 
हो सकते। इसका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। इसलिये 
भगवानूने इस प्रकरणमें आत्मा-अनात्मा, ब्रह्म-जीव, प्रकृति- 
पुरुष, जड-चेतन, माया-अविद्या आदि दार्शनिक शब्दोंका 
प्रयोग नहीं किया है*। कारण कि लोगोंने दार्शनिक बातें 
केवल सीखनेके लिये मान रखी हैं, उन बातोंको केवल 
पढ़ाईका विषय मान रखा है। इसको दृष्टिमें रखकर 
भगवानूने इस प्रकरणमें दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग न करके 
देह-देही, शरीर-शरीरी, असत्‌-सत्‌, विनाशी-अविनाशी 
शब्दोंका ही प्रयोग किया है। जो इन दोनोंके भेदको ठीक- 
ठीक जान लेता है, उसको कभी किंचिन्मात्र भी शोक नहीं 
हो सकता। जो केवल दार्शनिक बातें सीख लेते हैं, उनका 
शोक दूर नहीं होता। 

एक छहों दर्शनोंकी पढ़ाई करना होता है और एक 
अनुभव करना होता है। ये दोनों बातें अलग-अलग हैं और 
इनमें बड़ा भारी अन्तर है। पढ़ाईमें ब्रह्म, ईश्वर, जीव, 
प्रकृति और संसार--ये सभी ज्ञानके विषय होते हैं अर्थात्‌ 
पढ़ाई करनेवाला तो ज्ञाता होता है और ब्रह्म, ईश्वर आदि 
इन्द्रियां और अन्तःकरणके विषय होते हैं। पढ़ाई करनेवाला 
तो जानकारी बढ़ाना चाहता है, विद्याका संग्रह करना चाहता 
है, पर जो साधक मुमुक्षु, जिज्ञासु और भक्त होता है, वह 
अनुभव करना चाहता है अर्थात्‌ प्रकृति और संसारसे 
सम्बन्ध-विच्छेद करके और अपने-आपको जानकर 
ब्रह्मे साथ अभिन्नताका अनुभव करना चाहता है, ईश्वरके 
शरण होना चाहता है। 


परिशिष्ट भाव-_भगवानूने ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक देह-देहीके विवेकका वर्णन किया है। इस प्रकरणमें 


भगवानूने ब्रह्म-जीव, प्रकृति-पुरुष, जड़-चेतन, माया-अविद्या, आत्मा-अनात्मा आदि किसी दार्शनिक शब्दका प्रयोग 
नहीं किया है। इसका कारण यह है कि भगवान्‌ इसको पढ़ाईका अर्थात्‌ सीखनेका विषय न बनाकर अनुभवका विषय 
बनाना चाहते हैं और यह सिद्ध करना चाहते हैं कि देह-देहीके अलगावका अनुभव मनुष्यमात्र कर सकता है। इसमें 
कोई पढ़ाई करनेकी, अधिकारी बननेकी जरूरत नहीं है। 

सत्‌-असत्का विवेक मनुष्य अगर अपने शरीरपर करता है तो वह साधक होता है और संसारपर करता है 
तो विद्वान्‌ होता है। अपनेको अलग रखते हुए संसारमें सत्‌-असत्का विवेक करनेवाला मनुष्य वाचक (सीखा हुआ) 
ज्ञानी तो बन जाता है, पर उसको अनुभव नहीं हो सकता। परन्तु अपनी देहमें सत्‌ू-असतूका विवेक करनेसे मनुष्य 
वास्तविक (अनुभवी) ज्ञानी हो सकता है। तात्पर्य है कि संसारमें सत्‌-असत्का विवेक केवल पण्डिताईके लिये है, जबकि 
गीता पण्डिताईके लिये नहीं है। इसलिये भगवानूने दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग न करके देह-देही, शरीर-शरीरी जैसे सामान्य 
शब्दोंका प्रयोग किया है। जो संसारमें सत्‌-असतूका विचार करते हैं, वे अपनेको अलग रखते हुए अपनेको ज्ञानका 
अधिकारी बनाते हैं। परन्तु अपनेमें देह-देहीका विचार करनेमें मनुष्यमात्र ज्ञानप्राप्तिका अधिकारी है। अनुभव करनेके लिये 


* यद्यपि इस प्रकरणमें ( पंद्रहवें और इक्कीसवें श्लोकमें ) दो बार 'पुरुष' शब्दका प्रयोग किया गया है, तथापि वह 
दार्शनिक 'प्रकृति-पुरुष' के अर्थमें प्रयुक्त न होकर “मनुष्य ' के अर्थमें ही प्रयुक्त हुआ है। 


११० * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 


देह-देहीका विवेचन उपयोगी है और सीखनेके लिये तत्वका विवेचन उपयोगी है। इसलिये साधक अनुभव करना 
चाहता है तो सबसे पहले उसको शरीरसे अपने अलगावका अनुभव करना चाहिये कि शरीर शरीरीके सम्बन्धसे 
रहित है और शरीरी शरीरके सम्बन्धसे रहित है अर्थात्‌ “मैं शरीर नहीं हूँ।' उसने जितनी सच्चाईसे, दृढ़तासे, विश्वाससे 
और निःसन्देहतासे शरीरकी सत्ता-महत्ता मानी है, उतनी ही सच्चाईसे, दृढ़तासे, विश्वाससे और निःसन्देहतासे स्वयं 
(स्वरूप)-की सत्ता-महत्ता मान ले और अनुभव कर ले। 
शरीर केवल कर्म करनेका साधन है और कर्म केवल संसारके लिये ही होता है। जैसे कोई लेखक जब लिखने बैठता 
है, तब वह लेखनीको ग्रहण करता है और जब लिखना बन्द करता है, तब लेखनीको यथास्थान रख देता है, ऐसे ही 
साधकको कर्म करते समय शरीरको स्वीकार करना चाहिये और कर्म समाप्त होते ही शरीरको ज्याँ-का-त्यों रख देना 
चाहिये-उससे असंग हो जाना चाहिये। कारण कि अगर हम कुछ भी न करें तो शरीरकी क्या जरूरत है? 
साधकके लिये खास बात है-जाने हुए असत्का त्याग। साधक जिसको असत्‌ जानता है, उसका वह त्याग 
कर दे तो उसका साधन सहज, सुगम हो जायगा और जल्दी सिद्ध हो जायगा। साधककी अपने साध्यमें जो प्रियता 
है, वही साधन कहलाती है। वह प्रियता किसी वस्तु, व्यक्ति, योग्यता, सामर्थ्यं आदिके द्वारा अथवा किसी अभ्यासके 
द्वारा प्राप्त नहीं होती, प्रत्युत साध्यमें अपनापन होनेसे प्राप्त होती है। साधक जिसको अपना मान लेता है, उसमें उसकी 
प्रियता स्वतः हो जाती है। परन्तु वास्तविक अपनापन उस वस्तुसे होता है, जिसमें ये चार बातें हों- 
१--जिससे हमारी सधर्मता अर्थात्‌ स्वरूपगत एकता हो। 
२-जिसके साथ हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला हो। 
३-जिससे हम कभी कुछ न चाहें। 
४-हमारे पास जो कुछ है, वह सब जिसको समर्पित कर दें। 
ये चारों बातें भगवानूमें ही लग सकती हैं। कारण कि शरीर और संसारसे हमारा सम्बन्ध नित्य रहनेवाला नहीं 
है और उनसे हमारी स्वरूपगत एकता भी नहीं है। प्रतिक्षण बदलनेवालेके साथ कभी न बदलनेवालेकी एकता कैसे 
हो सकती है? शरीरके साथ हमारी जो एकता दीखती है, वह वास्तविक नहीं है, प्रत्युत मानी हुई है। मानी हुई एकता 
कर्तव्यका पालन करनेके लिये है। तात्पर्य है कि जिसके साथ हमारी मानी हुई एकता है, उसकी सेवा तो हो सकती 
है, पर उसके साथ अपनापन नहीं हो सकता। 
जाने हुए असतूका त्याग करनेके लिये यह आवश्यक है कि साधक विवेकविरोधी सम्बन्धका त्याग करे। जिसके 
साथ हमारा न तो नित्य सम्बन्ध है और न स्वरूपगत एकता ही है, उसको अपना और अपने लिये मानना विवेकविरोधी 
सम्बन्ध है। इस दृष्टिसे शरीरको अपना और अपने लिये मानना विवेकविरोधी है। विवेकविरोधी सम्बन्धके रहते हुए 
कोई भी साधन सिद्ध नहीं हो सकता। शरीरके साथ सम्बन्ध रखते हुए कोई कितना ही तप कर ले, समाधि लगा 
ले, लोक-लोकान्तरमें घूम आये, तो भी उसके मोहका नाश तथा सत्य तत्त्वको प्राप्ति नहीं हो सकती। विवेकविरोधी 
सम्बन्धका त्याग होते ही मोहका नाश हो जाता है तथा सत्य तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये विवेकविरोधी 
सम्बन्धका त्याग किये बिना साधकको चैनसे नहीं बैठना चाहिये। अगर हम शरीरसे माने हुए विवेकविरोधी सम्बन्धका 
त्याग न करें तो भी शरीर हमारा त्याग कर ही देगा! जो हमारा त्याग अवश्य करेगा, उसका त्याग करनेमें क्या कठिनाई 
है? इसलिये किसी भी मार्गका कोई भी साधक क्‍यों न हो, उसे इस सत्यको स्वीकार करना ही पड़ेगा कि शरीर 
मैं नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और शरीर मेरे लिये नहीं है, क्योंकि मैं अशरीरी हूँ, मेरा स्वरूप अव्यक्त है। 
जबतक साधकका शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध रहता है, तबतक साधन करते हुए भी सिद्धि नहीं होती और 
वह शुभ कमाँसे, सार्थक चिन्तनसे और स्थितिकी आसक्तिसे बँधा रहता है। वह यज्ञ, तप, दान आदि बड़े-बड़े शुभ 
कर्म करे, आत्माका अथवा परमात्माका चिन्तन करे अथवा समाधिमें भी स्थित हो जाय तो भी उसका बन्धन सर्वथा मिटता 
नहीं। कारण कि शरीरके साथ सम्बन्ध मानना ही मूल बन्धन है, मूल दोष है, जिससे सम्पूर्ण दोषोंकी उत्पत्ति होती है। 
अगर साधकका शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध सर्वथा मिट जाय तो उसके द्वारा अशुभ कर्म तो होंगे ही नहीं, शुभ कर्मोमें भी 
आसक्ति नहीं रहेगी। उसके द्वारा निरर्थक चिन्तन तो होगा ही नहीं, सार्थक चिन्तनमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। उसमें 


श्लोक ३१] * साधक-संजीवनी * १११ 


चंचलता तो रहेगी ही नहीं, समाधिमें, स्थिरतामें अथवा निर्विकल्प स्थितिमें भी आसक्ति नहीं रहेगी। इस प्रकार 
स्थूलशरीरसे होनेवाले कर्ममें, सूक्ष्मशरीरसे होनेवाले चिन्तनमें और कारणशरीरसे होनेवाली स्थिरतामें आसक्तिका नाश 
हो जानेपर उसका साधन सिद्ध हो जायगा अर्थात्‌ मोह नष्ट हो जायगा और सत्य तत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये 
भगवानूने अपने उपदेशके आरम्भमें शरीरका सम्बन्ध सर्वथा मिटानेके लिये शरीर-शरीरीके विवेकका वर्णन किया है। 





सम्बन्ध--अर्जुनके मनमें कुटुस्बियोके मरनेका शोक था और गुरुजनोंको मारनेके पापका भय था अथात्‌ यहां 
कुट्रम्बियोंका वियोग हो जायेगा तो उनके अभावे दु:ख पाना पड़ेगा-यह शोक था और परलोके पापके कारण नरक 
आदिका दु:ख भोगना पड़ेगा- यह भय था। अत: भगवानूने अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये ग्यारहवेंसे तीसवें शलोकतकका 


प्रकरण कहा और अब अआर्जुनका भय दूर करनेके लिये क्षात्रधर्म-विषयक आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं। 


स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। 
धर्म्याद्द्रि युधा च्छेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥ ३१॥ 


चच = और विचलित क्षत्रियस्य =क्षत्रियके लिये 
स्वधर्मम्‌ =अपनेक्षात्रधर्मको |न -नहीं अन्यत्‌ = दूसरा कोई 
अवेक्ष्य = देखकर अर्हसि = होना चाहिये; श्रेयः = कल्याणकारक 
अपि = भी (तुम्हें) हि = क्योंकि कर्म 
विकम्पितुम्‌ =विकम्पित अर्थात्‌ | धर्म्यात्‌ = धर्ममय न =नहीं 
कर्तव्य-कर्मसे युद्धात्‌ =युद्धसे बढ़कर विद्यते = है । 


व्याख्या-[पहले दो श्लोकोमें युद्धसे होनेवाले लाभका 
वर्णन करते हैं। ] 

“स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि '--यह 
स्वयं परमात्माका अंश है। जब यह शरीरके साथ तादात्म्य 
कर लेता है, तब यह 'स्व' को अर्थात्‌ अपने-आपको जो 
कुछ मानता है, उसका कर्तव्य 'स्वधर्म' कहलाता है। जैसे, 
कोई अपने-आपको ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र 
मानता है, तो अपने-अपने वर्णोचित कर्तव्योंका पालन 
करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको शिक्षक या नौकर 
मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना 
उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या 
किसीका पुत्र मानता है, तो पुत्र या पिताके प्रति किये 
जानेवाले कर्तव्यांका पालन करना उसका स्वधर्म है। 

यहाँ क्षत्रियके कर्तव्य-कर्मको ' धर्म ' नामसे कहा गया 
है*। क्षत्रियका खास कर्तव्य-कर्म है-युद्धसे विमुख न 
होना। अर्जुन क्षत्रिय हैं; अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है। 





इसलिये भगवान्‌ कहते हैं कि अगर स्वधर्मको लेकर देखा 
जाय तो भी क्षात्रधर्मके अनुसार तुम्हारे लिये युद्ध करना ही 
कर्तव्य है। अपने कर्तव्यसे तुम्हें कभी विमुख नहीँ होना चाहिये। 

' धर्म्याद्धि युद्धाच्छरयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते 
धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याण- 
कारक कर्म नहीं है अर्थात्‌ क्षत्रियके लिये क्षत्रियके कर्तव्यका 
अनुष्ठान करना ही खास काम है (गीता-अठारहवें 
अध्यायका तैंतालीसवाँ श्लोक) । [ ऐसे ही ब्राह्मण, वैश्य 
और शूद्रके लिये भी अपने-अपने कर्तव्यका अनुष्ठान 
करनेके सिवाय दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है। ] 

अर्जुने सातवें श्लोकमें प्रार्थना को थी कि आप मेरे 
लिये निश्चित श्रेयको बात कहिये। उसके उत्तरमें भगवान्‌ 
कहते हैं कि श्रेय (कल्याण) तो अपने धर्मका पालन 
करनेसे ही होगा। किसी भी दृष्टिसे अपने धर्मका त्याग 
कल्याणकारक नहीं है। अतः तुम्हें अपने युद्धरूप धर्मसे 
विमुख नहीँ होना चाहिये। 


परिशिष्ट भाव-_देह-देहीके विवेकका वर्णन करनेके बाद अब भगवान्‌ यहाँसे अड्तीसवें श्लोकतक देहीके 
स्वधर्मपालन (कर्तव्यपालन)-का वर्णन करते हैं। कारण कि देह-देहीके विवेकसे जो तत्त्व मिलता है, वही तत्त्व देहके 


* अठारहवें अध्यायमें जहाँ ( १८। ४२-४८ में ) चारों वर्णोके कर्तव्य-कर्मोका वर्णन आया है, वहाँ बीचमें ' धर्म ' 
शब्द भी आया है-- श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌' ( १८। ४७ )। इससे ' कर्मश और ' धर्म’ शब्द पर्यायवाची 


सिद्ध होते हैं। 


११२ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 
सदुपयोगसे, स्वधर्मके पालनसे भी मिल सकता है। विवेकमें “जानना' मुख्य है और स्वधर्मपालनमें 'करना' मुख्य है। 
यद्यपि मनुष्यके लिये विवेक मुख्य है, जो व्यवहार और परमार्थमें, लोक और परलोकमें सब जगह काम आता है। 
परन्तु जो मनुष्य देह-देहीके विवेकको न समझ सके, उसके लिये भगवान्‌ स्वधर्मपालनकी बात कहते हैं, जिससे वह 
कोरा वाचक ज्ञानी न बनकर वास्तविक तत्वका अनुभव कर सके। 

तात्पर्यं है कि जो मनुष्य परमात्मतत््तको जानना चाहता है, पर तीक्ष्ण बुद्धि और तेजीका वैराग्य न होनेके कारण 
ज्ञानयोगसे नहीं जान सका तो वह कर्मयोगसे परमात्मतत््वको जान सकता है; क्‍योंकि ज्ञानयोगसे जो अनुभव होता 
है, वही कर्मयोगसे भी हो सकता है (गीता--पाँचवें अध्यायका चौथा-पाँचवाँ श्लोक) । 

अर्जुन क्षत्रिय थे, इसलिये भगवानूने इस प्रकरणे क्षात्रधर्मकी बात कही है। वास्तवमें यहाँ क्षात्रधर्म चारों वर्णका 
उपलक्षण है। इसलिये ब्राह्मणादि अन्य वर्णोको भी यहाँ अपना-अपना धर्म (कर्तव्य) समझ लेना चाहिये। (गीता- 


अठारहवें अध्यायका बयालीसवाँ, तैंतालीसवाँ और चौवालीसवाँ श्लोक) । 
['स्वधर्म' को ही स्वभावज कर्म, सहज कर्म, स्वकर्म आदि नामोंसे कहा गया है (गीता-अठारहवें अध्यायके 
इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक) । स्वार्थ, अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके दूसरेके हितके लिये कर्म 


करना स्वधर्म है। स्वधर्मका पालन ही कर्मयोग है।] 





यदूच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्‌। 

सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदूशम्‌॥ ३२॥ 
यदूच्छया = अपने-आप च = भी है। (भाग्यशाली) हैं, 
उपपन्नम्‌ =प्राप्त हुआ (युद्ध) | पार्थ =हे पृथानन्दन! ईदूशम्‌ = (जिनको) ऐसा 
अपावृतम्‌ =खुला हुआ क्षत्रियाः = (वे) क्षत्रिय युद्धम्‌ =युद्ध 
स्वर्गद्वारम्‌ =स्वर्गका दरवाजा | सुखिनः =बड़े सुखी लभन्ते = प्राप्त होता है। 


व्याख्या- यदूच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्‌'- 
पाण्डवोंसे जूआ खेलनेमें दुर्योधनने यह शर्त रखी थी कि 
अगर इसमें आप हार जायँगे, तो आपको बारह वर्षका 
वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोगना होगा। तेरहवें 
वर्षके बाद आपको अपना राज्य मिल जायगा। परन्तु अज्ञात- 
वासमें अगर हमलोग आपलोगोंको खोज लेंगे, तो आप- 
लोगोंको दुबारा बारह वर्षका वनवास भोगना पड़ेगा । जूएमें 
हार जानेपर शर्तके अनुसार पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास 
और एक वर्षका अज्ञातवास भोग लिया। उसके बाद जब 
उन्होंने अपना राज्य माँगा, तब दुर्योधने कहा कि मैं बिना 
युद्ध किये सूईकी तीखी नोक-जितनी जमीन भी नहीं दूँगा । 
दुर्योधनके ऐसा कहनेपर भी पाण्डवोंको ओरसे बार-बार 





सन्धिका प्रस्ताव रखा गया, पर दुर्योधनने पाण्डवोंसे सन्धि 
स्वीकार नहीँ की । इसलिये भगवान्‌ अर्जुनसे कहते हैं कि यह 
युद्ध तुमलोगोंको अपने-आप प्राप्त हुआ है। अपने-आप 
प्राप्त हुए धर्ममय युद्धमें जो क्षत्रिय शूरवीरतासे लड़ते हुए 
मरता है, उसके लिये स्वर्गका दरवाजा खुला हुआ रहता है। 

“सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌’ 
ऐसा धर्ममय युद्ध जिनको प्राप्त हुआ है, वे क्षत्रिय बड़े सुखी 
हैं। यहाँ सुखी कहनेका तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन 
करनेमें जो सुख है, वह सुख सांसारिक भोगोंको भोगनेमें 
नहीं है। सांसारिक भोगोंका सुख तो पशु-पक्षियांको भी होता 
है। अतः जिनको कर्तव्य-पालनका अवसर प्राप्त हुआ है, 
उनको बड़ा भाग्यशाली मानना चाहिये। 





सम्बन्ध_युद्ध न करनेसे क्या हानि होती है-इसका आगेके चार श्लोकोंगें वर्णन करते हैं। 
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्य सङ्ग्रामं न करिष्यसि । 
ततः स्वधर्म कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥ ३३ ॥ 


श्लोक ३४-३५ ] * साधक-संजीवनी » ११३ 
अथ = अब सङ्ग्रामम्‌ = युद्ध च = और 

चेत्‌ = अगर न =नहीं कीर्तिम्‌ = कीर्तिका 

त्वम्‌ =्तू करिष्यसि =करेगा हित्वा = त्याग करके 
इमम्‌ = यह ततः =तो पापम्‌ = पापको 

धर्म्यम्‌ = धर्ममय स्वधर्मम्‌ "अपने धर्म अवाप्स्यसि = प्राप्त होगा। 


व्याख्या-- अथ चेत्त्वमिम”””””"पापमवाप्स्यसि'-- 
यहाँ 'अथ' अव्यय पक्षान्तरमे आया है और 'चेत्‌' अव्यय 
सम्भावनाके अर्थमें आया है। इनका तात्पर्य है कि यद्यपि 
तू युद्धके बिना रह नहीं सकेगा, अपने क्षात्र स्वभावके 
परवश हुआ तू युद्ध करेगा ही (गीता--अठारहवें अध्यायका 
साठवाँ श्लोक), तथापि अगर ऐसा मान लें कि तू युद्ध 
नहीं करेगा, तो तेरे द्वारा क्षात्रधर्मका त्याग हो जायगा। 





क्षात्रधर्मका त्याग होनेसे तुझे पाप लगेगा और तेरी कीर्तिका 
भी नाश होगा। 

आप-से-आप प्राप्त हुए धर्मरूप कर्तव्यका त्याग करके 
तू क्या करेगा ? अपने धर्मका त्याग करनेसे तुझे परधर्म 
स्वीकार करना पड़ेगा, जिससे तुझे पाप लगेगा। युद्धका त्याग 
करनेसे दूसरे लोग ऐसा मानेंगे कि अर्जुन-जैसा शूरवीर भी 
मरनेसे भयभीत हो गया ! इससे तेरी कीर्तिका नाश होगा। 





अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌। 
सम्भावितस्य चाकोतिर्मरणादतिरिच्यते॥ ३४॥ 


च = और अकीर्तिम्‌ = अपकोर्तिका मनुष्यके लिये 

भूतानि =सब प्राणी कथयिष्यन्ति = कथन अर्थात्‌ मरणात्‌ = मृत्युसे 

अपि =भी निन्दा करेंगे। च =भी 

ते =तेरी अकीर्तिः =(वह) अपकीर्ति | अतिरिच्यते = बढ़कर दुःखदायी 

अव्ययाम्‌ "सदा रहनेवाली सम्भावितस्य = सम्मानित होती है। 
व्याख्या- अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति | रहनेवाली होती है। 


तेऽव्ययाम्‌'मनुष्य, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जिन 
प्राणियाँका तेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात्‌ जिनकी 
तेरे साथ न मित्रता है और न शत्रुता, ऐसे साधारण प्राणी 
भी तेरी अपकोर्ति, अपयशका कथन करेंगे कि देखो! 
अर्जुन कैसा भीरु था, जो कि आपने क्षात्रधर्मसे विमुख हो 
गया। वह कितना शूरवीर था, पर युद्धके मौकेपर उसकी 
कायरता प्रकट हो गयी, जिसका कि दूसरोंको पता ही नहीं 
था; आदि-आदि। 

'ते' कहनेका भाव है कि स्वर्ग, मृत्यु और पाताल- 
लोकमें भी जिसकी धाक जमी हुई है, ऐसे तेरी अपकीर्ति 
होगी। 'अव्ययाम्‌' कहनेका तात्पर्य है कि जो आदमी 
श्रेष्ठताको लेकर जितना अधिक प्रसिद्ध होता है, उसकी 
कीर्ति और अपकीर्ति भी उतनी ही अधिक स्थायी 





“सम्भावितस्य चाकीरत्िर्मरणादतिरिच्यते'- इस श्लोकके 
पूर्वार्धमें भगवानूने साधारण प्राणियाँद्वारा अर्जुनको निन्दा 
किये जानेको बात बतायी। अब श्लोकके उत्तरार्धमें सबके 
लिये लागू होनेवाली सामान्य बात बताते हैं। 

संसारकी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ माना जाता है, जिसको 
लोग बड़ी ऊँची दृष्टिसे देखते हैं, ऐसे मनुष्यकी जब 
अपकीर्ति होती है, तब वह अपकीर्ति उसके लिये मरणसे 
भी अधिक भयंकर दुःखदायी होती है। कारण कि मरनेमें 
तो आयु समाप्त हुई है, उसने कोई अपराध तो किया नहीं 
है, परन्तु अपकीर्ति होनेमें तो वह खुद धर्म-मर्यादासे, 
कर्तव्यसे च्युत हुआ है। तात्पर्य है कि लोगोंमें श्रेष्ठ माना 
जानेवाला मनुष्य अगर अपने कर्तव्यसे च्युत होता है, तो 
उसका बड़ा भयंकर अपयश होता है। 





भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। 
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥ ३५॥ 


११४ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय २ 
च =तथा उपरतम्‌ =हटा हुआ बहुमतः = बहुमान्य 

महारथाः = महारथीलोग मंस्यन्ते = मानेंगे। भूत्वा =हो चुका है, 
त्वाम्‌ = तुझे येषाम्‌ =जिनकी (उनकी दृष्टिमें) 
भयात्‌ = भयके कारण (धारणामें) लाघवम्‌ = (तू) लघुताको 
रणात्‌ = युद्धसे त्वम्‌ च्तू यास्यसि - प्राप्त हो जायगा। 


व्याख्या--' भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः '-- 
तू ऐसा समझता है कि मैं तो केवल अपना कल्याण करनेके 
लिये युद्धसे उपरत हुआ हुँ; परन्तु अगर ऐसी ही बात होती 
और युद्धको तू पाप समझता, तो पहले ही एकान्तमें रहकर 
भजन-स्मरण करता और तेरी युद्धके लिये प्रवृत्ति भी नहीं 
होती। परन्तु तू एकान्तम न रहकर युद्धम प्रवृत्त हुआ है। 
अब आगर तू युद्धसे निवृत्त होगा तो बड़े-बड़े महारथीलोग 
ऐसा ही मानेंगे कि युद्धमें मारे जानेके भयसे ही अर्जुन 
युद्धसे निवृत्त हुआ है। अगर वह धर्मका विचार करता तो 
युद्धसे निवृत्त नहीं होता; क्योंकि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म 





है। अतः वह मरनेके भयसे ही युद्धसे निवृत्त हो रहा है। 

'येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌’ 
भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य आदि जो बड़े-बड़े 
महारथी हैं, उनकी दृष्टिमें तू बहुमान्य हो चुका है अर्थात्‌ 
उनके मनमें यह एक विश्वास है कि युद्ध करनेमें नामी 
शूरवीर तो अर्जुन ही है। वह युद्धमें अनेक दैत्यों, देवताओं, 
गन्धर्वो आदिको हरा चुका है। अगर अब तू युद्धसे निवृत्त 
हो जायगा, तो उन महारथियोंके सामने तू लघुता- 
(तुच्छता-) को प्राप्त हो जायगा अर्थात्‌ उनकी दृष्टिमें तू 
गिर जायगा। 





अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः । 
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥ ३६॥ 


तव =तैरे हुए वदिष्यन्ति = कहेंगे। 
अहिताः = शत्रुलोग बहून्‌ = बहुत-से ततः = उससे 

तव =तेरी अवाच्यवादान्‌ =न कहनेयोग्य दुःखतरम्‌ =बढ़कर और 
सामर्थ्यम्‌ =सामर्थ्यकी वचन दुःखकी बात 
निन्दन्तः =निन्दा करते च तभी नु, किम्‌ =क्या होगी? 


व्याख्या-- अवाच्यवादांश्च ..... निन्दन्तस्तव सामर्थ्यम्‌'-- 
' अहित' नाम शत्रुका है, अहित करनेवालेका है। तेरे जो 
दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण आदि शत्रु हैं, तेरे वैर न रखनेपर भी 
वे स्वयं तेरे साथ वैर रखकर तेरा अहित करनेवाले हैं। वे तेरी 
सामर्थ्यको जानते हैं कि यह बड़ा भारी शूरवीर है। ऐसा 
जानते हुए भी वे तेरी सामर्थ्यकी निन्दा करेंगे कि यह तो 
हिजड़ा है। देखो! यह युद्धके मौकेपर हो गया न अलग! 
क्या यह हमारे सामने टिक सकता है ? क्या यह हमारे साथ 
युद्ध कर सकता है? इस प्रकार तुझे दुःखी करनेके लिये, तेरे 
भीतर जलन पैदा करनेके लिये न जाने कितने न कहने- 
लायक वचन कहेंगे। उनके वचनोंको तू कैसे सहेगा ? 





“ततो दुःखतरं नु किम्‌'-इससे बढ़कर अत्यन्त 
भयंकर दुःख क्या होगा? क्योंकि यह देखा जाता है कि 
जैसे मनुष्य तुच्छ आदमियोंके द्वारा तिरस्कृत होनेपर अपना 
तिरस्कार सह नहीं सकता और अपनी योग्यतासे, अपनी 
शूरवीरतासे अधिक काम करके मर मिटता है। ऐसे ही जब 
शत्रुओंके द्वारा तेरा सर्वथा अनुचित तिरस्कार हो जायगा, 
तब उसको तू सह नहीं सकेगा और तेजीमें आकर युद्धके 
लिये कूद पड़ेगा। तेरेसे युद्ध किये बिना रहा नहीं जायगा। 
अभी तो तू युद्धसे उपरत हो रहा है, पर जब तू समयपर 
युद्धके लिये कूद पड़ेगा, तब तेरी कितनी निन्दा होगी। उस 
निन्दाको तू कैसे सह सकेगा ? 





सम्बन्ध-पीछेके चार श्लोकॉमें युद्ध न करनेसे हानि बताकर अब भगवान्‌ आगेके दो श्लोकोंमें युद्ध करनेसे लाभ बताते हैं। 
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌। 
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥ ३७॥ 


श्लोक ३८ ] * साधक-संजीवनी » ११५ 
वा = अगर (युद्धमें तू) | जित्वा = जीत जायगा कौन्तेय = हे कुन्तीनन्दन ! 
हतः =मारा जायगा (तो) (तो) (तू) 

स्वर्गम्‌ = (तुझे) स्वर्गको | महीम्‌ = पृथ्वीका राज्य युद्धाय =युद्धके लिये 
प्राप्स्यसि = प्राप्ति होगी (और) | भोक्ष्यसे = भोगेगा । कृतनिश्चयः = निश्चय करके 

वा = अगर (युद्धमें तू) | तस्मात्‌ = अतः उत्तिष्ठ =खड़ा हो जा। 


व्याख्या- हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग जित्वा वा भोक्ष्यसे 
महीम्‌'-इसी अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुने कहा था 
कि हमलोगोंको इसका भी पता नहीं है कि युद्धमें हम 
उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे। अर्जुनके इस सन्देहको 
लेकर भगवान्‌ यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि अगर युद्धमें तुम कर्ण 
आदिके द्वारा मारे भी जाओगे तो स्वर्गको चले जाओगे और 
अगर युद्धमें तुम्हारी जीत हो जायगी तो यहाँ पृथ्वीका राज्य 
भोगोगे। इस तरह तुम्हारे तो दोनों ही हाथोंमें लडु हैं। 
तात्पर्य है कि युद्ध करनेसे तो तुम्हारा दोनों तरफसे लाभ- 
ही-लाभ है और युद्ध न करनेसे दोनों तरफसे हानि-ही- 
हानि है। अतः तुम्हें युद्धमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये। 

' तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः '—यहाँ 
“कौन्तेय' सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि जब मैं सन्धिका 
प्रस्ताव लेकर कौरवोंके पास गया था, तब माता कुन्तीने 





तुम्हारे लिये यही संदेश भेजा था कि तुम युद्ध करो। अतः 
तुम्हें युद्धसे निवृत्त नहीं होना चाहिये, प्रत्युत युद्धका निश्चय 
करके खड़े हो जाना चाहिये। 

अर्जुनका युद्ध न करनेका निश्चय था और भगवानूने 
इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें युद्ध करनेकी आज्ञा दे दी। 
इससे अर्जुनके मनमें सन्देह हुआ कि युद्ध करना ठीक है 
या न करना ठीक है। अतः यहाँ भगवान्‌ उस सन्देहको 
दूर करनेके लिये कहते हैं कि तुम युद्ध करनेका एक 
निश्चय कर लो, उसमें सन्देह मत रखो। 

यहाँ भगवानका तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि 
मनुष्यको किसी भी हालतमें प्राप्त कर्तव्यका त्याग नहीं 
करना चाहिये, प्रत्युत उत्साह और तत्परतापूर्वक अपने 
कर्तव्यका पालन करना चाहिये। कर्तव्यका पालन करनेमें 
ही मनुष्यकी मनुष्यता है। 


परिशिष्ट भाव धर्मका पालन करनेसे लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं। तात्पर्य है कि कर्तव्यका पालन 
और अकर्तव्यका त्याग करनेसे लोककी भी सिद्धि हो जाती है और परलोककी भी। 





सुखदुः रखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। 
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ ३८॥ 


जयाजयौ = जय-पराजय, कृत्वा =करके एवम्‌ =इस प्रकार 
लाभालाभौ =लाभ-हानि (और) | ततः = फिर (युद्ध करनेसे) 
सुखदुःखे =सुख-दुःखको युद्धाय = युद्धमें पापम्‌ = (तू) पापको 
समे = समान युज्यस्व =लग जा। न, अवाप्स्यसि =प्राप्त नहीं होगा। 


व्याख्या-[ अर्जुनको यह आशंका थी कि युद्धमें 
कुटुम्बियोंको मारनेसे हमारेको पाप लग जायगा, पर 
भगवान्‌ यहाँ कहते हैं कि पापका हेतु युद्ध नहीं है, प्रत्युत 
अपनी कामना है। अतः कामनाका त्याग करके तू युद्धके 
लिये खड़ा हो जा।] 

“सुखदुःखे समे .... ततो युद्धाय युज्यस्व’ युद्धमें 
सबसे पहले जय और पराजय होती है, जय-पराजयका 
परिणाम होता है-लाभ और हानि तथा लाभ-हानिका 
परिणाम होता है-सुख और दुःख। जय-पराजयमें और 
लाभ-हानिमें सुखी-दुःखी होना तेरा उद्देश्य नहीं है। तेरा 





उद्देश्य तो इन तीनोंमें सम होकर अपने कर्तव्यका पालन 
करना है। 

युद्धमें जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःख तो 
होंगे ही। अतः तू पहलेसे यह विचार कर ले कि मुझे तो 
केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है, जय-पराजय 
आदिसे कुछ भी मतलब नहीं रखना है। फिर युद्ध करनेसे 
पाप नहीं लगेगा अर्थात्‌ संसारका बन्धन नहीं होगा। 

सकाम और निष्काम-दोनों ही भावोंसे अपने कर्तव्य- 
कर्मका पालन करना आवश्यक है। जिसका सकाम भाव 
है, उसको तो कर्तव्यकर्मके करनेमें आलस्य, प्रमाद 


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बिलकुल नहीं करने चाहिये, प्रत्युत तत्परतासे अपने 
कर्तव्यका पालन करना चाहिये। जिसका निष्काम भाव है, 
जो अपना कल्याण चाहता है, उसको भी तत्परतापूर्वक 
अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। 

सुख आता हुआ अच्छा लगता है और जाता हुआ बुरा 
लगता है तथा दुःख आता हुआ बुरा लगता है और जाता 
हुआ अच्छा लगता है। अत: इनमें कौन अच्छा है, कौन 
बुरा ? अर्थात्‌ दोनों ही समान हैं, बराबर हैं। इस प्रकार 
सुख-दुःखमें समबुद्धि रखते हुए तुझे अपने कर्तव्यका 
पालन करना चाहिये। 

तेरी किसी भी कर्ममें सुखके लोभसे प्रवृत्ति न हो और 
दुःखके भयसे निवृत्ति न हो। कर्मोमें तेरी प्रवृत्ति और 
निवृत्ति शास्त्रके अनुसार ही हो (गीता--सोलहवें अध्यायका 
चौबीसवाँ श्लोक) । 

“नैवं पापमवाप्स्यसि '--यहाँ 'पाप' शब्द पाप और 
पुण्य-दोनोंका वाचक है, जिसका फल है--स्वर्ग और 
नरककी प्राप्तिरूप बन्धन, जिससे मनुष्य अपने कल्याणसे 
वंचित रह जाता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है। 
भगवान्‌ कहते हैं कि हे अर्जुन! समतामें स्थित होकर 
युद्धरूपी कर्तव्य-कर्म करनेसे तुझे पाप और पुण्य-- दोनों 
ही नहीं बाँधेंगे। 

प्रकरण -सम्बन्धी विशेष बात 
भगवान्‌ने इकतीसवें श्लोकसे अड़तीसवें श्लोकतकके 
आठ श्लोकोंमें कई विचित्र भाव प्रकट किये हैं; जैसे- 
(१) किसीको व्याख्यान देना हो और किसी 
विषयको समझाना हो तो भगवान्‌ इन आठ श्लोकॉमें 
उसकी कला बताते हैं। जैसे, कर्तव्य-कर्म करना और 
अकर्तव्य न करना-एऐसे विधि-निषेधका व्याख्यान देना हो 
तो उसमें पहले विधिका, बीचमें निषेधका और अन्तमं 
फिर विधिका वर्णन करके व्याख्यान समाप्त करना 
चाहिये। भगवानूने भी यहाँ पहले इकतीसवें-बत्तीसवें दो 
श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन किया, फिर 
बीचमें तैंतीसवेंसे छत्तीसवेंतकके चार श्लोकोंमें कर्तव्य- 
कर्म न करनेसे हानिका वर्णन किया और अन्तमं सैंतीसवें- 
अड़तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन 
करके कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा दी। 

(२) पहले अध्यायमें अर्जुनने अपनी दृष्टिसे जो 

दलीलें दी थीं, उनका भगवानूने इन आठ श्लोकॉमें 


* श्रीमद्भगवद्गीता * 





[ अध्याय २ 


समाधान किया है; जैसे अर्जुन कहते हैं-मैं युद्ध करनेमें 
कल्याण नहीं देखता हूँ (पहले अध्यायका इकतीसवाँ 
श्लोक), तो भगवान्‌ कहते हैं-क्षत्रियके लिये धर्ममय 
युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणका साधन नहीं है (दूसरे 
अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक) । अर्जुन कहते हैं-युद्ध 
करके हम सुखी कैसे होंगे ? (पहले अध्यायका सैंतीसवाँ 
श्लोक), तो भगवान्‌ कहते हैं-जिन क्षत्रियोंको ऐसा युद्ध 
मिल जाता है, वे ही क्षत्रिय सुखी हैं (दूसरे अध्यायका 
बत्तीसवाँ श्लोक) । अर्जुन कहते हैं-युद्धके परिणाममें 
नरककी प्राप्ति होगी (पहले अध्यायका चौवालीसवाँ 
श्लोक), तो भगवान्‌ कहते हैं-युद्ध करनेसे स्वर्गको प्राप्ति 
होगी (दूसरे अध्यायका बत्तीसवाँ और सैंतीसवाँ श्लोक) । 
अर्जुन कहते हैं-युद्ध करनेसे पाप लगेगा (पहले अध्यायका 
छत्तीसवाँ श्लोक), तो भगवान्‌ कहते हैं-युद्ध न करनेसे 
पाप लगेगा (दूसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक) । आर्जुन 
कहते हैं-युद्ध करनेसे परिणाममें धर्मका नाश होगा (पहले 
अध्यायका चालीसवाँ श्लोक), तो भगवान्‌ कहते हैं- युद्ध 
न करनेसे धर्मका नाश होगा (दूसरे अध्यायका तैंतीसवाँ 
श्लोक) । 

(३) अर्जुनका यह आग्रह था कि युद्धरूपी घोर 
कर्मको छोड़कर भिक्षासे निर्वाह करना मेरे लिये श्रेयस्कर 
है (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक), तो उनको भगवानूने 
युद्ध करनेकी आज्ञा दी (दूसरे अध्यायका अड्तीसवाँ 
श्लोक); और उद्धवजीके मनमें भगवानूके साथ रहनेकी 
इच्छा थी तो उनको भगवानूने उत्तराखण्डमें जाकर तप 
करनेकी आज्ञा दी ( श्रीमद्भा० ग्यारहवाँ स्कन्ध, उनतीसवाँ 
अध्याय, इकतालीसवाँ श्लोक) । इसका तात्पर्य यह हुआ 
कि अपने मनका आग्रह छोड़े बिना कल्याण नहीं होता। 
वह आग्रह चाहे किसी रीतिका हो, पर वह उद्धार नहीं 
होने देता। 

(४) भगवानूने इस अध्यायके दूसरे-तीसरे श्लोकोंमें 
जो बातें संक्षेपसे कही थीं, उन्हींको यहाँ विस्तारसे कहा 
है, जैसे-वहाँ 'अनार्यजुष्टम्‌' कहा तो यहाँ धर्म्याद्धि 
युद्धाच्छ्ेयोऽन्यत्‌' कहा। वहाँ ' अस्वर्ग्यम्‌ कहा तो यहाँ 
'स्वर्गद्वारमपाव