Skip to main content

Full text of "Charo Dham Ki Yatra Datta Sharma Dadicha"

See other formats







, 


 { 
अ 


$ 
| 
५, 








न 










 ठङ्करदत्तशमा दाधीच4 1 
 दषीचे एण्ड कम्पनी 






















































॥। 
ष 
1 
५५ 
४ 
२ ॥; 
1 
^ 
[ि) 
॥ 
# 
५ 
| "५ 
0 „ 
त ^ | 
= 4 ॥ 
॥ 
ू 
"` , | 
॥ 
५ + 
| 1] 
१५ 
। =" , ४, । 
॥ ॥ 
॥। 
॥ 
+ १ 
॥ 
| | \ प ' 1 † 
र ष 01 । | 
। २ 
ी 
५ 
0 ५ 
); 
1 ॥ | | 
; 1 | ¢ 
| । + ॥ 
॥ पा 1 # \ ` च 
| र. 4 ॥ 
वि | 
॥ ~ । | 
^ | | 1 
१ ह "1 | 


भष, " र 


। ` स्कर तेन 
[र कलकत्ता 








1 





















जगदाधार श्री परमात्माकी अन्तः प्ेरणासे पहली बार मेरी 

यात्रा सम्बत्‌ १६६७ मे, मेरी धर्ममाता, रायबहादुर सेड भगवान - 

दाखजी बागलाकी धर्मपल्लीके साथ हई थी । वट्पश्चात्‌ पुनः 

दवो बार यात्राका सोभ्य प्राप्त होरेसे पूर्ीपरका अनुभवं 

` मिखाकर यह पुस्तकं छिष्ो गयी है । उसी समय पविन्र तोथया-' 

आपर एक स्तक टिखनेवगे टारसा बीजरूपसे मेरे हदयकी 

भूमिम सरक्षित हो गई थी । किन्तु अनुक्कुरु समयके अमावस 

अक्कुरित होकर पृष्प-प हवो से हरीभरी होनेका अवसर भाज्ञतक 
: उसे नहीं मरिखाथा। दटने दिनों बाद्‌ मेरी बह विरकारीन 








६ ५, 


आभ्यन्तरिक असिलाषा इस छोरी-सखी पुर्तिकाके रूपमे सहदय- 
पाटकोकी सेवाके स्यि उपस्थित हई, मे सके लिये सफलताके 


आधार, परमपिता परमेश्वरा तज्ञ हं ! यद्यपि शख पुस्तिका 









9 











€ 
परिचय द्प्णके तोरपर कु भी सु 


हुभां तो मै अपने परिश्रम ओर व्ययको साथे 
जीवनको धन्य समञ्च गा । इति शुभम्‌ । 


















५4444 
क व ११११ 








[क 


ततान तिन नतत न तता 
+न 





३० २० जूनागट्‌ 


५ 


९ प्रमास-्षे 


 दारका-धाम 




















है--उसके पिता भोर माता भी उस भगवद 
बलस अनन्तकाखतकके लये श्रवेङकण्ट- 





१ स 








 । छि 
। ४ „ । 





(1111111. 





{= 9 + "ब 1. 41. 
# * १1 ~. 





[त ` ** 









9 






॥ . धिनिम क न क वीति ज त १ 
५१५ ३.०५ ५,.४=५। +न. ¬; | ०५११५ ९५१७१००. + = ०४०५६ १५२०४ ति न ४, ~ नन [1 111 1 117 1 ०५० ५१,१४०४५५ 1१५1 7. '† १५५ 
५१.०१.५५५ ५५८१ वि १९.१५ १11 । क 01 ^+ ध णा # म 1. 


1 1 1 प मत सनः त को नमति कहत 
मार ५.4 धत 111 11 01.10. भ ~. ^ जसम रम १। न न | 


सतोम 





1, 


~ [0 1 










खुखद्‌ा यात्रा करनेकी ईच्छा; 


मटोक-पुरखुकित करके उनमें उत्साहकी शीतल-मन्द्‌ समीर 





च ॥ ५ 
\ , 
ए. 
ह, 1. १ 
शशः । 





५ | 


[न ) 





, ~~ |  , 
॥ , । । 
(त । ४ 

























कलकत्ता आकर 


विचार टर्‌ करके, यहां उतरकर, श्रीभुवनेश्वर 
न्द्नके पश्चात्‌ श्रीजगन्नाथजीकी यात्रा करे तो 
ॐ । सीधे श्रीजगन्नाथ-धाम जाकर घहांसे रोते हष 
यहां स्टेशनपर बैखगा 
कमेत चमा 









लती है । ध्नके बैल वहत 


यलि 


ड्यां 
अधिक आद्मि 


चारे 





4. 







@ क 



























प्रचण्ड धूपसे उन्हें कष्ट भी 





^, 


+ ण ड 
देव, अथात्‌ बह्मा, धि ल्प 





-„ [ की 














भुवनेश्वर यात्रा § 


॥ 


जानेके कारण चरते हुए यात्रियोंको बड़ा कष्ट होता है, क्यों 
दवदशोनोके स्यि उन्हे नंगे पैर ही जाना पडता दहे। बहुत 
अच्छा हो यदि धमेप्राण घनी मोद तरियोके 


पनि अ जनिमन 



























इङ बाद यात्री श्रोज्गं 
जिन्हे सः 











` दशेन करनेके लिये व्यग्र तथा. उत्कण्ठित हो.जते है । जिने 
दशन हो जाता है, े तो मारे आनन्दके फे अंग नहीं समते 
रोर जिन भोरेभारे सीधे यात्िर्योको दशन नहीं मिता, 


जाती है-वे बेचारे बहुत खिन्न 
लोग कहते हैँ कि जिन्दे' चक्रका दश न नहीं 
श्किरसे पभ दशन देते & । परन्त्‌ 


निमे ङे। प्रमु अपनी शरणमे आये इष 


॥ ॥ि ॥ ह '॥ ॥ ^ हि च ॥ | ५ " ह ^ । ह । † । 
. | , । । @ 










+ 


ॐ 
) ॥ 








11. 11411111 1111 





# ॥ ^ कि 





~ नन ५ मन = ५ 
५ 


(वि 1) ५ ~ 








^ + 
(५ 
८ 
(1 
॥ 
18 
वानत णत न ^ 
न (1 
(८ 
¦ 
4 ॥ 





कै 






पडता हे कि यहांका 





9, तू ॥ 


भी यहां 





पणितो 


परमानन्ददायी । इस ताला- 

















ख सी ताखावः अजने करते 












 साघन करनेवाखे भवभयसे दुरकारा करा देनेवाठे 
स्यि, चोथा गो 








न ॥ 
त 1 


१५५१ 














#ि | । मानम 
॥ 


को ओर सातवां 




















1011 





१९ 











घासं मो ॐेकर थोड़ीसी इन गोोंको दे देनी चाहिये । धार 
मिर जानेषर फिर वे गोव आप यात्रिथोका पीडा छोड देती 





यहांसे कुछ कदम बद्नेपर थगवानके रथका दशन होता 


। र 


सोह पदिये खगे हण है । ओर यह अचा 
है, आसमान चूम रहा है । इसी स्थपर बेटकर 
यात्रा-कर्तेहै। साटमर सथ यहीं रहता 

¡ रथ वनता है तब यष 
प्रणाम कर श्खको दाहनो ओरसे 





है । 










१ 





भ 


श्रीमगवानके मन्दिरमे जाना चादि 





 . मन्दिर्के विशाल द्वारक आगे काले पत्थरका बना एक बड़ा 





:: , । ॥ि 


साष्टांग प्रणाम करके द्वारम खड़े होकर दाहिनी तरफ 
तै दे । ` अद्त जातिया 








पर भगवान श्रीपतितपावनके दशेन 
य्हीत र आने पाती है । अछत जातियोको अपने दशनोसे पविन्न 
के कारण ही इन्हें पतित-पावन कहते है। 
यदास चकर सीडहिययोपर बड़ी सावधानीसे दख देखकर 
.  चढुना चाहिये । फिर मन्दिर पहु चनेसे जो अपू शोभा आलोको 

शीतर कर दै 











है,उसक्षी तो बात ही क्या हे | आङ्वयमे डाखकर 


। ॥ ५। ॥ ॥। 


बड़ी देरतकं मुग्ध कर रखनेक्ी शक्ति यहाके चार-रचना-च 








व. .1111 1.11. 1 व ४ 
पमा पोत सलोप पे वःते तिना 


1 (1. निदा, 








लन 11.21 ॥ [व ^" | 
न्तो भ 






0 7 | न, 





771 । 


7 क 








चन्य 
पि 


श्री र 


मीभगवानः 




















।५ 
॥ 





पि 1111411 (नी 
नन [1 ^ नि 11; स 
न त दः तनित 
५ त न गि ५१५५५ 





ममर जाती हे । 


क 


सोधी गई हे । यहां समुद्र- 



























0०001 का वा वा वा क ाााणााभकााे 


तिका वर्णन करे । विशाल तर 








५ 


आंसखोपर विशाख्ताकी असीम 








जी न्द  चारञआना देना 
करते हैः । इन्दं कुड देकर अगर कहा जाता है तो ये समुः 
| ग पर ॥ न हप | आनन्द । 
1 जाते है । पानीमें ये अनेक प्रकारकी 
ह: २ उतारकर देख 
उसमें बीडिर्या, दियाखलाई ओर बड़े बड़े भङ्करे 


> के दिे सरटि 
फ्किटमीम्‌ 1 ञूद्‌ | हे । । तारीफ तो यह क्िये*री 
टोपियोको ख्गाये हष 





पूवक फिर वभू 














हि| 
















10 11111111 





11111 












ति मनात म नान न व ना म ५ नन १ ग 








' ४, 


१ 


न्रा ॑ 


ककः व का व क । च रः च । । [ १ ॥ ५ ^ । । # 
ज कम एकक र च न न ५“ "^ नं [नी 


१, नी 


फ 
४ 























पुरोयात्ना | १७ ` 


(न 0 त । ॥ 10 + 0 00 ता | 





#॥ + 1 








न नक किक 


बाद एक धमेशाला मिर्ती है। शदसके भारिक अुवनेश्वर 
धमंशालावाले ही हेः । यह एक तीर्थ-सरोवरके किनारे बनी हई 
दै । यहां ल्लान आदि समाप्त कर पुष्प-चन्द्न आदि छेकर 
यातन श्रीसाक्षीगोपालके दू्शन करने जाते है । एकान्त घ्यानं 
श्रतिष्ठित होनेके कारण मन्दिरमे शान्तिदेवीका अबाध्य अधिकार 
। कसा ही चंचर मन क्यों नहो, पर ययौ आति ही वह 
स्तन्ध शन्त हो जाता है। यहां सखाक्चोगोपालकी यथाविधि 
पूजाचां करके भक्तिभावसे हाथ जोड़ याजी खोग॒ कहते है _ 
हे भगवन्‌ } हमासे या्ाके आप सक्षोहं। मधुर मरली धारण 
किये साक्षीगोपाल अनेक वस्त्राभरणोसे सयुसजित बडे ही 
नयनाभिराम जान पडते है । रंग श्याम है । तदनन्तर परिकिमा 
खमाप्तकर मन्द्रिके पश्चात्‌ भागम जाना चाहिये । वक्षा एक कुञ्ज 
ह । सकी सोन्दर्य-रमणीयता अर रखदख्ही-शोभा दैलकर आं 
छृताथं हो जाती है । कदम्बे सुन्दर दरर्त ओर मौटश्रीङ् फलो. 
रदे पेड ओर भाति भांतिके द्रम ओौर छता" दक्शंकङ हदयको 
बरावर वस कर खेती हैः । जी चाहता है कि ठल्वीष्े छ.चनोंसे 
यहांको खुहावनी श्री की ओर एकरक ताकते रहे । या एक चश्च 
णेखा हं जिसमें विचित्र भरकारके एक टगते हे । कहा जाता हे कि 
ह पेड़ चन्दावनके सिवा ओर कहीं नहं है, एक यद्यं यह मिता 
हे । यहां निमंङ सिरस इतराता हुआ एक सुन्दर सरोवर भी 
हे । ऊुञ्ज-वनका अहाता भी बहुत बडा ट । यहां ब्राह्मण पंडों 
दीका निवास हे, दूसरी ज्ञाति लोग इस कुञज-वनमें नहीं रहते । 
२ । ^ 






































१८ चारों धामकी यात्रा 


ण का ण पा, का ऋ छा ^ का । क, इ + + [क का ^ । 





| क क क 


 याच्री यहाँ दिनभर विश्राम करके रातके आट बजनेसे 
पे ही स्टेशनपर आ जाते है । याञ्रियोंको यहं सवार होकर 
खुदा स्टेशनमें उतर जाना पड़ता है । यहाँ यात्रियोको रातमें 
कर्कत्तेसे खा इञ मद्रास-मेर मिख्ता हं ! दूसरे दिन प्रातः- 
कालके पश्चात्‌ दिन १० बज्ञेके करीव गाड़ी वास्थियर स्टेशनपः 
पर्हैचती है । याञ्रियांको प्रसाद्‌ यदीं धारण कर ठेना चाहिये ¦ 
गाडी आधा घंटा यहाँ स्कती है | | 
रातको १० वजे गाड़ी बेजवाडम जंकशन पहू'चती दै । खचरः 
योंको यहाँ उत्तर जाना चाहिये । ` पास ही एक धमेशाखा रहें ¦ 
यहि मैनेजरसे मिरुकर धमेशाराके ऊपर ठहरनेका ध्रवन्ध करना 
चाहिये ; क्योंकि आराम वहां अधिक पमिखता है । रातभर सुखसे 
विश्राम करके सूर्योदयसे पहले उठकर स्टेशनपर पटच जान! 
चाहिये । यहांसे म॑गर-गिरिके खिये एक अनेका टिकर मिख्ता 
। गाडी छोरी खाहनकी तैयार ही खडी रहती हैउसीसे मंगल- 
गिरि जाते है, इसे भ्रन्नानरसिंह तीथं कहते है । बचें एक स्टेशन 
खटकर आगे म गङ-गिरि स्टेशन मिलता है। मंगरभिरि आर 
प्रन्नानरसिंह तीथे यांसि एक मीर पड़ता दै । यंहां पाड 


















जाना चाहिये 

पटाड्पर स्थित है। पहाडपर चटनेसे पह पंडाजी 
नसे गुडका शरवत जितना अपनेसे | 
करा छनेके लिये कहना चाहिये । मगर-गिरिकी 






पि मि मि जनकता सि निक नती मिम्‌ नकन) 





पुरोयात्रा १६ 








साफ ओर सुन्दर है । चढते हए किसीको कष्ट नदीं होता 
बाठक, चृद्ध, ओर स्त्रियां आरामसे उपर चद जाते है । सीहि- 
योंकी संख्या ५०० होगी । ऊपर कमेरीके दप्तरमें पूजन करनेका 
कर काया जातादहे) फिर मन्दिर-प्रवेशकी वारी आतीटै। 
मग्दिरिके भोतर अधेरा छाया रहता है । भगवान प्रन्नानरसिंहकी 
ते पवेतके भीतर दैख पडती है । पंडेरोग पूजन कराकर एक 
शंखमें शरवत भरकर प्रमुके मुखमें छोडते दैः । पान कराते-कराते 
आधा शरवत बचनेपर पिलाना बन्द्‌ कर दते है । शसक विषयमे 
कुछ भोरेारे खोगोंका यह कहना है कि भगवानक्ते निकर 





जितना शरवत जाता है उसका आधा ही घु पीते है ओर आध्रा 


अपने भक्तोके छिये रख छोडते हे । परन्तु यह वात यथुक्तिको 
नहीं जं चती । पडे खोग ख द्‌ आधा शरवत रख छोडते है । परि- 
कमा करङे पवेतपर खड़े होकर वनकी शोभा देखिये तोह 
(ुलकित हो जाता है। दहरेभरे पेड-पह्टबोकी निरारी ही छर 
दे्वनेमे भाती हे । यदहाकी विचित्र बात एक यह्‌ है ङि रोज मनो 
शरबत जमीनपर गिरते र्हनेपर भो मक्ली कहीं एक भी नजर 
नहीं आती । ओर हजारों मन शरवत श्रभके मुखपर ढाला जने- 
पर भी कीस शरबत बहता हुआ नहीं दैख पडता । 

इसके बाद्‌ यात्रियोंको उतरकर कृष्णा नदीकै तरपर आना 
चाहिये । पवेतसे नदीके किनारेतक जानेके दो मागे है । पक तो 
वेटकर रेखे पुखके पाससे जानेका गैर दूसरा 
जिस गाडीस चटूकर यात्री आते है उसकी राहसे । ङष्णा नदीम 











# ` के 


धि मित निमि जि कि कित ति जः ज थत जि ह त त त मेन भ अ 9 गन न 


































71, 1111 (का पा, ८०१५-७ पि किच्यर 1 रन 


© | खां धामको यत्रा 


नहाते खमय यात्रियोंको बहुत सावधान रना चाहिये । यह नदी 
वड़ी वेगवती है । इसका महत्वं भी बहुतदहे। 
इसके पश्चात्‌ दिनमें यहांका नगर-निरीक्चषण करना चादिये । 
रात्रिको मद्रास मे फिर मिख्ता है उसीसे मद्रास रवाना 
हो ज्ञाना चाहिये । गाडी रातमर चटी जाती है । सुबह आद वजे 
मद्वासतकी बडी स्टेशन सेन्युरमें उतार देती हे । 




















` मद्रास आना सिफ सरके च्यि दी नही, किन्तु इसे भी एक 
धमेश्े्र सम ॐेना चाहिये ! यह प्रान्त दिव्य देश कदराता है । 
यहि विदधान तामि माषे कहतेहे- छः  द्वाविडम्‌ 
धमः” यानी धमका हास होनेपर भी यहां क्छ न कछ धमं 
ही रहेगा । ईस शहरकी सरके लिये कमसे कम यहां तोन दिन 

` उहरना चाहिथे । यहां उहरनेके छि भाटियोकी बनाई एक धर्म- 
शाखा स्टेशनके पास ही है । परन्तु यात्रीगण अक्सर साहकार- 
खमे उतरा करते है ! यहां पंचायती क्षे भी बने हए है । सेर 
 वंसीलार भवीरचन्द्का श्षे्म्‌ (धमेशाखा) में इच्छचसार उहरना 
अच्छाहे। मद्रार 
उत्तमहे¢ यह 

























है । बाखाजीके दर्शन बहूत ही अहुभूत तौरसे होते है । यह 
सूतिं श्यामवणे ओर हाथमे खङ्ध धारण कि हर हे। 
लखारटमें दीय चमक रहाहे। आरतीक्े खप्रय देखनेपर यह 
स्वरूप बड़ा ही तेजस्वी प्रतीयमान होता है । पर्किमाके समय 
श्रीहन्‌मानजी ओर लक्ष्मीजीके दशन मिलते है । सभामन्दिरके 


पोछे एक नाला मिखुता है! इससे दोकर बाखाजीके स्नानका 
तीथे जल -आता हे शख जलको यात्रीटोग ने ओर हदये 


लगाते है । पास ही एक चरणचिन्ह मिखता है । यहां दो लंभोमें 
सिंहकी मूतियां बनी इई है । हरणक शोरके मुखम गोला पड़ा 
हआ हे । यह हाथसे हिखनेपर दढकता रहता दहै! यह भी 
भारतीय कारौगरोका एक अहुत नमूना हे । यहीं घुःटा नामका 
पक ओर तीर्थ है । पास भगवानकै प्रक्ादकी एक दूकान गी 
इई है .। श्समें खडा भात, दही-बडे आदि गिरते है । यदांसे चल- 
कर नसिंहजीके दशान करके श्रीसीतारामजीके दर्शन करना 
चाहिये । यहाके मालिक वावा जानकोद सजी बडे सश्चसि 
सबोध साधु । दिनके दो धजेके पञ्चात्‌ सवारीमे बेडकर 
अमली केनि नामक जगहमे भगवान पाथे-सारथीके दशन करने 
चाहिये । कसी समय अञ्ज नके रथको यहीं श्री भगवानने खडा 
क्या था। यह मन्दिर बहत बड़ा है। द्वारपर बाजार गता 
है । सहां अनेक प्रकारकी चीजे पिद्तीदहे। सभामन्दि्में 
प्रवे शकर भगवानके दशन कर धन्य होना चाहिये । यह मूति 


वहत बड़ी हे । रङ्क श्याम, श्छद्ध धारण क्ये, रारे तरिपुष्ड 





त । 
























त क 1 1) 





नि त 





+ दय चारों धामको यात्रा 











=. हीरे-जवादसात आर मूव्यवान आभूष्णोखे; सुखज्ित । प्रकी 
अर्चना समय यात्री खोगोसे नाम-धाम ओर गोत्र आदिका 
\ >: विवरण सुनकर पण्डा खोग सह नामसे तुलसीदर श्रो प्रसु- 
पर चटति दहे । आर्ती करनेके बाद्‌ सोने-वांदीका सोप प्रभु 
¦ चरणोमे र्खकर याजी उसे मस्तकपर ख्गाते हे । शख समय 
1. अपनी पगड़ी सिरसे उतारकर हाथमे ठे ठेना चाहिषे ! परघ्नाद्‌ 






जन 











| पाकर बाहर आनेपर एक पक्ता सुन्दर ताछाब दृष्टिगोचर होता - 
। है। यह इतना खन्दर है करि जीवने शायद्‌ ही कमी पेखा 


व मनोहर ताखाब देखनेको मिल्ताहे | 
व यांस छोग सभुद्ध-तर देखने जाते है । अपर स्थानोंसे समुद्र- 
| तट भी यहां अधिक सुहावना रूगता है । यहांसे यात्रियांको 


=: मच्छी काटिज देखना चाहिये । खके भीतर जानेकी फोस %) है । 
हर एक आदमी पीछे यह फोस बंधी है । इसके भोतर बाई" ओर 

बड़ी सुन्दर सुन्दर मछटियां देख पडती है ओर परमात्माकी 
 । कारीगरीपर छतिमकारीगरी नि्ावर कर देनेको जी चाहता 
1. है । यहां दो मछलियां रेसी है जो सर्पाकार ओर बहत ही जद- 
।  रीरीदहै। काचकी दीवारोमें पानी भरा रहता दहै ओर मशीन 
इरा गसं भी भरा जाता है । श्सके सहारे मछछियां जीती रहती 
`. दै इनके अतिरिक्त ओर भी अनेक प्रकारकी मछलियां देखनेपे 
आती हे ।"सक्तधातुओके रङ्गकी मछलियां देखकर तो आश्चर्य्यका 








मद्रासकी सर ` २३ - 


षि न मे न ह क 


ज। सकता । शसम कुङ संख्या एेसी मछटि्योको भी है जिनका 
रङ् धूप-छायाकी तरह बदलता ही रहता है । एक मछली देखो है 
जिसके आंखे' तो दो है, ठेकिन प्रकाश वारी वारी उनमें आता 
रहता है । मानो एक आं खमे जव ध्रकाश अयेगा तब दृसरेसे 
वह्‌ नदीं देख सकती । एक मछली एेखी है जिसकी देहम तमाम 
आंखे' ही आंखे" है । किसो किस मङरीमे मोरकी तरह छोर 
छोटे पंख रगे रहते है ओर आनन्दपूवेक वे उन्है फराती-सिको 
इती रहती है । एक मछखो -ठेसी भी दैखनेमे आई जिसका 
कार धोड़ेका-लाहै। इस प्रकार यहां सैकड़ों पकार्को. 
मछखियां है ¦ इन्दे" देखकर ईश्वर्की अपार सृष्टि-लोखापर कुछ 
दैरके लिये दशेक हषेविभोर होकर तह्टोन रह जाता रहै दस 
विशार समुद्रके अन्धकारगभमें न जाने ईश्वरकी कितनो अजीव 
सजीवं खशि जारी हे । €ख कालिजमें जो महछसियां रक््लो है, वे 
यहीके समुद्रोकी नदीं, किन्तु द्रे देशोसे मी खाई गई है । शनकै 
नाम ओर देश अंगरेजी भाषां च्वि हणहै। = 
समुद्र देखते हुए चले जानेपर बाई ओर द्‌ाहिनो ओर नीहा- 


 रनोय कसा खुहावना तर है । दाहिनी ओर समुद्डेव गरज रहा 
है । सडक ओर फुरपाथकी सजावट देखनेयोग्य है । ` बगीचे लगे 


हये है, जो समुद्रदेवकी पवित्र वायुस मरते नदीं । जगह जगदहं 

केच बिे इए है । बिजरीके खम्भोंकी सजावट पेसी है कि मोती 
1 भि सकता हे । सडकक्ती बाई" तर्फ बडे वड महर वादं 

ओादहोके जमानेके बने हैँ । इसके बाद मद्रासका किडा मिखता 


\ । । , † + ॥ ॥ ५, च 1 , 1 1 ू ^ ह . “ . = 7 
श्री ~ चै ४ ॥ ५४ च + १ , " ॥ # र ५ " ॥ हि ५, ॥ 


[9 + 











| 








सप ४११ ७१।१॥ 





क ५४८१४०१ 
मा त नलो ुािनकत १५ 


स 1 ६ ॥ ः + 





क 1, 
नना 17) 


२४ चारों धामको यात्रा 


यी णी पि 1 





है! यह भी करकन्तेके किटेकी तरह पृथ्वीके गभमे बना हुआ 
है । इ्तके आगे वठनेपर मद्रासका हाई कोर देख पड़ता है रेखा 
भव्य ओर विशार हाईकोरं भारते ओर कदी नहीं है । शस 
हाईकोट की कारीगरी ही छ विचित्र ढङ्क ह । यह हाई्कोरं 
कई सो वषेका बना हुआ होगा । अमी कहीं मरम्मत नहीं 


गड हे । ~. ~ _ 

यहांसे सम॒द्रतरकी ओर दैखिये तो एक बडा भावगभिंत 
दश्य देखनेमे आता है । द्राम डीपृके पास संगममरकी एक 
शिलापर अश्र जीमें जमेन जहाज एमडनकी कीतिं छिखी हुई है 
जिसने गोावारी करके हाई्कोरटंको उड़ा देना चाहा था । उसका 
निशाना हाईकोरंका था, ठेक्रिन निशाना कुछ चकः जानेकै 
कारण गोटा .पासहीकी किसासिन तेरखकी र "कियो पडे 
खगा ओर फिर उन्दें पार करता हुभा हा्ईकोरंके दक जगे 
को चकनाचूर कर डाला । हाईकोट का गुम्बज बहुत ऊचाहै॥ 


#। 


इसमे नक्राशी मौ बड़ी खुन्दर है । ऊपर सचेखा्ट भो रगो हई 
हे। ईक ऊपर चटकर समुद्र आओर सड़कों ओर मद्रासके 


अपर स्थानोके बडे आकर्षक द्रष्य देखनेमे अति है, नेर स्थिरदयोः ` 


























नि द्खः दश्य देखनेके, 
व्यि यात्रोगृण हाईकोर अवश्य जायं । =, 
खरे दिन य्ंका अज्ञायवधघर देखना चाहिये । कलक्तेका 
अजायवघर बहुत बडा कहलाता है4 यह चाहे सच हो क्यो न 








मद्रासको सैर रष 


1 न क का [नि 1 + 9 कः + १ 





नि 0 


हो, परन्तु यदांके अजायवबघस्मे जिख तरहकी तज्ञ ब डाल 
दैनेवारखी चौजें देलनेमे आती है, वैखी ओर कहीं नदीं । यहांतक्ष 
कि जुमायशोमें भी ये चीजे देखनेको नदौ नसीव होती । सानी 
वागमें तरह तरहक जानवर है, जिनमे एक भाद इतना बड़ा है 
कि वेसा शायद्‌ ही कहीं दूसरी जगह हो । 
इसके वाद्‌ शामके वक्त पचेपास स्क्रुखके ऊपर आनेपर बहुत 
बड़ी संख्ये लोग शकटं देखनेमे आते है । चारो ओरसे द्राम- 
` गाडयोंको आमदरपंत गी रहती है । यहीसे द्विहिपकेनको द्राम- 
गाड़ी ज्ञाती है । पाथं सास्थीका मन्दिर यदहींपर है । यहींसे द्राम-“ 
गाडी रायपुरम्‌को भी जाती है, जहां गब्छेकी गुदामें है ओर 
व्यापारकः केन्द्र है । इसी जगह हा्बेर यानी बन्द्र्याह भी है । 
देश-देशान्तरोके बड़ -वड़ जहाज यहीं आकर खड होते है ¦ पतेः 
स्कूरुसे द्राम महिलापुरमक्रो भी जाती है ! वहां एक बड़ा भारी 
शिवमन्दिर ओर एक तीथं है । इक्षके बौचके मागमे माउण्टरोड 
जो बहत हो खुन्दर बना इभा है । यहां गवनेर साहब बहादुर- 
की कोरी ओर अनेक सरकारी आफिसहै। 
पचपाससे ही पुरुषवाकम्‌को द्राम जाती है । यहां बड़ बड़े 
डाकृर मौर वारिस्टर कोग रहते है । यदा हरे.भरे अनेक वाग- 
बगीचे भी है । पचेपासखक्ते समीप ही एक्र गडङ्क गरी है। यहां 
कपडे का स॒र्प बाजार है । यहीं गोविन्द अप्पा स्ट्रीट है जहां 
किरानेका व्यापार होता है। 
« यदांसे कुछ दूर पच्छिप्की बर चरनेपर गुदरो बाजार 












































1 


11 1 111 





क 0 1 1 
त भय ता मो याल त णा लारा ॥ 0 





चारों धामको यात्रा 











मिता है । यहां दरा कपड़ा विकता है । अन्यान्य वस्तुओंकी 
दूकान भी यहांपर है । इस बाजाशें दो मन्दिर भी देखने खाय 
वड़े मणोक दहै, एक है विष्णु भगवान्‌का ओर दूखरा श्री शिव- 
{. जीका । शामको यहां फर वहत विकते है । खियोके लिये दजासं 
` की संख्याम खोग यहां फटमाखाएं खरीदते है ¦ सौभाग्यवती 
५ खयि यहां एक प्रकारका फलोंका आभूषण वनता है 
। = जिसे गरीवसे गरीवक्रो भी अपी लीके सिरपर धारण करानेका 
-शोक है । यहीं एक जगह रल्नंका भी वाजार है। यहां रलनोकि 
~ | जाभूषणवबिकतेदहे। ` । 

=. इससे कख ही दूर आगे चलनेपर साह्‌कार-पटः 


आन्न जीं श्से मिर स्द्रीट कहते दे । यह स्थान मद्रास 

















मक्ता दे] 
उतनादही 





मद्राक्षके जस ओर हैवतार्ओंकी सवास्यां यदा जरूर आतो हैँ 


"पर शाप्रको वड़ी चहट-पहट रहती है । एक ओर गणपतिमंदिर 

दूषरो ओर माता कुड (मन्द्र) । यहांभी खोगोष्धी अपार भीड्‌ 
॥ दोती हे! मन्दिरके सामने कछ खियां मीडा-चावर कण्डकी 
| आगर पकाकर वड श्वद्धाभावसे माता कुडि भोग लगाकर छे 
जाती है। माता-क्‌डकि प्रति धरे छोगोंकी बड़ी श्रद्धा ओर 
भक्ति है । चर्ता-फिरता हुभ्ा आदमी भी यहां माता-कडिके 
मन्दिरे सीमने आनेपर, खडा हो, अपने सिस्में धसे डगा, कान 


पक्र इकर नाचने रग जाता है । यहीं सनातनधमेके प्रति रोगो 


५ ५. 














पि # ॥ 2 + ^ ~ 5 


५ -महत्वपूणं ओर मनोरम समभा जाता है जितना फ़्ान्समें पेरिख। 


| यहां चीनारोड आर साहुकार-पैठके बीचमें एक रास्ता है । उस- 





नाः 


मद्रासकी सेर ` २७ 


यहांसे फिर साहकार-पंटकी ओर चटना चाहिये । पीडे भी 
साहकार-पेड पडता हे । साहुकार-पेटयें प्रवेश करते ही दोनों 

आर सोने-चादीकी दूकान दैखनेमे आती है । सोने-चां दीके जेवर 

ओर तरह तरहके पात्र तथा गिन्नी मोहर आदि यां बिकते रहते 

दै । यदहाके व्यापारो मारवाड़ी सञ्जन अधिक रहै । गिन्नीके 
दा लोका यहां खासा जमाच रहता है । मद्धासमे सद्धा पसारका 
८ ` व्यादखाली जो कुछ किये गिच्रियोकी दी दोतीदहै। दृखरी 
चीजोंका फाटका यहां नहीं होता । यहां मारद्राड प्रान्तान्तगेत 
जोधपुर, नागौर, आदिके रहनेवारे ओसवाख ओर गोख्वाड 
मा््योके हाथमे ही व्यापारकी बागडोर है स पैटमै कल- 
कन्ता, वम्बईं आदिकी तरह मारते नहीं हे । ज्यादासे ज्यादा दो 
तहं के मकान बनते है । यां विचित्रताकी द्रष्टिसे केवर एकी 
मकान ाक - पत्थरोका बना हुभा है । इख बुजेपर सचलाषट 
खगीं हुई है । यह मारत बीकानेर-निवासी रायवहादुर सेट 

वंशीखार अबीरचन्द्की बनायी हुई हे । 

इस स्थानसे कु ही दूर चलनेपर उस्तादका अखाडा मिख्ता 

है! यहां उस्तादके चेरे भंग तैयार रखते टै | इसके लिये ऊ 
दना नहीं पडता, परन्तु या्ियोंको थोडेसे टी सन्तोष करना 

: चाहिये । छ दूर चटनेपर वाई' ओर भरिय॒ नायका छेन पड़ती 
हे । यहींपर श्रीवेंकरेश दातव्य ओषधाटय रै जिसमे नरूनिवासी 
वेय कन्दैयाखाल शर्मा चिकित्खा करते है । यहां 


दैवा मिखती है । यदि मुरतमें किंसीको द्वा लेने 

















=, ॐ च. 








4 































10 कः 





पोषणात्‌ 
नि १) ५ क, भमि. 


चारो धामकौ याता 


(कप आ आ) + येका भना 





॥ ++ 8 











निभेन जनि प्रणयेन - 


शर्माकी मिटाईकी दूकान मिलती है । शस दूकानकी पिटाई 
बड़ी पविन्नरतासे बनाई जाती है। इख पैटमें तीन-चार भोजना- 
ख्यभीरहै। यात्री ोगोकी इच्छाओरसुचि हो तोवे यहां 
जन कर सकते है । पास ही एक चोराहा मिलता है । साह- 
| | कार- पेड य्हीपर समा्तहोताहै! ` 
। शसक वाद्‌ चंगा-बाजार पडता है । यहां पोर्ट आफिक्षः 
खका बोड ओर सनातनधमं-विद्याट्य है । यहां मारवाड़ी, 
गुजराती बाटकोंको शिश्चा मिती है। यह सडक 
यहां मीलों सामने चली गरईहै। = . 

वि मद्रासकी गोशाखा भी एक दैखनेकी जगह हे । |  ५००-६०७ 
गौणं अर्ग-अखूग रस्तियोंसे बंधी यथेष्ट भोजन पाती रहै। 


























| मद्ासमें | साहुक्छार | गुजराती | भाष््योदासय | तीन व संस्थाए 





=^ ह । पटरी तो हे गोशाला, दूसरी खस्था विद्याङक 
ओर तीसरी संस्था दातव्य ओषधालय है । यह अमी हाली 
्रष्म-प्रधन 











जब हमारे यहां वारि 
त काले 





तो फण्डमें कुछ देकर दवा छे सकते है । इसके वाद्‌ नथमल्क 


¡ प्रबन्धकी जित्तनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी हे । इसका अनुकरण 
जगहको गोशालखाओंप्रे कराया जाय या किया जाय तो 


त॒ फिर भी यहां शीतर 





पिः 











मद्वास्तकी सैर २६ 











मुख्य मोजन चावरू ओर कट है । कड इमी पानीसे बनता ह। 
-यही भोजन कर यहां छोग प्रसन्न रहते है । यहां अय्थर ओौर 
आयङ्कर नाम्रकी दो ब्राह्मण-जातियां हे । इनक! वणे गोर, खुन्दर 
ओर मुखपर तेज चमकता रहता है । इनके सिवा भौर जातियों 
कैखोग कारे ही कारे दिषवाई देते दं । मद्वासमे भारतके अन्य 
देशोकी भांति सडकोंपर मांसको दृकानें नहीं रगने पाती, न 
यहां करुकत्ता, वम्बई आदि शदहयेको तरह वेश्याए' खटह्मखल्ा 
- वाजास वेटने पाती है । उन्हे" धरफे अन्द्र छिपकर ही रहना 
"पडता है । यहां सुसदमानोंकौ आबादी बहुत कम है । आपका 
वर्ताब ओर खी-पुरषोंका मनोभाव तो यहां बहुत ही पवित्र है । 
द्रष्टि-दोष बहुत कम है! स्त्रियों परदैका सिज विटङ्क 

नह्‌ 


श्त 











आरा घी अं पैर खाने-पीनेकी सामघ्री कमसे कम १५ दिनो लिये 
-यहासे साथ ठेते जायं । उन्हे मद्रासके इगमोर नामक स्टेशन- 
पर सन्ध्याको ७ बज्ञेसे पह रे पच जाना चाहिये । छोरी टेनक्ी 
गाडी रातके ८ बजे यहासे छय्ती है । उसीपर सवार हो सादे 
दस बजे चिंगर पीड जंकशन उतर जाना चाहिये । यासे ६ फर- 


ंगपर एकः धर्मशाला है । रातको यहीं छोग ठहश्ते टे ! खबह 






























१ २१०५ क |, पानम ज 171 का व १. काच... र 


तयस्य वम्तयतनसान नयमः न ~, । 
. {4 








| ५००9 १ ®) » 14 9 ` 3 ` `  , । 
पंछी -तीर्थका मागं पवंत-माराके कारण द्श्योसे भरपूरा, 


` , आंखोंक्षो घस्ीकी स्निग्ध श्यामल छटासे शीतर करनेवाखा हे 
! ` राहकी दोनों बगल मनोहर लटह पेडांकी अपूवे शोभा दै । पवेत 
माटाकी मधाक्रार मुगधकर मधुर टश्यावली दखकरर एकान्त- 
प्रवासी ती्थयात्रियोका हृदय-संताप तत्कार दूर हो लाता 
। 1 मक्तिभावनाकी तरक तरगों बहता इभा हदय सब तरहके 
नत्त होजातादहै। उसे चाशें ओर एक 
| स्वर्गीय खुषप्राकी स्निग्ध दुब्धक्ारौ प्रारृतिक छटा दिखाई 
। पडती है! वह्‌ अपना-पराया सव भूलकर भक्तिके आवेशमें तन्मय 
ह्ोज्ञावा + तरह दस मील रास्ता पार कर चुकनेपरः 
`  पंदठी-तीथं मिता हे । यहां शंखतीथं नामका एक वहत वड़ा 
` तालाब है। इसमें स्नान करके यातरियोंको पं -तीर्थके पहाड्पर 





£ 


४] 
4 
| 
0 
ह 
ध 














| 








॥ 


चढना चाहिये । शख पहाडपर चटृनेके टये उन्हें ५०० सीदहियोके 


~ 
9 


। लगभग पार करना होगा । प्व॑त-शिखरपर एक शिव-मन्दिरर है 
 - यहां १९ वज्नेपर पण्डा मीरे चावर्छोको पक्राकर घण्टी वजात 





ॐ, जिखकी आवाज सुनकर एक खास किस्मके सफेद रंगे 
पक्षी जा जाते हैः ओर पण्डके हाथसे मोटा भात खा ओर पानी 
` पीकर फिर ड जाते ह । य्रियोमिं इन्दीक। जडा धरखाद थोड़ा 
भले यात्री बड़ी श्रद्धासे इषः 


ॐ - ` | | 7 

















धारण किया हे। ये प्रयागे तो स्नान करते हे.यहां 
भोजन करते हैः ओर पिर २ मेश्वरमे जाकर शयन करते है 


परन्तु गाववारोखि पूछनेपर मालूम होता है कि ये यदहीके पातु 
पक्षी हे । तीर्थंको दष्टिसे यहां शखतौ ओर शिव मन्द्र 


पराचीन ओर माननीयहै। | 
पंखीतीथेसे लोटकर फिर धर्मशाखमे आ जाना चाहिये 
दिनभर विश्रामक्षर १ वजे चिंगूपीट स्टेशनपर आ जाना 


चाहिये । यहां से चलकर खुबह सात वजे गाड़ी विदस्वर स्टेशनपर 
पडचती हं । यहां उतर जानेपर बाहर वैटगाडिय। 









घर्मंशाला रिकती हे । मुकाम यदीं करना ह्येता हं । यहां से स्नान 


आदि समाप्त करके चिदम्बरमके दर्छनोक्ि द्यि बाहर निकर 
जाना चाहिये | 
















11 1, (11 


3 


की अपूवं शोमा द खनेको मिलती है । हृदय शसकी सत्यतापर 
बरव मुग्ध होजातादहै। मन्दिरके सामने खर्छ जल भरा 
विस्तृत एक ता खाव मिरुता है, श्से शिवगंगा कहते है । यहां 
अंग-माजेन प्राणायाम्‌ ओर अंजलिदानके अनन्तर बाहर निकटने- 
-पर एक नम्विकेश्वर दिखाई पडता है । इसे पास ही एक तीर्थ- 
-रुतम्म दै । ह्न दोनोके दाहिने भागसे प्रणाम करते हुए मन्दिरकी 
ओर बहना चादिये । मन्दिरके शिखर -देशपर जो क्ख रगे 
इण है, इन्दे प्रणाम कर समा-मन्दिर्के पास जाये तो चांदी- 
की बनी सोदियां नजर आयेगी । सभा-मन्दिर यही है । मन्दिस्कै 
मतर भगवान भूतमावन चिदम्बरम्‌ महादेव ताण्डव-नत्यमे 








च 








को ता है । तीनों ताप नष्ट हो जाते हैः 
थ प्रताद्‌ भर जाता है श्रीमहादेवजोके पास एक 
परदा हे इसमें खुवणनिमित कई मालाए' ख्टक रही है । वहुतसे 
याज्ियोंको ती इनके 











००१२०... 


























नि 8 ता, ए, वा क आ आ आ क क कक काक षकमय 








॥ 


अपो (जल) लिग,अरुणाचल्े भ्चि-लिग 







छ्णावृत्ति शंख रक्ला 
चत्ति शंख भारतवष्भरमे नहीं दैख पडता । 
 पूजन-विधि ग ओर वेव्‌-विधिके. 
। अवज्ेष समाप्त माणिक-मूतिंके 
पीर कपू रकौ वत्तो जङाकर प्रकाशश्याजता दह 
देख पड़ते रहै । मारि 




















णच्यव- 










॥ ,॥ 


। शस नगस्म पाय 

सभी जातियोद्धे खोग वसतेः रैर इसकी आबादी अनुमानतः 

६००० धरोंकी होगी । इनमें ६०० घर तो पण्डके हीहै। 

विदस्बरममें याच्रिरयोको कमसे कम एक रोज तो जरूर ही रहना 
चा दिये श्ये } रान्निमें षस जगद्क्मी एक ओर हीं निरी शोभा हो 

जाती है) शंकरजीके सभा -मन्दिरको ङयोदढीपर जो पीतलकी 

+ १ | ° 








परन्तु चह 
रहती है, इन विजलीकी बत्तियों 
नही देखा वे. सका अञ्चुमान ` भ॑ न कर ३ 


¢ 


श्रार्थना करे कि उन्दें दक्षिणके शिव 
~ सोभाग्य प्राप्त हो [ माणिक्षय आर स्फरिक कमि मूर्तियां 








भ्रीरंग-तीथ जाते समय राहमें कावेरी नदीका एक बहुत बड़ा 


एक मीर लम्बा पुर्‌ मिता है । इसे पार करनेपर करीव ही बाई 











ओर एक खासा वंधा-बंधाया घाट मिता है । इस घारपर ` 
_ गण कमेकाण्ड करतिहै। य 














वायुका अभाव है । 
बर-त्याग करती है, जिस 





| 
॥। 
। 
| ४ प 
| | 1 (1 
1 ५] 





















न्दर दश्य,रोगोकी अपार भीड्+वहां खच्छन्द विहारिणी 
योंकी निष्पाप सूतिं, पुरूषोको भांति धोती पहने हुए, गीला 
कपड़ा बगर्र दबाये.{खचेर वस्रं सहित बगलमे जखपूणें कलर्स 
ख्ये इप, नत नयनोँसे देवी मूतियोंकी भांति अपने अपने घरोको 
-जाती रहती है । उधर घां कोई संध्या-वन्दन कर रहा 








है। तर्ष्णांजलि दै रहा है। कहीं स्त्रियां भी पुरषोष्छी तरह 


१ 






0 


श्राणायाम-क्रियाकयी साधनां मग्न है, स्यं 


अस्जाय कटका कोकिर 





११५... 











` श्रीरग- 


गष्ेोधोष्नलमकनका 





माना गया है ।. यां पिण 

खौटओआना चाहिये। = 
` श्रीरगजीके मन्दिरमे दशेनोके ख्यि दस वजेके वाद्‌ जाना 

अच्छा है । यहांसे मन्दिर आधा मीक पड़ता है । मन्दिरको दैख- ` 
` नेपर बड़ा आश्चयं होता है । यह मन्दिर क्या, एक श्रामका 
ग्राम जेसे शके अन्दर बला इभा हो । इसमें खात परकोटे खगे 
हए है । पहले दारके पवेतोन्नत शिखर देखिये, फिर 















मस्त भावसे इष कुः ` जर-श्रेषठ द्धो विर 
देखिये । विशार मस्तकपर उद्धपुण्ड तिलक जिसके सफेद्‌ रगके " 
मध्यमे खो 18 शोभायमान है | ये गजराज 
 सश्परदायकी सूचना दे रहे है । भीतर जाकर दैखनेसे एक वडा 
नगर वसा इभा देख पड़ता है । यहां बाजार, 





























 पहुचकर या छे गरुडजीके - दशेन करने 
हेये । गख्ड़जीको देखकर हृदय पुरक -प्रफुट्ल हो जाता है- 
कितनी विशाल मृति है { वीरासन गाये दास-भावमें तन्मय 
है । यह मूति कोई २५। ३० हाथ रम्बी होगी । किर भी 
का तेही बनता दहै 
अदत वस्तुभमिंसे एकदे। 






















रंगजीके मन्दिरमे जाना चाहिये । दक्षि णके मन्दः 
अधिक रहता हे । इसलिये श्रीरंगजीके दशन दीपम।खाकी सदा- 

ह । श्रोर्गजी बृहदाकार सर्पोकी शय्यापरचेटे इषः 
कृष्णवणं थले खष््मीजोकी खुवर्णप्रतिमा 
। कन्धेसे पड़ा हुआ खर्णोपवीत भोर मतिं अनेक 
प्रकारके चर्त भच षणोंसे षस ल्जित है । पाक्षही एक 
खे मण्डित है \ यदि श्नके दशर्नोकी 
पदां उट जाता दै। 












तिं 

















ध्मेशारा्म पंच कुक 


| 


कवेचार करना चाहिये । अगर एक रात उदरना दयो तो रहकर पूरी 











प 000 क 0 9 त च क कः का १ +) + 


श्सी शिखरपर स्थित हे । पहाड़ मागं सुगम है। रास्ते विचित्र 
ढंगके आरीशान मकान मिते है । पहाडपर श्रीगणेशज्ीके 
दशन अवश्य ही कर छने चाहिये 
शोभा तो इतनी भर्खं म्राटुम रीतं 
मर जाता हे । अथाह शान्तिसागसपे 
हे । कदा जाता हैत्रिचिनापद्टी रावणके मामा मारीचको बसाई 
इडं है । यदे नगरी पवेतके पदस्थपर बड़ी दुः खी 

< दहै। इसमें विस्तरत राजपथ, उद्यान ओर बडे बड सेशमार मकानात 
हे । यह आम भी बडा है । पहाडसे नोचे उतरते समय वी चमे एक , 

स्वगेस्थान मिता हे । शस भी देख छेना चाहिये । तदनन्तर नीचे 
आ गाड़ीपर सवार हो चिचिनापी स्टेशन आ जाना चाहिये । मागमे 
ओर बाजार 











कि वाह्‌ ! आनन्दसे हदय 
प्रन निमञ्जित हे जाता 






















न्द्र ओर बारीक कारीगरी है । फाटकके बाहर 
देखते ही मन प्रफुटित हो जाता हे । स्टेशनके 


गाडी स्टेशन- 
-द्शेनोके ल्यि मदुर 





न पडते है | पर इनमें यात्रियोके बोग्य 


। स्टेशनो मे खोमचा टलगये 








नि \ 
„ र, 4 ' + ॥ क ५ + र 


9 ` क 


।  @ ° 









(11111411 





प 





याजा 


एक कक काका कका क क क कक क क क काका क का क का प ऋक १ सिन ति नि त थो, १५ ज पला „४० न 


॥। 









है ओर श्रद्टीः 'काफोः 





आवाज लगाते फिरते ह । कड तो केखा ओर पाट (दूधोबेचते है 

हइटदी एक अजीव ढ'गकी वनी लाच समध्रीरै। उदं ओर 
चावल भिंगाकर चक्कीमें पीस रेते है, फिर उसको पीटीको एक 
य्॑रसे पानीकी माफ पकाते है । यही टीः कहलाती ह ¦ 
यह वकार हे ओर पाचनशक्ति भौ इससे बढती है । प्पाज 








यहांके याज्रियोके लिये खाभदायक्र होगा । यहां चैसेको 'काटना 
कहते हे । गिनती एकसे दसतक इस प्रकार है :--१ को ओर, 
को आर, को एड, 
: को एट,६ को उम्बद्‌ ओर १० को पत कदते है । इतनी गिनती 
याद्‌ कर ठेनेसे बाकी काम इशारेसे चर जाता रै । यहांके 

















शरेके बडे पक्के होते है । यहांक्ी गाडियां 
ती रहती है ओर श्नये विरोष आराम 

























४९ 


लि नता म तिमि जि ति म तक नत म 


यहां एक घमेशाखा बनवायं 
ल्वा दं तो यात्रियोका बड़ा ही उपकार हो । आरेक 
सदा ही अकारुस्हताहे। ` 
अस्तु प्रातःकालके समय मीनाक्षी-दशनोके बाहर | 
निकटठना चाहिये । मन्दिर -द्वारपर पहंचते ही बुद्धि चकरा जाती 
है- व्ह विशार भव्य दिव्योन्नत मंदिर देखकर । संसारम जसी 
८ इसकी खकीतिं पटी दुई है, यह वैसा ही मन्दिरिहैकिहोशदंग 
रह जाता है। मन्दिर-दारके शिखसरको ध्यानपूवेक देखनेसे ` 
नास्तिककी बुद्धि भी अगाध आस्तिकतामें डवकर कुड कारके 
स्यि स्तम्भित हो जाती टे । दक्षिणम मीनाक्षी-मन्दिरसे आटीशान 
मग्दिर दसरा नहं नजर आता । मुख्य दार पूवांभिमुख है । शसः 




























क रकबा ७५ 
। अनेक चकार्की 

















है। इसके भीतर एक तालाब 

तृप्ति कर छेनी चाहिये । शसमें नहाना अच्छा नहीं , क्योकि: 
| यहाके टोग हटदी ओर तेर बहुत गाते हैःसलिये पानीकारंगः ` | 
तरह हो गया है ओर ऊपर तेर फेखा रहता हे ¦ | 
मन्दिर ही एक सिंहकी मूतिं मिती है । यह 





रोर मीनाक्षी-देवीका वाहन हे । दघ्चिणावते करके यहांसे चलकर 


^ 


~ 1 1 2 ५ 1 
"५ ८५.५१ ५० 













~~~“ ` (नि 


कर रही है । पोशाककी 














खगा देती है। चरणारविन्दोस रेक मस्तकतक द खनेपर : 
कभी भी -बाहर निकालनेको 


॥। 











हे | कोई । कोड स्तौ 














1 , #: 


 दशेन समाप्त कर अपने ३ 
पश्चात्‌ परान्द  बज्ते यहांके राजमहरोका 

यह राजप्राखाद्‌ ३०० वषं पहरेका बना इभा है । इस महल 
पदरेपदल क्चत्रिय राजाओने बनवाया था । फिर यह सुखद 
वादशाोके हाथमे गया । अब यह अप्र जोके अधिकारमें है ¦ 
महरके अन्व्र जहां दरबार रुगता थो, वह स्थान वड़ा दी 

, विचित्र है । इसमे जो चमे लगे है बे बहुत ऊचे ओर मोटे होने- 
- पर भी बहुत खुस्दर है । आजतक कहीं इनकी मरम्मत नहीं 
गई | शनमें खोहै या पत्थरके जाड करं नजर आति } ये 
केवर चूने जोर ई गये है । अआजकक्के यूरोपीय 
ढ॑गसे, खोहे ओर पत्थरोंका जोड़ लगाकर बननेवाटे, मदान्ध 
शिद्पकार भी दन्द देखने अर £ श्चा प्राक्च करन हें 8 
गीचा देखने जाते है } यह पानं 
रीकी दूष्टिसे प्रशंसनीय स्थान है | 
 येहांकी बहुत प्रसिद्ध है । यहां रंग आदि- 



































वना हुआ है । ` मदुरा 
खासकर जरीकी साडी 

के भी कारखाने हे । 

दिनके ग्यारह बजे गाड़ी यदास श्रीरामेश्वर-धामको छरती ` 

है । इसीपर यात्नियोंको सवारहो जाना चाहिथे । गाडी खर जने- 








ओर एक पवेत मिरता है, बड़ ही खुन्द्र खुन्दर दश्य ` 





उसमें दैख पड़ते हैँ । तीन बञनेके 


बाद्‌ कण्डू नामका स्टेशन 





नेमे 








श 








111५ 








0 स, श 


का 0 त ^ 1 + + 


छांच-वोटसे . होकर जाना पडता था । टां च-बोरको चारों 
ओरसे पनडब्ये घेर रहते थे । खोग रुपया, अटन्नी, पसा, जो 
समुद्रम छोड़ते थे, उसे वै बडी विचित्र रीतिसे मुखमें दबाकर 
बाहर निकरुते थे । जव ठांचवोर कुछ दूर निकर जाता था तब 
एक तर्फ भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजीका बनाया हुभा सेतु 
देख पडता था । सेतुको रेखा ओर कुछ खण्ड ही खगो ¦ | 
आते थे । अव रेरे कम्पनीने सेत॒के खण्डोंको एक साथ जोड़- 
कर उसपरसे गाडी चरा दी दहै) ४ वज्ञे परान्ह कालमें 
समेश्वर स्टेशन पहुंच जाती हे । 























वाघा रामनाथक्रो 
मानको गु'जा देते हैः! स्टेशनपर पहुंचकर या्रियोंको चाहिये 


क "ठ 


दूर पेदख ही चकर अपने टहरनेके स्थानपर पटच } ` 














रोखेकी सडक आ जनेगर स्वर्गीय सेढ रायबहादुर 
अगवानदासर बागलाको एक धमशाखा मिरुती । 
बहुत ही आरामदायक है । यहां कई धमेशाटाण' है| 








ध # 











ना चाहिये । जिनके माता-पिता स्वगेव।सी हो चुके है उनके 
लिये इस अनुशासनका पालन करना परमावश्यक है ।ओर कमं 

तो सबको करना ही पड़ता है । श्ख देश तथा अपर देशोकी 
देविथां मो यहां मुण्डन कराती है । यहांसे चलकर मन्दिर जाना 
चाहिये । मागे बड़ा ही रमणीय हे । दोनों भर नारियल्के पेड 
ओर भव्य भवन खुसम्जित ओर रमणीय रूपवे दृष्टिको तृप्त करते 

। छ देर बाद्‌ भ्रीरामेश्वरजीका मन्द्र पडता है । मन्दिरके 

सामने आते ही परम ्रद्धा-मावसे साष्टं प्रणाम कर मन्दिरे 


च 


















दे । बड़े बड़ राजो -महाराजोकी मूतिंयांखम्भो- 
खड़ी की हुई, मन्दिरको मानो धारण किये इए है । श्नसे 
आस्तिकताकी जो १ उससे हृदयको अपार हषे 
होनेके खाथ ही एक बहुत बड़ी शिक्षा मी मिती है । दनके नीचे 
भाति भांतिके चित्र बिकते रहते है । एक चिज पेखा है जिसमें 
श्रीरामेश्वरजीकी पूजा श्रीरामचन्द्रजो ओर श्रो जानकीजी बड 
स्ि-भावसखे करते हुए दिखाये गये है । आगेःरक ° लम्बी 


















मणाय 


नि 





चं डी हर्चरु मचौ थी । भव पुरानी 
कर नईके बनानेका उद्योग हो रहा है ।श्से 










भागसे करते है । हइधर एक रास्ता चोड़ी ` 
क्रमा समाप होती 


लोग अपने बायेिम 
सडकष्छी तरहका देख पड़ता हे । जहां वाई' परि 
प श्रीराम-जानक्षीः 





है कि भव! तुम्हारी पसे हीमे 
ठि समथ इमा हं । इस 
म करके मागे समाप्त करना चाहिये । इस । 
ही श्रोशिवजी ताण्डवन॒त्य क त्‌ 





(म 


- 
५ 





४ 


आवेःसवे पहले 








ते हें। 
श्सके पास पहुंच तानकर एक तमाचा इसको रखगते हैः । 
मे पटे हरबोरा बड़ा प्रमादी 
था, पीडेसे शिवभक्त बन गया । रेकिन जब शिवजी इपर प्रसन्न 
इए ओर इसे वर देना चाहा, तव इसने एक अजीव वर मांगा । 
इसने कहा, महाराज { अपने. जीवनमें मने बड़े बड़ पाप-कायं 


















दशेन 
करने जाय खाते इस वेचारेका सिर 
भी पतला पड़ गया है । इसके आगे दारकी 
पत्थर टि । 





+ । | 


न्दतापूवेक अपनी 
नासिका टेहन कर रहे है । इनके सामने ही श्रीरिवज्ञी विराज- 





























-तेजोभय ज्योतिर्टिंगके दशेन कर हृदयको कितना आनन्द्‌ प्राप्त 
| होता दहै, यह वही जानते है जिन्हे" इसका अनुभव हो चुका हे । 
जब कपूरकी आर्तीकीजातीहे तब बहुत अच्छो तरह दशेन 
_ होते है । इनके दर्शनसे हदयकी जन्म-जन्मोंकी अजित पापराशि 
जाती है। दर्शक भक्त अपने इख जीवनको सफल 


मानते इण प्रेम-गद्रद्‌ हो जाते है । शख समय प्रमु श्रौरामनाथकी 
मू तिका £ 



















का अनुपम भाव हषयमें चिरकारके लिये संचित कर 
उधर पीट न फेरकर कुड दुरतक उद्या हटना चाहिये । यहांसे 
मिता है। यह श्रीरमेश्वरजोके मन्दिरकी वरा 
मे हे । यहां श्रीकाशीविश्वनाथके दशन होते हे । ये वही काशी- 
विश्वनाथ है, जिन्हं छंकापर आक्रमणके. बाद श्रीरामचन्द्रजीने 
हनूमानजीको मेजकर काशीसे मंगाया थां शिवरिंगकी स्थापना 














॥ (1 
॥ 
† 
1 0 
* ! 4 (4 
\ 1 





| ^ ॥ 
1:09 
1 
| 
| 1 ॥ 
1 
| | 
1 | ॥। ्‌ 
. ५... 0 | 





. त व । श 114 ऋ | 
| प्च ४. ॥ ष , ह ८. | <+ ८ नि ५" ५ । ( ज; ५.५ 9१४ । ^ र क ^ 


॥ ^ 
# 
| ¦ 
६ ॥ 
५ 
५ ध 
0 
1 
ध 





, 1 

॥ ॥। ॥ 
^] 

| | ( 


† | 
॥ १ 7 
॥ ॥ 
॥ ५ 
^ 
^ 
| ४५ 














| 
॥ 
| 
1 
| 
9) 
41 
( ( 
1 (| 
र 
1 # 
। 
# 
( 
| 





„ ` १. 


पुजा कर रडे दे रं र = 


111: | ६014} ^ ऽता00.. ॥ 
1 “> {0#6^72)1 511६7, (१1011. 














इनका उलाडा न उलड़ा । अन्ते थे 
दोश हुआ ओर समभ आई । 
माफ मांगी | ओर अपनी टाई म 


 करनेकी प्राथना की । तब श्रीरामचन्द्रजीनै 














चाजा वजता रहता ह । इसके घोर स्वरसे मन्दिर गज उरखता है 
हाथी, घोड, ऊट, अनेक कामदाश 








क्रि माता पार्व॑तीकी तरफ फिर जनताका ध्यान 
तो बह बस शन्दीं वेश्याभंको मन्बमुगधको तरह पकरकं 


ती रहती है । खमयको नमस्कार हे कि आजसे १० । १२ 





र आत्मवरकी वृद्धि । परन्तु इस 


कव साधारण जनता बिना श्ुभ्ध 
के बदरे पापो 











मेर (प 














नदहीकिवे 
ष करना चाहिये । उधर शास्म मी माजन-क्रियाको खान- 
के तुद्य ही मानादहै। दशन आदिसे निचत्त हो अपनी जगह 
आ जाना चाहिये । यहासि मीख्भरको दृरीपर जरा तीथं है | 
पगवान श्रीसमचन्द्रजीने यहीं अपनी जसा धोयी थी । यह स्थान 
मर-भूमिसखा है । यदा टीञे भी बड़ बङ्‌ है । एक ओर समुद्र ओर 











दूसरी ओर बालके बडे वडे ऊचे रीर । यात्री रोग इनपर वैठ- 


कर विश्राम करते है । यहांका द्श्य मी मनोहर्है। 


तीसरे दिनका कायेकमः 
याका एक प्रधान तीथं है धयुष-कोरि । तीसरे दिन रेख 

गा डीपर सवासर् हो यदहाकी यात्रा 
गाडी नहीं चली थी, यात्रियोंको नोका अथवा बैटगाडियोंसे 
होकर जाना पड़ता था । रास्ते एक रात एक तेलीके श्चेत्रमे 
ठहरना पड़ता था} ओर क्ले्रके नियमादुखार रातको ` वहाके 
याल्ियोँको उसी तेटोका अन्न खाना पडता शा | अब गाडीके 
निकल जानेषर वे दिकतें टर गई है । धनुषकोटि पडंचनेपर 
यहाकी आश्चर्यमे डारनेवालो प्राङृतिक रीरा देखकर मुग्ध 
ज्ञाना पडता ह । यहां वंग-सागर ओर अरब-सागर 
सरेसे मिटते ३ । न्दे मरोदधि र रल्लाकर भी कहते 
संमुद्रका यद प्रेमाछाप छः मदीनेतक इभा करतु है । 









































-मालापं अपनी प्रेमोन्नत बाहुओंको बहा बाकर अनन्द्से 
ती इई देख पड़ती है । छः महीनेतक रल्लाकरसे छहर उड. 
कर महोदधिको गले टगाती ह भोर छः महीने हस प्रेमका बदखा 
रह महोदधि भी रल्ञाकरके व्यि चुकाता है। दस जगह 








त 














तुष या तो यात्नी अपने पाससे छे कर रखते है या पण्डाजी 
देकर स्थित-निमिंत धनुषकी पूजा करते हे । पूजन आदि 
हो जानेपर यात्रियोको अपने डरेपर वापस आ जाना 










| 








कुर अभ्यास जवानी 
दूखरेकी आर सामना करके 


1) 








पाया शा 111 






मदाराजका कथन दै कि मनुष्ययोतरमें पुनवांर आनेकी आकां 
` रखनेवारेको विद्यादानं करना चाद्ये । जो ज्ञान-दान करता 





वद ईश्वरंकी छृपासे वदी चीज पाता भी ह । लत तरह ज्ञान -दान 


1 





 करनेवाछे मचुष्य-योनिमें दी आकर जन्म ठेते है । ज्ञान-दानकी 





सहायता करना भी वदी फ देनेवाला है । इसलिये 8ि 
, ज्ञानकी च 


[र 





| हायता च्रना सबसे | भ्रष्ठ  . क्पे । र ` उञ्छतम 
श्रोणीकादवानहै। । ,, 

` तदनन्तर ४ वज्ञे, दिनके पिछछे पहर, राम-सेखे जाना , 
चाहिये । इसके सम्बन्धमें यह कहावत मशहर है-- 


न्यम करोखे बैठकर सबकामुजरा खेय। 








५ 

















ण है । रामे बवूलके कटि 

यहांसे कुछ दुरपर खुग्रीव-कुर्ड पमिरुता हे । यर्हापर माजेन कर 
` छिपा हमा है । यहीपर वैटकर भगवान श्रीरामचन्द्रजीने अप्‌ 
महिमाका स्मरण करना चाहिये । जिन्हें अनुभव हो चुका है, व 


जाकी ससी चाकरी ताको तैसादेय॥* _ ` 
स्तु, यहांका मागं कर्टकाकी 
बहुत पडते हैः । अतणत्र रास्ता सावधानीसे 
आगे चना चाहिये | रामभररोखेके पासही एक ऊ चा : 
सा है। दस रीकेमें प्राचीनकालका एक बड़ा ही सहद्य भाव 
विशार वानरवाहिनी का प्रणाम खीकार कर उन्दः आशीर्वाद्‌ 
प्रदान कियाथा। थोड़ी देके लिये यहां बेटकेर उस प्राचीः 
जानते हे कि यां थोड़ी दी देम . अन्तस्तलको पुरुक. 
| , 





त १ क त-न 





तयि 


धि का क ५८८४५७५ 
थात १ वन "१५०1 
1 
















कष्छाकाकाकाष्काष्काकावकाण्काण्का्ठ का 





खी कैसी शान्ति मिती है । फिर यहां 
डेरेपर वापख आ जाना चाहिये! इस तरह चोथे दिनि 














मश्वस्फी यारा समाप्त होती है । अधिक दिनोंवक ठदरना . 
तरिर्योकी इच्छापर निमेर हे । ~. : 





` जिन कोगोने वास्मीकि-रामायण देखी हे वे जानते 
कितनी . महिमा. भगवान श्रीरमचन्द्रजीने अपने 















क शख स्थानें मैनि श्रोशंकरजीकी पुजा की थी जिनके विजय- 
एर खो रहा हं । जिसकी कीतिं 











करे, वह स्थान वास्तवमें 

यंतो यह भूमि बहुत प्राचीन ओर महत्वमयी हे, समे कोई ` 
 । परन्तु छ रोगं जो यद वतरते हँ कि यह्‌ मन्दिर 
सो यह बात माननेयोम्य नदीं । यह मन्दर ५०० 





अस्तु रामेश्वरसे चरते खमय वियोग-दु 
पहर ही स्टेशन आ जाना चाहिये । गाडी यदीसे 





॥ 











न 


नामका है । पटे यहां स्नान ओर तपेण-पि 




















| 
२४ 


 भूत्तियां मौ परिक्रमाके भीतर विराजमान है । इख परिक्रमामें एक 
सहख लिंग शिव दर्शन होते है । शन्दें सदसे श्वर महादेव कहते 
हें । यहां साक्षी  बहां कितने दी 








लोगो सुननेमे आया कि शव-कांची ओर विष्णु-कांचीमे बड़ा 


५, 


वैर-भाव रहता हे । परन्तु यह बात विक्र निराधार है; क्यों 


11 





कांची ही एक जगह विष्णुकौ मूति मी स्थापि 











~ छ 





५७ 





द 
॥ 





प्रवेश करना चाहिये । यहां भो एक तीथे-सरोवर् हे 
एक सुन्द्र इमारत खड़ी हुई हे । इसमे १०८ खमे है, ओर उनकी 





पहु चनेपर एेसा जान पड़ता है 
पहाडकी चोरीपर बना इभा है । सीघे-टेद कितने ही 
रास्ते है ! इन्द पार कर प्रभुके पदारविन्दं पहु'चना होता है । 
यहां पूजार्चा करके भक्त यात्रियोकी अन्तरात्मा आनन्द॑से लिख 
उठती है । उन्हं अपना अपार श्चम सार्थक जान पड़ता है । वे धन्य 
& हो ज्ञाते | है | । ` । वि ~ | 
यहांसे नगर-निरीक्षण करते हुए अपने स्थानपर वापस आ 
जाना चाहिये । कांचीवरम्‌ एकर विस्तृत ओर प्रतिष्ठित नगर है । 
यहां चार-पांच रालको मनुष्य-संख्या कही जाती है । यहां रेश- 
मके कारखाने ही पांच हजारके करीब होगे! दूसरे व्यापार 
भी यहां होते है ओर यह नगर २५ मील्मे बसा हुआदहै।  ... 
यहांसे यात्रियोंको रश््मणबाखाके दशेनोके ल्थयि चल 
दिनको गाडी खटती ओर आरक म्‌ जक 
शन होते हए रश््मणबाला पहूु'चती है । ३ बजेके कर 


| । ^ | । `; |  । 























४.14 41 1.11 1 





पि पि 1 






















ण्डा जंकशन आता है | यहां उतर जान। चाहिये । घोडे-गाडी- 
पर सवार हो तृक्िकी धमेशालामें दिनभर विश्राम करके शामके 
वजे कपिल-गंगाके दशन करने चाहिये । ये पर्वत- 
` ओकर प्रवाहितहोरहीदहैः। द्रश्यतो हर तरहसे मुग्ध करदे 
वाला है । पहाड़ी प्रपात बडे जोरसे गगा-गर्भमे आक्र 
` । बह शुम स्वच्छ धारा | 

























बंधा हआ है । चारो ओरसे मन्व 
न्दर अवश्वत्थामाका भी देख पडता 
` नहीं है । रातभर यहां विधम 
























पड़ता है। कितने 
डकी यात्रा करते हेः । जति 





पत्थरकी आधी मूत्तिं 















पर पक मेदान मिख्ताहै 
बाङाजीका मन्द्रिमिख्तारै। = 
 धमेशाराए" भो बनी इई हे । यहां हाथी. 
बावाका सोन भी उतरनेके लिये अच्छा है| पक तीथ-सरोवर भी 
यहां वना हुभा है । मन्दिर जने पहङे यहां स्नान कर ठेना 
चाहिये । मन्दिरमे रोर कमणवाखाजीके दशेनोँसे हदयक 
आनन्दकी प्राति द्योती है जिसका वणेन शक्तिसे बाहरकी 
सूतिं बड़ी ही खुगटित बौर श्यामवणकी बनी हु ॐ 
अमूल्य भभूषणोसे खुलत है । मस्तकपर अद्ध 










भतन भत ११०१ न भनति म तति - भत कति वदता न वीरम चिदिति प ष 0 1११ । 





[र 


| 


1 


०९ 


आकर गो- 


ध 


ण सम्पदा अंग्रेज-खरक्ारके 


१ 














॥ 
र 
॥ 
र 








रवाना होना चाये । यह शिवदिंग है पांच तत्त्वम वायु 
माना गया है। कालास्जी स्टेशनपर उतर जानेपर वा 
मीर दुर, स्वणां नदौ मिरूती है } इसे छोग 
है। इसका जख बड़ा सुस्वादु, ओर | 
चलनेपर एक पहाड्‌ मिता है जिखपर एक अत्यन्त मनोहर मन्द्र 
अधिष्ठित है । मन्द्रे भीतर जाये, देखियेगा, 
प्क भीलकी मूतिं खड़ी की ई है। इस 
था । इसके सम्बन्धे छोगोका यह ` 










1 










तीकी पूजा करता है ! पः 
कणप्पाका खगाया ` हआ भोग ति रिवज्ञी बडे  आदर्से 
रहे है । श्ससे ब्राह्मणको बडा आश्चयं हूभा। | 
शिवजीकी एक आं लसे खून निक 
जब कणप्पाने यह दैखा तब्र कट ` 
शिवजीको नेत्रदान 


















व त 





^ ५.५1 ब त 
ति .. ~ 1 ०५ ^. ५ 








५, 








विवाद किया मौर लडकर अन्तमं सवके सब मार 
प्राणदान देकर पृछा कि त॒म 












यह जङशन बहुत वड़ा है । इसके बाद्‌ 
मनवाडके लिय गाड़ी बदरनी पडती 











होताहै कि 





देख खकते है । मनवाडके वाद्‌ नासिक जाना चाहिये ¡ नासि- 
कके स्टेशनपर द्रम मिरुती हैँ ओर तांगे भी बहुत गिरते है 
 रास्तेके सघन पटवित वर चक्षोकी कतार देखकर अन्तरात्मा 















चित कार्य हो 
तीथ दिन्दुभोका है,शख अन्यायसे 






न्द हो जाना पस्मावः 








बेचारे यातियोको बड़ा संकर होता है) यह 
चीजोंकी बड़ी तलाशी होती है] या 
 सवसे पे रामधार चरुकर ` स्नान - आति 





सक 


दः 


॥ 
¢ 
1; 
[8 





11 1 ~. 


# 











११५ 











# ॥ 










"-^-~-~----~-~~-----ˆ~-~----~~~-~--~---~“-~----- ~~~ 


॥ ग ~ . - १ „ 9, म, पु 

















११५५ वा, 11 1 
शरन ॥ (व न म # = ५ / = ५ +" ^ ^ " ि 





कुः 


51 




















कात यके नाम माका ताअ 
# ४ जन, 9 त त म १,१५.१ 





५ ज [वि ॥ ~+ ~ 





=-= 


न न 




































यकाम तजसा 


११ 








व 11 1 


3 1. 


1.71. त १ 





1117 








+ 


# 1. 





वि 


: प " 


५१.११९ ८४ 


























निक ^ + | 






छ र 2 # 4 
न 





1. 111 


ना सत क जत्‌ ०४१० ति र 1१०११. 


101 1. 













(क 8 7 
11 1 





सा ०.७७, १.५७०५००००१ १५१५ 





१.1४ , , नार ना 








ति भै 


| 1 सि कि ण न न.त 





















अ म जद्कनिनिनिन्यस पमे पान 





आ+ ०८०।., 9, भ 2.४ 


५, कन 
^ रतोषः 





= प ४ 


9, 9 





1, 





जा तानी, गि ४ 


सुकन 





क था णान नत १ ता न२१५५५.०१५. ५.१ 
र ध 


9 


॥ 


--- + ~ म 


ष) 























ण + का ` ^ 





त ११1५-५ 


[0 1111 1 पी गि # 
नि 0 


नर ~, पव == धम 





धा 17 १17 111 





(4८4 


[ 
१ 
ई 
॥ 
' 
1 
( 


0 


एम 


2 














म ४4 





770 7 0 1111 111 





111. 


रात 0.11 











५ 


| | १ 


1 


२. 














षा 0 
= 


ममन ०. कुः म्मा 
1 





11 


५५ 


खुली हवा आया कर्ती दहै । दिनिभः 
मँ बेट सुदामापुसीः र दशेन करना 


न्दिर । 





डागोरज्ी < 


[नि 1 पाना क ^ श 9 त क) 9 





सि किति नि ५ 


। फिर सपुद्रके किनिारेसे दोकर चलिये । इसके तरक्षी इमारते 

` बड़नफोख मोर आखोशान है । यहां आफिस भी कितनेदी है, 

पोरबन्द्रका द्रष्य भो अपने द'गका पक रही है । यहां राष्री 

भी है । यहांके राजा राणासाहवब है । वे कायस्थ है ¦ महात 

गान्धीजीके पिता इस राज्यके मन्न रह चुके है! महात्माजी 

यहीं पेदा हुए । इख नगरमे सणुदके तटपर सीभैरटके कारखाने 

+ ओर पत्थर्ोका कारोषार तर्धीपर है । कभी कभी मच्छडोका 

जोर इतना बढ़त है कि यात्री दूसरी खव वातं भूलकर उसीका 
धान करने गते रै ! एक मछरो सापे रखना आवश्यक है । * 

कु दिन परख याजी खोग बेलगोडियांसे द्वारकाधामकी 

यात्रा कर्ते थे । यह यदाखे ४० कोस अन्दाजन दृर्है । मागं 

पथरीखा ओर बीहड है । रास्तेभरमें या्रियोंकी ददशा हो जाती 

थी । छेकिन धमेप्राण यात्री श्रीमगवानके नामपर यह सब कष्ट 

ओर मागश्रमशखखेतेदह) अश्भी श्स तरहक यान्राए' इभा 

करतो दे । रेकिन सुविधा भी अबरखव तरदको रेख्दारादहा 

गई है। अब तो द्वारकाधामतक रेख्गाडी दोडने लगी है। 

खदामापुरीसे जतर्सरमे पडू च जूनागदकी गाङीमे सवार होना 

चाहिये 1 कछ ही स्टेशनोके वादं जूनागह मिरुता है । 








कन, 








(ति + 1.1 ह. \ 
था मानमतनन  - - 








^ ८२ | चारों धामकी यात्रा 
स्टेशनसे उतरते ही यात्रियोंको एक पूवदधार मिरखुता है । यह 
वहत ही खुन्दर बना हुआ है ! इसके उपर एक घड़ी र्गी हदं हे । 
श जब याती पट्ुंचते है तव समे पांच बज्ञकर कछ भिनट होते हे । 





द. दारके सामने एक सिंह, काठे पत्थरका बना, बेडा हुआ हे । इस 


दारके भीतर जाते ही एक साफ सडक मिती है। दोनों आ 





वि ^ अच्छी अच्छी द्मारते है । बाजार लगा रहता है। हिन्दू ओर सुसल- 
ए मान, दोनों यहां आनन्दपूवेक विहार करते रहते है । बाजास्में फर - 
१ फूल ताज मिखते है । सीताफट यहांका नामी होता है । सडकसे 


+ इमारतों ओर बाजारका द्‌ श्य देखते इए यात्री रोग ुनागदुके 
| किटेके पाक पट्चते है। अक्सर यहीं यात्रीटोग ठदहस्ते है । यहां 








। | णक धमंशाटा है । याचियोंको यहां अपना कार्यक्रम तैयार कर 
 . टेन चाहिये । पटर दिन शन्द्रेष्वर महादेव के दश न करे । पदणै- 
 , पल नरखनि शद श्रलन्न किया था। यह एक तीर्थरूपमें है । इसके 

1 पास पटुचते ही पदाडोके मध्यमे श्रौमहादेवजीका छोटासा मन्दिर 

। श्यमे कुछ ब्रह्मचारी वास करते हें । यह खान बिक निजेन 





` भौर शान्तिमरय है । यदीं नरसीने शिवमक्तिकी साधन कौ थी | 
ध ॥ि ` यांस चकर नवावशाहका वाग देखना चाहिये । 

4 “^ नवावशाहके बागमें फारकके सामने ही गाडियोंसे याचरियों 
पड़ता है । फिर वे वागको बहार दैखनेमरे जी खगत } 














ञूनागद गिनार ` < 


0 नल पि नी च क का म म पा भके 


वाग क्या दै, साक्षात्‌ शान्ति-निकेतन ! भीख ओर द्वार देखिये 
तो नकाशीपरजी मुग्धदहो ज्ञाता है। उस कासेगरकी बलि- 
दं जिखने इस तरहकी साफ काका नमूना दख सभ्यता- 
खंसखारको दिखखाया । भीतर हर तरहके सन्दर खन्दर 
सुगन्धित एर्टोकी अरग अलग क्यारियां देल पडती है | फरोके 
ौ धाजरियोको अधिक मोह हो जानेपर भी उन्दे' हरगिज 
नमं दाथ न खगाना चाहिये । क्योकि इखसे उनके अपमान दो 
जानेका उरे! फू सुरश्ित रहते है । देखकर आख वत्त कर 
खीजिये । बस, फिर आगे महर मिलत हे । यात्री आगे बहते है 
तो एक तरफ एक कां चके बरतनमे एक गोखोचनक्षा गो छा देख 
पडता है । मचुष्योके उपकारे लिये, गोमाताके शरीरसे कैसी 
द्वा इश्वरने पेदा की कि दैखकर चकित हो जान! पडता है। 
फिर सजादई इई बहुमूल्य चीजोंको देखते चलिये । कांच 
खामान तो बहुत तरहके है । वहांसे लिंहोंकौ जगह देखिये कि 
केसे केसे सि ह पडे हण है । मिह्‌ पाधः सव देशक है,जरां जहा 
वे पाये जाते है । भारतवष का सिद बड़ा जवरदस्त पूरे नौ हाथ- 


ति म कि नि मा न्‌ कन्‌ 


























काटोतादहै। से नोहत्था शेर कहते है। इसका रंग काल) 


है । अग्छिकाके भी चेरयदहां मोजद है । यदाके नवाबको सेरोका 
वड़ा रोक है । इतना शेरोका शौकीन शायद ही कोई दूखरा 
नवाब या राजञा होगा । पंचमजाज जब आये थे तव यर्हासे दश्च 





द्‌खनेके लिये; भेजवा दिये थे 














0 0, 1 णा 






८४ चारों धामक्षो यात्रा 


बाग देल कर यात्रियोंको नरसीजीका मन्दिर देखना चाहिये 

; चौके एक गोलाकार चबूतया देख पड़ता हे। शख चबरूतर 

चाये ओर क्ूरदासोंको मण्डली सजन गा-गाकर चक्कर: खायां 

॥ करती थी । पदेसे अब स्थानका दृश्य बदल गया है । पदे 
१ इतनी तड़क-मडक न थी । अव तो इस मन्दिरम्‌ सोने-चां दीक 

















। | : । =: . | 9.८ . है । 
| .  कपार, घुन्दरं चोखट ओर संगममेरका समा-मन्द्रि बन गया हे, 


, ओर नरसीज्ञी दि्य भवनमें विराजमान हो गेह । जास दशक 
 _ दशन करनेको आत है ¦ यहां कचूतर्योक्ो अन्न चुगाया जाता है । 
~ ^: दर्शन समाप्त कर अपने स्थानको खोट जाना चाहिये ओरं 
 श्रसाद्‌ पा, दृखरे दिनके ल्यिमी इसा छेखेना चाहिये 

| जो खोगरस्तेङी ची पूडियां लाते है, उन रातको पूडो-प्रसाद्‌ 
। बनाकर वाध छेना चाये । जो नहीं लाते, उन्हें कोई दख 
ए व्यवस्था अपने मोजनक्ौ कर छेनी चाहिये । दृश्वरे दिन गिनांरककी 
[र चटाई करनी पडती है । | 

| ` दृसखरे दिन गिर्नारके मध्यमे गुली गंगापर प्रसद्‌ पा खेला 
| चाहिये। जो लोग खानेको साथ नहीं ठे जते उन्हें वहां कष 
व पिता है । क्योकि खलानेकी कोई चीज वहां नहीं मिरुती । घोड- 








न ¬". 





५ 


गाडि्ोनि सूर्योदयसे पके दी गिर्नारके पदस्यरुपर पटं जाना 
चादिये। पवेतपर चढ़ाई करते ही करते सर्योदय होता है । एका- 


4 एक पर्वतमालापर सू्यंकौ सुनहरी किरणं सोनेका छ रख 





























आदमी ऊपर मजेमे चटु सकते है । जब यात्री रोग थक जाते है 
तब एक जगह जरा देर विश्राम भी करं ठेते है । ज्याद्‌ा दस्तक 
विश्राम कोई इसलिये नहीं करता कि धूप चट्‌ अआनेपर उन्हें 
चदा कष्ठ अधिक होनेका मय रहता दै । क्या आप जानते है 
कि इन सीदियों ( पैडयो ) की संख्या कितनी है १ हजार-दो 
हजार नही, प॒रे दस हजारकी संख्या है । इनको पार कर गुरु 
श्रीदन्ता्रयके चरणोके दर्शन होते है । दनमें कदी कहीं साघु 
महात्माओंके स्थान भी मिरुते है । जनभायोके मन्दिरिका रास्ता 
ओर गुरु दत्ताज्नयका मागे यरींसे कटकर गया हे, जद पर 
`ˆ सोरट महर बने हए है । हन महरोंको दैखनेकी यात्रियोको वड़ो 
इच्छा होती है, परन्तु महर हमेशा बन्द रहते हे । विना इन्तजाम- 
पडे रहनेके कारण अब शनम चमगादडोंका अड जमा रहता 

। सब सम्प्रदायकि याजो इन्हें देखनेको उतघुक रहते रे, परन्तु 
वन्द्‌ रहनेसे किसीका वश नदीं चता । इन मकानोके सम्बन्धे 
कहावत मशहर्हैे क्िअव भी यहां रातको पासो गैर 
सखोपडकी आवाज अती है| कछ भी हो, दमारतोमे जो सन्नारा 
भरा रहता है, उससे प्राचीनताकी जो रेखा चित्तपर अंकित होकर 
दीघ क्छालतक स्थायी वनी रहती है, वह बड़ी ही विचित्र ओ 
णक्‌ अपव निस्तब्ध भावक पेद्‌ा करनेवारी है । 




































५. ॥ 01 ^ ,५॥ ५ 


८६ चां धामकी याजा 
._ .__---------------------------------------------- ~ ` 


आगे बढनेपर दाहिने हाथ जो मागे गया हैः वह 


यभितमनगणिनेयनण्णि 











यहां कु प्रसाद्‌ रख गुर 


मरण करना चाहिये । इश्व तरह आसानीसे 
उनके चरणोंतक प्च हो जायगी । गोमुखीका मागे छोडकर 


ह दक पटाडसे उगे हए दो पेडंकी शीतर छायाम गोमयसरे ङीपा 





[र रणकमटोंका 











|. >; आ एश चवूतरा है ! यह स्थान परते्ाप कटखातारै। यह 
(श स्थान वडा रमणीक माम होता है । शछका इतिहास भी कर- 


ष्‌ 


| | ` ^ चास हि तप्रोत हे कहते टे, कितने री मरात्माअओंने अपने 





५. इदेवको उत्कर दरशन-लालसासे यांस कूदकर अपरे नश्वर 

। | । । शसीरका त्याग कर दिया है । यहां अपना सामान रखकर यरा- 

। ।  . कै रहनेवालोसे कह देना चाहिये । फिर बजरंगबरीक) योकी 

द बेटा गुर दत्तात्रयके चरणोकी ओर बहना चाहिये । यातौ जव 

 . गोमुखी गंगाखे चता है तब थोड़ी दूरपर एक ॒पहाड्के ऊपर 

= बहुतसे रंगूर फल-षूक-पत्ते खाते इए देख पडते है। श्न्दे 
छेडना उचित न्दी । [र 





| | शसक बाद्‌ यात्रियों को श्रीगोरखनाथका पहाड्‌ मिक्ता है ! 
नि ` यह पाड गोमुखी गंगासे बहुत उचा है । इसमें एक ऊारीसी 
शुषा बनी हई है। इ पाल एक धूनीमे भस्म पड़ दुई हे । 











| धूनीमें गडा इभा है । कहा जाता हं कि इस जगह 





गोरलनाथजो भजन करते थे । इसके आगे पहाड़की दो 
मे मिली हुई है । इनके भीतरसे याद्वि्योको निकव्टना 





चदानं श्रः 





जूनागढ गिनार ८७ 


_________--------------------------------------------- 


यडता ह । इसको मोश्चयोनि कते हे । मोरे आदमियोंको यहां 
मरोक्षपासिका दस्लाहस न कर बेटना चाहिये । यह से कछ इर- 
तक सीधा रास्ता मिखता है | यदांका पार्वत्य द्रश्य क्था विं 
है कि जान पडता है जः न आौर आखमानके बीयमे विधाताने 
यद एक दूखरौ ही अदत खष्टि कौ है। सहसलखेचन भी 
इख दश्यको देलक तृत्त न होगे! अर्ते समय जान पड़ता था 
+ कि दत्तात्रयजीका पहाड़ अवर करौब आ गया | ङेकिन यहां आति 
ही वह खयाल गायव हो जाता] यांसि उतरकर फिर एक 
दृखरे पहाड्की चढ़ाई करनी पडती है । दैलकर हिम्मत पस्त टो 
ज्ञाती है । छेकिनं घैयेके साथ श्रीगुर दत्तात्रयका ध्यान कर याति 
योँकते धीरे धोरे यह मार्ग मी ते कर छेना चाहिये । उनको कृपा- 
खे याजियोंको कोई कष्ट न होग? । वदिक आधे घण्टेमं वे रास्ता 
पार कर डासेगे ! चलते ख्य यहां बारंबार दृत्तात्रयके नामपर 
याचरियोकी सगनसेदिनी जयध्वनि पर्व॑तो प्रतिध्वनित हो हि 
यर्मकी महां लध्वनिकी तरह सुनाई देती है । हृदय भावावेशमे 
मस्तहो जाता है।\ इन सजीव प्रतिक छटाओंको छोड़कर 
गग {सिनेमा देखक्रर जो बदहलाया कसते हे । परन्तु उन्हे स्मरण 
रखना चाहिये कि निर्जोव छत्रिमता कमी खु करोपमररु सजीवताका 
मुकाबला नहीं कर सकती । यहां खाभ्यवाद्‌ भौ कितना मनाहर 
हे कि राजा ओर रंक एक ही मागंके पथिक है, कोई किसीसे 














. 






























17 





11.111 
ति का 1111 1 (११५ 





८८ चारों धामको याजा | 


¬ज भविभः नि मि किणि द म क त, 9 नात्‌ ह, ह ह 


, जवान, स्त्री-पुरुष, सबको यहां सीधी चद्वाई करनी पडती 
हे । शस पहाडमे १०० सीद्धियां है । ये नई नहीं, पुराने जमानेको 
बनी हुई है , परन्तु कष्टप्रद्‌ नहीं है । भयकी बात न रहनेपर भौ 
किसी किसीको धेयं मी नहीं रहता । क्योंकि दाहिनी ओर नज्ञर 
गई तो सीघे पाताकका रास्ता दिखलाई पड़ता है । यात्री रोग 
भगवानका नाम ठेते हु आनन्दसे पेंडियां पार करते चरे जाते 
है! उपर पहंचते ही सारा कष्ट आनन्द्का स्वरूप बन- 
जाता है । गुर दत्तात्रयके नेतलसुखद पवित्र पाटपीटोकि दूर्शन 
कर यात्री जीवनको सफर मानते है । चरण-चिह्लोपर एक 
खोरीसी छतरी बनी इई है इसके पास गोसाई' खोग वैरे इए 
भेर पाते है । द्शेन कर परिक्रमा करनी चाहिये । परिकिमामें एकः 
घण्टा कंधा हभाहै। इसे वजा देना चाहिये ताकि यायो 
पडुचनेकौ खबर गुरुके कानोंतक हो जाय । थोड़ी देस्तकः 
छनोके पास खड़े हो चारों ओर निगाह दौडाश्ये । विरार पङृति- 
की शक्ति-शोभा देखते है बनती दै । हदये जो अपार आनन्दकी 
धारा उमड़ चरती है उसका अनुभव वहो होता है । घर सै 
कर्पनाके सहारे, उसका ठेशमात्र भी अनुभव नहीं हो सकता । 
पूवेकी ओर दैखिये तो पहाडसे सरा इभा एक दूसरा पाड 
देख पडता हे । यह अधोरियोका पहाड है । श्खपर जाना कटिन 
हे । उत्तरकी ओर देखिये, हरे-भरे प्रफस्र वनोंका खमुद्रसा दिख- 
लाई --दूर-बहूत दूरतक--जहां तक द्रष्ट पंच हो ॥ 
वन दो है, एकको लाखा ओर दृसखरेको रोशा वन कहते है । इन 


प ` ` ~ ` , 

















जूनागद गिनांर ८६ 





जि णनो तणा कि 


नोसे होकर मी अनिका मार्ग है। शस मागेसे देदाती खोग 
आति है । यात्रियों को पे डिरयोखे होकर आना-जाना पड़ता दै । 
पच्छिमकी ओर पवेतपर खदी इई पेंडियोंकी शोभाका निरीक्षण 
कीजिये । दक्चिणक्छो ओर तरंगाकार पवेतमाला, पृथ्यीङे वंराग्य- 

विजय वक्षःस्थलपर पडो हई केसी खुन्दर भावनामय दो रहौ है | 
नादि मानो इस अपराजित शोभाके सोदलन्येपर पराजय खीकार 
करके उसके पेमोपहार मााके लिये विनयपूवेक प्राथेना कर 
रहा हे । 











1 नि 


यदहापर एक कमण्डल-तीथं है । यहां गुर दत्ताय स्नानः 
करते थे । श्सी ती्थेको जाना हो तो जहांपर डोलियां आकर 
हर्ती है, उन्हीके पाससे वांई' ओरको जो सीदियां गई इई टै, 
उन्हीके मार्भसे होकर जाना पडता हे । 

शस तरह दशान कर आदिस्तेसे उतर आना चाहिये । इनः 
भयावनी सीदटियोंसे हजारों वेः 






षंसे खगातार करोड़ों मनुष्य चद्‌ 
उतर चुके, पर किक्लीकी सत्यु हुईं रेका नहीं खन पड़ता । वहीं 
एक वड़ी जबरदस्त शिला टक रही है । नीचे उतरकर दैखिये 
तो होश उड्‌ जाते दहै । लेकिन इसी तरह अज्ञात अतीत कारुसे 
यह खरक रही है । | 

फिर गोमुखी गंग।पर पहुंच प्रसाद पाश्ये । पेखा प्रसादका। 
सवाद्‌ आपको कमी न मिखा होगा । अश्ुतजछ पीकर जीकी 
शन्ति दूनी । 
तप्र जगह-जगहपर खासख-खास् ह'गसे भापको 











&० ` सारं धामकी यात्रा 


पनि णमः न लो कि ति पन क त थ, भामिति त्‌ ता दा ष क न 0 


यहांकी एकान्त शान्त साघनाका भाव ऊढ विचित्रता जरूरला 
देगा। सब वीर्थाक्े च्वि यह खास बातदहै। यहां कछ देर ,, 
आशम कर फिर कमर कसनी चाहिये । चडढते खमय यात्रियोको 

दैर होती है, जोर पडता; परन्तु उतरते समय वे बहुत शीघ्र 
रास्ता पार कर ठेते ड । यहां देखने छायक एक स्थान ओरटहै। 
यह स॒चकुन्द-गुफा है ! जो रोग जाना चाह, वे इसे भी देख ठे । 
गिनारकी दश्यावली एक चार जिनके हद यमे अंकित हो गई दे, 
फिर जिन्दगी भर उक्चक्छी छाप नहीं मिट सकती । वह सन्द, 
उह सत्यं-शिवं- सुन्दरम्‌ को ञ्योति सदा अन्तरात्माकौ अन्धकार 
ञ्योतिपय बनाये रहती है । ` 
यहांसे सीधे उरे पटच आसम करना चादिये } उस दिनि 
यानियांको गुडका मोहनभोग खाना चाहिये, क्यांकि इससे 
कावर दूर होगी । जिन्हे" गुड़ हजम न हो, वे चीनीका बनाये; 
पर हष्टपुष्ट मदष्योको शुडका वना मोहनमोग ज्यादा फायदै- 
चर होगा । रातको नींद्‌ पेसी ख्गेगी कि मालूम होगा, जीवने 
शस तरहक्छो नीद कमी नहीं ख्गी | _ 

इश्च धर्मशाराके पात॒ एक किला है, इसे जूनागटकः सिखा 

कहते है । समे जानक लिये मुपरतमें पाख भिता है । यह किखा 
पांच हजार वेका बना हुभा वहत पुराना है । श्छ समयके रोग 
हजार वेका बना बतटते है । यह किला अनेक 

















॥ 









` ष 


जूनागद््‌ गिर्नार  &श 


[^ + + 


चौडा है | मखके ऊपर अरबी भाषा एक टेल लिखा हभ हे। ` 

यह किखा राव खंगारके हाथोसे मुसलमानोके अधिकारमे गया 
था) उखक्े महर इस समय शंडहरके सपमे जीर्ण हो रहे है । 
शमे पडे हुण है । इन्दीमिं मंडप बघकर राव लंगारने विवाह (कया 

था | दखसे भौर भी बहुतसे पुराने द्रश्य देख पडते हे । एक जगं 
सरोवर है। इसीसे श्राममे नलोंद्यारा पानी पहुंचाया जप्ता हे । 

, इस सरोवर पानी पर्वेतसे आता हे । 
यासे प्रमाल-ती्थकी तैयारी करनो चाहिये । स्टेशनपर 
पह्ंचकर वीरं्रामका टिकर छेना चाहिये । वीरप्राममे शड- 
पनाह देखिये । यह भी एक अदभुत द्रश्य है । ख विशाल प्राममे 
मुसर्मानोहीकी बस्ती अधिक हे । इसी सटेशनसे प्रभासको द्राम 
जाती हे । अकेडा हो तो द्रामखे जाना अच्छा है, ओर अगर कोई 
खाथ हयो तो घोदेगाडीसे ! प्रभासके पू्ेद्वारपर ससुद्रके किनार 
फक भारियेकी ध्ेशाखा हे । यह बड़ी सुन्दर, मन्य मास्त € । 
खीं उहर्ना अच्छा होगा । गाडीें वेड प्रभाखको चरतं समयं 
कन्रस्तान ही कत्रस्तान दिखाई देते है । यदा  वौरताक्रा पक 
सन्दर अमव दोता दे । यहांके निवासी वीर ये उन्हे श्चणमर- 
लिये पराधीन रहना स्वीकार न था । वे सुसलमानोंपर बरावर 
आक्रमण करते गये, जिखका फर यह धत्यश्च होता हं कि यदा 
कन्रस्तानेकी असंख्य संख्या हो गई । ये उन्दी मुसलमानों 


अरकबरे ड जो खडाश्मे मरे ये! । त 
+ . जब नगरका द्वार यगा, तब यह एक माप्त मोजाक्षा 




















मं 


| ६२ ॥ि चागो धामकी यात्र 


निति न पे कि ५ णिति) दि १ 





ए क क + 





+ ° 


1 । माद्ूम दोगा । इसके मकान बहुत पुराने मादू होते है । पुवेदार- 
` की धर्मशारमें ठहर ओर शौच आदिसे निच हो, स्नान करके 
। यहांके श्रघान दैवता ज्योतिलिङ्क सोपरेश्वर (सोमनाथ) महादेवके 
दशेनोके खये चखना चाहिये । यह्‌ ञ्योतिलिङ्क आदिलिंग मना 
` गया दहें। मन्द्रे भीतर जाश्येतो इसकी प्राचीनता प्रकर हो .. 
` जायगी । भीतर दै खियेगा कि एक शिच बरिरसाजमान है । शस मृतिके । 
नीचे एक गुफा-सी है । सीदियोंसे होकर नीचे उतरना पड़ता है । 
` भीतर रोशनोमें एक अदुभुत गोकाकार तेजोमय शिवलिङ्खके दशेन 
होते रहै। यह सौराद्रपति सोमनाथ है । स्पर्शं करके दर्शन करनेकाः 
` अधिकार खाधारण द्विजातिमात्रको है। गजनीका बाद्शाद, 
` महमूद, यहीसे अरबों धन ठे गया था । यहां शिवजीकौ विभूति, 
 सौन्वर्थं ओर तेज देखकर सम्पूणं दुःख-राशि दूर हो जाती है । 
` प्रभासे धमेशारसे पूवे आधे या पौन मीक दृरीपर एक ` 
बहुत उत्तम स्थान है । यहां पांच नदियां आकर मितो है । इनके 
नाम यह है--? हिरण्या, २ वजनी, ३ शट, ४ कपिखा, ५ सर- 
स्वतो! ये पांचों नदियां समुद्रकौो एक खाडीपे आकर मिलती 
। श्न नवि्योंका बहुत वड़ा मादात्म्यहै। 
छ सोमनाथज्ङञे दशेन कर, प्रसाद्‌ पा, विराम करना चाहिये । 
` ४ बजनेपर घोड़ागाड़ीपर सवार हो प्रत्यक्च सरस्यतीके दर्षनोकी 
तेयारी करना उचित है | सरस्तीके तटपर खड होकर दैलिघे,ये ` 
मन्द्‌ गतस बह रही है । यहां भी निस्तन्धता छाई रहती है । शांति 


तो आपको ते ही प्रात योगी; ओर से आप यहांका मोन 

















+ 


तूनागट 


| ना र्‌ ६ 


0 त का कक काणक कणकाषक्क कक कनकान्कागकगकषकाकाकाष्कककाकाका = 























प्रमाव प्रत्यक्ष करगे] चारों ओर खुदहावने पेड़ोकी पांति खड़ी 
इई है । सरस्वती साथ बहुत पुरानी एक एे्ी स्प्रुति जडी 
हई है जो हिन्दुभं हे मस्तिष्के चिर्काटतक अमर रहेगी ! 
इतिहासवेत्ता भी इसे नदीं भूल सकते । यीं यादवोंका निधन 
हभ था ! यादवोका षटूखा-फला वाग एक ही दिनम उजड़कर 
न जाने क्या हो गया ! धन्य है विघाताकी सृष्टि ओर धन्यै 
उखे विधान । वह भालाकार खड़े हुए रेरे जिनसे यादर्वोका 
"ध्वं हुआ, मव भो सरस्वतीके तटपर मोजूद्‌ दै । 
यहां टगु'र भो है'परन्तु दन्द छेडना उचित नहीं । अगर हले 
सके तो कुछ चने आदि इन्द चवा देना चादिये, अन्यथा मौन 
श्वारण किये रहना ही टक होगा | "यहां एक ही ठंगर 
माद्‌ असंख्य हे । यह एक विचित्र द्रश्य है ! कभी कभौ रेखा 
दोता है कि जंगलसे कोई ठंगर मोटा-ताजा होकर इससे डने 
ख्यि आता है। जब दोनो भधानक म्छयुद्ध॒छिड जाता 
› तब उखकी लिया ( मादागूर ) सिङ्डकर चुपचाप वैदी 
इई दोनांका महायुद्ध देखती रहतो दहै । वे किसीका पश्च नहीं 
तों । दोनोंकी देहसे शूनको धारा बह चलती है, पर तोभी 
-कोई मैदान छोडकर नदीं भागता । अन्तमं जिसे विजप मिरूती 
है, उसे ही वै सब मादा-छंगूर अपना पति स्वीकार करती है | 
दिन्दुभोंकौ खियो' ओर वच्चो"को छे भागनेवाङे मुसद्मा 
इखसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये । परन्तु उन्हे वीरता अआौर 
द्रढताक्षी क्या परवा ? चोरी करना ही उनके स्यि. परम धर्मे 


























क १५, . 
प ^ [॥ 
पो १ ॥ 1 ॥ 


६४ चाये धामी याचा 
दाखिल है, जो काम एक पशुभी नहं कर्ता । हिन्दुओको तो 
हर तरसे अपनी ब्रा्णीसि प्यारी पल्लियोंकी र्चा ख्ये बरी 


वीर र सारसी दोना चाहिये! 
यहां सरस्वतीके दष्ंन खमाप्त कर सायंकाटक्े समय प्ठिर 


ज्योविकिंङ-मगवान श्रोक्ोमनाथजीके दशेनोंको तेयारौ करना 
चाद्ये । वेद मन्त्रोच्च।र कर्ते हुए कछ कार्तक सैटकर ध्यान 
कौद्धिये । हदये आनन्दकी निमे धारा बह चरेगी । रोमांच 
होगा अौर जाध्रत सूतिका परमाव प्रत्यक्च हो जायगा। शामके. - 
वक्त सोमेश्वरे शांति र्ती है । रातको भी बड़ा खन्नाटा रहता 
है । रात्रिक दर्शन समाप्त कर अपने डेरेपर पटच विश्राम करना 
चहिये ॥ि [र 
 वीस्ररे दिन, बहो उखकर समुद दैवके दभोन कीजिये । 
धरमशालाके पीडे ही इनकी घोर गजेना हो रही है । अगर कोर्‌ः 
नानेकी इच्छा करे तो उसे दट्की तरंगोमे स्नान करना 
दिये । प्रातःकाल्का दरशन खमा कर प्रसाद्‌ पा कुछ विश्राम 
स्नेके च्छद तागा मंगवाकर भाड़ा तै कर छेना चाहिये कि दम 
लोग ऋ ण-सुक्तेश्वर उतरगे । यदी श्रीमगवानने नश्वर मञुष्य- 
नेरा समात्त की थी । यहां दशेन करके र गाडङीके वक्तपर 
 स्य्यान वापश् अ, जाना चाहिये । यात्रिथोको चादिये कि तांगे- 
वाछेसे पहर दी यदह करार कर ठं कि वह स्थान दिखाकर 
वक्तपर स्शनपर पटटुचा देगा 1 इसके वाद्‌ निरिचन्त. होकर तांगे- 


, भीतरसे होकर जाना पड़ता है यह भ्राम छोटा-सा है । 























2) 





ज्‌नागद्‌ गिनार ह्यः 








करनेपर फिर कब्रस्तान ओर खमरक्षेत्र आ जाते है 


११५ 


ससे 
पार करके ऋणमुकतेश्वर आना पड़ता है । कुदे बाद 


वह स्थान भी आ जाता है |, यहां उतरकर दशन कौजिये । ऋण- 
मुकतेश्वरका माहात्म्य ह कि ये ऋणसे मुक्त कर दैते है! दशेन 
भी बड़ विलक्षण होते है । जी भर जाता हे। जव दशेक मन्द्रिके 


बाहर आकर खड होते है तब देखते है कि बाई ओर रल्लाकर 


१ 





1 


सागर्की उत्तार तरंगे उट रही है । तरपर वाणेश्वर महदेव 
इसी जगहसे भीलने भगवान श्रोकृष्णचन्द्रके नेत्रोको श्छग- 
नेत्र समश्रकर तीरं मारा था । अहा ! वह कितनी करुणाका 
द्भ्य था ! मारतङ़े माग्य-सयं धीरे धीरे अस्ताचरुकी ओर धं 
रहे थे } जिनकी रोरापे अपार परेम, अजेय शये, अखण्ड ज्ञानः 
अप्रतिहत संगठन-शक्ति थी; जो भारते पूर्ण अवतार, अपने 
~~ . समयके एकमात्र सवेमान्य नेताथ; यहं उन्हीँकी ङीखाका 
अन्तिम पराक्चेप हुआ टै ! कितना भावव्यंजक ओौर कितना 
करुणाजनक यर स्थान रै ! 
महादेवके मन्दिस्से पांच सो कदम अगे कुछ ब्श्चसे देख पडते 
यही भगवान श्रीरृष्णचन्द्रको रीखावसानभूमि है । हदय 
थामकर यात्री इसकी ओर वदते है । यहां छोटासा एक पका 
पका पेड खडा टे । यहां पडंचते 





खरोवर रै । श्सके पाख एक 








१ 








& . चाये धाभमक्ती यात्रा 


लङ्क शयाघातसे धराशायी भगवान श्रीकृष्णचन्द्र दसी पीपरुके 
नीचे छेटे इष घे । याद्‌ कीजिये; श्टुगको मरा जान मोट दोडकर 
वहं आया ओर भगवानके द्रन करं बहुत हो खित॒ भावके 
कहने सगा “भगवन्‌ ! क्षमा कौजिये, मे आपका शरणागत हृं । 
मेरी रश्चा कीजिये । मेरे अपराधङो थाह नदीं हे 1 रुधिराक्त 
तण मगवानङ्े अरण कोमल चरणांसे ख्टक रदा है। अहा! 
वह कितनी कदणाकी घड़ी थी ! भील की बाते सुनकर श्रीमग- 
वानने कदा- तुम चिन्ता न करो । वड़ा आच्छा हुमा जो बदला 
आज चक गया । मेने मी तर्द चाण मारा था, जव तुम वारिः 

रूपमे थे । व्याधको भगवानकी बातोसे ज्ञान हो गया । शष 
पुण्य-भूमिक्णे ग्ज कर बार बार मस्तकपर श्वारण करना 


0 क त का 

















पवाहिये । 








 वाणेश्वर मदादेवसे होकर स्टेशन पटच द्वार्का-घामका 
टिकट खरीदना चाहिये । शीघ्र दी गाड़ द्वारका-घाम पह्चा देगी 
यह पुरी श्रो्ष्णचन्द्र भगवान सचिद्‌।नन्दकी है, जिसकी महिमा 
अमर है । इन्दी भगवानका यहांके रोग रण-छोड रीकः 





पुराण 
श्रीजी बाकेविहारी,सांवर सेटःमाखनचोर, आदि विरेषण दै देकर 
रहते ह । भक्तगण कछ दिन वहां रदं तो उन्हँ बह 














दार्का-धाम ६9 


ज म व 








जान पड़ता है कि हम द्वारकाधोशकी भूमिके निवाक्ती है, वही 
हमारे महाराज दहै । यहां श्रीजीका सैभव इतना बट्ावटू 
है कि संसारको चकित करनेवाला । यह व्यथेकी प्रशंसा 
नहीं है। श्रीजीके मन्दिर-शिखरपर जो ध्वना उड्‌ रही है 
वह कोई मामी पताशा नहीं । ५०1६० गज कपडे सके 
जनानेमे दजींके सिपुदं कयि जते हे । क्यां आपने क 
६० गज कपडकी कोई ध्वजा देखी है ? सुनी भी न दोगी । समुदर- 
-‹ के किनारे गोमतीतटपर यह आकाश चूमती हुई दवाके मन्द्‌- 
मन्द्‌ कोंकोमें भूमती रहती हे । मन्दिर देखक्रर तो आनन्दका 
फल्वारा फः र निकलता है । उच्छ वाखका वेग किसी तरह फिर " 
रकता ही नदीं । उसी सम्य दशेकोंको विदित होता हैक 
्री्ृष्णचन्द्रका कितना प्यार उनके हृदयम अज्ञात भावसे छिपा 
आ था। यहां सव कुछ अच्छा है; सिफं एकः बात खरकने 
वाटी रहै। यहं कुड गन्दगी रै, जिसे देखकर वड़ा ख 
होता है । यद्य॑की खफाईधर गांववारों ओर खास तोरसे राज्या- 
धिक्षारियोंको विश्षेषरूपसे धयान देना चाहिये । 
पहर घाममें उहस्नेकी कोई धमेशाटखा न्हीथी। इस कए 
कारण अनुमानतः यह जान पड़ता है किं यकि जखकष्टके | 
कारण किसने धर्मशाला नदय बनवाईं । जब ताराधम पानी 
स्हता है तव मी वड्ी दूरसे पानी छाया जाता है] इस समथ 
श्रीजोकी पासे एक ध्मशाखा तो स्येशनपर यातजियोज्छी-सेत्र 
च्य कैयार है! इसके वनवनेवाे कठकन्ते के प्रसिद्ध बात्रू 
१ | ७ | | ` 











शु 1 





॥ 














६८ चासें धामकी यतरा 


„~ ~~~ ~ `` `` ˆ~ 


हज्ञारीरमलज्ी दद्वेवाला है । हन्दोने इका निमाण करा खूब 
यशी प्रा की। दूसरी धर्मशाला मन्दिरे पास हदीदहे।श््से 
स्वर्गीय बाबू वर्देवदासजी दुदवेवाठेके खुपुत्र चखन्तखाखजी 
शपश्वरखाटजीने बनवाकर यातियोके सेवाभागका पुण्य 
कमाया है| यातरियोंकी जहां इच्छा हो, वहीं ठहर सकते 
हैः बार वार दशेनोंकी इच्छा रखलनेवा छेको चाहिये किं भीतर 
ही उतरे । ` 
` यातरियोको चाहिये किएक बार बधी कमरकौो हाखतमे 
दृशंन करर, अगर उन्हे' पट खुले इए भिर जायं । अगर पर बन्द्‌ 
तो स्नान कर फिर्दशन करे मन्दिसके दो द्वार प्रधान दहै 
एक तो गोमतीके तटवाला ओर दृखय भ्रामकौ तरफ्वाला । 
न्दिर-दवारपर प्रवेश करते ही दाहिने ओर बाय ओर परभुके दशन 
होते है । शसके आगे श्रीजीका सखभा-मन्दिर मिखता है । चोक्में 
दशेनाभिलाषी बेडे रहते हैँ । पर खुर्ते ही यात्रियों की जयजय. 
ध्वनिसे आसमान गुज उठतादहै ओर दृशेन करते समयक 
आनन्दका कहना हयी क्या है ? खड़े देखते ही रहिये, पर चित्तकी 
चाह पूरी नहीं दोतो, उत्तरोत्तर आकांक्षा बढती ही जाती हे। 
प्रमी चासते भजाओमिं शंख, चक्र, गदा, पद्म शोभायमान हे । 
मंस्तकपर मुङ्कट, कानोमिं कुण्डल, गरे तुखसी ओर बहुमूस्य 
मारा, गुखाबी ओर पीटी पोशाकमे सफद्‌ किनारीदार धोती 
पायल, अनिन्ध खुन्दररूपकी शोभाकी ओर दी छटा कर 
है। जव कभी वंशी धारण कप्ते है, तव तो सरलतापर 


+ 

















षि 


भोन्ति 


1. 
[व क म 


क 7 ध ॥ 
1 7 ग १ 1 १ 1 व 


४ [~ ( 














दार्का-धाम ६६& 


"~~~ ~~~ ~~ 
सवसव नि्ठावर कर देनेको जी चाहता है । आरती उतारने 


समय कसा अद्भुत तेज चेहरेसे बरसता रहता है कि वाह्‌ देखते 

जाश्ये, पर आंखे पटक मारनेकी दजाज्ञत न दै'गी | नये याजीकां 

तो जीवन दी सफल हो जाता है । उसके मनसे मार्जघ्रम ज 

कुल कष्ट दूर हो जाते ह । प्रत्युत उसका मुखमण्डल भी श्रीजीकै 

अखण्ड तेजका छोटासा एक विम्ब बनकर हषं ओर तेजोमय 

हो जाता है । थोड़ी दैरमे सेवकगण दश कोको पुष्प आदि अर्घ्यं 

लेकर देते है, खसे मादूम हो जाता है कि अब पर बन्द्‌ होनेवाछे 

है । यहांसे चलञर यात्री छोग चोकम आते है । यहां छोटे छो 

मन्दिरमे श्रीजीका परिवार विराजमान है । उनकी नामावली 
क्िण द्वारसे छेकर उत्तर दारतक इस प्रकार है :- कुण्डेश्वर ` 

महादेव, केशव भगवानः प्रय॒ म्नजी, अंबिका देवी, पुरुषोत्तम 

भगवान, गुर दत्तात्रयजी, प्रभुके सामने देवकी माता, बल्दाञजी 

राधारृष्ण, वेणौमाधव, शारदामटके शंकराचाये महाराजकौ गदी 

ओर पादुकां | ` | 

यहांसे टक््मी-माण्डारकी ओर च्य । जो क विभूति 
देख पडती दे, वह सब दन परटरानीजीकी ही पासे हैःसव इन्दी 





का प्रताप है | श्रौजीको तो पता ही नदीं कि लष््मीभाण्डारमें क्व 


रि 


है । उन्हे वख माखन-मिश्री, दूध-दही, पेडा-मिटाई आौर अनेक 
प्रकारके भागोसे मतलब ; ञ्याद्‌ा हिसाव-निकाष वे क्यों रखने 
खगे? त व | 

मगवानकी पररानियां है, लक्ष्मीज्ी, सत्यमामाजी, राधि. 


























काका + न निमी 


काजी ओर ज्ामवन्तीजी । _ पररानियोके मन्दिर एक 









१० = : यारों धामकी यात्रा 


क धि रा व 1 








बराबरी है । यदीं स्वामी शंकराचा यक्री गही भी है । यदांसे 
चलकर दुर्वाशा ऋषिके दशन करने चाहिये ! इनका मन्दिर छोटा- 
¶ह। शन्दे बडे अक्तिभावसे प्रणाम करना चाहिये । ये वरी 
राशा ऋषि है जिन्हे, राजे -महाराजे, ऋषि-मुनि, सब कोई उसे 
से! शृन्दोनि स्थ जोतकर, भगवानक) पररानियों खदित स्थपर 


ज्ञा सैडे थे । जव साक्षात्‌ भगवन ही इनसे इतना घबराते थे तब 


र 


॥ 


ध 


॥ 


हम रोगोंका कहना ही क्या है, हमे तो दनक अत्यधिक सम्मान 
करना उचित है । नके सामने ही दक्िणद्वार है । यदहांसे ७० 
सीद्वियां नीचे उतरते ही गोमती-गगा मिख्ती दै। अहातेमे 
कितने ही ओर भौ मन्दिर है । भमक्तिपूवंक सवके दशन ओरं 
व्रणाम कर्के वापस आना चादहिये। 
 दसरे दिन गोमतीपर पडुंचकर एक छाप खेन पड़ती है। 
सका कर १) चुका देनेपर स्नान करमेकी आज्ञा मिरुती हे । 


पक वार कर देकर पिर चाहे रोज स्नान किया करे । गोमतीमे 


पिश्डदान कर रणछोडजीके मन्दिरमे सामघ्री सहित जाना 
चाहिये)! कर चुका हर एक यात्री चाहे तो द्वारकाधीशकी पूजा 


- अपने हाथों कर सकता है । परन्तु अकसर यहां सष्डद्धिशारी 


 मष्य द पूजन करते देखे जाते दैः । य्हांसे फिर सभामन्दिरको 





ओर चलना चाहिये । यात्रियोके पडुंचनेपर मन्दिरमे परदा डाल 
दिया जाता है। फिर भगवानके सब चस उतारकर निर्वाण 


 दृशन.कराये जते है। इस समय देखिये, प्रभुकी नियाभरण देह 


॥ 
११ 












+ + 





चनन चमोनि 


कितनी मनोहर जान पडती है, ओर वक्षःस्थल श्गुखता-चिन्द- 
की बात ही क्वा, वहांसे मानों सौन्दर्ये, भाव ओर तिहासका 
मौलिक साक्षात सत्य प्रतिश्च॑ण निकलता रहता है । दुग्ध, दधिः 
घृत, मध, शकरा ओर जलसरे बरावर मरकर प्रम सहित स्नानं 
करावे, सके बाद वख धारण करा चन्दन, गन्ध-पुष्प आदिसे 


चित करे । सके अनन्तर आरती करे । यह्‌ पूजन-विधि सर्वांग 
पूर्ण हो जानेपर परदा हट ज्ञाता है । बाहर खड्‌ यात्रियोंकी 


४ 





जय जय-ध्वनि वारस्वार एक साथ उट उटकर जमीन ओर आस- 
मानक पे एकमे मिला देती है । जिन्होनि अपने हाथों श्रीप्रसुकौ 





५, "1. 


विधिपूर्वक पूज्ञा करके अन्तमं यह खद कण्टकी द९ ध्वनि 
है, उनका जीवन सार्थक है, इस समयके आनन्द्का रसास्वाद 


मै [शि 


उन्हे दीमिरुताहै। ` `. 

तोखरे दिन गोमतीम ख्लान करप्रसुदशंनके बाद्‌, गोमती- 
तपर आ. यहे द्वारकाधामकी परिक्रमा करनी चादिये । 
पर्िमाये कई तीर्थं मिरुते है । भूसैय वावेका मन्दिरः फिर प्रभ 
जिस कमे रैदा इप वह करूप मिरुता दै, फिर वह स्थान भी 
प्ता है जहां प्रस॒ने नरसीकीी डी स्वीकार की शी | फिर 
नगकःडः (राजा नग गिरगिर होकर इसी क डमे पड थे) फिर रिण 


मुक्तेश्वर आदिक दर्शनोके पश्चात्‌ परिक्रमा समाप्त हो जातो हे) 





। । । । | । ॥ । कि धा 











श्म 
1 








ध्रीपरभुके मन्दिर-शिखरपर जो ध्वजा फहरा रही है ओर दूरसे 


छोरीसखी मालूम देती है, इसकी बात सुनकर बड़ा आश्चयं होता 
है । इसमें पूरा ६० गज कपड़ा ख्गता है । जो भक्त ध्वजा चदने. 
की इच्छा रखता टै,उसते २००० ब्राह्मण-भोजनका भी संकस्प साथ 
ही करना चाहिये । ध्वज्ञा चट्निका वही अधिकारी है । जिस 


^ दिन कोर ध्वजा चदढाता है, उस दिन शहस्भरमें उसकी कीति 


पौर जाती है ओर बड़ी चहर्पहल दिखाई देने खगती है | चार 


वजे खोगोँकती अपार भीड़ छग जाती हे | ध्वज्ञाक्छी एक बडी गार 


बांधकर एक मनुष्य रस्सेसे ऊपरको चटाता है । वह द्र्य 








1 ५ 1 


देखने ही खायक् होता है कि व्रा्णो्षी जय भी पसवान कर एक 
भादमी पहली ध्वजाको खोखनेके लिय उपर चट्‌ जाता है, ओर 


५ 


बड़ी करिनतासरे ऊपरकी ध्वजा खोर, उसे बांधकर आसानीसे 


, 


नीचे उतारता है| फिर नई ध्वजाकी गांड दृण्डसे बांधकर, उपर- 


से एक नारियल धवजाकी पूजाम अपण कर ऊपरसे नीचेकौ ओर 


4 |, 


पटक देता है। नारियल नीचे आते ही उसे टूटनेके ख्ये टोग 
दोड़ पडते है । नारक नीचे गिरकर चकनाचूर दो जाता है । 


न्तु यहांके लोग चोरकी कुछ भो परवा न कर एक एक चर 
लूट छेते है । फिर ध्वैजा पटकनेको छोड़ते ही जयध्वनिसे आकाश 


गूज उठता है। उधर ब्रह्ममोज होना भी शुरू हो जाता है 


8 ॥ 


[3 


नन नाजिम 





५ 





ष. 








च . चत ष, 


यह ब्रह्मपुरी-स्थान मन्दिस्से कुछ हयौ दूरपर है। इसमे हजारे जद न स्यान मन्दर इख ही दूरपर हे । इसमे हाते 
ब्राह्मण एक साथ वैटकर भोजन करते है । मोजनके ल्य 
वड़ा ही सस्वादु मोदकः बनता है; दार, शाक, पूरी-ग्रसाद्‌ 
दिया ही जाता है। यह मोदक या ड. विविध प्रकारसे बनता 
है । एक वार प्रभने मुकरपर अन्नकोटके समय दशान देनेकी छया 
की थौ । अन्नकोरको 
पसे हो गई । यहांका अन्नकोट दूखरी जपु्ोके अन्नकोरसे बहुत 
ही बहा-चदढा शौर राजसी है ।. अनेक प्रकारके मिष्टान्न; धीका 
पकवान, पररी-बडे ौर सागोंकी संख्या तो कु गिनी नहं 
सक्ती । देवकी माताके सामने चूरमेका पक चवूतरा बनाया 
ज्ञाता है। यारी लोग अन्नकोट देखकर तना रलचति 
मसाद पानेके लिय अधीर दो उठते है । भगवानके मिष्टान्न भोग 

पदाथि मोसेख चीनी मिराई जाती हे । यह बड़ खेदकी बात है। 























न तो जगदीशमें श्सका प्रचार है, न रामेश्वस्मे उन्तराखण्डमें तोः 


हरिद्वारतक भी इसकी पैठ नहीं हयो पाद । छेकिन यदा यह भु 
चितदहो स्हादहै। यां देशी चीनी तो कीं दैखनेको भी नहीं 
मिती | अगर बहक ठ्यापारी विशेष ध्यान द्‌ तो इसका खुश्रार 
बहुत अंशि हो सकता है । इसमे सन्देह नहीं कि देशौ शकर 
प्रचारसे मगवानको अर प्रसन्नता होगी । 
द्वारकाधामके दृश्यो प्रशान्ति है । चारों ओरसे शहर पनाह 
हित बड़ा ह मनोहर श्र है । श्रीजीका मन्दिरः 





खकर बड़ा आनन्द मिखा । हदयक इच्छा 























# ^ 


१०४ चारों धाः 


॥ 








[ क छ क का क क ह ४ 0 क श त शा ॥ 7 ++ 0 का, 


हा है ! खमुद्र-पथसे आते हण यात्रियों आर कक्तानको हसे 
देखकर कितना ध्यं होता है ! सबके हृदयम दर्शनोंकी खारसा 
एक दृखर रत्नाकरकी तरह अगणित हर्षत्फहछ रहस उमड 
चरती है । ध्वजा मीलोसे समरुद-यात्रियोंकूो आश्वासनसा देती 
रहती है! 
नगरमे एक बहुत अच्छा पुस्तकालय है। यदहं समयपर 
लखा कश्ताहै। 
इस प्रकार तीन दिन द्ारकाधाममें परमानन्द ठेते इए तत्प- 
"श्चात्‌ भेट-द।रकाके लिये रवाना होना चादिये । पहरेपदल 
बेलगादड्योवरं बेडकर सेट द्वारकाकी यारा की जाती थी | उख 
समय सांफ-सुथरी सडक ओर कहके पेडोकी कतारका प्राङ- 


क आनन्द मिक्ता था ¦ बाई' ओके वक्ष अपने कोम किख- 
ख्य-करोसे प्रातःकारके भगवान भुवनभास्कर प्राचीपुत्रको 
वारंवार लम स्कार करते हण देख पडते थे- बड़ा अच्छा, बड़ा ही 
पवित्र जान पड़ता था । फिर सद्‌ा ही परशविमकी भरसे समुदर- 
शीतर वायुके भोंकोसे सवके सब अष्टावक्रकी तरह सिकुड 
जाते थे! सामने एक सरोवरके समीप श्रीरुक्मिणीजीका 
मन्दिरहै। = ` 
यहां उतर याजिर्योको सबसे बडी परसयनी माता रुक्पिणी- 
जीके दर्शन होते है । यहांसे नकी रूडे हए भावोसे विराजमानः 
। इनके दशंनोसि यात्रा सर्वा ग सम्पूणं खमभ्ी जाती है । कहते 























है, श्रीकृष्णसे रूखकर पररानीजीने यहां वास कियाथा | 


त 


४ 





 छ्वज्ञाः `: १०९५ 





यहांसे आगे खाडी परिलती है । किनारेपर व्याध जसे आदमी 
शंखके सूखे इए कीड़ वेचा करते है । इसी खाडीसे ये कोड 
निकारते है 1 इन कौडोंकी सूखी देह सुगासेगकौ अचक दवा 
वता जाती है! खाडीका दथ भी यपने दंगका निराला है । 
पानीमे कहीं कही सदी पहाड़ उपस्की ओर मेनाकको तरह 
सिर उठाये हण देख पडते दै, पदे लोग खाड़ीसे डोगियांपर वेट- 
कर भर द्ारकाकी यात्रा करते थे, परन्तु अब तो धा 
सीघे टिकानेतक आरामसे पटच जाते हे 
गयाहै। | 
भेट दवारकाम सत्यमामाजीकौ छोरीसी, लेकिन साफ एक 
धर्मशाला है । अमीर मोर धनीमानियोके ओर भी 
सुखप्रद अच्छेसे अच्छं स्थान दै । पहटेपदट यात्रौ जब मन्दिरके 
पास जाता है तव यदांकी विभूति देखकर उसकी उदासीनता 
दूर हो जाती है । चाये ओरसे सोने-वांदीकी चमचमाहटः नजर 
आती है, द्रष्ट फिसर जाती है ओर यात्रीको पेश्वयंकौ मदत्तापर 
मुग्ध हो जाना पड़ता है । मन्दिर क्या है स्वगेमहल दैः! बौचमे 
श्रीजी विराजमान है । महारानियोके मन्दिरोंकी तो बात हीन 
पूचिये । ` 
श्रीज्ीके स्थानपर पडह"चते हौ यादवियोमिं आरती-द्शेनांको 
राटसरा प्रवल हो जाती है | क्रमशः वे देखते है, टश्ष्मीजीका 
पण्डा स्वच्छ सुन्दर सपेद्‌ वख धारण किये, हाथ में 
लचिया लिये, जिसपर सापो ढकी रती है, श्रीजीके पास पटुंच 


। # 












+ # + । 


1 


गाडीक्रा प्रबन्ध दो 














1 









0 त 














साथ अपना भी सिर ककर कु वार्ताराप करता है ] 





दुपट्ा अलग कर अपना कान प्रमुके सुखके पाल खगा, 


धीरे धीरे सिर दिखाता रहता है जैसे प्रमुकौ आज्ञा खन रहा हो| 
यह दैखकर भोकेमाखे यात्रियोको विश्वास हो जाता है कि 


दोनोमें यथार्थ ही वार्ताखापहोरदादै। वे अपने विश्वालतपर 


इतना द्र रहते है कि क्डनेके खपे भी तयार हो जाया करते 





कमो कोई सेवक पटरानियोंकी तरफसे कोई सन्देशा सेक 
आताहे 

पक लीला भर याज्रियोंको चकित करनेवारी हे । वह यहं 
करि श्रीजीकः वही मनोहर सूति महखके ऊपर भी, शीर 





अन्दर देखनेको प्रिकुती है । असाधास्ण खोग तो क्या 
द्विमान भी इसे देखकर चक्कसमे पड़ जाते ह। उन्हं यह 


होता है कि अभी तो नीचे श्रौजीको देखकर दम चे 

1 रहे है अव यहां वही श्रीजी शीरोके अन्दर केसे आ गये ? 
कारण यदह है कि श्रीजीकी जो रतिं नीचे दहे, उसका बिम्ब एकं 
दूरे शशमे पड़ता है, फिर उससे ऊपरवाठे शीतम बही बिम्ब 
पडता है तरह कितने बिम्ब बना ल्य गये है । दूसरे शीशोका 
विम्ब रखोगोको दिखाई नहीं देता । जो लोग अन्धभक्ति करनेवाले 





^ 





से हवा करने लगता है । फिर 


ओर चुपचाप श्री प्रमुके कानों कहकर चखा जाता दे। 








ध्वजा १०७ 








है । क भो हो, यह्‌ अन्धश्चद्धा भी प्रथुको प्रसन्न करनेकै 
यथेष्ट है| वेतो बस भावके भषखेरहतेरह। . 
लीरा ओर होती है । इससे घूव मनोरञ्जन होता है । 
सव परटरानियोके सेवक, आये हुये श्रीमानोंको घेरकर . बेट. जाते 
है ओर अपनी अपनी महारानीकी बडे छम्ब टम्बे वाक्चामं तारीफ 
करना शुरू कर देते है । कोई कहता है कि रक्ष्मीजी श्रीजीको 
-„ सबसे प्यारी है। कोई कहता है, नदीं सत्यभामाजीको वे जि- 
` -तना प्यार करते है उतना ओर किसीको नही करते ।  तवतक 
जामवन्तीज्ीका सेवक बिगड़ खडा द्योता है । बह अपनी महार- 
नीका पश्च ठेकर कहता है कि बस्त जामवन्तीजीके मुकाबलेमं 
ओर कोई नदीं टहरती, क्योंकि श्चौजी उनके हाथक्रा कच्चा प्रसाद्‌ 
_ पाते ₹ै। यह अधिकार ओर किसी पटरानीको नीं 1 इख तरह 
आनन्द्- विनोदं होता रहता है 1 
` यदहकि वह्म-सम्प्रदायके आचार्यं गोसाजी ओर उनके पीछे 
पीछे वहुजी महारानी ध्र घट डाले सभामन्दिरमें श्रीजौके पूजनके 
द्यि आती है । बहूजी महाराजके सिवा दूखरौ खली सभामन्व्मे 
नहीं जा सकतो । श्रीजीके सामने गोसार्ईजी महाराज खड़ होते 
;उनके पीछे वहुजी महारानी । गोखाईजी महाराज पूजाकर करके 
सामग्री देते रहते है, बहजी महारानी धी रीतिसे अपेण करती 
जाती हैँ । आरती श"खोदक आदि अव श्सी तरह आधी रीतिसे 
अपितं हभ करता है । गोखाक्ष्जीके दपण दिखानेके पश्चात्‌ बहजी 
"महारानी श्रौजीको दर्पण दिखाती है पर उसी तरह उद्या । जनता 


ए; 



























# 


१०८ ` चारों धामी याच्ना 


[णकार णक्णकाणकावक्ावक्रण्ककरकानकाा वा प 


देखकर अटहास करने खुगती है । मतखब इसके पौरे माद्ुम 
जाता है} बह यह्‌ कि खियां खभावकी भोखीभारी होती हे । उन्हे 
बाकायद्‌। पूजन-विधिे क्या तअद्लुक १ परन्तु नहीं, इन भार्वो- 
प्रर ही श्रीजीको परमानन्दको प्रासि होती है ¦ 
` शसके पश्चात्‌क्षी खीखा बड़ी करुणा पूर्ण है यातरियोंकोः 
करेजेपर पत्थर ही रख ठेना पड़ता । इससे बचने या इसे नः 
देखनेका कोई उपाय भी नहीं है । मन्दिरिसे बाहर कुर दूरपर 
पीपलके पेड खड़े हए है ! इनके नीचे क 'डोंको आगमे भगवानके 
आयुध - शंख, चक्र, गदा, पद तपते रहते है । एक ओर कतार 
बांधे बारक, बद्ध, युवा सभी अवस्थाके रोग छाप ठेनेको तेयार 
रहते है । श्नमे बहुतेरे तो पदे हयी उद्‌ासख हो जाते हे । जच समय 
आता है, त्ष पृथ्वीम ह्यथ रोपकर रोगोंको छप टेनेके स्वि 
तैयार हो जाना पड़ता है । फिर भगवानके आयुध, लम्बे लम्बे 
चीमयोसे बादर निकालकर, छपाछप क्षण मारने लगते रहते है 
इसके पश्चात ऊापोंको दूध डवो देते है । छप र्ग जनेपर 
यात्रिय योको दरद धारण हो जाती है कि मब हमारे सामने भूलकर 
यमदूत नहीं आ सक्ते । 
र दिन तागेपर बैठकर गोपी तलाई जाना चादिये । मार्गमे 


॥ # + +^ ^+ 




















तिद्ध महादेवके दशन होते हें जिनकी कथा दारका-धाममे 
लेखी है । यह वदी नागेश्वर महादेव हें । यात्री भोजन साथ लेकर 
यहां ब्रहण करते हे, कोई कोई गोपीतला्ईमे चकर प्रसाद्‌ पाते 
है । नागेश्वरमे रातको कोई ठदरता नदं । कहावत मशदर दै £ 


। ए" 















गोपी ताई १०६ 





यहां एक नागर रातको भगवान शिवके पास आकर लिपर रहता 

 -बतलाते थे, इख समय तो पक्के घाट स्थान बन गये है, उक्त वक्त 
शून्य अरण्य ही अरण्य था । अव रातको यात्री यहां उद 
सकते हे, रडुविधा हो गई है । पर कावोंका अच भी बड़ा डर 
रहता टै । नदीं माम एसे भ्रव 

| "क्यों नहीं होता । 


= 


ख राञ्यमें चोरव्रत्तिका निरोधं 











परे गोपी तखाईका प्रसार सेकड़ं बीधे घेरकर था } इसकी 
मिद्टौ पीलो ओर कीं कहीं सफेद रङ्कौ थी । लोग उठाकर 
अपने हार्थसखे खाते ये । गोपी-चन्द्न बना बनाकर | 


` चते रहते हैः । जव गोपियोंको ठेकर अज्ञ नै आ रहे थे तब दुरे 
शोसे इसी जगह उन्दें सामना करना पड़ा था ओर उस महावीर ` 
| -गाण्डीवधारीौको प्रज्वलित अभिमानके लिये ईश्वरप्रदत्त दण्ड 
-स्वरूप गोपियोको दाथसे खोना पड़ा था | कितना अमोल, दूर 
 -स्म्रतिके गभेसे हमार अखण्डवीरताको जगनेवाला इतिहास 
है| कषयं है आज वे अज्ञ॒न ओर कहां दै आज वे श्रीकृष्णे 
छ सदा पागल रहनेवाटी पेमकी पवित्र सूतिं गोपियां १ 
 -महावीर खराखुर विज्ञयी अरज्ञनका सारा शोयं यहां तुच्छ 








[नि 





न 
(८ (0 धा ॥ 
| ( 1 ( 
1 1 
1 । 
(| (| 
(1 1 
11.11 











कि नि 


११० चारो धामक्ी यात्रा 


| 











्रीकृष्णके अन्तर्धान दोनेके साथ ही अज्ञुनका सम्पूणं बल- 
विक्रम अस्तंगत्‌ सूयेकी तरह निस्तैज दहो गया गोपयां 
जो अज्ञनके साथ लौटकर आ रदी थीं रेस अवस्था देखकर 
छद्‌ भी श्सी सरोवरमे श्रीरृष्णको याद्‌ करके तहीन हो 
गई" । द्रेरे काबे दैखतेके देखते रह गये ] उषी विनसे परम 
पवित्र गोपी तलाक नामस यह सरोवर प्रसिद्ध इभा । 
इसका चन्दन भक्त यात्रियों तथा दृखरे श्रद्धालु मचुष्योंको 
अवश्य खगाना चाहिये । इस समय गोपी तङाईपर कई स्थान 
बन गये है । पले यह्‌ एक वैराग्य उत्पन्न करनेवाखा खान था । 


॥ 





£ 


इस प्रकार परम पवित्र स्थानके दशन कर वियोग कष्टका सहन 
करते हुए बारम्बार श्रीप्रभुको यह याद्‌ दिखावे कि फिर बुखा- 
श्येगा--फिर दशन दीजियेगा, द्वारकाधा मसे गाड़ीपर सवार हं 
सिद्धपुर मातृगयाको प्रयाण करना चाहिये । 

 सिद्धपुरका स्टेशन देखते ही दृखरे स्टेशनोंके भाव गायव हों 
जाते है) यह स्टेशन मड ओर मन्दिरोंकी तर्टका रै। यांस 
सवारीपर या दैदल चलकर एक मीलसे कुछ दूर प्रत्यक्च॒ सर- 
के तटपर ठहर जाना अच्छा है । जिसकी माताका स्वर्म- 











बास हो गया हो उसके खिये यहां श्राद्ध करना परम आवश्यक 


(द 


है । राजे महाराजे, सेट सादूकार सव रोग यहां अपनी माताका 
श्राद्ध करति है! सरस्वती तटपर हजारोकी संख्ये यात्री 
स्नान, पूजन, तपेण.पिण्डदान करते देख पडते है । प्रत्यश्च रूपसे 
जैसी सरस्वती यहां है, पेसी ओौर कहीं नहीं । दूसरे कतनी गहरी 








(५५१ (0 
न ५१.७१५५०५५ 


८५५१-५०१०.४००१..४ 


थिम 


। 


५ 


हि | ॥५ 


गोपौ तलाई ` ११९ 











भो नहीं क इूबनेका भय हदो | इस शदरमे एक महरके कु खण्ड 
खड हे । शख मदलको अवश्य देखना चाहिये । इसका इतिहास 
सुनकर चकित होना पड़ता है । सिद्धपुस्से सीधे गाडी अहमद्‌ा- 





वादको जाती हे । शसीपर सवार हो जाना चाहिये । अहमदावादसे 


गाड़ी १०बजेके करीब मिरृती है दखीसे अवन्तिकापुसे ( उज्जैन ) 


को जाना चाहिये । ११॥ बजे गोधरा जंकशनपर उतर १॥ वजे- 


५" 


बहुत होते है। महाकाटेश्वर पहं चकर 


को गाड़ीपर सवरार होना चाहिये! यह गाडी बडोदासे आती 
है । यदांकी भूमि बड़ी भयंकर मादू देती है । दिनभर चकर 
गाडी रतखाम स्टेशन पटंचती दहे । फिर फतीयावादके बाद्‌ 
उजञ्जेन स्टेशन आ जाता है । क्षिप्रा नदीके तटपर फतेहपुरियोंकी 
ध्मेशारारमे ठहरना अच्छा है । पहले-पदर क्षिप्राके तटपर यारी 
पहु चते हे । इसका किना पक्ता बन्धा हुआ है । यह बहुत 
पुराना हे ससे यहके पराचीन वेभवका अच्छा ज्ञान हो जाता 
क्षिप्राका स्नान बड़े भाग्यसे मिख्ता है! शास्मि इसका 
वहत बदाचहा माहात्म्य गाया गया हे । नदीम कद्युए बहुत 
है । जग सावधानीसे लान करना चाहिये । खान, पूजन, पिण्ड 
दान आदि समापन कर उडजेनके महाराजा ज्योतिलिंग श्रीमदहा- 
कारेश्वरके दशन करने चादहिये। 

जाते समय मार्गमे कई तााब मिख्ते है। दनम सिंघाडे 
पक पक्ता ताराव 
दैखियेगा । यह शिवगङ्खाके नामंसे प्रसिद्ध हे । पहठे इसमें 
माजनकर पवित्र हो यात्री लोग मशके सहारे एकु गुफाकी 

















११२ चारों धामकौ यात्रा 


0 + नि जि ५ किति क क ह क क । क ॥ 1 0 





र जाते है। दख समय सवे धातुओंक्षा वना एक नन्दि 
केश्वर द्रष्टिगोचर होता है। इनकी पूजा करकं महाका 
श्वरे पास जाना चाये । दीपल्योतियोंष्छी सहदायतासे 
-अहाकारेश्वरके दरशन कर यात्रियोंको परम प्रसन्नता टोतीदहे 
गहुगहकण्ठ शिवजीका नाम रेते हप उन्हे देदकी भी खुधवुध्र नदीं 
रहती । पूजाकर बाहर आ महाराजके दौवान अगलेश्वरके दशं 
करना चाहिये । यहां दीपावरीके दो स्तस्म खड़े हुए है । नपर 
बर सोशनो.होती है तव जगमगाते हए बरक्षकौ तरह देखकर बड़ा 
अहाद्‌ होता है । जबतकः उञक्ैनये वास हो तबत्तक दोनों समय 
द॒शेन करना चाद्ये । दस्रं दिनि क्षिप्रा नदीसे परिक्रमा प्रारप भ- 
कर देषनेसे बड़े अदुभुत द्य देखनेको मिलते हे । एक जगह एक 
मस्जिद्‌ है । इसको उडी हुई मस्जिद कहते ह ¦ किसी खमयमे 
ह मस्जिद्‌ उडतो हई कीं जा रदी थी । इसे दैखकर एक सिद्ध 
शषने कहा.यदीं ठहर जा । वक मस्जिद वदीं रह गई । मस्जि 
नीचे अब मी नीव भरी हुई नहीं नजर आती फिर ऋ णमुतेश्वर - 
के पाख यहांकी भूमि देखनेसे उररी इई नजर आती हे । इसके 
ये यद्‌ कहावत है कि एक सिद्ध पुरषने इसको उल्ट दिया . 
थौ इसमे गोपीचन्दकी गुहा मिती दे । यहांके गोसाई ' खम 
शाटक सहारे यान्नियोंको भीतर छे जाते है" । य्हींपर बेडकर 
राजाने तपस्या कौ थी} एर श््सी. तरह दूसरी 
शुफामे जाना 


























होतादहै।! यह गृुपठा महाराज भतृहरिकी 
तपस्याका स्थानरहै। यद्यं शचुनोक्ी भस्म, चिमरा दिखाई 


प" त . † ६४ ५ ५ " \ । 








गोपी तकाई ११३ 


तिमि तिति जि ति मिनि ति मिनि सि णा मि ज हि ~ ~ + 1) + + 0 ^ 


देगा । ऊपरकी र देखिये तो एक शिखा रकती इई देख पड़गी । 
कहते हे, महाराज भतू हरि भजन्मे तद्छीन थे, उसी समय यह 
शिखा उनके ऊपर कटकर गिर रही थी । यह देख यह राजने 
कहा, बस वदी ठहर जा ! उसी दिनसे यह शिला ज्योंकी स्यो 
ख्टक रदी है । इसे वाद्‌ उक्ष जगदम्बाका मन्दिर मिरखता है ` 
जिसने तपस्वीको अमरकार दिया था । जिखके लिये कहते है 
अन्तम महोशजको ज्ञान इभा । उञ्जेनमे घड़ बड सिद्धे 
स्थान है । दशेन करते हुष्ट कई दिन खग जाते है । यहां महाराज 
विक्रमादित्यके विशार प्रासादका जीणांश अव भो दशेकोकी, 
कर्णा जगा देता टहै। इसको यात्रीगण बडे भावावेशमें 
देखते रहै । इखकी पूजा करते है । उञ्जेनका बाजार ओर 
अद्यावाईका श्रीगोपाल-मन्दिरि अवश्य दशना चाहिये। 
ओर योतो उञ्जेनकी प्राचीनता, उसकी पेतिहासिकता, उसकी 
-वतेमान अवश्थाके द्रश्य, उसके निवासियोके आचार-उ्यवहाः 
वर्हांकी महत्ता आदिके सम्बन्ध अगर कोई पूणं प्रकाश डाख्ना 
साह तो एक विशाल भ्न्थ तेयार हो जाय अस्तु, हासे चख्ते 
छमय महाकारेश्वरको अन्तिम वार प्रणाम करके दिनके ६ वजे 
यस भ्रस्थान कर ३ बजे मोरट ङ पडंचना होता हे । इसे कोई 
कोई खेरीधाट भी कहते है । उतरकर रात्रिको यदीं डेरा जमा ` 
वैलगाडीवारोखे भाड़ा तै कर छेना चादिये। फिर उनका कोई चख 
छेकर पार रख छेना चाहिये । फिर कोई डर नहीं । सूर्योदयसे 
„ हरे छा लड़ी कर दंगे । धातःकाख ही शोचक्रियासे चिञच 
८ 






































१९४ चारों धामको यात्रा 


[क छा क का व क वि 


गाडियोमिं वैर जायं । चाहिये कि पुरुष एक गाड़ीपर वेटे' ओर 
सिया दखरीपर । फिर मरोरसकसे कुछ दुर निकर जायेगा । स्व- 
गीय पथ देखकर पुरषोके हृदयम तो पीछेसे पर खि्योके हदयको 
अगाध अक्ति उमड़ चलती है : ओर भजनोंकी भड़ी खग जाती 
है! सच्चं सनातनधमेके अटल भावोंसे भरी इई रेसी 

वित्र भूमि, कि वाह! देखते दी जौ मन्त्रमुग्ध-सा हो 
जाता है । यहां सागवनकै पेड, हरी हरी पत्तियां ओर फेरी 
हई दब देखकर जीकी सारी जलन मिट जातीदहै। धीरे धीरे 


ार्मका मध्यभाग आता है यहां पुराने धने बरश्चोसे धिरा हुमा 
एक सरोवर है, ये पेड श्दौरकी अहरयाबाईके लगाये हे | 


यहांसे आगे चलनेपर विष्णुपुरी मिेगी । रातको यहीं विश्नाम 
करना चादिये ।-कपिलगज्ाका प्रवाद पहाडसे निककर नमेदामें 
मिता है । यद्यं ममलेश्वर महादेव है । कुछ रोगोका कहना है 
कि जमरेश्वर ही आकार रै ओर यदी ज्योतिलिंग हे । परन्तु शस 
अक्षार ममदेश्वरके कहनेपर भी वास्तवमें ओंकारेश्वर दी ञयो- 
तिडः महाद्रैव है! आज यही कपिला ओर नमेदाके संगमस्थल- 
स्नान कर संतष्ट हजिये । ममेश्वर महादेवका विधिपूवंक 
पूजन कर प्रसाद पा हरिस्मरण करते हुए विश्राम कीजिये । दिनके 
पिद्धसे पहर, जय ८*बजनेका समय हो, अपने विस्तरेसे उटकर 

सी मकानकी छतपर चरे जाये ! यहांसे ओंकारेश्वरकी छवि- 
पडते ही इुःख-ताप जाते रहे 











‰& 


५ 








१ 














१ 





| जरष्ली ५ 











तटपर केसी अहम्‌ त छवि छा रही है । ओंकार पर्व॑त ओकार ही 
माटूम देता हे । जिसपर बना हआ मन्दिर चन्द्रबिन्दुसा दिखखाई 

दे रहा हे । इस पवेतपर मन्दिर ओर राजमहल शोभा दे रहे है 

पवेतके दूसरी तरफ़ नमेदा ओर कावेरी दो नदियोंका खलद ` 


प्रवाह ओर सदसो भक्ति-गद्गदकण्ठसे हर-हरकी गगनसेदी 
मध्र ध्वनि सुनते दी रोमांच होने टगेगा | 











दूसरे दिन प्रातःकाल नावपर वेट ओंकारजीमें पच मान्धाता 
आदिकी धममेशाखामें ठहरना चाहिये । फिर नमेदापें विधिपूर्नक 
खान कर पूजनके लिय मन्दिरिकी ओर चखना चाहिये । -मंदिरपै 
भ्रवेश कर ओकारजीके दशेन कीजिये । यह शिवलिद् एक अजब ` 
तरहका मालूम देगा । पेखा जान पडता है कि यह शिवलिद्कः 
 किसीका- बनाया हूभा नदीं है । वनावरी प्रतिमाकीतरद इसमे (कोई 
सफाई नहीं हे । शिव-जलहरीके अन्दर पुजारी लोग हाथ रक्ले 
वेठे रहते है । जो कुर चटाया जाता है वह नीचे नहं गिरने ` 
पाताःचकड्‌ ठेते हे; नहीं तो वह शिवजीकै नीचे होकर सीधा नर्- 
दामे दी जाकर उहरे। आनन्दपूवेक पूजा कर पावेतीजीको प्रणाम 


करनेके अनन्तर बाहर आ जाना चाहिये । बाहर शुकदेव आदिक 
द्शेन होते हँ । इस मन्द्रिकी आमदनी ओंकारके राज्ञा सांहव 


ही पातेहैः। दस समय यहकि राजा खाहब भी मह 
* श्यीतर बटे नज्जर अते है। छखोग दनके भी दरशन करतेदहै। ` 


` कि 




















११६ चारों धामको यात्रा 


नी प ॥ वि 
वाक का क का क १ 0 थ + प 


यान्रीगभण इस पटाडके उपर गोरीशं कर महादेव ङे दशेन करने 
जाते है । पहाडपर जानिके छिपे सोदहियां बनी हई है । यह शिव- 
छिगि छः खात दाथ लम्बा ओर ञ्योतिङिग कहा जाता हे 

वड़ा ही तेजोमथ लिङ्क है। ओंकारेश्वर परिक्रिप्रा नावपर 
बैठकर पवेतके चायो ओर धमकर की जाती दै। कहतेहै, 
पवेतके उरपरसे भी रास्ताटै। पैदल चख्ना पड़ता दै 

डेन यह बहुत दुर्गम है । याज्जियोंको भूकर भो शख रास्तेसे 
परिक्रमान करनी चाहिये । नावपर पर्करिमा करते समयका 
परानन्द आप कमीन भुखेगा। नमेदव्छो उत्तार तरंगोकी 





५ 


 चदहर-पहट, उनका नावसे अटखेखियां करना, कीं करीं 
[र सरल ` रेला-सा प्रव प्रवाह, बड़ा हो मघुर, स्वगंषुख को. प्रत्यक्ष 
कर दिखानेवाखा हे । जबर पवंतकी पकरिप। परी दो जाती है तव 


.  कावैरीओर नर्मदाका संगमस्थर आता रै। यहां उतरकर याती 
स्नान करते टे । स्नान समात्त कर फिर नावपर्‌ बेठते रै । नाव 














 ,  कावेसीमरे चरती है । शली मार्गसे पद्मनाम भौर कमल मारतीकौ ` 
| टिया देकर बड़ा हर्ष होता है। आगे पर्वतसे रर खाकर 

त डे बेणसे याती दुई नरमद्‌ाके भवरोमें नाव पडतो है ओंक्ारजी- =, 

 ।  काध्यान करते हण पार कर परिकिमा सपरा करनी पड़ती है। “ 


सोमवारको पंचप्ुखी सवरणं 











हो मागमे अवंतिका ( उज्जैन ) को प्रणाम करते इष 
आकर उतरना चाहिये । चिन्तोड़्‌ इतिहास प्रसिद्ध स्थान 
दै.) यदहाका किरा अवक्षय देखना चाहिये । किलेमे मीराबाई 
` ओर अग्विकामाईके दशन दते है । किरेके अन्दर बडे 
८ तालाब है । इसक्मी सन्दस्ता ओर स्मरणीयतापर जो 
खा जाय, उसकी महन्ताकी ` दृष्टस थोड़ा है । राजपूत च 
की बति, टह महासमर, किरेकी दीवारपर गोलके निशनोंसे 
आज मी हृदयकी स्च वीरताको एक बार अवश्य जाघ्रत कर 
देगा । वह महाश्मशान लीला याद्‌ कीजिये, महारानी पश्चिनीः 
पवित्र कथा, उज्वल सतीत्व, वीर क्षज्राणीका महासमर, अन्तः 
अगणित राजपूत-कुलाङ्कनाभंका चिताटिङ्न याद्‌ है न १-- वद 





























- आज्ञ मी करुण नेन्नोंसे भानो अपने स्वधम 
है| ` | । 


१ 


चिन्तोडसे सवार हो मावली स्टेशन पहु च बेरुगाडियांसे 


< -नाथद्धारा जाना पडता है । यह भूमि पवेतमालासे छरी इई है, 





५ ¢ ण 




















1 
| 


म न 

















वितन्व 


(प 


पिक्का न च ^ च `  । " | 





११८ चारों धामकी यात्रा 





मन्दिर मम्दियेंकी बनावरके नहीं क्षिन्तु राजप्रासलादको तरहक 

है । दशेन नासियरु कर करना पडता है । नही तो दशनकी 

यशा अधूरी रह्‌ जायगी । मे पटरेपदड जब गया था, उस समय 
जन्पाष्टमी-पहोत्सव था, हजारोकी संख्याम नर-नासै दशन करने 

आये थे । उन श्चीमानोको हौ खातिरदारी होती थी । साधारण- ` 
जन बाहर ही खड थे । लक्ष्मीक सुपुत्रोंको भीतर कमल चोकम 
वैटनेको जगह दी गई थी । एक ओर स्त्रियाँ थीं । मेरी च्छा दुई 
किमे मी शृ्दीरने जाकर बेट ओर पहले दशन करू । टेक्छिन 
गरस्तेमें द्वारपाल नंगो तख्वार छ्य खडा था । जी सुख गया । 
पूनेपर एक बुदिया माताने मुञ्चे एक दुसरा द्वार बताया । 
साथ ही कहा, यह जो पदार्थं हम तयार कर रही है, इसको रेते 
जाओ, तभी जा सकोगे । उनकी आज्ञाचुसार में दूसरे द्वारसे 
मीतर घुख गया । वहाँ देखा, वकि मंत्री महोदय धनाठ्योके । 
सामने वैडे हए थे, बड़ी सजधजसे ये । जब उनको नजर मुक- ` 
पर पड़ी तो बड़े चकित हए, पूछा, तुम यहां कैसे अये ? में कुछ 

न बोला, चुपचाप बेटा रहा । तब श्रीमान्‌ मंजीजीकी आज्ञासे 
खङ्कधारी एक सिपाही दाथ पकड सुरे बाहर निकार दैनेके चये 

खे चला, कोई ५०० आदमी थे-सब अमीर थे--सवङे सब मेरी 
खातिरदारी देखकर प्रसन्न हु--शायद्‌ उन्हं भो याद्‌ आया हो 

कि हमारे बीचमें यह कीरः कसे आ बेटा । सक्रके सब सुस्करा,कर 

हंसे । बाहर निकार दैनेपर मेरे हदयमें फिर वदी चलकर बैटने- 
की च्छा हुई । में उसी राहसे फिर भीतर चला गया । योङ ~--- 






१५ 


` नाथ दवाय ९९१६ 


ति का क क क । क त 0 ॥ कि + ^ 7 + + + 





++ + 9 + 


वैरम मंजीजीक्ी निगाह्‌ पिर मुभ्पर पडी । उनका नापर था 
दयाराम !] श्रीभान्‌ते मुञ्चे देखते ही फरमाया, तुर्हं बाहर निकाठ 








दिया था, फिर तुप यहाँ आ ग्रे ? उनको उस: वातसे सुच बड़ा 
श्चोभ हुभा । मैं श्रोजीका स्मरण कर उठाोर कहाकिश्क्वामे 
श्रीजीका भक्त नहीं हं १ आप जिल बीकानेर भूमिके मनुष्य हे मे 
भी उसी भूमिका निवासी हं । चुरू मेसा नगर है । क्या धन्यो 
ओर सुन्दरी स्त्ियोदीको पहटे -पदर दर्शेन कराये जाते हे ` 
इन शन्दोसे श्रोमान्‌ पम॑जीजीके दोश कुछ टिकनेहुए। चुपहो 
रहे। सै वैटा रहा! टेकिन थोडी दैरमे फिर उन्हें मेरी सूरत 
खटकने ठगी । एक आदमीखे कानापूसी कर द्वारपालक 
संकेत कर दिया कि यह्‌ आदमी अबके भीतर हरगिज न आने 


। 


 पवे। में ताङ्‌ गया। जबधघ्ण्टी हई तब लोग उठकर 


1 





च्छे! नै सौ उधर ही चछा, एक दूसरे मागेसे श्रीजीके 
सामने पहु चा । प्रमु पादपरञमामें प्रणाम कर अपने अपमान 
खे उत्पन्न हुई उवाला शान्त की । श्रोप्रञ्ुके पाल ही गोखाई जी 


महाराज कभी वादोके ख्डु, कमी फिर्कौ, कमौ स्मन 
श्छनियां टेकर खेखा  ग्देथे। पाख मंजीजी ख्डेये। सुञ्चे 
देखकर त्योस्यां बदल रहै धे। मैने कहा, अव इतना जमेसे _ 
बाहर न हजिये, श्रीजीकौ सुपर छपा है, उन्दोने मुञ्चे बुखा ` 
दिया । मेरी वात सुनकर गोखाई'जी मु्कराये ओर सुकको बुला 
ला । अस्तु आनन्दपूर्वक ध्रीध्रमुको देख जीवन सफल किया । , 


> = परन्तु मै सबकी सुविधाके सिये अवज उडाता हं कि 








न ८ 





ना र च कष १ वष क 





२० | चाये धापम्रकी याजा 


कष्ककष्काष्ककष्ककाक का कक का का कि 


यहांसे उट जानी चाहिये किः अमीसेको तो खुमोतेखे दशेन कराये 
चारे ठोकरे' सहते रँ । क्या देवद 
चार है? यहां प्रसाद भौ बिना खै 
खोग यहां ६ रोज रहे, 

























यांसे ६ कोखपर एक बड़ा तीर्थंहै । यह एकर 
का स्थानहै। राञपुत-इतिहाखके साथ एक्टिंग महादेवकीः 
गीतिं भी अमर हे। एकलिंग उद्यपुरके दैवता दः । उद्यपुर 
यासे ६ कोख हे । राज्यको "वपरस" में भो एक ंगजी खुदा 
रहता हद । ` | ` 
यासे सवार दो यात्रिथोंको अजरः प्रघ्थान करना चाहिये ६ . 
अजमेर आनास्रागर एक बाग ओर जेनियोके मन्दिर देखने 
कायक है । फिर इककेपर बेटकर तीर्थराज पुष्कर जाना चाहिये । 
तीन धामकी यात्ना करके आये हए यात्री अन्तिमवार धोती यही 
धोकर यात्रा सम्पूर्णं करते हे । पुष्करकी महत्ता अवर्णनीय है 
दूश्योंका तो कहना दी क्या, म्रकृतिका उदार राञ्य-सा फेला हुआ 
है । याँ तीन पुष्कर है-- आदि पुष्कर, मध्य पुष्कर ओर चहत्‌ 
पुष्कर । दन तीनों पुष्करोमे ' त्रान ` करना चाहिये । प्क रोज 


॥ 0" 
























१२९ 






आरम्भ कीजिये । छत्री तीथं देखिये, फिर बाराहघारः । यह बहुत 





डा है ओर बना भी बहत पुराने जमानेका हे । परिकमा करत 
करते घाट ट जाते है । एक ओर पुष्कर -ओौर दूखपी ओर 
पवंत-माखा आ जाती हे । ७ वजेके समय पापमोचनी पर्दतप 
पंच पक दिन श्रौ सावित्रीके दशन अवश्य करं । यह पर्व॑त 
न्दर शिखरके सहश आकाशसे बाते कर रहा है! श्खपर 
डोलियां जाया करती है ! सावित्रीजीकी कथा भारते घर 
पट जाती हे । वै लियो शो आदश है । यहां उनकी जो प्रतिम 
है बह तेजोमयी रहै | उनके द्शेन कर प्रारङृतिक लीखाएः दख: ी 
चािये जो आश्चयं डाख्नेवाली है । पुष्कर प्रधान मन्दिर 
्रह्माका ह । यहाके सिवा ब्रह्माका मन्दिर ओर कीं नहीं है । 
पुष्करमें दिन्यदेश विशेषकर उह लयोम्य है । शसते बनने 
पांच वषेके खगमग समय लगा है । इसका मुख्य दवार तीर्था 
सुख ओर जोधपुर खुरखागर खानक गेहरगे पत्थरसे अनेकः 
कारोगरीके साथ बना है। भीतर सभा-मन्दिस्मे 
प्रकरनेके लगे है। यहां राजपुतानेकी कारीगरी दै 
बनती हे ! यहं दिव्य दैश १८ बीधाक्के घेरेमे बना है । इसके अन्दर 
बाग, कुप, गोशाला आदि बडे खुरम्य मालूम देते है । यहां 1 
दानक व्यवस्था भी अच्छी है | अच्छे अच्छे भाचासी आचार्य्यो 
खे अध्यापनका काये चिया जाता है । इसकै निर्माणकतां डिड- 
"चाना निवासी कलकत्तकै सुप्रसिद्ध श्रीमगनीराम बांगड़ रै । दिव्यः 


े 
















































(भपय दु कि च" 1 





१२२ चारे धामकी यातना 





दशके देलनेमें समथ खता है । इसलियि धमरशाला या भरतपुर 


महाराजके कुजे आसन खगा गङउघाश्पर जाना चाहिये 
पुष्करमे बड़ी सावधानी रखनेकी आवश्यकता है । हाथमे एक 
डण्डा या छडी रहै तो ओर अच्छा । क्योकि यहांके मगर नामो 
है । पण्डेजी यहां तीथेका आह्वान कस्ते है । क्योंकि सारम 


ऋतिक खुदी पकादशीसे ठेकर पूणिंमातक, सिफ ५ दिन वाख 


॥ करे पुष्कर महाराज यहां्ि अन्तित हो जाते हे । शासनीय 
` विधान हे कि आह्वान करनेपर वेआ जाते हे । सान, पूजन, 
. -परिकमाको हार हम पीर लिख चुकेहे। 

६: परिक्रमा -समाघ्त कर ब्रह्माके द्शौनके पश्चात्‌ तीन धामोंकी 
-यात्रा पूणं होती हे। यदांसे जहां श्च्छा यात्री जा सकता हे । रोग 
यहींसे अपने अपने घरका मागं छेते दै । जिन्हें प्रयागङे रास्तेसे 


॥ ` दोकर आना है, उन्हें स्मरण रखना चाहिये कि जो रेणुका : धञुष- 
| कोटिकी वे ठेते आये दहै, उसे अगर त्रिवेणी छोड दै" तो एक 


शिव-मन्दिरनिर्माणके इतना पुण्य होगा । जिन्दं करकत्तेद्धी 





॥ तर्फ आना है वे अजमेर, पुठेरा, मथुस, अयोध्या ओर प्रयाग 


' अवश्य होते आवे । 


ककगेकीभिभभ्यनानतिवतािा कनिनोततििकमनेतििततेननोतात 





=+ इख पुरुतकमें बद्रोनाथ, मानसरोवर, गंगोत्तरी, केदारनाथ, 


आदि उत्तराखण्डे पविन्न तीथेस्थरछोकी आवश्यक वर्णना नद 


१५५ 











सश ~= ~ 
~ ~ ~ -च------ 








--5- +~ ~. 








ह 
६ 
४ 
ध 
लः 
= 
र 
न 
: 
„स 
८ 


[1 र 
स 
ध 
० ~ 
1 
= 
(व ¢ 
& य 
य स 
4 
$ स 
क स 
9 स = स 
ल 
॥ र 
४ 
५ र 
धू 
ष 
ऋ स 
= 


बर्द्रीनाथ १२३ 





आ सकी | कार्ण यह्‌ कि मेरा विचार उत्तयाखण्डक्यी यात्रापर 
एक खतन्तर पुस्तक लिनेका था ओर अव भो है । यदि ईश्वस्की 
रपा भोर प्रेरणा हुई तो शीघ् ही मै अपनी मनोमिलाषा पूर्णं 
करनेकी चेष्ठा भी करू गा । ईस पुस्तकमें बद्रीनाथ आदिक 
स्तत वणना एक दृखरे चिचारसे भी नदीं की गई । वह यहं 
कि यात्री खोग तीन धामोंकौ यात्रा कर्के, उसी समय बदरीनाथ- 
की यात्रा नहीं करते, न कर सकते रै । वे थक जातेरहै, ओर 
खमय भी खग जाता है, अतएव उन्े कुड कारके. लिये विश्राम 
करनेकी आवश्यकता आ पडती हे | शसल्ये वे सीधा घरका 
मागे ठेते है भोर खास्थ्य सुधारक ही खमयायुखार चतुथे 
धास, बद्रिकाश्रमङे लिये प्रस्थान करते है । ओर जो रोग पदे 
दद्रीनाथको यात्रा करते वे वहांसे वापस आकर साधही 
अपर तीन धामोकी यात्रा नहीं करते । वे सीधे घरपर ही आकर 
उहरते हँ । सका कारण स्पष्ट बस वही हे कि अधिक परिश्रम- 
के पश्चात्‌ कुछ कारके छिये विघ्ाम आवश्यक हो जाते, 
चाहे पुरी, रामेश्वर ओर द्वारका, न तीन धार्मोंकी यात्रा एक 
साथ करे विश्राम करे, या अकेरे बद्रिकाश्रमसे छोटकर 
विश्राम करे, मतदब यह्‌ कि चाये धापमकी यात्रामें बदरिकाश्रम 
अपर तीन धाममोसे विर्िल्ष्टदीटै। शसलिये इस पुस्तकमे दम 
उसका उद्धे संक्षेपे ही करके शान्त हांगे। दसकी विस्तृत 
वर्णना ईश्वरकी श्च्छापर भवरम्बित है । यदि इश्वरकी इपा 
इई ओर पारटकोंसे भ॒शचै उत्साह मिखा तो विश्वासे किएक 











१२४ चारो धामक्से यात्रा 


१ 1 1 नमयामि नि 








ह | ममो त १ विमनो अतमि नि होन कम कजत 


पुस्तक श्सी तरहकयी वदरीनाथके मागंके परिचयमे तेयार 





न, < 





रीनाथके मामका वर्णन किया जाताटहे! 

हरिद्वार स मागका द्वार है, ससे प्रवेश करके यात्रियोको 

षीकेश पहुंचना चाहिये । हृषीकेश हरिद्वारसे १२ मौल पडता 

हे । सैटगाड़ी व श्क्के यातरियोंको मिरु सकते हेः । हषीकेशसे 

फिर आप चाहे जहां जयं, गंगोत्तरी, मानसरोवर, केदारनाथयाः 

वद्रीनाथ, आपको गगनविचुभ्बी पर्वतोके रास्तेसे ही गुजरना ` | 

होगा। मागेक्यारहै, केवल एक पडाडसे उतरकर दृसरोपर 

चद्ना है । यद्ीके च्य यह कहावत मशहर् दै “नो दिनि चलैः 
अदा३ं कोस | | 

` यात्रियोंको इख यात्रामें बहुत सावध्रान रहना चादिये । क्व॑ ॥ि 

५ खमरतर दैशोके रहनेवाछे यात्रो शस पहाड़ी देशमें प्रायः बीमार पड़ | 
~ जाते है उख समय एकाएक उस दुर्गम पार्वत्य भूमिम सहायता- ` 

 अभावसे बडा कष्ट उडाना पडता है । इसल््यि, सबसे परठेतोः 

याजियोंको कपडे-खत्तेसे ङस होकर यहांङी यात्राके चयि कमर | 

कसनी चाहिये । जूता, छतरी, दोकाई, कम्बल, पायजामा आदि 

अपने कामक चीजें जरूर साथ हों | जिनके पाख दनक! अभावः 

हो वे चाहें तो ह र्दवार्में यह सब सामान खरीद्‌ सकते है । क्यों - 

|| कि वहां याच्रियोंकौ आवश्यकता-पूतिके ल्यि दूकानोमे सब 

0 .. | सामान इकटं पिर जाते है । हाजमा दुरुप्त रखनेके खिये कोई 
{| अच्छा चूर्णं ओर बुखार आदिक बचावके ख्पि सैस्वग्सादि ठेना . 


























ॐ) 












यं क्छ साथमे ठेनेकी आवश्यकता नहीं । 
क्योकि बद्रीनाथतक सव चद्ियोभे 


जाता हैः जोर कहीं कहीं तो आवश्यक वतन भी दूकानद्योसे 
पिखजतेहै। | 
हषोकेषसे रश््मण्युखा एक मीखपर ग ज्ाजीके दाहिने 
किनारेपर है । पास ही एक छोटा-सा मन्दिर है. श्रीशनघ्रजी 
„ "कौ सूत्तिं स्थापित है । शन ्चजीके मन्व्रिसे रश्चमणजीका 
मन्द्र {एक मील पडता है। गङ्काके किनारे किन। 
चरना पडता है । चढ्ाई-उतराई खगम है। ट्टमणजीकः 
मन्दिर शिखरद्‌ार है । भीतर २ हाथक्छी ऊ ची, श्रीटक्ष्मणजीकी 
गोरांग सत्ति विराजमान रैः जिसके दशन कर जीवन 
चरिताथं हो जातादहै। इस मन्दिरिसे २ फर्छांगपर गंगाजीङ 
उपर खष्मणञ्चूखा नामक कटकता हुआ छोहेका पल है । यात्री 
रोग इसे पार कर फिर आगे बढते जाते है । ` यहां एक बात 
स्मरण रखनी चाहिये । पुर उतरनेके वाद्‌ ही एक दोमुदामागं 
मिखेगा। जो मागे बाई ओर गया रहै, बदरिकाश्चमका 
मागे वही है ओर दाहिनी ओरवाला भागे म्णिक्रूट पदतपर 
गया हे। 
उत्तरयालण्डके पावेत्य द्रष्यो.प्ररृतिकी सजोवं छराक्ा वर्णन 
थोड मं क्या करू १ उभडते हुए हरीखे हदयको यहां मुम्डे बर- 
बस रोकना पड रहा है, 
* -या्ाका हा श्तने संक्षेपे 


























। 





























१२६ चाये धमकी यात्रा 


_____-- ~~~ 
बरावर ही होता है । अपनी खासा में पटले जाहिर कर चुका 


ह.ओौर दविर निवेदन करता हं कि पाटकोंकौ आज्ञा ओर ईश्वरकीी 
र्णा होगी तो फिर किसी दूखरी पुस्तकमें स्वतन्त्ररूपसे परम 
प्रणीय संसखारकी सर्वश्र ष्ट भूमि, प्रकृतिके विहारस्थर, ऋषि- 
सुनियोकि तपस्याक्षेत्रका विस्तृत वणेन करूगा । ` 
अस्तु, सबसे पदरे गसर्डचद्री मिठेगो, फिर ॒फएूखचड्धी, श्सी 
तरह बद्ियोमे समते इण, भीटेश्वर, देव प्रयाग, श्रीनगर, 
शद्रधयाग, गङ्ख ओर मन्दाकिनीका संगम्षेत्र, र्दरेभ्वर, 
श॒प्तकाशी, घामाकोरो, महिषासुरमदि नी, मन्द्राचट, शाकस्मरौ 
दुर्गा, वियुगो नारायणः, सुण्डकयगणेश, गोरीकुण्ड, चीरवासाः 





, मं भनक 








तरव, श्रीकेदारनाथ, उलोमट, मध्यमेश्वर, तंगनाथ, मण्डटरगाच, 
रुद्रनाथ) गोपेश्वर, चमोली, विरही नदी ओर अरुकनन्दाका 


संगम, आदि बदरी, कल्पेश्वर, चद्ध बदरी, जोशीमरट, भविष्यः 
वदरी, विष्णुप्रयाग, पाण्ड्केश्चर, योगवदरी आदि अनेक पुण्य- 
स्यो, देवों, देवारयो, पूतसलिखोदय सखदहोदरा अनेक नदिया, 
नयन-मनोरञ्जिनी, खगेखप्रसे भी खन्दर कितनी ही प्रक्तिकृतियो 

को देखकर नश्वर शरोरका साथेक गौरव मनाते हृद प्रधान 
तीर्श्चे् बदरीनाथके पादपड्कजोमे आकर हाजिर हजिये । दशेनोसे 
जीवन तो पवित्र है ही, साथ दो, कुर-परिवकष्र, पूवेज ओर वंश 
भो पवित हो जायगा ! पूवेज्ञगण आप जेसे सुपुत्रकौ पवित्रता- 
पर अनेकानेक आशीर्वाद दंगे भौर उनकी आत्मा सवेप्रकारकीः 
बाधाओंका अतिक्रमण करके अक्चय खगंकी परासि होगी { 
























१२७. 








आप मी अपने गुरुभार पिच्रऋणसे सदाके स्यि निष्छति 
पाकर मुक्तात्माके खटदरश पापलेशरहित होकर संसारम विचरण 
करगे । 


ओम्‌ शान्तिः शान्तिः शान्तिः| 





11 7.१ 


र 
4 


ध 


(8 


25 


८100] 


< 


¢ 


191} 


"ट 
(= 
प 
¢ 
न 
श) 


1 {6त 9 


(0१6 एए 


हव